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आधुनिक सोच और हिंदुत्व के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे नरेंद्र मोदी

आधुनिक सोच वाले शख्स और हिंदुत्व के झंडाबरदार मर्दाना नेता की इमेज के बीच संतुलन साधने की बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की कोशिश.

अपडेटेड 25 नवंबर , 2013
कहने को तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों में कड़ा मुकाबला है लेकिन इन दिनों जो नाम सबसे अधिक चर्चा में है, वह है बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का. प्रधानमंत्री पद के लिए अपना नाम घोषित करवाने की खातिर पार्टी के भीतर चली लंबी लड़ाई दो महीने पहले जीतने के बाद देशभर में रैलियों को संबोधित कर मोदी पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुके हैं.

मोदी के भाषणों से पता चलता है कि उन विभिन्न मतदाता वर्गों में संतुलन साधने के लिए उन्हें कितनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है जिन्हें वे खुश रखना चाहते हैं. जब वे बिना तुष्टीकरण वाले विकास की बात करते हैं तो उसमें विकास के भूखे ऐसे मिडिल क्लास के लिए एक संदेश छिपा होता है जो आधुनिक मोदी की खातिर समाज को बांटने वाले मोदी को नजरअंदाज करने को तैयार है क्योंकि उनसे उसे उम्मीद है कि वे डगमगाती अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेंगे. दूसरा संदेश कट्टरपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड के लिए है.

8 नवंबर को उत्तर प्रदेश के बहराइच की अपनी रैली में नरेंद्र मोदी ने चुनौती दी, ''अगले चुनाव में सीबीआइ और इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) कांग्रेस को बचाने के लिए लड़ेंगे. जनता के बीच आकर हमारा मुकाबला कीजिए. कायरों की तरह छिपकर हमारी पीठ पर वार मत करिए.”

शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार ने किसी प्रमुख राजनैतिक पार्टी या सीबीआइ की तुलना आतंकी संगठन से की हो. रैली में उन्होंने गुजरात के गांवों को चौबीसों घंटे बिजली देने का लक्ष्य हासिल करने की चर्चा भी की लेकिन उनकी आइएम वाली टिप्पणी को ही लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

बीजेपी के एक रणनीतिकार का कहना है कि मोदी चाहे अपने शब्द चुन-चुनकर बोलते हों या उनकी जुबान फिसल जाती हो, ''संदेश वहां पहुंच जाता है जहां उसे पहुंचना चाहिए था.” मसलन यही तथ्य कि पूरी बीजेपी राहुल गांधी को कांग्रेस का युवराज कहती है मगर मोदी के लिए वे हमेशा से 'दिल्ली सल्तनत’ के 'शहजादे’ ही रहे हैं.

मोदी के मुताबिक कांग्रेस सिर्फ कपड़े ही नहीं पहनती बल्कि मुस्लिम वोटों को रिझाने के लिए वह 'धर्मनिरपेक्षता का बुर्का भी ओढ़ती है. शहजादा और बुर्का जैसे प्रतीकों से मोदी हिंदुत्वादी वोटरों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं शहरी मध्यवर्ग के लिए वे गुजरात के विकास का डंका पीट रहे हैं.

कार्यकर्ताओं और अति-उत्साही लोगों के लिए मोदी का संदेश हिंदू नेता का या एक बीजेपी नेता के शब्दों में कहें तो 'हिंदू हृदय सम्राट’ का होता है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि 27 अक्तूबर को पटना की रैली में हुए कई धमाकों के बावजूद मोदी तथा अन्य बीजेपी नेताओं ने रैली को जारी रखा.

उसमें सात लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कई अन्य घायल हो गए. मोदी ने खुद को और दूसरों को भले ही खतरे में डाला हो लेकिन यह उस मर्दाना और बाहुबली छवि के अनुरूप ही था जिसे वे कई वर्षों से सतर्कतापूर्वक गढ़ते रहे हैं. सोशल मीडिया उनकी तुलना एक शेर से करते मैसेज तथा छवियों से भरा पड़ा है.

रैलियों और यहां तक कि बीजेपी की बैठकों में भी नारा लगाने वाली भीड़ 'भारत मां का शेर आया’ के नारे के साथ उनका स्वागत करती है.

जब बिहार बीजेपी ने पटना में मारे गए लोगों के अस्थि कलशों के साथ एक यात्रा निकालना तय किया तो मोदी को हिंदुत्व की जरूरत और अपनी उस नई नरम छवि के बीच संतुलन साधने की सबसे कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ा जिसके निर्माण की कोशिश वे अपने 'न्याय सभी का, तुष्टीकरण किसी का नहीं’ और 'सबका साथ, सबका विकास’ जैसे जुड़वां नारे के माध्यम से कर रहे हैं.

मोदी को इस बात का एहसास है कि जहां कार्यकर्ताओं के दबाव की वजह से आरएसएस प्रधानमंत्री पद की उनकी उम्मीदवारी के मुद्दे पर नरम पड़ा है, वहीं चुनाव अगर महंगाई, भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों पर लड़ा जाना है तो उन्हें महज हिंदू हृदय सम्राट से कुछ अधिक होने की जरूरत होगी. बीजेपी के लिए सबसे आदर्श स्थिति में पार्टी को एक हिंदुत्व समर्थक ध्रुवीकरण की उम्मीद है जो 2014 में उसे बहुमत दिला ले जाएगा.

बीजेपी अध्यत्क्ष राजनाथ सिंह के राजनैतिक सलाहकार सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं, ''अगर यह चुनाव लहर वाला हुआ तो वह लहर हिंदू राष्ट्रवादी वोटों के ध्रुवीकरण की वजह से पैदा होगी. अतीत में सभी लहरें ऐसे ही ध्रुवीकरण की वजह से पैदा हुई हैं.”

बीजेपी का चुनावी गणित इस धारणा पर आधारित है कि बांग्लादेश युद्ध के बाद और 1984 की कांग्रेस विजय से लेकर बीजेपी को दिल्ली में सत्ता पर ला बिठाने वाले राम जन्मभूमि आंदोलन तक सभी बड़ी लहरें हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के कंधे पर ही सवार होकर आई हैं. लेकिन मोदी एक ही दांव पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते.

जब बिहार बीजेपी इकाई अस्थि कलश यात्रा का प्रस्ताव लाई थी तो मोदी ने यह सुझाव रखा कि वे रैली में मारे गए लोगों के लिए पटना में एक शोकसभा को संबोधित कर दें. मगर बीजेपी आलाकमान ने प्रदेश इकाई की मांग को स्वीकार कर लिया. यात्रा के समर्थकों का यह तर्क था कि लोग इसलिए मारे गए क्योंकि वे बीजेपी की रैली में शामिल होने आए थे, इसलिए उनके लिए कुछ खास और हटकर किया जाना चाहिए. मोदी सांत्वना देने के लिए मृतकों के घर जाकर उनके परिजनों से मिले.

मोदी अपनी हिंदुत्व वाली छवि को इन दिनों थोड़ा संयत रखने की कोशिश करते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में उन्होंने दो जगह रैलियां कीं, बहराइच और कानपुर (19 अक्तूबर) में, लेकिन उन्होंने कहीं भी राम मंदिर का नाम तक नहीं लिया. यह काम उनके भरोसेमंद सिपहसालार और बीजेपी महासचिव अमित शाह के लिए छोड़ दिया गया है जिन्होंने जुलाई में पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी के रूप में अपने कार्यकाल की शुरुआत अयोध्या के एक दौरे के साथ की थी.

नरेंद्र मोदी इन दिनों अपेह्नाकृत नरम हिंदुत्व दृष्टिकोण को तरजीह देते हैं. वे तुष्टीकरण के किसी आग्रह से रहित विकास पुरुष की छवि पर ही जोर देना पसंद करेंगे. आरएसएस नेता और गुजरात बीजेपी के महासचिव भरत पांड्या मोदी के मन को भली-भांति समझते हैं. वे कहते हैं, ''विकास, गरीबी उन्मूलन और राष्ट्रीय गौरव पर आधारित नरेंद्र मोदी के नजरिए को लेकर पूरा संघ परिवार उनके साथ एकजुट है क्योंकि आरएसएस भी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के खिलाफ है, न कि अल्पसंख्यकों के.”

इसलिए पटना रैली में मोदी के यह कहने पर कि गरीब हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लडऩे की बजाए गरीबी से लडऩा चाहिए, जब संघ की ओर से कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. 'सच्ची हिंदू-मुस्लिम एकता’ पर बोलते हुए मोदी के भाषणों में महाराणा प्रताप, शिवाजी और चाणक्य के संदर्भ बार-बार आते हैं.

यह बात कट्टरपंथी तत्वों को खुश रखती है. देवबंदी मुस्लिम नेताओं से बातचीत में मोदी उन्हें लुभाने की हद तक कभी नहीं गए. मोदी का मकसद सिर्फ इतना है कि मुसलमान उनके खिलाफ आक्रामक होकर एकमुश्त मतदान न करें.

मोदी के मुस्लिम प्रत्याशी देवबंदी नेताओं को यह बताते रहे हैं कि वे विकास रूपी केक में मुसलमानों का हिस्सा भी सुनिश्चित करेंगे लेकिन यह बिना किसी खास तवज्जो के होगा. सितंबर, 2011 में अहमदाबाद के अपने तीन दिन चलने वाले सद्भावना उपवास से कुछ दिन पहले मोदी ने ब्लॉग में लिखा था, ''(जस्टिस सच्चर कमेटी की) रिपोर्ट के विश्लेषण से गुजरात के मुसलमानों ने जिस तरह की तरक्की है उसका साफ पता चल जाता है.

खास तौर पर दूसरे राज्यों के अपने भाई-बंदों की तुलना में.” संघ के एक नेता कहते हैं, ''जब तक मोदी मुस्लिम वोटों के लिए राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों को तिलांजलि नहीं देते हैं तब तक हमें कोई दिक्कत नहीं है.”

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि मोदी के लिए जिन्हें जीतना एक चुनौती है, वे तो आरएसएस से बाहर के लोग हैं.
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