केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री कपिल सिब्बल आजकल बिलकुल बदल गए हैं. उनका जाना-पहचाना अक्खड़पन गायब हो गया है. वे बड़े प्यार से मिलते हैं. हर शनिवार, रविवार चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर विभिन्न हिस्सों में मतदाताओं की बैठकें करते हैं.
कांग्रेस को फरवरी अंत तक की अपनी समयसीमा में उम्मीदवारों के नामों के ऐलान को लेकर खासी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन कानून मंत्री ने अपनी उम्मीदवारी का ऐलान खुद ही कर दिया है. ऑटो रिक्शे पर 'आपका अपना सिब्बल’ लिखे पोस्टर दिखाई देने लगे हैं. पार्टी के जानकार बताते हैं कि सिब्बल लोकसभा चुनाव हारने की संभावना से डरे हुए हैं.
इस मनोदशा से गुजरने वाले वे अकेले कांग्रेसी नहीं हैं, खासकर जब से आम आदमी पार्टी (आप) ने भ्रष्टाचार विरोधी के नारे के साथ विधानसभा चुनाव जीता है. पिछले एक साल के दौरान तीन भीतरी सर्वेक्षणों ने कांग्रेस के लिए संभावित सीटों की संख्या 145 से घटाकर 75 कर दी है. आखिरी सर्वे दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में पार्टी के हार के बाद हुआ है.
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की टीम का अनुमान है कि उन्हें करीब 110 सीटें मिलेंगी, जो गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए जरूरी आंकड़ों से कोसों दूर हैं, जो खानदान कभी सत्ता की चाभी लगता था, आज उसकी बेचैनी जगजाहिर है. गांधी परिवार के सदस्यों की हत्याओं या परिवार के आत्मनिर्वासन के दौर में साथ रहे पुराने और नए वफादार भ्रम और ऊहापोह की स्थिति में हैं.

राहुल के दौर में इस एक सदी पुरानी पार्टी ने कई बार हार का मुंह देखा है. अब भी जीत की गारंटी नहीं नजर आती क्योंकि राहुल ने जो भी चुनावी फैसला किया है, उसका उल्टा असर दिखाई देता है. पहले 2009 में बिहार में उन्होंने वफादार साथी लालू प्रसाद यादव से पीछा छुड़ाने का फैसला किया, फिर 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव कांग्रेस को अकेले लड़ाने का फैसला किया.
8 दिसंबर को विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आए, उनमें चार राज्यों में कांग्रेस के सफाए के डर से ऐसी लहर फैली है कि पार्टी हारे हुए दाव आजमा रही है. 2014 में सत्ता के लिए यह शायद आखिरी दाव है.
गांधी परिवार की कमजोर होती पकड़
बेचैनी के स्वर मुखर होने के साथ अभेद्य माने जाने वाले खानदान को भी चोट लगने लगी है. पुरानी बेफिक्रियां कमजोर होने से निराशा हर तरफ है. अभी पिछले दिनों तक नेहरू-गांधी खानदान की धुरी पर पार्टी की किस्मत घूमा करती थी. सोनिया गांधी ने अपने दम पर 2004 और 2009 में लगातार दो लोकसभा चुनाव जितवाए.
लेकिन अब पार्टी की डूबती नैया पार लगाने की राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं. बाहरी आलोचक ही नहीं, भीतरी वफादार भी उंगलियां उठाने लगे हैं. पार्टी में अनुशासन नहीं रह गया है, जबकि एक जमाने में सोनिया की नरम दिखने वाली फौलादी मुट्ठी में पार्टी सिमटी रहती थी.
हाल ही में जब कांग्रेस ने लोकसभा के 15 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार तय करने के लिए कार्यकर्ताओं से वोट लेने की उपाध्यक्ष की अनूठी सोच पर अमल करने का फैसला किया, तो उस सूची में चांदनी चौक और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली का भी नाम था.
फिर क्या था मनमोहन सिंह सरकार में शामिल दोनों मंत्री और इन सीटों से सांसद सिब्बल और कृष्णा तीरथ भड़क उठे. उन्होंने शिकायत की कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. राहुल गांधी ने जिस तरह युवक कांग्रेस में भीतरी लोकतंत्र लाने की कोशिश की, उसी तर्ज पर उम्मीदवार चुनने के लिए वोट लेने का प्रयोग कर रहे हैं. इस पर उंगली उठाने को कभी 'धर्मविरुद्ध’ कार्य माना जाता.
इस दफा बगावत करने वाले सिब्बल और तीरथ अकेले नहीं थे. अगली पीढ़ी के भी कुछ प्रमुख सदस्यों ने बिना किसी तैयारी के जंग में कूदने का निमंत्रण ठुकरा दिया. कुशीनगर से सांसद, गृहराज्य मंत्री आर.पी.एन. सिंह से उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनने को कहा गया, तो उन्होंने मना कर दिया.
मानव संसाधन राज्यमंत्री, धौरहरा के सांसद जितिन प्रसाद भी तैयार नहीं हुए. बिजली राज्यमंत्री और गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विधानसभा चुनावों में बुरी हार का जिक्र करते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष पद ठुकरा दिया.
पार्टी में असंतोष के स्वर तेज होने लगे हैं. आने वाले चुनाव के मद्देनजर ये बेसब्री का संकेत दे रहे हैं. पार्टी के हाथ से लंबी लड़ाई में कोई मुकाम पाने का मौका निकलता जा रहा है. पुराने वफादारों और नए खिलाडिय़ों की पट नहीं रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि कांग्रेस सत्ता से बाहर रहने की तैयारी कर रही है.
उन्होंने सावधान किया कि ''हम पहले भी सत्ता से बाहर रह चुके हैं और फिर बाहर हो सकते हैं लेकिन चुनाव तो जीतने के लिए ही लडऩा होगा.” राहुल के करीबी सलाहकार ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने अपनी हताशा कुछ महीने पहले यह कहकर जाहिर कर दी थी कि कांग्रेस उपाध्यक्ष व्यवस्था बदलना चाहते हैं, लेकिन पार्टी के सामने तात्कालिक समस्या एक अदद चुनाव जीतने की है.
आम तौर पर फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले जनार्दन द्विवेदी भी पार्टी के निर्देशों पर सवाल उठाने लगे हैं. उन्होंने कांग्रेस के 2009 में यूपीए-2 का नेतृत्व करने के फैसले की आलोचना की है. द्विवेदी ने पिछले दिनों कहा था कि ''यूपीए-1 जितना काम किसी और गठबंधन ने नहीं किया.”
उनका कहना था कि 2009 में पार्टी को अपने अकेले के दम पर बहुमत न मिलने पर सरकार नहीं बनानी चाहिए थी. पिछले महीने वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह कहकर आलोचना की थी कि वे सरकार की उपलब्धियों के बारे में खुलकर नहीं बोलते.

सहमे हुए कांग्रेसी
नाकामी के बढ़ते अंदेशों के मद्देनजर अब अपनी खाल बचाना ही मुख्य मकसद बनता दिख रहा है. फिक्र के इस दौर में उन कांग्रेसी नेताओं की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है, जो चुनाव लडऩे से डरते हैं. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्री कुमारी शैलजा जैसे नेताओं ने संसद में सीट पक्की करने के लिए राज्यसभा का रुख कर लिया.
राजनीति से दस साल का स्वघोषित वनवास समाप्त करने के लिए दिग्विजय लोकसभा चुनाव लडऩे की बात कहते आए थे. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि व्यापक जनाधार के बावजूद दिग्विजय के पीछे हटने से पार्टी के मौजूदा सांसदों में हड़कंप मच गया है.
जब 1993 से 2003 तक राज्य की कमान संभालने वाला नेता चुनाव लडऩे की हिम्मत नहीं दिखा रहा, तो बाकी नेता तो मैदान में कूदने से पहले सौ बार सोचेंगे. लोकसभा में अंबाला सीट की प्रतिनिधि शैलजा के हटने से हरियाणा में कांग्रेस को दो स्तरों पर सत्ता विरोधी हवा का डर सताने लगा है.
2009 में राज्य में पार्टी ने दस में से नौ सीटें जीती थीं. जो छुटभैए नेता दिग्विजय, मधुसूदन मिस्त्री और शैलजा की तरह गांधी खानदान के इतने निकट नहीं रहे, उन्हें अपने खुद के बूते पर मैदान में छोड़ दिया गया है.
फिर भी खानदान को तो हर कीमत पर बचाना ही है. कांग्रेस के सुल्तानपुर से सांसद संजय सिंह ने जैसे ही बीजेपी से पींगें बढ़ाने के संकेत दिए और लगा कि वे अमेठी में राहुल को चुनौती देने वाले हैं, उन्हें असम से राज्यसभा की पर्ची थमा दी गई और राज्य इकाई के विरोध को अनसुना कर दिया गया. पार्टी ने परिवार के किले को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है.
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक महासचिव दीपक सिंह को भारतीय रेल यात्री सेवा समिति के अध्यक्ष की कुर्सी दी गई है, जबकि राजीव गांधी के वफादार रहे जगदीश पीयूष को पूर्वांचल विश्वविद्यालय की कार्यसमिति में जगह मिली है.
ये दोनों गांधी परिवार से उपेक्षा के कारण नाराज थे. उत्तर प्रदेश में पार्टी का सफाया होने का अंदेशा है. जनवरी के मध्य में इंडिया टुडे ग्रुप-सी वोटर देश का मिजाज सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस को राज्य में सिर्फ चार सीटें मिलने का अनुमान है. प्रदेश में कई नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र बदलने की फिराक में हैं.
यह खौफ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं. कांग्रेस की अगली पीढ़ी के उभरते सितारों को उनके अपने खेमों में हमले का डर सता रहा है. नवंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अजमेर में आठों सीटें गंवा दीं. पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर से ही सांसद हैं.
मध्य प्रदेश में मंदसौर में राहुल की विश्वस्त मीनाक्षी नटराजन के निर्वाचन क्षेत्र में आठ में से सात विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हार हुई. सिर्फ सुवारसा सीट ही बच सकी. सिंधिया के निर्वाचन क्षेत्र गुना में आठ में से पांच सीटें पार्टी ने जीतीं, फिर भी राज्य में पार्टी की हार की जिम्मेदारी उन्हें लेनी पड़ी, जबकि चुनाव से सिर्फ तीन महीने पहले उन्हें प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

दो टीमों की दास्तान
पार्टी का थिंक टैंक सिर्फ लंबी अवधि की योजनाएं बनाता है
पार्टी के युवा नेताओं में भी सत्ता के नए केंद्र राहुल के निवास और कार्यालय 12 तुगलक लेन, नई दिल्ली के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है. पार्टी के कई सदस्यों का कहना है कि यहां राहुल के चुने हुए सलाहकारों का दबदबा है, जिनकी अगुआई राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष जी. मोहन गोपाल करते हैं. पार्टी जनों का कहना है कि ''ये खास तरह के लोग हैं.”
पार्टी के एक सदस्य कहते हैं कि ''ये अंग्रेजीदां, विदेश में पढ़े-लिखे लोग राजनीति से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं. इससे ऐसा लगता है कि अजय माकन, राहुल की सोशल मीडिया टीम के मुखिया और रोहतक के सांसद दीपेंद्र हुड्डा और दिग्विजय सिंह इनमें फिट नहीं होते क्योंकि उनका जनाधार है और उनमें राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं भी हैं. राहुल की टीम जो करना चाहती है, उससे इन लोगों की संगत बैठना लाजमी नहीं दिखता.”
सुनने में तो आता रहा है कि हुड्डा और संदीप दीक्षित जैसे नेता राहुल की करीबी टीम में शामिल हैं, लेकिन सच यह है कि वे अंदर बाहर होते रहते हैं. उन्हें अपनी भूमिकाएं मालूम नहीं हैं. बुद्धिजीवियों की एक कोर टीम राहुल का भाषण लिखती है और तय करती है कि वे किन मुद्दों की वकालत करेंगे. पार्टी के एक युवा सांसद ने माना कि असंतोष तो है.
असंतोष इस बात का है कि जिन लोगों का कोई जनाधार नहीं है और जो किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं वही पार्टी की दिशा तय कर रहे हैं. ये लोग राहुल गांधी के लिए ऐसी ख्याली आदर्श दुनिया बनाते रहते हैं, जो है तो बहुत अच्छी लेकिन तात्कालिक राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से माकूल नहीं है.

इधर 12, तुगलक लेन नई दिशा और नई राजनीति का खाका बना रहा है और उधर, प्रतीक्षा में खड़ी नई पीढ़ी, पार्टी के युवा नेता खुद को पीछे छूटा हुआ, उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे 2019 का इंतजार नहीं कर सकते और अगले चुनाव में उन्हें अपना वजूद बचाना होगा. राहुल की टीम के साथ काम करने वाले एक युवा सांसद को अकसर दौरे करने पड़ते हैं.
उनकी शिकायत है कि उपाध्यक्ष जैसी स्प्रेडशीट स्टाइल की राजनीति कर रहे हैं, उससे निर्वाचन क्षेत्र और मतदाताओं की रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए बहुत कम समय बचता है. इस सांसद के मुताबिक, ''वोटर चाहता है कि हम दूर कहीं बैठकर पार्टी मजबूत करने की बजाए इलाके में रहकर उसकी छोटी-बड़ी समस्याएं सुलझाएं.”
चुनाव सिर्फ 10 हफ्ते दूर है. ऐसे में पार्टी हड़बड़ी में कदम उठा रही है. सरकार 2009 की तरह एक के बाद एक सौगात लुटा रही है (देखें बॉक्स). उस समय कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की जीत का दारोमदार किसानों के लिए 74,000 करोड़ रु. की कर्ज माफी या ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना पर था. इन सौगातों की कीमत आर्थिक सुधारों को चुकानी पड़ी.
इस बार भी रियायती एलपीजी सिलेंडर का कोटा बढ़ाने की राहुल की मांग पूरी करने के लिए सरकार दंडवत हुई और 5,000 करोड़ रु. का अतिरिक्त बोझ उठाया. सब्सिडी से मुक्ति पाने की कोशिश टल गई. एलपीजी सब्सिडी को सीधे नकदी देने की योजना से अलग करने का असर एक महत्वपूर्ण पहल पर पड़ा.
पिछले दिनों सरकार ने जाटों के लिए आरक्षण को मंजूरी दे दी. जैनियों को अल्पसंख्यक मान लिया क्योंकि कांग्रेस को नया वोट बैंक बनाना है. पिछले हफ्ते सरकार ने ऐलान किया कि अधिसूची से बाहर की गई और घुमंतू जनजातियों के लिए कल्याण बोर्ड बनाया जाएगा. इससे 15 करोड़ लोगों को फायदा होने जा रहा है.

राज्यों में लाचारी
बिहार और उत्तर प्रदेश की जंग में खाली हाथ
सोनिया की ताकत यह थी कि उन्होंने 2004 के खंडित जनादेश को गैर-धर्मनिरपेक्ष ताकतों को दूर रखने के हरकिशन सिंह सुरजीत के सूत्र से गठबंधन को बांध दिया था. 2009 में लगातार प्रचार करके कांग्रेस को 206 सीटें दिला दी थीं. इनमें से आधी सीटें पांच राज्यों—आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और केरल—से आई थीं.
इस बार इन राज्यों में उससे एक-तिहाई सीटें मिलने का अनुमान है. आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 में से 33 सीटों पर विजय मिली थी, लेकिन इस बार दक्षिणी गढ़ में सबसे करारी हार मंडरा रही है. तेलंगाना बनने के बाद उसकी 17 सीटों में से अधिकांश तेलंगाना राष्ट्र समिति के बूते पर जीत लेने का अनुमान था.
लेकिन तेलंगाना के गठन में बेहिसाब देरी और संसद में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित कराने में बीजेपी की नई आपत्तियों ने कांग्रेस के मनसूबों पर पानी फेर दिया है. अगर विभाजन न हुआ तो कांग्रेस उन सीटों को भी न जीत पाएगी, जो तेलंगाना में मिलने की उम्मीद है. वर्तमान अनुमान सिर्फ सात सीटें जीतने का भरोसा दे रहे हैं.
मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी के नेतृत्व में विभाजन विरोधी सीमांध्र क्षेत्र के नेता पार्टी की नाफरमानी कर नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार से 120 सांसद लोकसभा में जाते हैं. यहां बीजेपी का सितारा बुलंद हो रहा है. राहुल जानते हैं कि नई दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है, फिर भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत बेहद खस्ता है. 2009 में 80 में से 21 सीटें और 18.25 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी कैसे भी मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का हाथ पकडऩे को बेताब दिख रही है.
बीएसपी ने पिछले चुनाव में 20 सीटें जीती थीं. उसे 27.42 फीसदी वोट मिले थे. 47 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी. बीएसपी और कांग्रेस का गठबंधन 80 में से दो-तिहाई सीटों पर निर्णायक हो सकता है, क्योंकि उसे मुस्लिम वोट भी मिल सकते हैं, लेकिन अब तक बीएसपी मानने को तैयार नहीं है और गठबंधन कांग्रेस का ख्याली पुलाव ही लगता है.
कांग्रेस और बीएसपी के संभावित गठबंधन में एक दिक्कत यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 64 सीटों पर पहले या दूसरे नंबर पर रहे होने के कारण बीएसपी ज्यादातर सीटों पर खुद को संभावित विजेता के तौर पर देखती है.
यही नहीं कांग्रेस के मौजूदा सांसदों को हार का सबसे ज्यादा खतरा फिलहाल बीएसपी प्रत्याशियों से लग रहा है. ऐसे में अगर दोनों दलों में गठबंधन हुआ तो या तो कांग्रेस को मौजूदा सांसदों को मैदान से हटाना पड़ेगा या फिर बीएसपी अपनी जीत की उम्मीद वाली सीटों को कांग्रेस को सौंप देगी.
अगर उत्तर प्रदेश का यह हाल है तो बिहार में तो कांग्रेस का हाल और खराब है. राहुल ने बिहार में कांग्रेस को फिर खड़ा करने का वादा किया था, लेकिन 2010 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के सफाए के बाद राज्य में उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई. पार्टी ने 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ चार पर जीत मिली.
बिहार के चुनावी इतिहास में यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन था. राहुल जुलाई, 2011 में आखिरी बार बिहार गए थे और उनकी बेरुखी ने पार्टी को अनाथ कर दिया. बिहार में सभी गठबंधनों की पेशकश ठुकराकर अकेले चुनाव लडऩे का फैसला इसलिए किया था क्योंकि वे जानते थे कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) हो या लोक जनशक्ति पार्टी, सब कांग्रेस की कीमत पर बड़े हुए हैं.
एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे को बताया कि कई बड़े नेता लोकसभा में अपनी जीत की खातिर आरजेडी के साथ जाना चाहते हैं. आज अगर राहुल आरजेडी के साथ जाने को तैयार दिखते हैं, तो वजह सिर्फ यह है कि कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें समझ दिया है कि लालू के समर्थन के बिना उनकी नैया पार नहीं होगी.
लेकिन इस राज्य में राजनीति अब पहले जैसी नहीं रह गई है. बिहार में अब नीतीश कुमार की जनता दल-यूनाइटेड (जेडी-यू) और बीजेपी में तलाक हो चुका है. ऐसे में मुकाबला एक बार फिर त्रिकोणीय होगा. लेकिन इस त्रिकोण में कांग्रेस और आरजेडी वाला गठबंधन और जेडीयू दोनों ही मुसलमान और दलित वोटरों की आस लगाएंगे, वहीं अगड़ी जाति के वोटों पर बीजेपी अब तक अपनी बढ़त बनाए हुए है.

गठबंधन में दरार
क्षेत्रीय साथियों के नखरे और खुले विकल्प
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 28 जनवरी को इस्तीफे और कांग्रेस के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन तोडऩे की धमकी इसलिए दी क्योंकि नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर मतभेद थे. महाराष्ट्र्र में भी सत्तारूढ़ गठबंधन में हालात अच्छे नहीं हैं.
जनवरी के शुरू में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की अहम बैठक में शरद पवार ने पार्टी नेताओं से कह दिया था कि प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र्र मोदी को अदालतें पाक साफ बता चुकी हैं, इसलिए अब 2002 के गुजरात दंगों पर बहस की जरूरत नहीं है. कहते हैं पवार ने ये भी बताया था कि लोकसभा चुनाव अकेले लडऩे का विकल्प खुला रखना चाहिए.
जानकार तो यह भी कहते हैं कि वे चुनाव के बाद बीजेपी से गठजोड़ की तैयारी में हैं. अगर पुराने वफादार साथी बीजेपी की तरफ करवट लेने लगे हैं, तो सत्ता की तरफ बीजेपी के बढ़ते कदम रोकने की कांग्रेस की तमन्ना कैसे पूरी होगी.

पार्टी ने हमेशा खानदान का साथ दिया है और उसका फायदा उठाया है. 1969 में इंदिरा गांधी ने पार्टी में विभाजन कराया और 1984 में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद मिला. तब तक हमेशा पार्टी ने परिवार का साथ दिया.
1998 में जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभालने की इच्छा दिखाई तो कांग्रेस ने उनका स्वागत किया. फिर राजनीति में राहुल के कदम बढ़ाने का धैर्य से इंतजार किया. लेकिन यह संबंध हमेशा लाभ-हानि का रहा है, जब कमाई घटने लगती है तो पार्टी में परिवार के खैरख्वाह भी कम हो जाते हैं.
—साथ में कौशिक डेका, जयंत श्री राम, आशीष मिश्र, अमिताभ श्रीवास्तव, अमरनाथ के. मेनन और लेमुअल लालफोटो: शेखर यादव
कांग्रेस को फरवरी अंत तक की अपनी समयसीमा में उम्मीदवारों के नामों के ऐलान को लेकर खासी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन कानून मंत्री ने अपनी उम्मीदवारी का ऐलान खुद ही कर दिया है. ऑटो रिक्शे पर 'आपका अपना सिब्बल’ लिखे पोस्टर दिखाई देने लगे हैं. पार्टी के जानकार बताते हैं कि सिब्बल लोकसभा चुनाव हारने की संभावना से डरे हुए हैं.
इस मनोदशा से गुजरने वाले वे अकेले कांग्रेसी नहीं हैं, खासकर जब से आम आदमी पार्टी (आप) ने भ्रष्टाचार विरोधी के नारे के साथ विधानसभा चुनाव जीता है. पिछले एक साल के दौरान तीन भीतरी सर्वेक्षणों ने कांग्रेस के लिए संभावित सीटों की संख्या 145 से घटाकर 75 कर दी है. आखिरी सर्वे दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में पार्टी के हार के बाद हुआ है.
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की टीम का अनुमान है कि उन्हें करीब 110 सीटें मिलेंगी, जो गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए जरूरी आंकड़ों से कोसों दूर हैं, जो खानदान कभी सत्ता की चाभी लगता था, आज उसकी बेचैनी जगजाहिर है. गांधी परिवार के सदस्यों की हत्याओं या परिवार के आत्मनिर्वासन के दौर में साथ रहे पुराने और नए वफादार भ्रम और ऊहापोह की स्थिति में हैं.

राहुल के दौर में इस एक सदी पुरानी पार्टी ने कई बार हार का मुंह देखा है. अब भी जीत की गारंटी नहीं नजर आती क्योंकि राहुल ने जो भी चुनावी फैसला किया है, उसका उल्टा असर दिखाई देता है. पहले 2009 में बिहार में उन्होंने वफादार साथी लालू प्रसाद यादव से पीछा छुड़ाने का फैसला किया, फिर 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव कांग्रेस को अकेले लड़ाने का फैसला किया.
8 दिसंबर को विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आए, उनमें चार राज्यों में कांग्रेस के सफाए के डर से ऐसी लहर फैली है कि पार्टी हारे हुए दाव आजमा रही है. 2014 में सत्ता के लिए यह शायद आखिरी दाव है.
गांधी परिवार की कमजोर होती पकड़बेचैनी के स्वर मुखर होने के साथ अभेद्य माने जाने वाले खानदान को भी चोट लगने लगी है. पुरानी बेफिक्रियां कमजोर होने से निराशा हर तरफ है. अभी पिछले दिनों तक नेहरू-गांधी खानदान की धुरी पर पार्टी की किस्मत घूमा करती थी. सोनिया गांधी ने अपने दम पर 2004 और 2009 में लगातार दो लोकसभा चुनाव जितवाए.
लेकिन अब पार्टी की डूबती नैया पार लगाने की राहुल की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं. बाहरी आलोचक ही नहीं, भीतरी वफादार भी उंगलियां उठाने लगे हैं. पार्टी में अनुशासन नहीं रह गया है, जबकि एक जमाने में सोनिया की नरम दिखने वाली फौलादी मुट्ठी में पार्टी सिमटी रहती थी.
हाल ही में जब कांग्रेस ने लोकसभा के 15 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार तय करने के लिए कार्यकर्ताओं से वोट लेने की उपाध्यक्ष की अनूठी सोच पर अमल करने का फैसला किया, तो उस सूची में चांदनी चौक और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली का भी नाम था.
फिर क्या था मनमोहन सिंह सरकार में शामिल दोनों मंत्री और इन सीटों से सांसद सिब्बल और कृष्णा तीरथ भड़क उठे. उन्होंने शिकायत की कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. राहुल गांधी ने जिस तरह युवक कांग्रेस में भीतरी लोकतंत्र लाने की कोशिश की, उसी तर्ज पर उम्मीदवार चुनने के लिए वोट लेने का प्रयोग कर रहे हैं. इस पर उंगली उठाने को कभी 'धर्मविरुद्ध’ कार्य माना जाता.
इस दफा बगावत करने वाले सिब्बल और तीरथ अकेले नहीं थे. अगली पीढ़ी के भी कुछ प्रमुख सदस्यों ने बिना किसी तैयारी के जंग में कूदने का निमंत्रण ठुकरा दिया. कुशीनगर से सांसद, गृहराज्य मंत्री आर.पी.एन. सिंह से उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनने को कहा गया, तो उन्होंने मना कर दिया.
मानव संसाधन राज्यमंत्री, धौरहरा के सांसद जितिन प्रसाद भी तैयार नहीं हुए. बिजली राज्यमंत्री और गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विधानसभा चुनावों में बुरी हार का जिक्र करते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष पद ठुकरा दिया.
पार्टी में असंतोष के स्वर तेज होने लगे हैं. आने वाले चुनाव के मद्देनजर ये बेसब्री का संकेत दे रहे हैं. पार्टी के हाथ से लंबी लड़ाई में कोई मुकाम पाने का मौका निकलता जा रहा है. पुराने वफादारों और नए खिलाडिय़ों की पट नहीं रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि कांग्रेस सत्ता से बाहर रहने की तैयारी कर रही है.
उन्होंने सावधान किया कि ''हम पहले भी सत्ता से बाहर रह चुके हैं और फिर बाहर हो सकते हैं लेकिन चुनाव तो जीतने के लिए ही लडऩा होगा.” राहुल के करीबी सलाहकार ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने अपनी हताशा कुछ महीने पहले यह कहकर जाहिर कर दी थी कि कांग्रेस उपाध्यक्ष व्यवस्था बदलना चाहते हैं, लेकिन पार्टी के सामने तात्कालिक समस्या एक अदद चुनाव जीतने की है.
आम तौर पर फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले जनार्दन द्विवेदी भी पार्टी के निर्देशों पर सवाल उठाने लगे हैं. उन्होंने कांग्रेस के 2009 में यूपीए-2 का नेतृत्व करने के फैसले की आलोचना की है. द्विवेदी ने पिछले दिनों कहा था कि ''यूपीए-1 जितना काम किसी और गठबंधन ने नहीं किया.”
उनका कहना था कि 2009 में पार्टी को अपने अकेले के दम पर बहुमत न मिलने पर सरकार नहीं बनानी चाहिए थी. पिछले महीने वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह कहकर आलोचना की थी कि वे सरकार की उपलब्धियों के बारे में खुलकर नहीं बोलते.

सहमे हुए कांग्रेसी
नाकामी के बढ़ते अंदेशों के मद्देनजर अब अपनी खाल बचाना ही मुख्य मकसद बनता दिख रहा है. फिक्र के इस दौर में उन कांग्रेसी नेताओं की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है, जो चुनाव लडऩे से डरते हैं. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्री कुमारी शैलजा जैसे नेताओं ने संसद में सीट पक्की करने के लिए राज्यसभा का रुख कर लिया.
राजनीति से दस साल का स्वघोषित वनवास समाप्त करने के लिए दिग्विजय लोकसभा चुनाव लडऩे की बात कहते आए थे. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि व्यापक जनाधार के बावजूद दिग्विजय के पीछे हटने से पार्टी के मौजूदा सांसदों में हड़कंप मच गया है.
जब 1993 से 2003 तक राज्य की कमान संभालने वाला नेता चुनाव लडऩे की हिम्मत नहीं दिखा रहा, तो बाकी नेता तो मैदान में कूदने से पहले सौ बार सोचेंगे. लोकसभा में अंबाला सीट की प्रतिनिधि शैलजा के हटने से हरियाणा में कांग्रेस को दो स्तरों पर सत्ता विरोधी हवा का डर सताने लगा है.2009 में राज्य में पार्टी ने दस में से नौ सीटें जीती थीं. जो छुटभैए नेता दिग्विजय, मधुसूदन मिस्त्री और शैलजा की तरह गांधी खानदान के इतने निकट नहीं रहे, उन्हें अपने खुद के बूते पर मैदान में छोड़ दिया गया है.
फिर भी खानदान को तो हर कीमत पर बचाना ही है. कांग्रेस के सुल्तानपुर से सांसद संजय सिंह ने जैसे ही बीजेपी से पींगें बढ़ाने के संकेत दिए और लगा कि वे अमेठी में राहुल को चुनौती देने वाले हैं, उन्हें असम से राज्यसभा की पर्ची थमा दी गई और राज्य इकाई के विरोध को अनसुना कर दिया गया. पार्टी ने परिवार के किले को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है.
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक महासचिव दीपक सिंह को भारतीय रेल यात्री सेवा समिति के अध्यक्ष की कुर्सी दी गई है, जबकि राजीव गांधी के वफादार रहे जगदीश पीयूष को पूर्वांचल विश्वविद्यालय की कार्यसमिति में जगह मिली है.
ये दोनों गांधी परिवार से उपेक्षा के कारण नाराज थे. उत्तर प्रदेश में पार्टी का सफाया होने का अंदेशा है. जनवरी के मध्य में इंडिया टुडे ग्रुप-सी वोटर देश का मिजाज सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस को राज्य में सिर्फ चार सीटें मिलने का अनुमान है. प्रदेश में कई नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र बदलने की फिराक में हैं.
यह खौफ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं. कांग्रेस की अगली पीढ़ी के उभरते सितारों को उनके अपने खेमों में हमले का डर सता रहा है. नवंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अजमेर में आठों सीटें गंवा दीं. पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर से ही सांसद हैं.
मध्य प्रदेश में मंदसौर में राहुल की विश्वस्त मीनाक्षी नटराजन के निर्वाचन क्षेत्र में आठ में से सात विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हार हुई. सिर्फ सुवारसा सीट ही बच सकी. सिंधिया के निर्वाचन क्षेत्र गुना में आठ में से पांच सीटें पार्टी ने जीतीं, फिर भी राज्य में पार्टी की हार की जिम्मेदारी उन्हें लेनी पड़ी, जबकि चुनाव से सिर्फ तीन महीने पहले उन्हें प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

दो टीमों की दास्तान
पार्टी का थिंक टैंक सिर्फ लंबी अवधि की योजनाएं बनाता है
पार्टी के युवा नेताओं में भी सत्ता के नए केंद्र राहुल के निवास और कार्यालय 12 तुगलक लेन, नई दिल्ली के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है. पार्टी के कई सदस्यों का कहना है कि यहां राहुल के चुने हुए सलाहकारों का दबदबा है, जिनकी अगुआई राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष जी. मोहन गोपाल करते हैं. पार्टी जनों का कहना है कि ''ये खास तरह के लोग हैं.”
पार्टी के एक सदस्य कहते हैं कि ''ये अंग्रेजीदां, विदेश में पढ़े-लिखे लोग राजनीति से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं. इससे ऐसा लगता है कि अजय माकन, राहुल की सोशल मीडिया टीम के मुखिया और रोहतक के सांसद दीपेंद्र हुड्डा और दिग्विजय सिंह इनमें फिट नहीं होते क्योंकि उनका जनाधार है और उनमें राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं भी हैं. राहुल की टीम जो करना चाहती है, उससे इन लोगों की संगत बैठना लाजमी नहीं दिखता.”
सुनने में तो आता रहा है कि हुड्डा और संदीप दीक्षित जैसे नेता राहुल की करीबी टीम में शामिल हैं, लेकिन सच यह है कि वे अंदर बाहर होते रहते हैं. उन्हें अपनी भूमिकाएं मालूम नहीं हैं. बुद्धिजीवियों की एक कोर टीम राहुल का भाषण लिखती है और तय करती है कि वे किन मुद्दों की वकालत करेंगे. पार्टी के एक युवा सांसद ने माना कि असंतोष तो है.
असंतोष इस बात का है कि जिन लोगों का कोई जनाधार नहीं है और जो किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं वही पार्टी की दिशा तय कर रहे हैं. ये लोग राहुल गांधी के लिए ऐसी ख्याली आदर्श दुनिया बनाते रहते हैं, जो है तो बहुत अच्छी लेकिन तात्कालिक राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से माकूल नहीं है.

इधर 12, तुगलक लेन नई दिशा और नई राजनीति का खाका बना रहा है और उधर, प्रतीक्षा में खड़ी नई पीढ़ी, पार्टी के युवा नेता खुद को पीछे छूटा हुआ, उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे 2019 का इंतजार नहीं कर सकते और अगले चुनाव में उन्हें अपना वजूद बचाना होगा. राहुल की टीम के साथ काम करने वाले एक युवा सांसद को अकसर दौरे करने पड़ते हैं.
उनकी शिकायत है कि उपाध्यक्ष जैसी स्प्रेडशीट स्टाइल की राजनीति कर रहे हैं, उससे निर्वाचन क्षेत्र और मतदाताओं की रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए बहुत कम समय बचता है. इस सांसद के मुताबिक, ''वोटर चाहता है कि हम दूर कहीं बैठकर पार्टी मजबूत करने की बजाए इलाके में रहकर उसकी छोटी-बड़ी समस्याएं सुलझाएं.”
चुनाव सिर्फ 10 हफ्ते दूर है. ऐसे में पार्टी हड़बड़ी में कदम उठा रही है. सरकार 2009 की तरह एक के बाद एक सौगात लुटा रही है (देखें बॉक्स). उस समय कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की जीत का दारोमदार किसानों के लिए 74,000 करोड़ रु. की कर्ज माफी या ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना पर था. इन सौगातों की कीमत आर्थिक सुधारों को चुकानी पड़ी.
इस बार भी रियायती एलपीजी सिलेंडर का कोटा बढ़ाने की राहुल की मांग पूरी करने के लिए सरकार दंडवत हुई और 5,000 करोड़ रु. का अतिरिक्त बोझ उठाया. सब्सिडी से मुक्ति पाने की कोशिश टल गई. एलपीजी सब्सिडी को सीधे नकदी देने की योजना से अलग करने का असर एक महत्वपूर्ण पहल पर पड़ा.
पिछले दिनों सरकार ने जाटों के लिए आरक्षण को मंजूरी दे दी. जैनियों को अल्पसंख्यक मान लिया क्योंकि कांग्रेस को नया वोट बैंक बनाना है. पिछले हफ्ते सरकार ने ऐलान किया कि अधिसूची से बाहर की गई और घुमंतू जनजातियों के लिए कल्याण बोर्ड बनाया जाएगा. इससे 15 करोड़ लोगों को फायदा होने जा रहा है.

राज्यों में लाचारी
बिहार और उत्तर प्रदेश की जंग में खाली हाथ
सोनिया की ताकत यह थी कि उन्होंने 2004 के खंडित जनादेश को गैर-धर्मनिरपेक्ष ताकतों को दूर रखने के हरकिशन सिंह सुरजीत के सूत्र से गठबंधन को बांध दिया था. 2009 में लगातार प्रचार करके कांग्रेस को 206 सीटें दिला दी थीं. इनमें से आधी सीटें पांच राज्यों—आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और केरल—से आई थीं.
इस बार इन राज्यों में उससे एक-तिहाई सीटें मिलने का अनुमान है. आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 में से 33 सीटों पर विजय मिली थी, लेकिन इस बार दक्षिणी गढ़ में सबसे करारी हार मंडरा रही है. तेलंगाना बनने के बाद उसकी 17 सीटों में से अधिकांश तेलंगाना राष्ट्र समिति के बूते पर जीत लेने का अनुमान था.
लेकिन तेलंगाना के गठन में बेहिसाब देरी और संसद में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित कराने में बीजेपी की नई आपत्तियों ने कांग्रेस के मनसूबों पर पानी फेर दिया है. अगर विभाजन न हुआ तो कांग्रेस उन सीटों को भी न जीत पाएगी, जो तेलंगाना में मिलने की उम्मीद है. वर्तमान अनुमान सिर्फ सात सीटें जीतने का भरोसा दे रहे हैं.
मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी के नेतृत्व में विभाजन विरोधी सीमांध्र क्षेत्र के नेता पार्टी की नाफरमानी कर नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार से 120 सांसद लोकसभा में जाते हैं. यहां बीजेपी का सितारा बुलंद हो रहा है. राहुल जानते हैं कि नई दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है, फिर भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत बेहद खस्ता है. 2009 में 80 में से 21 सीटें और 18.25 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी कैसे भी मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का हाथ पकडऩे को बेताब दिख रही है.
बीएसपी ने पिछले चुनाव में 20 सीटें जीती थीं. उसे 27.42 फीसदी वोट मिले थे. 47 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी. बीएसपी और कांग्रेस का गठबंधन 80 में से दो-तिहाई सीटों पर निर्णायक हो सकता है, क्योंकि उसे मुस्लिम वोट भी मिल सकते हैं, लेकिन अब तक बीएसपी मानने को तैयार नहीं है और गठबंधन कांग्रेस का ख्याली पुलाव ही लगता है.
कांग्रेस और बीएसपी के संभावित गठबंधन में एक दिक्कत यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 64 सीटों पर पहले या दूसरे नंबर पर रहे होने के कारण बीएसपी ज्यादातर सीटों पर खुद को संभावित विजेता के तौर पर देखती है.
यही नहीं कांग्रेस के मौजूदा सांसदों को हार का सबसे ज्यादा खतरा फिलहाल बीएसपी प्रत्याशियों से लग रहा है. ऐसे में अगर दोनों दलों में गठबंधन हुआ तो या तो कांग्रेस को मौजूदा सांसदों को मैदान से हटाना पड़ेगा या फिर बीएसपी अपनी जीत की उम्मीद वाली सीटों को कांग्रेस को सौंप देगी.
अगर उत्तर प्रदेश का यह हाल है तो बिहार में तो कांग्रेस का हाल और खराब है. राहुल ने बिहार में कांग्रेस को फिर खड़ा करने का वादा किया था, लेकिन 2010 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के सफाए के बाद राज्य में उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई. पार्टी ने 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सिर्फ चार पर जीत मिली.
बिहार के चुनावी इतिहास में यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन था. राहुल जुलाई, 2011 में आखिरी बार बिहार गए थे और उनकी बेरुखी ने पार्टी को अनाथ कर दिया. बिहार में सभी गठबंधनों की पेशकश ठुकराकर अकेले चुनाव लडऩे का फैसला इसलिए किया था क्योंकि वे जानते थे कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) हो या लोक जनशक्ति पार्टी, सब कांग्रेस की कीमत पर बड़े हुए हैं.
एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे को बताया कि कई बड़े नेता लोकसभा में अपनी जीत की खातिर आरजेडी के साथ जाना चाहते हैं. आज अगर राहुल आरजेडी के साथ जाने को तैयार दिखते हैं, तो वजह सिर्फ यह है कि कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें समझ दिया है कि लालू के समर्थन के बिना उनकी नैया पार नहीं होगी.
लेकिन इस राज्य में राजनीति अब पहले जैसी नहीं रह गई है. बिहार में अब नीतीश कुमार की जनता दल-यूनाइटेड (जेडी-यू) और बीजेपी में तलाक हो चुका है. ऐसे में मुकाबला एक बार फिर त्रिकोणीय होगा. लेकिन इस त्रिकोण में कांग्रेस और आरजेडी वाला गठबंधन और जेडीयू दोनों ही मुसलमान और दलित वोटरों की आस लगाएंगे, वहीं अगड़ी जाति के वोटों पर बीजेपी अब तक अपनी बढ़त बनाए हुए है.

गठबंधन में दरार
क्षेत्रीय साथियों के नखरे और खुले विकल्प
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 28 जनवरी को इस्तीफे और कांग्रेस के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन तोडऩे की धमकी इसलिए दी क्योंकि नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर मतभेद थे. महाराष्ट्र्र में भी सत्तारूढ़ गठबंधन में हालात अच्छे नहीं हैं.
जनवरी के शुरू में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की अहम बैठक में शरद पवार ने पार्टी नेताओं से कह दिया था कि प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र्र मोदी को अदालतें पाक साफ बता चुकी हैं, इसलिए अब 2002 के गुजरात दंगों पर बहस की जरूरत नहीं है. कहते हैं पवार ने ये भी बताया था कि लोकसभा चुनाव अकेले लडऩे का विकल्प खुला रखना चाहिए.
जानकार तो यह भी कहते हैं कि वे चुनाव के बाद बीजेपी से गठजोड़ की तैयारी में हैं. अगर पुराने वफादार साथी बीजेपी की तरफ करवट लेने लगे हैं, तो सत्ता की तरफ बीजेपी के बढ़ते कदम रोकने की कांग्रेस की तमन्ना कैसे पूरी होगी.

पार्टी ने हमेशा खानदान का साथ दिया है और उसका फायदा उठाया है. 1969 में इंदिरा गांधी ने पार्टी में विभाजन कराया और 1984 में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद मिला. तब तक हमेशा पार्टी ने परिवार का साथ दिया.
1998 में जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभालने की इच्छा दिखाई तो कांग्रेस ने उनका स्वागत किया. फिर राजनीति में राहुल के कदम बढ़ाने का धैर्य से इंतजार किया. लेकिन यह संबंध हमेशा लाभ-हानि का रहा है, जब कमाई घटने लगती है तो पार्टी में परिवार के खैरख्वाह भी कम हो जाते हैं.
—साथ में कौशिक डेका, जयंत श्री राम, आशीष मिश्र, अमिताभ श्रीवास्तव, अमरनाथ के. मेनन और लेमुअल लालफोटो: शेखर यादव

