भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) सरीखे देश के अग्रिम वैज्ञानिक संस्थान के मुखिया, 64 वर्षीय कोप्पिली राधाकृष्णन गहरी धार्मिक आस्था वाले व्यक्ति हैं. सच पूछिए तो उनका कोई भी बड़ा मिशन गुरुवायूर या फिर तिरुपति मंदिर में दर्शन-पूजन के बगैर शुरू नहीं होता.
मंगल ग्रह का चक्कर लगाने के लिए 5 नवंबर को छोड़े गए मंगलयान के पीछे की शक्ति वे ही रहे हैं. अंतरिक्ष में भारत का यह अब तक का सबसे दुस्साहसी अभियान माना जा रहा है.

दुनियाभर से अभी तक मंगल के कुल 52 मिशन भेजे गए हैं. लेकिन जहां तक कामयाबी की बात है तो इनमें से 22 मिशन को ही सफलता मिली है.
अपने निर्धारित समय यानी अगले सितंबर में इसरो अगर इस अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दे सका तो भारत उन तीन एजेंसियों के साथ विशेष जमात में शामिल हो जाएगा, जिन्हें अब तक इसमें कामयाबी मिली है. इन तीनों के नाम हैं यूरोपियन स्पेस एजेंसी, रशियन स्पेस एजेंसी और नासा.
राधाकृष्णन ने अपनी पंचलाइन तैयार रखी है: ''हम दुनिया को यह बताएंगे कि भारत की मितव्ययी इंजीनियरिंग सबसे किफायती और कामयाब है—ऑटोमोबाइल से लेकर अंतरिक्ष तक.”
मंगल ग्रह का चक्कर लगाने के लिए 5 नवंबर को छोड़े गए मंगलयान के पीछे की शक्ति वे ही रहे हैं. अंतरिक्ष में भारत का यह अब तक का सबसे दुस्साहसी अभियान माना जा रहा है.

दुनियाभर से अभी तक मंगल के कुल 52 मिशन भेजे गए हैं. लेकिन जहां तक कामयाबी की बात है तो इनमें से 22 मिशन को ही सफलता मिली है.
अपने निर्धारित समय यानी अगले सितंबर में इसरो अगर इस अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दे सका तो भारत उन तीन एजेंसियों के साथ विशेष जमात में शामिल हो जाएगा, जिन्हें अब तक इसमें कामयाबी मिली है. इन तीनों के नाम हैं यूरोपियन स्पेस एजेंसी, रशियन स्पेस एजेंसी और नासा.
राधाकृष्णन ने अपनी पंचलाइन तैयार रखी है: ''हम दुनिया को यह बताएंगे कि भारत की मितव्ययी इंजीनियरिंग सबसे किफायती और कामयाब है—ऑटोमोबाइल से लेकर अंतरिक्ष तक.”

