भारत के उत्तर क्षेत्र में हिमालय के मध्य चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ देश के चार प्रमुख धामों में से एक है और करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है. लेकिन वही बद्रीनाथ इस समय अपने मुख्य पुजारी की वजह से शर्मसार है. बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी वी. केशवन प्रसाद नंबूदरी दिल्ली में एक महिला से छेड़छाड़ करने के आरोप में जेल में बंद हैं.
बद्रीनाथ धाम के पिछले 238 सालों के इतिहास में यह पहला मामला है, जब मंदिर के मुख्य पुजारी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. इसके पहले 1957 में रावल वासुदेव नंबूदरी को भी एक मामले में बद्री-केदार समिति ने हटा दिया था. उन पर मंदिर समिति में ही कार्यरत एक कर्मचारी की बेटी के साथ छेड़छाड़ का आरोप था लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई थी.
उसके बाद 2000 में रावल विष्णु नंबूदरी और मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद नौटियाल के बीच विवाद के चलते विष्णु ने अपने पद से इस्तीफा दिया था. इसके अलावा यह धाम और यहां के रावल कभी ज्यादा बड़े विवादों में नहीं फंसे.
रावल की भूमिका बद्रीनाथ मंदिर में सबसे अहम मानी जाती है. दिल्ली की घटना से बद्रीनाथ के प्रति श्रद्घा रखने वाले लाखों लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं. इसी संवेदनशीलता को देखते हुए बद्री-केदार समिति ने गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही वी. केशवन को पद से हटाने में देर नहीं की.
मंदिर का प्रबंध देखने वाली बद्री-केदार मंदिर समिति की उपाध्यक्ष मधु भट्ट कहती हैं, ''यह सूचना हमारे लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. लोगों की भावनाएं आहत न हों, इसलिए हमने गिरफ्तारी की अधिकृत जानकारी मिलते ही केशवन को मुख्य रावल के पद से हटा दिया है. केशवन की जगह नायब रावल ईश्वरी प्रसाद को अब मुख्य रावल का काम सौंपे जाने का निर्णय हुआ है.
पांच सदस्यीय जांच दल भी समिति ने गठित किया है, जिसे जल्द जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया है.” बद्री-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल कहते हैं, ''यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अगर रावल बेदाग साबित होते हैं तो उन्हें दोबारा नियुक्ïत किया जाएगा.”
बद्रीनाथ में भगवान बद्री विशाल की प्रतिमा के स्पर्श का अधिकार केवल रावल को ही है. इस अधिकार को बनाए रखने के लिए रावल से तपस्वी जैसा जीवन जीने की अपेक्षा की गई है. केशवन न केवल संस्कृत के ज्ञाता हैं, अपितु बाल ब्रह्मचारी भी हैं और नंबूदरी ब्राह्मण भी.
27 साल के वी. केशवन चार साल पहले ही मुख्य रावल बने थे. मुख्य रावल बनने से पहले वे बद्रीनाथ में ही नायब रावल के रूप में कार्य कर चुके थे. लेकिन इसके पहले भी उन पर अनेक आरोप लग चुके हैं. कहा जाता है कि 2009 में मुख्य रावल बनने के बाद केशवन अनेक परंपराएं तोड़ते रहे हैं.
पांच बार स्नान करने के नियम को तोडऩे के साथ ही वे महाभिषेक पूजा और बालभोग पूजा के अलग-अलग होने के नियम को तोड़कर दोनों पूजा एक साथ करने लगे थे. मंदिर समिति से भी केशवन का अनेक बार टकराव हो चुका है. बद्री-केदार समिति के पूर्व अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट्ट कहते हैं, ''केशवन प्रसाद मनमौजी प्रकृति के हैं.”
बद्रीनाथ की पूजा व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली परंपरागत संस्था ''डिमरी केंद्रीय धार्मिक पंचायत” के अध्यक्ष सुरेश डिमरी कहते हैं, ''हमने सरकार से इस प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. रावल पर इस तरह का छेडख़ानी का आरोप लगना बहुत दुखद और आश्चर्यजनक है.”
अंग्रेजों ने 1939 में बद्रीनाथ की व्यवस्थाओं के लिए अलग से कानून बनाया था, जिसमें न केवल रावलों की स्वेच्छाचारिता अपितु उनके आचरण को संयमित करने के लिए लिखित प्रावधान भी किए गए थे. मधु भट्ट कहती हैं, ''बद्रीनाथ में पूजा के दौरान रावल को सख्त परंपराओं का पालन करना पड़ता है.
दिन में कई बार स्नान करना, संयमित भोजन तथा बद्रीनाथपुरी से बाहर न जाने की वर्जनाएं हैं, जिनका सख्ती से पालन होता है. शीतकाल में भी रावल के आचरण को संयमित करने के लिए अलग से नियम बनाने की तैयारी की जा रही है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर उत्पन्न न हो.”
नंबूदरी को लेकर चल रहे विवाद से फिलहाल उत्तराखंड सरकार बचकर निकल रही है. राज्य के कैबिनेट मंत्री और यमुनोत्री विधायक त्रिवेंद्र पवार से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं है. अगर सरकार मंदिर के क्रिया-कलापों को नियंत्रित करने पर विचार करेगी तो उसी फोरम पर राय रखी जाएगी.
क्या है रावल परंपरा का इतिहास
बद्रीनाथ धाम के पिछले 238 सालों के इतिहास में यह पहला मामला है, जब मंदिर के मुख्य पुजारी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. इसके पहले 1957 में रावल वासुदेव नंबूदरी को भी एक मामले में बद्री-केदार समिति ने हटा दिया था. उन पर मंदिर समिति में ही कार्यरत एक कर्मचारी की बेटी के साथ छेड़छाड़ का आरोप था लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई थी.
उसके बाद 2000 में रावल विष्णु नंबूदरी और मंदिर समिति के अध्यक्ष विनोद नौटियाल के बीच विवाद के चलते विष्णु ने अपने पद से इस्तीफा दिया था. इसके अलावा यह धाम और यहां के रावल कभी ज्यादा बड़े विवादों में नहीं फंसे.
रावल की भूमिका बद्रीनाथ मंदिर में सबसे अहम मानी जाती है. दिल्ली की घटना से बद्रीनाथ के प्रति श्रद्घा रखने वाले लाखों लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं. इसी संवेदनशीलता को देखते हुए बद्री-केदार समिति ने गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही वी. केशवन को पद से हटाने में देर नहीं की.मंदिर का प्रबंध देखने वाली बद्री-केदार मंदिर समिति की उपाध्यक्ष मधु भट्ट कहती हैं, ''यह सूचना हमारे लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. लोगों की भावनाएं आहत न हों, इसलिए हमने गिरफ्तारी की अधिकृत जानकारी मिलते ही केशवन को मुख्य रावल के पद से हटा दिया है. केशवन की जगह नायब रावल ईश्वरी प्रसाद को अब मुख्य रावल का काम सौंपे जाने का निर्णय हुआ है.
पांच सदस्यीय जांच दल भी समिति ने गठित किया है, जिसे जल्द जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया है.” बद्री-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल कहते हैं, ''यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अगर रावल बेदाग साबित होते हैं तो उन्हें दोबारा नियुक्ïत किया जाएगा.”
बद्रीनाथ में भगवान बद्री विशाल की प्रतिमा के स्पर्श का अधिकार केवल रावल को ही है. इस अधिकार को बनाए रखने के लिए रावल से तपस्वी जैसा जीवन जीने की अपेक्षा की गई है. केशवन न केवल संस्कृत के ज्ञाता हैं, अपितु बाल ब्रह्मचारी भी हैं और नंबूदरी ब्राह्मण भी.27 साल के वी. केशवन चार साल पहले ही मुख्य रावल बने थे. मुख्य रावल बनने से पहले वे बद्रीनाथ में ही नायब रावल के रूप में कार्य कर चुके थे. लेकिन इसके पहले भी उन पर अनेक आरोप लग चुके हैं. कहा जाता है कि 2009 में मुख्य रावल बनने के बाद केशवन अनेक परंपराएं तोड़ते रहे हैं.
पांच बार स्नान करने के नियम को तोडऩे के साथ ही वे महाभिषेक पूजा और बालभोग पूजा के अलग-अलग होने के नियम को तोड़कर दोनों पूजा एक साथ करने लगे थे. मंदिर समिति से भी केशवन का अनेक बार टकराव हो चुका है. बद्री-केदार समिति के पूर्व अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट्ट कहते हैं, ''केशवन प्रसाद मनमौजी प्रकृति के हैं.”
बद्रीनाथ की पूजा व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली परंपरागत संस्था ''डिमरी केंद्रीय धार्मिक पंचायत” के अध्यक्ष सुरेश डिमरी कहते हैं, ''हमने सरकार से इस प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. रावल पर इस तरह का छेडख़ानी का आरोप लगना बहुत दुखद और आश्चर्यजनक है.”
अंग्रेजों ने 1939 में बद्रीनाथ की व्यवस्थाओं के लिए अलग से कानून बनाया था, जिसमें न केवल रावलों की स्वेच्छाचारिता अपितु उनके आचरण को संयमित करने के लिए लिखित प्रावधान भी किए गए थे. मधु भट्ट कहती हैं, ''बद्रीनाथ में पूजा के दौरान रावल को सख्त परंपराओं का पालन करना पड़ता है.
दिन में कई बार स्नान करना, संयमित भोजन तथा बद्रीनाथपुरी से बाहर न जाने की वर्जनाएं हैं, जिनका सख्ती से पालन होता है. शीतकाल में भी रावल के आचरण को संयमित करने के लिए अलग से नियम बनाने की तैयारी की जा रही है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर उत्पन्न न हो.”
नंबूदरी को लेकर चल रहे विवाद से फिलहाल उत्तराखंड सरकार बचकर निकल रही है. राज्य के कैबिनेट मंत्री और यमुनोत्री विधायक त्रिवेंद्र पवार से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं है. अगर सरकार मंदिर के क्रिया-कलापों को नियंत्रित करने पर विचार करेगी तो उसी फोरम पर राय रखी जाएगी.
क्या है रावल परंपरा का इतिहास
बद्रीनाथ को पुर्नस्थापित
करने का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को जाता है. शुरू में पूजा की
जिम्मेदारी आदिगुरु की ओर से स्थापित आचार्य परंपरा के आचार्यों पर थी.
रावलों के जिम्मे बद्रीनाथ की पूजा-अर्चना काफी बाद में आई. 1776 में यहां
रावल परंपरा की शुरुआत हुई और अब तक कुल 19 रावलों को यह दायित्व सौंपा जा
चुका है.
यह परंपरा भी आदिगुरु शंकराचार्य की ही स्थापित की हुई है. बद्रीनाथ में मुख्य रावल बनने से पहले नायब रावल बनना पड़ता है. बाद में मुख्य रावल के पद से हटने के बाद नायब रावल को ही मुख्य रावल बनाया जाता है.
यह परंपरा भी आदिगुरु शंकराचार्य की ही स्थापित की हुई है. बद्रीनाथ में मुख्य रावल बनने से पहले नायब रावल बनना पड़ता है. बाद में मुख्य रावल के पद से हटने के बाद नायब रावल को ही मुख्य रावल बनाया जाता है.
बद्रीनाथ धाम के मुख्य रावल (मुख्य पुजारी) केरल के नंबूदरी
ब्राह्मणों में से ही चुने जाते हैं, जिनके गले में पैदाइशी जनेऊ का निशान
होता है, वही रावल और मुख्य रावल बन सकता है. बद्रीनाथ धाम के मुख्य रावल
को पांच साल के लिए चुना जाता है.
कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इस मंदिर का पुनरुद्घार किया था. सनातन धर्म का प्रचार करते हुए शंकराचार्य जब उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भगवान नारायण की मूर्ति नारद कुंड में पड़ी है.
अपने प्रताप से उन्होंने मूर्ति को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया. फिर उन्होंने अपने ही शिष्य को वहां पुजारी नियुक्त किया ताकि मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य सुचारू रूप से चलता रहे. टिहरी के राजा प्रदीप शाह ने 1833 में शंकराचार्य के रसोइए गोपाल नंबूदरी को मंदिर में पूजा के लिए अधिकृत कर दिया.
रावल चुनने की कठिन और प्राचीन परंपरा को अब आधुनिक बनाया गया है. प्रत्येक पांच सालों में रावल का चुनाव किया जाता है, जिसके लिए मंदिर समिति बाकायदा विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन मंगाती है. इस प्रक्रिया में सैकड़ों संस्कृत और कर्मकांड के ज्ञानी युवा पंडित भाग लेते हैं.
मंदिर समिति के पदाधिकारियों के साथ ही धर्माचार्य मिलकर संस्कृत, वेद, मंत्रोच्चार, धर्म और कर्मकांड का मूल्यांकन करते हैं. सात वर्ष पूर्व वी. केशवन नंबूदरीपाद भी इसी कठिन परीक्षा को पास कर नायब रावल बने थे. इस घटना के बाद यह मांग भी जोर पकडऩे लगी है कि आगे से रावल का चयन उत्तराखंड के पंडों में से ही किया जाए.
अब इस घटना के बाद बद्रीनाथ धाम में मंदिर समिति ने कुछ नए कदम उठाकर बात को अपने हाथ में रखने की कोशिश की है. मंदिर के रावल, धर्माधिकारी, वेदपाठी समेत अन्य पंडे और पुजारियों के आवास पर श्रद्धालुओं के पूजा-अर्चना करने, मुलाकात करने और माथा टेकने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.
मंदिर के भीतर मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही मंदिर समिति के कार्मिकों के लिए मंदिर में अनिवार्य रूप से धोती पहनने का नियम बना दिया गया है.
(साथ में प्रवीण कुमार भट्ट)
कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में इस मंदिर का पुनरुद्घार किया था. सनातन धर्म का प्रचार करते हुए शंकराचार्य जब उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भगवान नारायण की मूर्ति नारद कुंड में पड़ी है.
अपने प्रताप से उन्होंने मूर्ति को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया. फिर उन्होंने अपने ही शिष्य को वहां पुजारी नियुक्त किया ताकि मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य सुचारू रूप से चलता रहे. टिहरी के राजा प्रदीप शाह ने 1833 में शंकराचार्य के रसोइए गोपाल नंबूदरी को मंदिर में पूजा के लिए अधिकृत कर दिया.
रावल चुनने की कठिन और प्राचीन परंपरा को अब आधुनिक बनाया गया है. प्रत्येक पांच सालों में रावल का चुनाव किया जाता है, जिसके लिए मंदिर समिति बाकायदा विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन मंगाती है. इस प्रक्रिया में सैकड़ों संस्कृत और कर्मकांड के ज्ञानी युवा पंडित भाग लेते हैं.
मंदिर समिति के पदाधिकारियों के साथ ही धर्माचार्य मिलकर संस्कृत, वेद, मंत्रोच्चार, धर्म और कर्मकांड का मूल्यांकन करते हैं. सात वर्ष पूर्व वी. केशवन नंबूदरीपाद भी इसी कठिन परीक्षा को पास कर नायब रावल बने थे. इस घटना के बाद यह मांग भी जोर पकडऩे लगी है कि आगे से रावल का चयन उत्तराखंड के पंडों में से ही किया जाए.
अब इस घटना के बाद बद्रीनाथ धाम में मंदिर समिति ने कुछ नए कदम उठाकर बात को अपने हाथ में रखने की कोशिश की है. मंदिर के रावल, धर्माधिकारी, वेदपाठी समेत अन्य पंडे और पुजारियों के आवास पर श्रद्धालुओं के पूजा-अर्चना करने, मुलाकात करने और माथा टेकने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.
मंदिर के भीतर मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही मंदिर समिति के कार्मिकों के लिए मंदिर में अनिवार्य रूप से धोती पहनने का नियम बना दिया गया है.
(साथ में प्रवीण कुमार भट्ट)

