चार फरवरी को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों की फांसी की सजा माफ करने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. उन्हें 11 साल पहले इस मामले में सजा सुनाई गई थी. दो हफ्ते पहले 21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने शत्रुघ्न चौहान और अन्य बनाम केंद्र सरकार और अन्य मामले में 15 लोगों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था.
बतौर सरकारी वकील मैं अपनी दलीलों के दम पर उनमें से आठ को फांसी की सजा मुकर्रर करवाने में कामयाब हुआ था. मैं खुलेदिल से इस फैसले का स्वागत करता हूं. मौत की सजा, सुनाए जाते समय भले कितनी भी जायज क्यों न रही हो, अगर एक लंबे समय के बाद उसे लागू किया जाता है तो वह संविधान की नजर में नाजायज है.
लॉर्ड स्करमैन और ज्याफ्री रॉबर्टसन जैसे कई न्यायविद् देर से दी गई सजा के एकदम खिलाफ हैं. रॉबर्टसन ने अपनी किताब द जस्टिस गेम में अपने मुवक्किल, 1960 के दशक के अश्वेत कार्यकर्ता माइकल एक्स के साथ मुलाकात के बारे में बताया है. एक्स को 1975 में फांसी दी गई. वे लिखते हैं, ‘‘मुझे उससे मिलाने कुछ इस अंदाज में ले जाया गया, जैसे कोई चिड़िय़ाघर वाला विरली प्रजाति के बंदरों को दिखाने ले जा रहा हो.
कंक्रीट के फर्श वाले दड़बे में करीब तीसेक लोग, पसीने से तर-बतर, तार की जाली से उंगलियां बाहर निकालकर एक-दूसरे पर और वार्डन पर चीख-चिल्ला रहे थे. कुछ बंदी पागलों की तरह हरकत कर रहे थे तो कुछ बस गुस्से का इजहार कर रहे थे. उनमें माइकल अकेला शांत और अपने में खोया हुआ था. उसने मुझसे कहा, ‘‘हम फांसी के फंदे के झूलने की आवाज सुन सकते हैं, वह हमें साफ-साफ सुनाई देती है.’’
बाकी अभी शांत नहीं हुए थेः एक साथी कैदी को गंवा देने के दुख में चीखना-चिल्लाना जारी था, उसका शरीर फांसी के फंदे से हल्के-हल्के झूल रहा था. माइकल ये सब बातें धीरे-धीरे पूरी सावधानी के साथ बता रहा था, मानो वह अपनी हत्या के कर्मकांड को अपनी आंखों के सामने देख रहा हो. वह अब एकदम अलग शख्स था, जिस व्यक्ति को त्रिनिदाद की सरकार ने गुस्से में आकर एक दूसरे व्यक्ति की हत्या के लिए मौत के घाट उतारने की योजना बनाई थी, उससे वह बिल्कुल बदल गया था.’’
माइकल एक्स की फांसी के लगभग 22 साल बाद प्रिवी काउंसिल ने अर्ल प्रैट बनाम जमैका के अटॉर्नी जनरल के मामले में अपने फैसले में कानून की खामी को दुरुस्त किया. काउंसिल ने फैसला सुनाया, ‘‘मौत की सजा पाए किसी शख्स की फांसी वर्षों तक लटकाने के खिलाफ भावनात्मक उबाल देखा जा रहा है.
यह भावनात्मक उबाल क्यों पैदा हो रहा है? इसका जवाब सिर्फ मानवीय दृष्टिकोण से ढूंढ़ा जा सकता है. लंबे समय तक किसी को फांसी के इंतजार में रखना अमानवीय है. अगर फांसी की सजा बनाए रखनी है तो उस पर अमल जितनी जल्दी संभव हो, किया जाना चाहिए.’’
भारतीय न्यायपालिका भी इस सवाल से रू-ब-रू हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में वातेश्वरन मामले में मौत की सजा पर अमल के लिए दो साल की समय-सीमा तय की थी लेकिन 1989 में त्रिवेणीबेन मामले में संविधान पीठ ने समय सीमा हटा दी. पीठ ने फैसला सुनाया, ‘‘मौत की सजा के अमल में बेहिसाब देरी होने से सजायाफ्ता इस कोर्ट में अपील कर सकता है, लेकिन कोर्ट सिर्फ देरी की वजहों पर ही विचार करेगा और मौत की सजा के निष्कर्ष की जांच-परख करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं होगा.’’
भारत में मौत की सजा में देरी की बड़ी वजह राष्ट्रपतियों के भिन्न-भिन्न मत और तरीके रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने गृह मंत्रालय से पूछा था कि सिर्फ गरीबों को ही फांसी क्यों होती है? उनकी उत्तराधिकारी प्रतिभा पाटिल भी दया याचिकाओं के निबटारे में बहुत धीमी रफ्तार से चलीं. अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में उन्होंने पांच दया याचिकाएं खारिज कीं.
ये राजीव गांधी के हत्यारों, असम के महेंद्र नाथ दास और पंजाब के देविंदर पाल सिंह भुल्लर के मामले थे. उन्होंने 23 लोगों की फांसी की सजा माफ की और पिछले 30 साल में सबसे दयावान राष्ट्रपति कहलाईं. उनके बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अजमल कसाब की दया याचिका खारिज की.
यह फैसला मुश्किल इसलिए नहीं था क्योंकि वह 2008 के मुंबई आतंकी हमले का एकमात्र जीवित पकड़ा गया आतंकी था. उसके बाद उन्होंने अफजल गुरु को फांसी के तख्त पर भेजा और गृह मंत्रालय की सलाह पर कई और लंबित याचिकाओं को खारिज किया. इससे याचिकाकर्ता फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंचे.
न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी की अगुआई वाली पीठ ने 2013 में देरी के आधार पर दास की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया लेकिन भुल्लर के मामले में नरमी नहीं बरती क्योंकि उसे आतंकवाद के लिए सजा सुनाई गई है. 21 जनवरी के फैसले में इस फर्क को नहीं माना गया है. इस फैसले में सभी 15 मामलों की जांच की गई और वजह बताई गई कि क्यों उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती.
‘‘दया याचिका के लंबित रहने या कार्यपालिका अथवा संवैधानिक अधिकारियों के प्रासंगिक पहलुओं पर गौर न करने की वजह से अगर सजा के अमल में बेहिसाब, बेवजह और बेतुकी देरी होती है तो कोर्ट अनुच्छेद 32 के तहत सजायाफ्ता की शिकायत सुनने और मौत की सजा माफ करने का अधिकार रखता है, बशर्ते वह संतुष्ट हो कि देरी की वजह सजायाफ्ता नहीं है.’’
सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और हम सभी को याद दिलाया कि ‘‘हमारे लोकतांत्रिक देश में बदले की भावना की कोई जगह नहीं है. इस देश में अभियुक्त को भी संविधान के तहत सुरक्षा प्राप्त है. कोर्ट का यह कर्तव्य है कि उसकी रक्षा की जाए.’’
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं )
बतौर सरकारी वकील मैं अपनी दलीलों के दम पर उनमें से आठ को फांसी की सजा मुकर्रर करवाने में कामयाब हुआ था. मैं खुलेदिल से इस फैसले का स्वागत करता हूं. मौत की सजा, सुनाए जाते समय भले कितनी भी जायज क्यों न रही हो, अगर एक लंबे समय के बाद उसे लागू किया जाता है तो वह संविधान की नजर में नाजायज है.
लॉर्ड स्करमैन और ज्याफ्री रॉबर्टसन जैसे कई न्यायविद् देर से दी गई सजा के एकदम खिलाफ हैं. रॉबर्टसन ने अपनी किताब द जस्टिस गेम में अपने मुवक्किल, 1960 के दशक के अश्वेत कार्यकर्ता माइकल एक्स के साथ मुलाकात के बारे में बताया है. एक्स को 1975 में फांसी दी गई. वे लिखते हैं, ‘‘मुझे उससे मिलाने कुछ इस अंदाज में ले जाया गया, जैसे कोई चिड़िय़ाघर वाला विरली प्रजाति के बंदरों को दिखाने ले जा रहा हो.
कंक्रीट के फर्श वाले दड़बे में करीब तीसेक लोग, पसीने से तर-बतर, तार की जाली से उंगलियां बाहर निकालकर एक-दूसरे पर और वार्डन पर चीख-चिल्ला रहे थे. कुछ बंदी पागलों की तरह हरकत कर रहे थे तो कुछ बस गुस्से का इजहार कर रहे थे. उनमें माइकल अकेला शांत और अपने में खोया हुआ था. उसने मुझसे कहा, ‘‘हम फांसी के फंदे के झूलने की आवाज सुन सकते हैं, वह हमें साफ-साफ सुनाई देती है.’’
बाकी अभी शांत नहीं हुए थेः एक साथी कैदी को गंवा देने के दुख में चीखना-चिल्लाना जारी था, उसका शरीर फांसी के फंदे से हल्के-हल्के झूल रहा था. माइकल ये सब बातें धीरे-धीरे पूरी सावधानी के साथ बता रहा था, मानो वह अपनी हत्या के कर्मकांड को अपनी आंखों के सामने देख रहा हो. वह अब एकदम अलग शख्स था, जिस व्यक्ति को त्रिनिदाद की सरकार ने गुस्से में आकर एक दूसरे व्यक्ति की हत्या के लिए मौत के घाट उतारने की योजना बनाई थी, उससे वह बिल्कुल बदल गया था.’’
माइकल एक्स की फांसी के लगभग 22 साल बाद प्रिवी काउंसिल ने अर्ल प्रैट बनाम जमैका के अटॉर्नी जनरल के मामले में अपने फैसले में कानून की खामी को दुरुस्त किया. काउंसिल ने फैसला सुनाया, ‘‘मौत की सजा पाए किसी शख्स की फांसी वर्षों तक लटकाने के खिलाफ भावनात्मक उबाल देखा जा रहा है.
यह भावनात्मक उबाल क्यों पैदा हो रहा है? इसका जवाब सिर्फ मानवीय दृष्टिकोण से ढूंढ़ा जा सकता है. लंबे समय तक किसी को फांसी के इंतजार में रखना अमानवीय है. अगर फांसी की सजा बनाए रखनी है तो उस पर अमल जितनी जल्दी संभव हो, किया जाना चाहिए.’’
भारतीय न्यायपालिका भी इस सवाल से रू-ब-रू हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में वातेश्वरन मामले में मौत की सजा पर अमल के लिए दो साल की समय-सीमा तय की थी लेकिन 1989 में त्रिवेणीबेन मामले में संविधान पीठ ने समय सीमा हटा दी. पीठ ने फैसला सुनाया, ‘‘मौत की सजा के अमल में बेहिसाब देरी होने से सजायाफ्ता इस कोर्ट में अपील कर सकता है, लेकिन कोर्ट सिर्फ देरी की वजहों पर ही विचार करेगा और मौत की सजा के निष्कर्ष की जांच-परख करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं होगा.’’
भारत में मौत की सजा में देरी की बड़ी वजह राष्ट्रपतियों के भिन्न-भिन्न मत और तरीके रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने गृह मंत्रालय से पूछा था कि सिर्फ गरीबों को ही फांसी क्यों होती है? उनकी उत्तराधिकारी प्रतिभा पाटिल भी दया याचिकाओं के निबटारे में बहुत धीमी रफ्तार से चलीं. अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में उन्होंने पांच दया याचिकाएं खारिज कीं.
ये राजीव गांधी के हत्यारों, असम के महेंद्र नाथ दास और पंजाब के देविंदर पाल सिंह भुल्लर के मामले थे. उन्होंने 23 लोगों की फांसी की सजा माफ की और पिछले 30 साल में सबसे दयावान राष्ट्रपति कहलाईं. उनके बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अजमल कसाब की दया याचिका खारिज की.
यह फैसला मुश्किल इसलिए नहीं था क्योंकि वह 2008 के मुंबई आतंकी हमले का एकमात्र जीवित पकड़ा गया आतंकी था. उसके बाद उन्होंने अफजल गुरु को फांसी के तख्त पर भेजा और गृह मंत्रालय की सलाह पर कई और लंबित याचिकाओं को खारिज किया. इससे याचिकाकर्ता फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंचे.
न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी की अगुआई वाली पीठ ने 2013 में देरी के आधार पर दास की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया लेकिन भुल्लर के मामले में नरमी नहीं बरती क्योंकि उसे आतंकवाद के लिए सजा सुनाई गई है. 21 जनवरी के फैसले में इस फर्क को नहीं माना गया है. इस फैसले में सभी 15 मामलों की जांच की गई और वजह बताई गई कि क्यों उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती.
‘‘दया याचिका के लंबित रहने या कार्यपालिका अथवा संवैधानिक अधिकारियों के प्रासंगिक पहलुओं पर गौर न करने की वजह से अगर सजा के अमल में बेहिसाब, बेवजह और बेतुकी देरी होती है तो कोर्ट अनुच्छेद 32 के तहत सजायाफ्ता की शिकायत सुनने और मौत की सजा माफ करने का अधिकार रखता है, बशर्ते वह संतुष्ट हो कि देरी की वजह सजायाफ्ता नहीं है.’’
सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और हम सभी को याद दिलाया कि ‘‘हमारे लोकतांत्रिक देश में बदले की भावना की कोई जगह नहीं है. इस देश में अभियुक्त को भी संविधान के तहत सुरक्षा प्राप्त है. कोर्ट का यह कर्तव्य है कि उसकी रक्षा की जाए.’’
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं )

