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भास्कर ने पटना में दस्तक देकर मीडिया जगत में मचाई खलबली

दैनिक भास्कर की आक्रामक दस्तक से पटना के मीडिया जगत में हलचल, अखबारों की कीमत और क्वालिटी पर छिड़ी जंग. प्रमुख अखबारों ने पटना में कीमत घटाई.

अपडेटेड 30 दिसंबर , 2013

पटना में दैनिक भास्कर ने आखिकार कदम रख ही दिया है. इस बात की पूरी संभावना है कि पटना में अखबार का पहला अंक 14 जनवरी को या उसके कुछ दिन बाद आ जाएगा. भारत में दूसरे सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी दैनिक अखबार, दैनिक भास्कर के प्रकाशक डीबी कॉर्प ने जिज्ञासा जगाने वाले बड़े-बड़े विज्ञापनों के साथ अगस्त- सितंबर में ही पटना आने का ऐलान कर दिया था. इन विज्ञापनों में अलग-अलग इंसानों के मुंह बंद किए हुए चित्र थे. इनमें से हर एक पर बस एक पंक्ति लिखी थी-बोलो बिहार बोलो.

इसका साफ इशारा था कि बिहार का मीडिया हमेशा चुप रहता है. उसके बाद के विज्ञापनों में कई सटीक सवाल किए गए, जैसे-पटना के अखबार देश में सबसे महंगे क्यों हैं. डीबी कॉर्प के आक्रामक प्रचार का असर तुरंत दिखने लगा. अक्तूबर में यहां तीनों स्थापित प्रतिद्वंद्वी अखबारों—हिंदुस्तान, दैनिक जागरण और प्रभात खबर ने पटना में अपनी कीमत घटाकर ढाई रु. कर दी. जल्द ही विज्ञापनों पर नई पंक्ति दिखने लगी—कीमतें घटीं, क्वालिटी? अब आपको मिलेगी सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी.

पटना में दैनिक भास्कर की दस्तक से यहां के तीनों प्रतिष्ठित अखबार अपनी विषय-वस्तु और रणनीति की वर्षों पुरानी चाल बदलने पर मजबूर हुए हैं. भास्कर की पहली प्रति प्रकाशित होने से पहले ही कई स्तरों पर उसका असर दिखने लगा है. इन तीनों अखबारों में अब जन-केंद्रित सामग्री प्रमुखता से छपने लगी है. एक पाठक का कहना है, ''तीनों अखबारों में छह महीने पहले की तुलना में नई किस्म की ताजगी दिखाई दे रही है. ''

डीबी कॉर्प ने पटना में अपनी संपादकीय टीम का नेतृत्व प्रमोद मुकेश को सौंपा है, जो पहले प्रभात खबर में थे. प्रमोद ने डीबी कॉर्प की तरफ  से संपादकीय सहयोगियों को चुना है और उन्हें उनके पिछले संगठनों से बेहतर वेतन देने का वादा किया है. भास्कर के लिए इस भर्ती का असर भी अन्य तीनों अखबरों में दिखने लगा है. इन तीनों ने ही टक्कर के वेतन की पेशकश या वादे के साथ अपने कई संपादकीय सहयोगियों और कर्मचारियों को भास्कर में जाने से रोका है.

पटना के बाजार में भास्कर की आहट ने विज्ञापन उद्योग में भी हलचल मचा दी है. पिछले कुछ वर्षों में इस उद्योग में लगातार 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी होती रही है. ऐसा माना जा रहा है कि भास्कर के आने से बिहार में विज्ञापन के नए अवसर खुलेंगे. हिंदी पट्टी में डीबी कॉर्प को स्थानीय विज्ञापनदाताओं से होने वाली कुल विज्ञापन कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा मिलता है. डीबी कॉर्प से जुड़े एक विज्ञापनकर्मी का कहना है, ''दैनिक भास्कर के आने से पहले से मौजूद अखबारों को करारी चोट लगेगी. शुरू में हमें उम्मीद है कि विज्ञापन की कुल कमाई का कम से कम तीस प्रतिशत हिस्सा हम ले लेंगे. ''

बिहार जो कभी मैनुफैक्चरिंग उद्योग के लिए मजदूरों की भर्ती का केंद्र था, वहां अब खरीदार बढ़ गए हैं. बड़ी-बड़ी कंपनियां अब बिहार को विशाल उपभोक्ता बाजार की नजर से देखने लगी हैं. पटना में डीबी कॉर्प के एक वरिष्ठ विज्ञापनकर्मी का कहना है ''इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बिहार में विज्ञापनों की संख्या बढ़ रही है, जिससे दैनिक भास्कर  को लाभ ही होगा. '' 

पटना में एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के विज्ञापन अधिकारी ने माना कि हिंदी प्रदेश में विज्ञापन की कमाई करीब 13 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि कुल मिलाकर उद्योग 8-9 प्रतिशत की दर से ही बढ़ रहा है. एक और विज्ञापनकर्मी का मानना है, ''पटना के बाजार में अग्रणी प्रकाशकों का एकाधिकार भी टूटेगा, जिससे उनकी बहुत चढ़ी हुई विज्ञापन दरें कम होंगी. '' कई विज्ञापन एजेंसियां छोटे बजट वाले ग्राहकों को दैनिक भास्कर में विज्ञापन देने की सिफारिश करने वाली हैं. ऐसा माना जाता है कि भास्कर ने पटना में आने में देरी की है, फिर भी लगातार बढ़ती सरकारी विज्ञापनों की कमाई के हिसाब से अखबार सही समय पर आने वाला है. 2006-07 से 2011-12 के बीच राज्य सरकार ने पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन समाचार चैनलों में विज्ञापन पर 141.3 करोड़ रु. खर्च किए, जबकि 2000-2001 और 2004-05 के बीच यह खर्च 22.5 करोड़ रु. था. भास्कर  आज नहीं तो कल सरकारी विज्ञापन पाने का हकदार हो जाएगा.

भास्कर  के आने से पहले तीनों प्रमुख अखबार ऑनलाइन बिक्री और अखबार बेचने वालों के जरिए होने वाली बिक्री से पाठकों का दायरा बढ़ाने की कोशिश में वार्षिक ग्राहकी और उपहारों का लालच दे रहे हैं. कीमत कम करने से कभी-कभार पढऩे वाला पाठक भी ढाई रु. में अखबार खरीद लेता है. बताया जाता है कि ये तीनों अखबार वितरण के मोर्चे पर भी जूझ रहे हैं. बिक्री अधिकारी अपने प्रतिद्वंद्वियों पर आरोप लगा रहे हैं कि वे अखबार बेचने वालों को खरीद रहे हैं, ताकि वे दूसरे अखबार न बेचें.

भास्कर की दस्तक से इसमें भी एकाधिकार टूटने वाला है. अखबार बेचने वालों और एजेंटों को भी एक नया विकल्प मिल गया है. कीमतें घटाने के बावजूद पहले से मौजूद अखबारों को मजबूरन अखबार बेचने वालों को आकर्षक प्रोत्साहन देना पड़ रहा है, ताकि वे दूसरे अखबार न बेचें. कुछ मीडिया घराने ज्यादा संख्या में अखबार छापने की रणनीति का संकेत दे रहे हैं.

कुछ लोगों का दावा है कि भास्कर  बड़े धमाके के साथ आ तो रहा है, पर सामग्री के लिहाज से कदम जमाने में उसे वक्त लगेगा, क्योंकि पहले से मौजूद अखबार अपनी स्थिति का लाभ पाते रहेंगे. यह भी सच है कि भास्कर  को उभरने में भले ही समय लगे, लेकिन उसके बारे में जगी उत्सुकता फायदेमंद साबित होगी. इससे पहले पटना में कई अखबारों की शुरुआत नाकाम रही है. कई अखबार कदम नहीं जमा सके और कम-से-कम एक अखबार ऐसा है, जो अब बहुत पिछड़ गया है. लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग होगी क्योंकि पहले से मौजूद तीनों अखबारों के साथ भास्कर  की जेबें बहुत भारी हैं.

पटना में मीडिया वार के पहले दौर में किसी अखबार को विजेता चुन पाना मुश्किल है, पर मुकाबला जरूर दिलचस्प होगा. अखबार और उनकी रणनीतियां चाहे जिस ओर करवट लें, असली लाभ तो पाठकों को मिलेगा.

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