खास लम्हा : बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनना
मोदी की लहर
-उनके फेसबुक पेज पर हर हफ्ते 2 करोड़ लोग कनेक्ट करते हैं. यही नहीं, उनकी पसंदीदा ड्रेस को मोदी कुर्ता नाम दिया गया है.
-देश भर में हुई उनकी रैलियों में 60 लाख लोग शिरकत कर चुके हैं.
अगर कोई एक ऐसा शख्स है, जिसने 2013 में राजनीति की दिशा बदली है, तो वे हैं 63 वर्षीय नरेंद्र दामोदर दास मोदी. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और 2014 के चुनाव में उसके मुख्य प्रचारक के रूप में मोदी ने दुनिया के सबसे मुखर लोकतंत्र की सोच पर पूरी तरह छा जाने के अलावा भी काफी कुछ किया है.
यह शख्स संदेश और संदेशवाहक दोनों बन गया है. देश में नई चेतना जागृत करने की मोदी की पुकार ने उन लोगों को झंकृत किया है, जो दिल्ली में बैठे वर्तमान शासकों के हाथों छला हुआ महसूस कर रहे हैं. विकास की उनकी पुकार ने उन लोगों को उम्मीद दिलाई है, जो ठहरी हुई अर्थव्यवस्था से निराश हैं.
संदेशवाहक भी उतना ही हावी है. मोदी अपनी पार्टी से ऊपर उठ गए हैं और रॉक स्टार की तरह काम कर रहे हैं. वे जनता के दिमाग से जबरदस्त ढंग से खेल रहे हैं. उनका करिश्मा, उनके जुझारूपन, उनके आक्रोश और प्रशासक के रूप में उनकी उपलब्धियां, उनकी महत्वाकांक्षा से मेल खाती हैं.
मोदी का रास्ता इतना आसान नहीं था. सबसे पहले जून में पार्टी की प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित होने के लिए उन्हें पार्टी के भीतर विरोध को कुचलना पड़ा. वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने विरोध में कार्यकारिणी का बहिष्कार किया. फिर भी पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को कार्यकर्ताओं के दबाव के आगे झुकना पड़ा. जब मोदी को सितंबर में विधानसभा चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो हालात बदल चुके थे और आडवाणी विरोध भी नहीं कर पाए.
मोदी अब पार्टी के बाहर विरोधियों को जीतने की कोशिश में हैं, चाहे वे मुसलमान हों या उन्हें बांटने वाला नेता मानने वाले लोग. वे चाय बेचने के अपने दिनों की याद दिलाकर गरीबों का दिल जीतने में लगे हैं. सोशल मीडिया पर बढ़ते समर्थन से मोदी का प्रभाव जाहिर होता है. इनमें आम तौर पर आरएसएस और बीजेपी समर्थक दक्षिणपंथी साइबर हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि मोदी के ऐसे नए समर्थक भी हैं, जिन्हें लगता है कि उनके पास हर समस्या का समाधान है और वे कुछ गलत नहीं कर सकते.
मोदी ने जो आंधी पैदा की है और यूपीए का जितना व्यापक विरोध है, उसका सबूत विधानसभा चुनाव में मिला, जब बीजेपी ने भारी बहुमत से राजस्थान जीता और छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाई. तीनों विजेता मुख्यमंत्रियों ने माना कि उनके राज्यों में मोदी के प्रचार से बढ़त मिली.
2014 की गर्मियों में मोदी प्रधानमंत्री बनें या न बनें, उन्होंने भारतीय राजनीति की चाल बदल दी है. वे अकसर बोलते हैं, जोर से बोलते हैं और अपने से असहमत लोगों को भी अपनी बात सुनने पर मजबूर कर देते हैं. 29 अक्तूबर को कानपुर की रैली में मोदी ने कहा था कि 125 करोड़ का देश दुनिया की सबसे युवा आबादी के बल पर जो चाहे हासिल कर सकता है. जरूरत है सिर्फ हासिल करने के लिए मजबूत इरादे की.
मोदी इतने सयाने हैं कि अपनी कमियों को पहचानते हैं और इसीलिए विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की बारीकियों को समझने में लगे हैं. वे लगातार सोनिया गांधी और 'शहजादा’ राहुल का मखौल उड़ाकर कांग्रेस के पहले परिवार पर हमला बोल रहे हैं. लेकिन बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि उन्हें अब हर बार सिर्फ कांग्रेस पर चाबुक भांजने की बजाए समाधानों की बात ज्यादा करनी चाहिए. 2013 में कांग्रेस विरोधी लहर ने मोदी की ताकत बढ़ाई. 2014 की जंग मोदी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जंग होगी.
मोदी की लहर
-उनके फेसबुक पेज पर हर हफ्ते 2 करोड़ लोग कनेक्ट करते हैं. यही नहीं, उनकी पसंदीदा ड्रेस को मोदी कुर्ता नाम दिया गया है.
-देश भर में हुई उनकी रैलियों में 60 लाख लोग शिरकत कर चुके हैं.
अगर कोई एक ऐसा शख्स है, जिसने 2013 में राजनीति की दिशा बदली है, तो वे हैं 63 वर्षीय नरेंद्र दामोदर दास मोदी. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और 2014 के चुनाव में उसके मुख्य प्रचारक के रूप में मोदी ने दुनिया के सबसे मुखर लोकतंत्र की सोच पर पूरी तरह छा जाने के अलावा भी काफी कुछ किया है.
यह शख्स संदेश और संदेशवाहक दोनों बन गया है. देश में नई चेतना जागृत करने की मोदी की पुकार ने उन लोगों को झंकृत किया है, जो दिल्ली में बैठे वर्तमान शासकों के हाथों छला हुआ महसूस कर रहे हैं. विकास की उनकी पुकार ने उन लोगों को उम्मीद दिलाई है, जो ठहरी हुई अर्थव्यवस्था से निराश हैं.
संदेशवाहक भी उतना ही हावी है. मोदी अपनी पार्टी से ऊपर उठ गए हैं और रॉक स्टार की तरह काम कर रहे हैं. वे जनता के दिमाग से जबरदस्त ढंग से खेल रहे हैं. उनका करिश्मा, उनके जुझारूपन, उनके आक्रोश और प्रशासक के रूप में उनकी उपलब्धियां, उनकी महत्वाकांक्षा से मेल खाती हैं.
मोदी का रास्ता इतना आसान नहीं था. सबसे पहले जून में पार्टी की प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित होने के लिए उन्हें पार्टी के भीतर विरोध को कुचलना पड़ा. वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने विरोध में कार्यकारिणी का बहिष्कार किया. फिर भी पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को कार्यकर्ताओं के दबाव के आगे झुकना पड़ा. जब मोदी को सितंबर में विधानसभा चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो हालात बदल चुके थे और आडवाणी विरोध भी नहीं कर पाए.
मोदी अब पार्टी के बाहर विरोधियों को जीतने की कोशिश में हैं, चाहे वे मुसलमान हों या उन्हें बांटने वाला नेता मानने वाले लोग. वे चाय बेचने के अपने दिनों की याद दिलाकर गरीबों का दिल जीतने में लगे हैं. सोशल मीडिया पर बढ़ते समर्थन से मोदी का प्रभाव जाहिर होता है. इनमें आम तौर पर आरएसएस और बीजेपी समर्थक दक्षिणपंथी साइबर हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि मोदी के ऐसे नए समर्थक भी हैं, जिन्हें लगता है कि उनके पास हर समस्या का समाधान है और वे कुछ गलत नहीं कर सकते.
मोदी ने जो आंधी पैदा की है और यूपीए का जितना व्यापक विरोध है, उसका सबूत विधानसभा चुनाव में मिला, जब बीजेपी ने भारी बहुमत से राजस्थान जीता और छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाई. तीनों विजेता मुख्यमंत्रियों ने माना कि उनके राज्यों में मोदी के प्रचार से बढ़त मिली.
2014 की गर्मियों में मोदी प्रधानमंत्री बनें या न बनें, उन्होंने भारतीय राजनीति की चाल बदल दी है. वे अकसर बोलते हैं, जोर से बोलते हैं और अपने से असहमत लोगों को भी अपनी बात सुनने पर मजबूर कर देते हैं. 29 अक्तूबर को कानपुर की रैली में मोदी ने कहा था कि 125 करोड़ का देश दुनिया की सबसे युवा आबादी के बल पर जो चाहे हासिल कर सकता है. जरूरत है सिर्फ हासिल करने के लिए मजबूत इरादे की.
मोदी इतने सयाने हैं कि अपनी कमियों को पहचानते हैं और इसीलिए विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की बारीकियों को समझने में लगे हैं. वे लगातार सोनिया गांधी और 'शहजादा’ राहुल का मखौल उड़ाकर कांग्रेस के पहले परिवार पर हमला बोल रहे हैं. लेकिन बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि उन्हें अब हर बार सिर्फ कांग्रेस पर चाबुक भांजने की बजाए समाधानों की बात ज्यादा करनी चाहिए. 2013 में कांग्रेस विरोधी लहर ने मोदी की ताकत बढ़ाई. 2014 की जंग मोदी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जंग होगी.

