यह सब एक ऐसे वक्त में हुआ जब भारत में एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मौजूद हैं और उत्तर प्रदेश की सत्ता एक ऐसी पार्टी के पास है जो खुद को किसानपरस्त कहलाना चाहती है. यही नहीं इस पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह अगले लोकसभा चुनाव के बाद वामपंथी दलों के समर्थन से देश की सत्ता संभालना चाहते हैं. ऐसे वक्त यह वाकया वामपंथी प्रोफेसर और किसानों के हित के लिए लड़ रहे इसरार खान के साथ हुआ.
23 अक्तूबर को अर्थशास्त्र के 44 वर्षीय प्रोफेसर अपने साथी प्रोफेसर सुबोध धवन के साथ रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में कुछ बातचीत कर रहे थे कि अचानक पुलिस ने उन्हें धर दबोचा. हथकड़ी बांधी और खूंखार अपराधियों की तरह रस्सी से बांध के घसीट ले गए. फिर हवालात में रात भर एक दारोगा और तीन सिपाहियों ने जमकर उसकी मरम्मत की. ‘प्राथमिक शिक्षा के अर्थशास्त्र’ पर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले खान उन किसानों के साथ खड़े थे, जो यह अर्ज कर रहे थे कि जमीन पर कब्जा करने से पहले सरकार कम-से-कम उन्हें अपनी खड़ी फसल तो काट लेने दे. प्रोफेसर की जानवरों की तरह कराई गई परेड की तस्वीरें इंटरनेट और फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर बड़ी संख्या में शेयर की गईं और बुद्धिजीवी तबके ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताई.
“मैं किसानों का साथ जरूर दे रहा था, लेकिन 22 अक्तूबर को जब प्रशासन ने सैदपुर चुन्नीलाल गांव में खड़ी फसल उजाड़ दी और किसान विरोध करते रह गए तो मैं वहां था ही नहीं. इसके बावजूद मुझे यूनिवर्सिटी कैंपस से जानवरों की तरह दबोच लिया गया.” बरेली की सेंट्रल जेल में 20 दिन बिताने के बाद 13 नवंबर की शाम जमानत पर रिहा हुए खान ने बड़ी तकलीफ के साथ यह बात कही. हालांकि के बरेली के एसएसपी आकाश कुलहरे इस तरह के आरोपों को खारिज करते हैं. उनका दावा है, “इस तरह के मामलों में पुलिस पर आरोपों की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है, इसलिए इसरार खान का मेडिकल परीक्षण कराने के बाद ही जेल भेजा गया था.” प्रोफेसर को रस्सी से बांध के घुमाए जाने के सवाल का सीधा जवाब न देते हुए कुलहरे ने कहा कि पुलिस ने सामान्य कानूनी प्रक्रिया का पालन किया.

उन्होंने कहा कि पुलिस ने मोबाइल पर उनकी लोकेशन ट्रैक करने के बाद ही पता लगाया कि वे उस दिन कहां थे. इसी आधार पर उनकी गिरफ्तारी की गई. लेकिन पुलिस ने जिस तरह से इसरार खान को मुकदमों से लाद दिया है, उससे उसकी मंशा पर उठने वाले सवाल और मजबूत ही होते है. जरा देखिए, उन पर कितनी धाराएं लगाई गर्ई है-हत्या की कोशिश के लिए धारा 307 समेत धारा 147, 148,149, 332, 336, 323, 504, 506, 427, 325 और संगठित अपराधियों पर लगने वाला 7 क्रिमिलन अमेंडमेंट ऐक्ट. इसके अलावा उनकी गिरफ्तारी यूनिवर्सिटी परिसर से ही की गई. इसके बहुत से लोग गवाह हैं और गिरफ्तारी के फोटोग्राफ भी हैं. लेकिन सवाल यह है कि पुलिस प्रशासन अचानक एक प्रोफेसर के पीछे क्यों पड़ गया?
दरअसल दिल्ली से लखनऊ को जोडऩे वाले एनएच 24 पर बरेली में 29 किलोमीटर लंबा बाइपास बनाया जाना है. इस बाइपास के लिए सरकार 30 से ज्यादा गांवों की जमीन का अधिग्रहण कर रही है. इसके अलावा रामगंगा बैराज और अन्य कई परियोजनाओं के लिए कुल मिलाकर 1.5 लाख बीघा जमीन की जरूरत है. खान का कहना है कि यहां बाइपास बनाने का ठेका एक पूर्व ब्यूरोक्रेट की कंपनी को दिया गया है. बाइपास से मिलने वाले टोल से कंपनी करोड़ों का मुनाफा कमाएगी. अगर सिर्फ किसान आगे रहते तो उन्हें दबाना कंपनी के लिए आसान होता. लेकिन पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में आंदोलन का नेतृत्व आने के बाद कंपनी ने स्थानीय नेताओं और प्रशासन से मिलकर आंदोलन को कुचलने की गोलबंदी की है. कंपनी नहीं चाहती कि उसे किसी भी सूरत में किसानों को वाजिब मुआवजा देना पड़े. किसानों की लड़ाई लड़ रहे दमन विरोधी मोर्चा, बरेली के सह संयोजक और सीपीआइ-एमएल के नेता अफरोज आलम बताते हैं, “कुछ गांवों में प्रति बीघा मुआवजा 25 लाख रु. से बढ़ाकर 68 लाख कर दिया गया जबकि कुछ गांवों में यह आज भी 28 लाख रु. बीघा है. इसी को लेकर किसान विरोध कर रहे हैं.” इस मोर्चा के संयोजक प्रोफेसर साहब हैं.
लेकिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आखिर किसानों की लड़ाई से कैसे जुड़ गए? इस सवाल पर आलम कहते हैं, “दरअसल इससे पहले 2006 में प्रोफेसर साहब के गांव कंजा दासपुर के पास एयरपोर्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण होना था. उसमें उनकी जमीन भी जा रही थी. तब उन्होंने आंदोलन चलाकर जमीन अधिग्रहण नहीं होने दिया. तभी से बरेली और आस-पास के किसान इस तरह के मुद्दों पर प्रो. खान की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं. इसके अलावा इसरार खान का जनपक्षीय बैकग्राउंड सहज ही उन्हें किसानों के साथ कंधा से कंधा मिलाने को प्रेरित करता है, खासकर तब जब बाकी सियासी पार्टियां मुद्दे से कन्नी काट रही हों.”

इसरार खान का कहना है कि वे जमीन अधिग्रहण का विरोध करने की बजाए सिर्फ उचित मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन ठेकेदार कंपनियों के दबाव में सरकार और प्रशासन पूरी तरह किसान विरोधी रुख अपना रहा है. उनकी गिरफ्तारी के बाद जिस तरह बरेली शहर में किसानों ने धरना-प्रदर्शन किया, उससे भी यही संकेत मिलता है कि किसानों को एक प्रोफेसर का साथ खासा रास आ रहा है.
लेकिन आगे का रास्ता आसान नहीं है. 20 दिन की कैद के बाद प्रो. खान बाहर तो आ गए, लेकिन लड़ाई वहीं खड़ी है, जहां वे छोड़ गए थे. उन्हें लगता है कि पुलिस ने डंडा चलाकर किसानों का हौसला तोड़ा है. इसके अलावा उनकी गैर-मौजूदगी में किसानों पर दबाव भी बनाया गया. ऐसे में चीजों को फिर से खड़ा करने के लिए उन्हें नए हौसले की जरूरत होगी. लेकिन क्या सरकार को भी सोचने की जरूरत नहीं कि आखिर कैसे ‘धरतीपुत्र’ मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री होते हुए किसान दमन का शिकार हो रहे हैं और जो मुख्यमंत्री शिक्षा के प्रसार के लिए लैपटॉप बांट रहा हो, वहां प्रोफेसर को हथकड़ी बांध के घुमाया जा रहा हो? क्या लोकतंत्र की सेहत के लिए एक प्रोफेसर के साथ इस तरह की बदसलूकी करना ठीक है?
23 अक्तूबर को अर्थशास्त्र के 44 वर्षीय प्रोफेसर अपने साथी प्रोफेसर सुबोध धवन के साथ रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में कुछ बातचीत कर रहे थे कि अचानक पुलिस ने उन्हें धर दबोचा. हथकड़ी बांधी और खूंखार अपराधियों की तरह रस्सी से बांध के घसीट ले गए. फिर हवालात में रात भर एक दारोगा और तीन सिपाहियों ने जमकर उसकी मरम्मत की. ‘प्राथमिक शिक्षा के अर्थशास्त्र’ पर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले खान उन किसानों के साथ खड़े थे, जो यह अर्ज कर रहे थे कि जमीन पर कब्जा करने से पहले सरकार कम-से-कम उन्हें अपनी खड़ी फसल तो काट लेने दे. प्रोफेसर की जानवरों की तरह कराई गई परेड की तस्वीरें इंटरनेट और फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर बड़ी संख्या में शेयर की गईं और बुद्धिजीवी तबके ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताई.
“मैं किसानों का साथ जरूर दे रहा था, लेकिन 22 अक्तूबर को जब प्रशासन ने सैदपुर चुन्नीलाल गांव में खड़ी फसल उजाड़ दी और किसान विरोध करते रह गए तो मैं वहां था ही नहीं. इसके बावजूद मुझे यूनिवर्सिटी कैंपस से जानवरों की तरह दबोच लिया गया.” बरेली की सेंट्रल जेल में 20 दिन बिताने के बाद 13 नवंबर की शाम जमानत पर रिहा हुए खान ने बड़ी तकलीफ के साथ यह बात कही. हालांकि के बरेली के एसएसपी आकाश कुलहरे इस तरह के आरोपों को खारिज करते हैं. उनका दावा है, “इस तरह के मामलों में पुलिस पर आरोपों की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है, इसलिए इसरार खान का मेडिकल परीक्षण कराने के बाद ही जेल भेजा गया था.” प्रोफेसर को रस्सी से बांध के घुमाए जाने के सवाल का सीधा जवाब न देते हुए कुलहरे ने कहा कि पुलिस ने सामान्य कानूनी प्रक्रिया का पालन किया.

उन्होंने कहा कि पुलिस ने मोबाइल पर उनकी लोकेशन ट्रैक करने के बाद ही पता लगाया कि वे उस दिन कहां थे. इसी आधार पर उनकी गिरफ्तारी की गई. लेकिन पुलिस ने जिस तरह से इसरार खान को मुकदमों से लाद दिया है, उससे उसकी मंशा पर उठने वाले सवाल और मजबूत ही होते है. जरा देखिए, उन पर कितनी धाराएं लगाई गर्ई है-हत्या की कोशिश के लिए धारा 307 समेत धारा 147, 148,149, 332, 336, 323, 504, 506, 427, 325 और संगठित अपराधियों पर लगने वाला 7 क्रिमिलन अमेंडमेंट ऐक्ट. इसके अलावा उनकी गिरफ्तारी यूनिवर्सिटी परिसर से ही की गई. इसके बहुत से लोग गवाह हैं और गिरफ्तारी के फोटोग्राफ भी हैं. लेकिन सवाल यह है कि पुलिस प्रशासन अचानक एक प्रोफेसर के पीछे क्यों पड़ गया?
दरअसल दिल्ली से लखनऊ को जोडऩे वाले एनएच 24 पर बरेली में 29 किलोमीटर लंबा बाइपास बनाया जाना है. इस बाइपास के लिए सरकार 30 से ज्यादा गांवों की जमीन का अधिग्रहण कर रही है. इसके अलावा रामगंगा बैराज और अन्य कई परियोजनाओं के लिए कुल मिलाकर 1.5 लाख बीघा जमीन की जरूरत है. खान का कहना है कि यहां बाइपास बनाने का ठेका एक पूर्व ब्यूरोक्रेट की कंपनी को दिया गया है. बाइपास से मिलने वाले टोल से कंपनी करोड़ों का मुनाफा कमाएगी. अगर सिर्फ किसान आगे रहते तो उन्हें दबाना कंपनी के लिए आसान होता. लेकिन पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में आंदोलन का नेतृत्व आने के बाद कंपनी ने स्थानीय नेताओं और प्रशासन से मिलकर आंदोलन को कुचलने की गोलबंदी की है. कंपनी नहीं चाहती कि उसे किसी भी सूरत में किसानों को वाजिब मुआवजा देना पड़े. किसानों की लड़ाई लड़ रहे दमन विरोधी मोर्चा, बरेली के सह संयोजक और सीपीआइ-एमएल के नेता अफरोज आलम बताते हैं, “कुछ गांवों में प्रति बीघा मुआवजा 25 लाख रु. से बढ़ाकर 68 लाख कर दिया गया जबकि कुछ गांवों में यह आज भी 28 लाख रु. बीघा है. इसी को लेकर किसान विरोध कर रहे हैं.” इस मोर्चा के संयोजक प्रोफेसर साहब हैं.
लेकिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आखिर किसानों की लड़ाई से कैसे जुड़ गए? इस सवाल पर आलम कहते हैं, “दरअसल इससे पहले 2006 में प्रोफेसर साहब के गांव कंजा दासपुर के पास एयरपोर्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण होना था. उसमें उनकी जमीन भी जा रही थी. तब उन्होंने आंदोलन चलाकर जमीन अधिग्रहण नहीं होने दिया. तभी से बरेली और आस-पास के किसान इस तरह के मुद्दों पर प्रो. खान की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं. इसके अलावा इसरार खान का जनपक्षीय बैकग्राउंड सहज ही उन्हें किसानों के साथ कंधा से कंधा मिलाने को प्रेरित करता है, खासकर तब जब बाकी सियासी पार्टियां मुद्दे से कन्नी काट रही हों.”

इसरार खान का कहना है कि वे जमीन अधिग्रहण का विरोध करने की बजाए सिर्फ उचित मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन ठेकेदार कंपनियों के दबाव में सरकार और प्रशासन पूरी तरह किसान विरोधी रुख अपना रहा है. उनकी गिरफ्तारी के बाद जिस तरह बरेली शहर में किसानों ने धरना-प्रदर्शन किया, उससे भी यही संकेत मिलता है कि किसानों को एक प्रोफेसर का साथ खासा रास आ रहा है.
लेकिन आगे का रास्ता आसान नहीं है. 20 दिन की कैद के बाद प्रो. खान बाहर तो आ गए, लेकिन लड़ाई वहीं खड़ी है, जहां वे छोड़ गए थे. उन्हें लगता है कि पुलिस ने डंडा चलाकर किसानों का हौसला तोड़ा है. इसके अलावा उनकी गैर-मौजूदगी में किसानों पर दबाव भी बनाया गया. ऐसे में चीजों को फिर से खड़ा करने के लिए उन्हें नए हौसले की जरूरत होगी. लेकिन क्या सरकार को भी सोचने की जरूरत नहीं कि आखिर कैसे ‘धरतीपुत्र’ मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री होते हुए किसान दमन का शिकार हो रहे हैं और जो मुख्यमंत्री शिक्षा के प्रसार के लिए लैपटॉप बांट रहा हो, वहां प्रोफेसर को हथकड़ी बांध के घुमाया जा रहा हो? क्या लोकतंत्र की सेहत के लिए एक प्रोफेसर के साथ इस तरह की बदसलूकी करना ठीक है?

