तारीख 24 मार्च है और दोपहर के दो बजे हैं. जौनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में वकील अपना कामकाज निबटा रहे हैं. अचानक दो दर्जन युवाओं का झुंड वकीलों के खेमे में दाखिल होता है. जोरदार नारा गूंजता है, ‘‘जौनपुर की तरक्की, रवींद्र नारायण शुक्ला करेंगे पक्की.’’ आंखों पर मोटा चश्मा लगाए एक कोने में बैठे 60 वर्षीय वकील आनंद प्रकाश बुदबुदाते हैं, ‘‘अब यह कौन नया उम्मीदवार अचानक चुनाव में आ टपका.’’ कुछ ही देर में गेंदे के पीले फूल की मालाओं से ढके फिल्म अभिनेता रवि किशन नमूदार होते हैं. आनंद प्रकाश को मामला समझने में देर नहीं लगी.
यह सियासी मजबूरियों का ही तकाजा था, जिसने जौनपुर के साढ़े तीन लाख ब्राह्मण वोटरों पर कब्जा जमाने के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार रवि किशन को अपनी जाति को आगे करना पड़ा. रवि किशन का तर्क है, ‘‘सभी कार्यकर्ता चाहते थे कि मैं अपने नाम के आगे शुक्ला लगाऊं, मैंने वैसा ही किया.’’
यूपी की सियासी जंग की यही हकीकत है. लोकसभा चुनाव की आहट शुरू होते ही सभी पार्टियां विकास के दावों के रथ पर सवार होने का दिखावा कर रही थीं लेकिन जैसे ही बिगुल बजा, 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के चुनावी चौसर में जाति के घोड़े कुलांचे भरने लगे. इलाके में जाति का अंकगणित उम्मीदवारों के चयन का पैमाना बन गया. सभी पार्टियों ने अपने समीकरणों के हिसाब से मोहरे सेट करने की भरपूर कोशिश की है. राजनैतिक दल विकास का मुखौटा लगाकर जनता के बीच हैं लेकिन इनके अंदरखाने में जातियों पर दांव लगाए जा रहे हैं.

मायावती को भाए ब्राह्मण
प्रत्याशीः 21 ब्राह्मण, 19 मुस्लिम, 17 दलित, 15 पिछड़े, 8 ठाकुर
20 मार्च की दोपहर एक बजे लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित बीएसपी के प्रदेश दफ्तर में जब मायावती पार्टी उम्मीदवारों की सूची जारी करने पहुंचीं तो यह बताना नहीं भूलीं कि उन्होंने सबसे ज्यादा 21 टिकट ब्राह्मणों को ही दिए हैं. मायावती ने साफ कहा, ‘‘यूपी की 17 सुरक्षित सीटों पर दलित प्रत्याशियों को उतारने के साथ बीएसपी ने क्षत्रिय समाज को आठ, पिछड़े वर्ग से 15 और मुस्लिम बिरादरी से 19 उम्मीदवारों को टिकट दिया है.’’
जाहिर है, जिस तरह से मायावती ने ब्राह्मणों और ठाकुरों को रिकॉर्ड टिकट दिए हैं उससे साफ है कि वे यही संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी का ‘‘अपर कास्ट’’ से भरोसा घटा कम नहीं हुआ है.
इसी भरोसे को और अधिक मजबूती देने के लिए बीएसपी ने इस बार ब्राह्मणों और ठाकुरों को अधिक तवज्जो दी है. 2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बीएसपी ने ‘‘अपर कास्ट’’ पर भरोसा जताते हुए 20 ब्राह्मणों और सात ठाकुरों को टिकट दिया था. इस बार यह संख्या एक-एक बढ़ी है. मुजफ्फरनगर दंगे और वाराणसी से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के चुनाव लडऩे से बदले सियासी समीकरण को साधने के लिए मायावती ने पिछली बार की तुलना में पांच ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा है.
पश्चिम में दंगे के बाद सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) के खिलाफ मुसलमानों की नाराजगी को ‘‘कैश’’ कराने के लिए बीएसपी ने दंगा पीड़ित मुजफ्फरनगर, कैराना लोकसभा क्षेत्र के अलावा अपेक्षाकृत अधिक मुस्लिम आबादी वाले इलाके रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ में इसी बिरादरी के नुमाइंदों को उम्मीदवार बनाया है. बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी कहते हैं, ‘‘दूसरी पार्टियों की तुलना में मुसलमानों को सबसे ज्यादा टिकट देकर बीएसपी ने साबित कर दिया है कि यही इकलौती पार्टी समाज के इस तबके की सबसे बड़ी हितैषी है.’’
इस बार के टिकट बंटवारे की एक खास बात यह भी है कि पिछली बार तीन वैश्यों को टिकट देने वाली बीएसपी ने इस बार उनसे किनारा कर लिया है. पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव बताते हैं, ‘‘ब्राह्मण और ठाकुरों की तरह वैश्य समाज बीएसपी से नहीं जुड़ रहा है.’’ कुछ ऐसी ही स्थिति पिछड़े वर्ग के साथ भी है. इस बार मायावती ने पिछली बार की तुलना में पिछड़े वर्ग के तीन उम्मीदवार कम उतारे हैं.

( प्रबुद्ध सभा में ब्राह्मण नेताओं के साथ मुलायम सिंह यादव)
पिछड़े-मुसलमान दौड़ाएंगे साइकिल
प्रत्याशीः दलित 17, मुस्लिम 13, यादव 13, कुर्मी 8, ठाकुर 11, ब्राह्मण 7, ओबीसी 8, वैश्य 1
यूपी में सपा कुल 78 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिसमें पार्टी ने सबसे ज्यादा 29 सीटों पर पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार उतारे हैं. इसके बाद मुस्लिम 13, ठाकुर 11, ब्राह्मण 7, दलित 17 और एक वैश्य को सपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सफर में यह पहली बार है.
जब उनके सामने पश्चिमी यूपी में दंगे के कारण नाराज चल रहे मुसलमानों को मनाने की चुनौती है. इसके लिए मुलायम ने पश्चिमी यूपी की 22 सीटों में से 10 पर मुसलमान उम्मीदवारों को उतारकर जातिगत समीकरणों को साधने का दांव खेला है.
इतना ही नहीं, अपनी स्वजातीय बिरादरी पर पकड़ बनाए रखने के लिए मुलायम ने 13 यादव प्रत्याशियों पर दांव लगाया है. बीजेपी में टिकट बंटवारे के बाद ब्राह्मणों के असंतोष में भी सपा अपने लिए अवसर देख रही है. इसीलिए पार्टी ने प्रबुद्घ सभा के अध्यक्ष मनोज पांडेय को आगे कर दिया है. पिछले दो हफ्ते के दौरान पांडे यूपी के एक दर्जन जिलों में सम्मेलन कर ब्राह्मणों को सपा के पह्न में लामबंद करने में जुट गए हैं.

(बीजेपी की दलित भागीदारी रैली)
बीजेपी का अगड़ा-पिछड़ा गठजोड़
प्रत्याशीः ब्राह्मण 17, ठाकुर 14, ओबीसी 25, दलित 17, वैश्य 3, पारसी 1, भूमिहार 1
अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की चुनावी सीट वाराणसी पर राह आसान करने की जुगत ही थी जिसने यूपी में बीजेपी को अपना दल से गठबंधन करने को मजबूर कर दिया. वाराणसी में करीब 3 लाख कुर्मी मतदाता हैं. अपना दल की राष्ट्रीय महासचिव अनुप्रिया पटेल कहती हैं, ‘‘अगर वाराणसी में 60 फीसदी कुर्मी वोट भी मोदी को मिल गया तो उनकी बढ़त का अंदाजा लगाया जा सकता है.’’ पटेल कुर्मी वोटों को लामबंद करने के लिए वाराणसी की बगल की मिर्जापुर सीट पर चुनाव लड़ रही हैं.
मोदी के रथ को यूपी में दौड़ाने के लिए बीजेपी ने अगड़ा-पिछड़ा गठजोड़ पर भरोसा जताया है. अब तक घोषित 78 लोकसभा उम्मीदवारों में बीजेपी ने ब्राह्मण 17, ठाकुर 14, दलित 17, वैश्य 3, एक पारसी और एक भूमिहार को चुनाव में उतारा है. खास बात यह है कि पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है. दूसरी ओर मुसलमानों के विरोध में खड़ी जाट और गुर्जर बिरादरियों का फायदा लेने के लिए पार्टी ने पश्चिम की 22 सीटों में सबसे ज्यादा सात सीटों पर जाट और गुर्जर उम्मीवारों को तवज्जो दी है.
उत्तर प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं, ‘‘बीजेपी के लिए लोकसभा चुनाव में विकास ही एकमात्र एजेंडा है लेकिन जनतंत्र में जाति समूहों के प्रतिनिधित्व की अनदेखी नहीं की जा सकती.’’

(लखनऊ से कांग्रेस उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी)
अपर कास्ट की पार्टी बनी कांग्रेस
प्रत्याशीः ब्राह्मण 13, ठाकुर 7, वैश्य 10, दलित 14, मुस्लिम 10, ओबीसी 8, जैन 1, कायस्थ 1, भूमिहार 1
28 फरवरी को जब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बाराबंकी लोकसभा क्षेत्र में रोड शो और यहीं के धार्मिक स्थल देवा शरीफ पर चादर चढ़ाकर यूपी में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की तो ऐसा लगा था कि कांग्रेस दलित और मुसलमानों के बूते बाजी मारने की कोशिश करेगी. इसके उलट अब तक कांग्रेस के जो 65 उम्मीदवार मैदान में हैं उनमें सबसे ज्यादा 30 अपर कास्ट से आते हैं.
इनमें भी ब्राह्मण 13, ठाकुर 7 और सभी पार्टियों में सबसे ज्यादा 10 वैश्यों को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है. इसके अलावा दलित 14, मुस्लिम 10, ओबीसी 8, एक जैन, एक भूमिहार और एक कायस्थ को चुनाव मैदान में उतारकर पार्टी ने सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश की है. पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा पिछड़े वर्ग के नेता की कमी अखर रही है.
इसी की भरपाई के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जाट आरक्षण को हरी झंडी देकर पश्चिमी यूपी में जाट बिरादरी में जनाधार रखने वाले अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) से चुनावी समझौता कर लिया. इसके अलावा गंगा नदी के किनारे बसीं मौर्य, शाक्य, कुशवाहा और सैनी जातियों में पकड़ रखने वाले महान दल से समझौता कर इन बिरादरियों के प्रभाव वाली एटा, नगीना और बदायूं सीट थमा दी. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. निर्मल खत्री कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश में केवल कांग्रेस पार्टी ही ऐसी है जिसने समाज के सभी तबकों को टिकट वितरण में उचित प्रतिनिधित्व दिया है.’’
बहरहाल, अण्णा आंदोलन के बाद बने भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल और दंगों के बाद आम जनता की सुरक्षा जैसे मुद्दों को दरकिनार कर राजनैतिक पार्टियों ने यूपी में जाति की रोटियां सेंकना शुरू कर दिया है. रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर जातिवाद भारी पड़ रहा है. ऐसे में चाहे जितना विकास का नारा लगे, पर वोट जाति के नाम पर ही डलेगा.
यह सियासी मजबूरियों का ही तकाजा था, जिसने जौनपुर के साढ़े तीन लाख ब्राह्मण वोटरों पर कब्जा जमाने के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार रवि किशन को अपनी जाति को आगे करना पड़ा. रवि किशन का तर्क है, ‘‘सभी कार्यकर्ता चाहते थे कि मैं अपने नाम के आगे शुक्ला लगाऊं, मैंने वैसा ही किया.’’
यूपी की सियासी जंग की यही हकीकत है. लोकसभा चुनाव की आहट शुरू होते ही सभी पार्टियां विकास के दावों के रथ पर सवार होने का दिखावा कर रही थीं लेकिन जैसे ही बिगुल बजा, 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के चुनावी चौसर में जाति के घोड़े कुलांचे भरने लगे. इलाके में जाति का अंकगणित उम्मीदवारों के चयन का पैमाना बन गया. सभी पार्टियों ने अपने समीकरणों के हिसाब से मोहरे सेट करने की भरपूर कोशिश की है. राजनैतिक दल विकास का मुखौटा लगाकर जनता के बीच हैं लेकिन इनके अंदरखाने में जातियों पर दांव लगाए जा रहे हैं.

मायावती को भाए ब्राह्मण
प्रत्याशीः 21 ब्राह्मण, 19 मुस्लिम, 17 दलित, 15 पिछड़े, 8 ठाकुर
20 मार्च की दोपहर एक बजे लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित बीएसपी के प्रदेश दफ्तर में जब मायावती पार्टी उम्मीदवारों की सूची जारी करने पहुंचीं तो यह बताना नहीं भूलीं कि उन्होंने सबसे ज्यादा 21 टिकट ब्राह्मणों को ही दिए हैं. मायावती ने साफ कहा, ‘‘यूपी की 17 सुरक्षित सीटों पर दलित प्रत्याशियों को उतारने के साथ बीएसपी ने क्षत्रिय समाज को आठ, पिछड़े वर्ग से 15 और मुस्लिम बिरादरी से 19 उम्मीदवारों को टिकट दिया है.’’
जाहिर है, जिस तरह से मायावती ने ब्राह्मणों और ठाकुरों को रिकॉर्ड टिकट दिए हैं उससे साफ है कि वे यही संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी का ‘‘अपर कास्ट’’ से भरोसा घटा कम नहीं हुआ है.
इसी भरोसे को और अधिक मजबूती देने के लिए बीएसपी ने इस बार ब्राह्मणों और ठाकुरों को अधिक तवज्जो दी है. 2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बीएसपी ने ‘‘अपर कास्ट’’ पर भरोसा जताते हुए 20 ब्राह्मणों और सात ठाकुरों को टिकट दिया था. इस बार यह संख्या एक-एक बढ़ी है. मुजफ्फरनगर दंगे और वाराणसी से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के चुनाव लडऩे से बदले सियासी समीकरण को साधने के लिए मायावती ने पिछली बार की तुलना में पांच ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा है.
पश्चिम में दंगे के बाद सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) के खिलाफ मुसलमानों की नाराजगी को ‘‘कैश’’ कराने के लिए बीएसपी ने दंगा पीड़ित मुजफ्फरनगर, कैराना लोकसभा क्षेत्र के अलावा अपेक्षाकृत अधिक मुस्लिम आबादी वाले इलाके रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ में इसी बिरादरी के नुमाइंदों को उम्मीदवार बनाया है. बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी कहते हैं, ‘‘दूसरी पार्टियों की तुलना में मुसलमानों को सबसे ज्यादा टिकट देकर बीएसपी ने साबित कर दिया है कि यही इकलौती पार्टी समाज के इस तबके की सबसे बड़ी हितैषी है.’’
इस बार के टिकट बंटवारे की एक खास बात यह भी है कि पिछली बार तीन वैश्यों को टिकट देने वाली बीएसपी ने इस बार उनसे किनारा कर लिया है. पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव बताते हैं, ‘‘ब्राह्मण और ठाकुरों की तरह वैश्य समाज बीएसपी से नहीं जुड़ रहा है.’’ कुछ ऐसी ही स्थिति पिछड़े वर्ग के साथ भी है. इस बार मायावती ने पिछली बार की तुलना में पिछड़े वर्ग के तीन उम्मीदवार कम उतारे हैं.

( प्रबुद्ध सभा में ब्राह्मण नेताओं के साथ मुलायम सिंह यादव)
पिछड़े-मुसलमान दौड़ाएंगे साइकिल
प्रत्याशीः दलित 17, मुस्लिम 13, यादव 13, कुर्मी 8, ठाकुर 11, ब्राह्मण 7, ओबीसी 8, वैश्य 1
यूपी में सपा कुल 78 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिसमें पार्टी ने सबसे ज्यादा 29 सीटों पर पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार उतारे हैं. इसके बाद मुस्लिम 13, ठाकुर 11, ब्राह्मण 7, दलित 17 और एक वैश्य को सपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सफर में यह पहली बार है.
जब उनके सामने पश्चिमी यूपी में दंगे के कारण नाराज चल रहे मुसलमानों को मनाने की चुनौती है. इसके लिए मुलायम ने पश्चिमी यूपी की 22 सीटों में से 10 पर मुसलमान उम्मीदवारों को उतारकर जातिगत समीकरणों को साधने का दांव खेला है.
इतना ही नहीं, अपनी स्वजातीय बिरादरी पर पकड़ बनाए रखने के लिए मुलायम ने 13 यादव प्रत्याशियों पर दांव लगाया है. बीजेपी में टिकट बंटवारे के बाद ब्राह्मणों के असंतोष में भी सपा अपने लिए अवसर देख रही है. इसीलिए पार्टी ने प्रबुद्घ सभा के अध्यक्ष मनोज पांडेय को आगे कर दिया है. पिछले दो हफ्ते के दौरान पांडे यूपी के एक दर्जन जिलों में सम्मेलन कर ब्राह्मणों को सपा के पह्न में लामबंद करने में जुट गए हैं.

(बीजेपी की दलित भागीदारी रैली)
बीजेपी का अगड़ा-पिछड़ा गठजोड़
प्रत्याशीः ब्राह्मण 17, ठाकुर 14, ओबीसी 25, दलित 17, वैश्य 3, पारसी 1, भूमिहार 1
अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की चुनावी सीट वाराणसी पर राह आसान करने की जुगत ही थी जिसने यूपी में बीजेपी को अपना दल से गठबंधन करने को मजबूर कर दिया. वाराणसी में करीब 3 लाख कुर्मी मतदाता हैं. अपना दल की राष्ट्रीय महासचिव अनुप्रिया पटेल कहती हैं, ‘‘अगर वाराणसी में 60 फीसदी कुर्मी वोट भी मोदी को मिल गया तो उनकी बढ़त का अंदाजा लगाया जा सकता है.’’ पटेल कुर्मी वोटों को लामबंद करने के लिए वाराणसी की बगल की मिर्जापुर सीट पर चुनाव लड़ रही हैं.
मोदी के रथ को यूपी में दौड़ाने के लिए बीजेपी ने अगड़ा-पिछड़ा गठजोड़ पर भरोसा जताया है. अब तक घोषित 78 लोकसभा उम्मीदवारों में बीजेपी ने ब्राह्मण 17, ठाकुर 14, दलित 17, वैश्य 3, एक पारसी और एक भूमिहार को चुनाव में उतारा है. खास बात यह है कि पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है. दूसरी ओर मुसलमानों के विरोध में खड़ी जाट और गुर्जर बिरादरियों का फायदा लेने के लिए पार्टी ने पश्चिम की 22 सीटों में सबसे ज्यादा सात सीटों पर जाट और गुर्जर उम्मीवारों को तवज्जो दी है.
उत्तर प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं, ‘‘बीजेपी के लिए लोकसभा चुनाव में विकास ही एकमात्र एजेंडा है लेकिन जनतंत्र में जाति समूहों के प्रतिनिधित्व की अनदेखी नहीं की जा सकती.’’

(लखनऊ से कांग्रेस उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी)
अपर कास्ट की पार्टी बनी कांग्रेस
प्रत्याशीः ब्राह्मण 13, ठाकुर 7, वैश्य 10, दलित 14, मुस्लिम 10, ओबीसी 8, जैन 1, कायस्थ 1, भूमिहार 1
28 फरवरी को जब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बाराबंकी लोकसभा क्षेत्र में रोड शो और यहीं के धार्मिक स्थल देवा शरीफ पर चादर चढ़ाकर यूपी में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की तो ऐसा लगा था कि कांग्रेस दलित और मुसलमानों के बूते बाजी मारने की कोशिश करेगी. इसके उलट अब तक कांग्रेस के जो 65 उम्मीदवार मैदान में हैं उनमें सबसे ज्यादा 30 अपर कास्ट से आते हैं.
इनमें भी ब्राह्मण 13, ठाकुर 7 और सभी पार्टियों में सबसे ज्यादा 10 वैश्यों को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है. इसके अलावा दलित 14, मुस्लिम 10, ओबीसी 8, एक जैन, एक भूमिहार और एक कायस्थ को चुनाव मैदान में उतारकर पार्टी ने सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश की है. पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा पिछड़े वर्ग के नेता की कमी अखर रही है.
इसी की भरपाई के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जाट आरक्षण को हरी झंडी देकर पश्चिमी यूपी में जाट बिरादरी में जनाधार रखने वाले अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) से चुनावी समझौता कर लिया. इसके अलावा गंगा नदी के किनारे बसीं मौर्य, शाक्य, कुशवाहा और सैनी जातियों में पकड़ रखने वाले महान दल से समझौता कर इन बिरादरियों के प्रभाव वाली एटा, नगीना और बदायूं सीट थमा दी. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. निर्मल खत्री कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश में केवल कांग्रेस पार्टी ही ऐसी है जिसने समाज के सभी तबकों को टिकट वितरण में उचित प्रतिनिधित्व दिया है.’’
बहरहाल, अण्णा आंदोलन के बाद बने भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल और दंगों के बाद आम जनता की सुरक्षा जैसे मुद्दों को दरकिनार कर राजनैतिक पार्टियों ने यूपी में जाति की रोटियां सेंकना शुरू कर दिया है. रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर जातिवाद भारी पड़ रहा है. ऐसे में चाहे जितना विकास का नारा लगे, पर वोट जाति के नाम पर ही डलेगा.

