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सुर्खियों के सरताज 2013: सचिन तेंडुलकर

सचिन तेंडुलकर के रिटायरमेंट ने न सिर्फ उनके लिए इस साल को यादगार बनाया बल्कि उनके करोड़ो प्रशंसकों और चाहने वालों के लिए भी खास रहा.

अपडेटेड 6 जनवरी , 2014
भारतीय क्रिकेट को अगर हम एक बेहद उतार-चढ़ाव भरे लैंडस्केप के रूप में देखें तो घास का हरा मैदान अकसर अंधेरी खाइयों में तब्दील हो जाता है. ऐसे हालात में सचिन तेंडुलकर ही वे खेवनहार थे जो हमारे लिए लगातार उम्मीद बंधाते रहे.

उनके बेहतरीन फुटवर्क के साथ ही हाथों और आंखों के बीच के तालमेल ने न केवल क्रिकेट की बदलती विश्व व्यवस्था को परिभाषित किया, बल्कि एक नए भयमुक्त भारत का चेहरा बने. वे एक अगुआ, एक जादूगर, एक देवता जैसे थे.

घुंघराले बालों वाले एक बालक ने हमारी चेतना में प्रवेश करने के 24 साल बाद सचिन के रूप में उससे बाहर जाने का निर्णय लिया. यह दिग्गज माइक्रोफोन से भी उतना ही मोहित कर सकता है, जितना कि तीखे शोर वाले स्टेट ड्राइव के साथ करता था.

वानखेड़े स्टेडियम में अपना विदाई भाषण शुरू करने से पहले उन्होंने वहां जुटे अपने प्रशंसकों से कहा, ''दोस्तो...बैठ जाइए, कृपया मुझे बोलने दीजिए, नहीं तो मैं भावुक हो जाऊंगा.” आलोचक, उन्हें घेरने वाले, उनको नजरअंदाज न कर पाने वाले, सभी उस दिन कुछ अलग महसूस कर रहे थे.

यह हमारे जैसे करोड़ों लोगों के लिए अपने जीवन का एक निजी अध्याय खत्म कर देने जैसा था. महीने भर तक उनका विदाई उत्सव लाहली से कोलकाता और मुंबई तक चलता रहा. मैदानों, चाय की दुकानों और दूसरे देशों में प्रवासी भारतीयों के बीच 'सचिन, सचिन’ का मंत्र गूंजता रहा.

अंत में सचिन को ऐसी विदाई मिली जैसी कि वे चाहते थे. तगड़े गेंदबाजी आक्रमण के खिलाफ शायद वह ठीक न होता. वेस्ट इंडीज की 2-0 से धुलाई ने एक फील-गुड फैक्टर तो दे ही दिया था. इसी माहौल में उन्हें भारत रत्न देने का ऐलान हो गया.

पद्म विभूषण, राजीव गांधी खेल रत्न और एक अरब से ज्यादा भारतीयों की शुभेच्छाओं के बगल में यह भी सजेगा. उनके प्रशंसकों में सभी क्रिकेट प्रेमी नहीं, पर वे इतना जानते हैं कि सचिन का मतलब क्या?
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