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अपने भी रोक रहे हैं नरेंद्र मोदी की राह

उप-प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर दो अलग खेमों से अरुण जेटली और सुषमा स्वराज का नाम उछलना जाहिर करता है कि बीजेपी के चूके हुए दावेदार बिसात बिछाने में लगे हुए है.

अपडेटेड 14 अप्रैल , 2014
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में नेतृत्व का मुद्दा तय तो हो गया है, पर सबने उस नेतृत्व को स्वीकार भी कर लिया हो, ऐसा लगता नहीं. किसी भी संगठन में पीढ़ी परिवर्तन आसान नहीं होता. मामला राजनैतिक दल का हो तो यह और मुश्किल होता है. उस पर बात अगर ऐसे राजनैतिक दल की हो जिसके सत्ता में आने की प्रबल संभावना हो तो फिर तो आप कल्पना ही कर सकते हैं कि समस्या कितनी विकट हो सकती है.

पिछले करीब साल भर से बीजेपी इसी मुश्किल से रू-ब-रू है. पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मिले-जुले प्रयास से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए हैं. लेकिन पार्टी में शीर्ष पर अभी ऐसे लोग हैं, जिनकी नजर में नेतृत्व का मुद्दा खुला हुआ है. उन्हें बस मौके का इंतजार है.

यही कारण है कि बीजेपी के सत्ता में आने की संभावना के साथ ही भावी प्रधानमंत्री के नामों की भी चर्चा शुरू हो जाती है. इसी चर्चा के कारण कहा जाता है कि बीजेपी में एक 160 क्लब है. इसका अर्थ है कि पार्टी में ऐसे लोग हैं जिन्हें पार्टी की कम कामयाबी में अपने लिए अवसर नजर आता है. ये वही लोग हैं जो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो छोड़िए, राष्ट्रीय चुनाव अभियान समिति की कमान भी सौंपने को तैयार नहीं थे.

उनका तर्क था कि मोदी को नेतृत्व सौंपने से देश भर में एक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो जाएगा और बीजेपी अलग-थलग पड़ जाएगी. कहा गया कि इस फैसले को चार राज्यों के विधानसभा चुनाव तक तो कम-से-कम रोक ही दिया जाए. पर फैसला रुका नहीं और विधानसभा चुनाव में नुकसान की बजाय फायदा ही हुआ.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के दौरान अंदेशा जताया गया कि पार्टी को नए साथी नहीं मिलेंगे. अब इस समय स्थिति यह है कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को जितने सहयोगी मिले हैं, उतने 2009 में लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के समय भी नहीं मिले थे. लेकिन वह नेता ही क्या जो इतनी आसानी से हार मान ले.

अति आशावाद और असीमित महत्वाकांक्षा नेता की सबसे बड़ी पूंजी होती है. और बीजेपी तो अटल बिहारी वाजपेयी की पार्टी है जिनकी कविता की प्रसिद्ध पंक्ति है, हार नहीं मानूंगा रार नई ठानूंगा. तभी तो देखिए न, बीजेपी में आडवाणी के नेतृत्व में नई रार ठानने के लिए कई लोग बैठे हैं. इनके और बीजेपी विरोधियों के लक्ष्य में कोई अंतर नहीं है. दोनों का लक्ष्य एक ही हैः मोदी को रोकना.

मोदी की लड़ाई अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर है. फर्क सिर्फ इतना है कि बाहर की लड़ाई का वे खुला जवाब दे सकते हैं, अंदरवालों का जवाब देने के लिए उन्हें पार्टी में अपने साथियों की जरूरत है. बीजेपी में अंदर की लड़ाई रुकी नहीं है, चुनाव नतीजों तक के लिए वह स्थगित हो गई है. बीजेपी में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की कमी नहीं है. आडवाणी के शब्दकोश में रिटायरमेंट शब्द है ही नहीं. सो यह रामरथी अभी पैदल नहीं हुआ है.

उनकी हालत यह है कि साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं. प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा आज भी जोर मार रही है. उनके तरकश में और भी तीर हैं. उनको खारिज किया तो सुषमा स्वराज सामने खड़ी नजर आएंगी. सुषमा पार्टी के अंदर लगातार अपने को मोदी विरोधियों के गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बनाने में लगी हुई हैं. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी के साथ खड़े हैं लेकिन 16 मई के बाद दांव लगा तो चौका मारने से क्यों चूकना चाहेंगे.

ऐसा नहीं है कि मोदी को यह सब पता नहीं है. वे अपने विरोधी खेमे की गतिविधियों के प्रति बहुत सतर्क हैं. यही वजह है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जैसे ही ट्वीट किया कि ‘‘अबकी बार भाजपा सरकार्य, मोदी खेमा सक्रिय हो गया. आधे घंटे के अंदर ही उन्हें नारे को बदलना पड़ा.

उन्होंने दुबारा ट्वीट किया ‘‘अबकी बार मोदी सरकार’’, अब सवाल यह है कि आम चुनाव में बीजेपी की 160 या 170 ही सीटें आने पर क्या मोदी के अलावा पार्टी का कोई और नेता प्रधानमंत्री हो सकता है? इसका जवाब हां और ना दोनों में है. मोदी खेमे वाले इसका जवाब ना में और उनके विरोधी हां में देंगे.

पर क्या ऐसा संभव है? ऐसी कोशिश एक बार 1989 में हुई थी. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल ने चुनाव लड़ा और चुनाव बाद चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश हुई. उसका क्या हश्र हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं. बीजेपी के 160 क्लब का सबसे बड़ा तर्क यही है कि बीजेपी इतने पर ही रुक गई तो सरकार बनाने के लिए नए साथी इसी शर्त पर आएंगे कि मोदी प्रधानमंत्री नहीं होंगे. तार्किक रूप से यह बात ठीक लगती है.

लेकिन व्यावहारिक नजरिए से और इतिहास के आईने में देखें तो यह दावा कमजोर नजर आता है. 162 सीटों पर तो अटल बिहारी वाजपेयी को भी साथी नहीं मिले थे. 182 पर मिल गए. बीजेपी को जितनी भी सीटें मिलें, उसमें मोदी के योगदान को नकारना कठिन होगा. मान भी लें कि मोदी के नाम पर नए साथी नहीं मिलेंगे तो क्या बीजेपी इसके लिए अपने सबसे लोकप्रिय नेता की कुर्बानी देने को तैयार हो जाएगी? उससे भी बड़ा सवाल है कि पार्टी को 112 से 160 या 170 सीटों तक  पहुंचाने वाले मोदी क्या इतनी आसानी से दिल्ली छोड़कर गांधीनगर लौट जाएंगे? इस नाटक के अगले दृश्य के लिए 16 मई का इंतजार कीजिए.
 
(प्रदीप सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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