नई दिल्ली के एस-67 पंचशील पार्क के बेसमेंट में एक तरह का आश्चर्य आपका इंतजार कर रहा है. एक बिल्ली म्याऊं करते हुए एकाएक कुर्सी के पीछे जा छुपती है. लेकिन इस तहखाने में चौंकाने के लिए इससे भी बड़े आश्चर्यजनक जीव हैः
उड़ता हाथी, बाघ की खाल जैसी धारियों वाला हिरण, एक सूअर जिसका मुंह उसके पेट पर है, विशालकाय मछली, पेड़ में गुंथी गाय, पक्षियों में बदल जाने वाला सांप वगैरह. दरअसल ये दीवार पर टंगी पेंटिंग हैं.
यह तलघर असल में मस्ट आर्ट गैलरी का ठिकाना है. आम तौर पर यहां मध्य भारत के गोंड आदिवासियों की परंपरागत कला की ही प्रदर्शनी लगा करती है. गोंड ज्यादातर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहते हैं. वे गांव-घरों की दीवारों को ऐसी पेंटिंग से सजाते रहे हैं. इसमें वे काल्पनिक पशु-पक्षियों से लेकर देवताओं और पेड़-पौधों का रूपाकार बनाते हैं

इस कला में विशिष्ट शैली के बिंदुओं, अंडाकृतियों और मछली की खाल जैसी आकृतियों का पैटर्न देखने को मिलता है. यह कला मुगल और अंग्रेजी राज में लगभग विलुप्त हो गई थी. 1980 के दशक में यह पुनर्जीवित होनी शुरू हुई जब भोपाल के कला केंद्र भारत भवन के मुखिया प्रसिद्ध कलाकार जगदीश स्वामीनाथन ने एक गोंड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम को फिर से स्थापित किया.
उनके प्रयोगात्मक काम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली. उसके बाद से इस समुदाय के कई कलाकार सामने आए और पिछले कुछ साल में उनके काम को देश-विदेश में कई कला संग्रहकर्ताओं ने खरीदा.
इस कला के पुनर्जीवन का सबसे बड़ा सबूत शायद यह है कि उनके काम की कीमत भी बढ़ी है. 39 वर्षीय राजेंद्र श्याम ने ब्रिटेन के नॉटिंघम की न्यू आर्ट एक्सचेंज गैलरी में 2009 में और लंदन की हॉर्नीमैन आर्ट गैलरी में 2011 में प्रदर्शनी लगाई. वे कहते हैं, ‘‘गोंड कला लोकप्रिय हो गई है. ए-4 आकार की पेंटिंग अब 2,000 रु. से 5,000 रु. में बिकती है.
दस साल पहले यह 150-200 रु. में बिक रही थी.’’ मस्ट आर्ट गैलरी की प्रवक्ता के मुताबिक, नर्मदा प्रसाद टेकम जैसे कलाकारों के काम की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है. उसी के शब्दों में, ‘‘टेकम की एक पेंटिंग की 2012 में नीलामी का न्यूनतम बेस प्राइस 60,000 रु. था. बिकी वह तिगुनी कीमत में.’’ एक दूसरे कलाकार मयंक श्याम की पेंटिंग्स की कीमतों में पिछले एक दशक में तीन गुना उछाल दिखा है. उनके बड़े कैनवस 2.5 लाख रु. तक में भी बिकते हैं.

गोंड कला की बढ़ती कीमतों से आदिवासी कलाकारों की जीवन दशा में भी काफी सुधार आया है. भोपाल में आदिवासी कला की प्रमोटर पद्मजा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘इन कलाकारों ने अब कार, सोफा, बड़ी टीवी वगैरह खरीद लिया है. उनके बच्चे बेहतर स्कूलों में पढऩे जाते हैं.’’
श्रीवास्तव ऑनलाइन गोंड आर्ट गैलरी चलाती हैं और गोंड कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रमोट करने का काम करती हैं. उनकी तरह की गैलरियों ने गोंड आर्ट को लोकप्रिय बनाया, तो ई-कॉमर्स के जरिए अब यह अंतरराष्ट्रीय संग्रहकर्ताओं तक पहुंच रही है. मस्ट गैलरी की प्रवक्ता के अनुसार, ‘‘अमेरिका और यूरोप से भी मांग आ रही है. गोंड कला कॉरपोरेट जगत में गिफ्ट देने के लिए भी खरीदी जा रही है.’’

हालांकि कुछ जानकार इस कला के पुनर्जीवन में इसके पुनरोत्थान को भी महत्व देते हैं. गोंड कलाकारों के काम में काल्पनिक पशु-पक्षियों और प्रकृति का अभी भी ज्यादा महत्व है लेकिन कुछ कलाकार इसमें नए तत्व भी ला रहे हैं.
मसलन, कलाकार वेकट रमन सिंह श्याम ने इस साल कनाडा की नेशनल गैलरी में सकहान इंटरनेशनल इंडिजिनस आर्ट एक्जिविशन में ‘‘स्मोकिंग ताज’’ की प्रदर्शनी लगाई. यह मुंबई के ताजमहल होटल में 26/11 के आतंकी हमले पर उनकी प्रतिक्रिया थी. यानी धीरे-धीरे ही सही, गोंड कला भी समकालीन दुनिया को दर्ज कर रही है.
उड़ता हाथी, बाघ की खाल जैसी धारियों वाला हिरण, एक सूअर जिसका मुंह उसके पेट पर है, विशालकाय मछली, पेड़ में गुंथी गाय, पक्षियों में बदल जाने वाला सांप वगैरह. दरअसल ये दीवार पर टंगी पेंटिंग हैं.
यह तलघर असल में मस्ट आर्ट गैलरी का ठिकाना है. आम तौर पर यहां मध्य भारत के गोंड आदिवासियों की परंपरागत कला की ही प्रदर्शनी लगा करती है. गोंड ज्यादातर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहते हैं. वे गांव-घरों की दीवारों को ऐसी पेंटिंग से सजाते रहे हैं. इसमें वे काल्पनिक पशु-पक्षियों से लेकर देवताओं और पेड़-पौधों का रूपाकार बनाते हैं

इस कला में विशिष्ट शैली के बिंदुओं, अंडाकृतियों और मछली की खाल जैसी आकृतियों का पैटर्न देखने को मिलता है. यह कला मुगल और अंग्रेजी राज में लगभग विलुप्त हो गई थी. 1980 के दशक में यह पुनर्जीवित होनी शुरू हुई जब भोपाल के कला केंद्र भारत भवन के मुखिया प्रसिद्ध कलाकार जगदीश स्वामीनाथन ने एक गोंड कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम को फिर से स्थापित किया.
उनके प्रयोगात्मक काम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली. उसके बाद से इस समुदाय के कई कलाकार सामने आए और पिछले कुछ साल में उनके काम को देश-विदेश में कई कला संग्रहकर्ताओं ने खरीदा.
इस कला के पुनर्जीवन का सबसे बड़ा सबूत शायद यह है कि उनके काम की कीमत भी बढ़ी है. 39 वर्षीय राजेंद्र श्याम ने ब्रिटेन के नॉटिंघम की न्यू आर्ट एक्सचेंज गैलरी में 2009 में और लंदन की हॉर्नीमैन आर्ट गैलरी में 2011 में प्रदर्शनी लगाई. वे कहते हैं, ‘‘गोंड कला लोकप्रिय हो गई है. ए-4 आकार की पेंटिंग अब 2,000 रु. से 5,000 रु. में बिकती है.
दस साल पहले यह 150-200 रु. में बिक रही थी.’’ मस्ट आर्ट गैलरी की प्रवक्ता के मुताबिक, नर्मदा प्रसाद टेकम जैसे कलाकारों के काम की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है. उसी के शब्दों में, ‘‘टेकम की एक पेंटिंग की 2012 में नीलामी का न्यूनतम बेस प्राइस 60,000 रु. था. बिकी वह तिगुनी कीमत में.’’ एक दूसरे कलाकार मयंक श्याम की पेंटिंग्स की कीमतों में पिछले एक दशक में तीन गुना उछाल दिखा है. उनके बड़े कैनवस 2.5 लाख रु. तक में भी बिकते हैं.

गोंड कला की बढ़ती कीमतों से आदिवासी कलाकारों की जीवन दशा में भी काफी सुधार आया है. भोपाल में आदिवासी कला की प्रमोटर पद्मजा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘इन कलाकारों ने अब कार, सोफा, बड़ी टीवी वगैरह खरीद लिया है. उनके बच्चे बेहतर स्कूलों में पढऩे जाते हैं.’’
श्रीवास्तव ऑनलाइन गोंड आर्ट गैलरी चलाती हैं और गोंड कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रमोट करने का काम करती हैं. उनकी तरह की गैलरियों ने गोंड आर्ट को लोकप्रिय बनाया, तो ई-कॉमर्स के जरिए अब यह अंतरराष्ट्रीय संग्रहकर्ताओं तक पहुंच रही है. मस्ट गैलरी की प्रवक्ता के अनुसार, ‘‘अमेरिका और यूरोप से भी मांग आ रही है. गोंड कला कॉरपोरेट जगत में गिफ्ट देने के लिए भी खरीदी जा रही है.’’

हालांकि कुछ जानकार इस कला के पुनर्जीवन में इसके पुनरोत्थान को भी महत्व देते हैं. गोंड कलाकारों के काम में काल्पनिक पशु-पक्षियों और प्रकृति का अभी भी ज्यादा महत्व है लेकिन कुछ कलाकार इसमें नए तत्व भी ला रहे हैं.
मसलन, कलाकार वेकट रमन सिंह श्याम ने इस साल कनाडा की नेशनल गैलरी में सकहान इंटरनेशनल इंडिजिनस आर्ट एक्जिविशन में ‘‘स्मोकिंग ताज’’ की प्रदर्शनी लगाई. यह मुंबई के ताजमहल होटल में 26/11 के आतंकी हमले पर उनकी प्रतिक्रिया थी. यानी धीरे-धीरे ही सही, गोंड कला भी समकालीन दुनिया को दर्ज कर रही है.

