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देसी नुस्खे से लगभग खत्म हो चुके बाघों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है

साल 2009 में पन्ना में बाघ लगभग खत्म हो गए थे, लेकिन देसी तरकीब से उनकी संख्या बढ़कर 22 हो गई है. चीन भी अध्ययन करना चाहता है इस सफलता को.

अपडेटेड 26 नवंबर , 2013
यह तरकीब भले ही अजीब लगे, लेकिन मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व के कर्मचारियों ने बाघों की तादाद बढ़ाने का जो नायाब तरीका निकाला है, उस पर वे गर्व कर सकते हैं. यहां शिकार की वजह से बाघों की संख्या 2009 के शुरू में नगण्य हो चुकी थी.

लेकिन कर्मचारियों ने इस स्थिति से घबराने की बजाए इसका देसी समाधान निकालने का फैसला किया. इस राष्ट्रीय पशु के मूत्र पर आधारित तरकीब से महज तीन साल में यहां उनकी संख्या 22 तक पहुंच गई है, जिनमें सात वयस्क बाघ शामिल हैं. इस बढ़ती संख्या की वजह से पन्ना और छत्तरपुर जिलों में फैला 542 वर्ग किमी जंगल का दायरा भी उनके लिए छोटा पड़ता जा रहा है.

हाल यह हुआ कि संख्या बढऩे की वजह से एक किशोर उम्र बाघ अपना इलाका बनाने के लिए अकसर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भागने लगा. इसलिए उसे पकड़कर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में भेजना पड़ा.

बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए विकसित की गई इस तरकीब की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. इस मकसद से मार्च, 2009 में दो बाघिनों को—एक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से और एक कान्हा टाइगर रिजर्व से—पन्ना में भेजा गया.

इसके बाद 6 नवंबर, 2009 को पेंच टाइगर रिजर्व से एक बाघ लाया गया ताकि उन दो बाघिनों से संसर्ग करवाकर बाघों की संख्या बढ़ाई जा सके. बाघ को रेडियो कॉलर लगाया गया और नौ दिन के बाद पन्ना में छोड़ दिया गया.

लेकिन वह 10 दिन बाद पीटीआर की सीमा से निकलकर वापस पेंच टाइगर रिजर्व भाग गया. तब अधिकारियों को लगा कि उनकी संख्या बढ़ाने के उनके कार्यक्रम पर पानी फिर गया है, क्योंकि बाघिनों से सहवास के बिना उनकी संख्या कैसे बढ़ सकती थी.

  इस बाघ को टी-3 नाम दिया गया था. इसे बड़ी मेहनत के बाद 25 दिसंबर, 2009 को दमोह जिले में तेजगढ़ के जंगल से पकड़ा गया. फील्ड डायरेक्टर समेत 70 से ज्यादा वन अधिकारी चार हाथियों के साथ उसकी खोज में लगे हुए थे. अब अधिकारी यह सोचने लगे कि उसे किस तरह दोबारा भागने से रोका जाए.

तभी कुछ कर्मचारियों ने एक अनोखी जुगत निकाली. उन्होंने बाघिन के मूत्र को उस इलाके में छिड़क दिया, जहां बाघ को छोड़ा जाना था. यह इलाका बांधवगढ़ से लाई गई बाघिन के इलाके तक था जिसे टी-1 नाम दिया गया था. दिसंबर, 2009 को बाघ को पन्ना में छोड़ दिया गया.

वह मूत्र की गंध को सूंघते हुए बाघिन के पास पहुंच गया और दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए. चार दिन बाद टी-3 बाघ और टी-1 बाघिन को साथ-साथ घूमते देखा गया. 16 या 17 अप्रैल को टी-1 ने चार शावकों को जन्म दिया, जिनमें से दो ही बच पाए. फरवरी, 2012 में चार शावक पैदा हुए लेकिन बाघिन ने एक शावक को छोड़ दिया.

टी-3 बाघ ने अपना संबंध सिर्फ टी-1 तक ही सीमित नहीं रखा, उसने कान्हा से लाई गई टी-2 नामक दूसरी बाघिन से भी रिश्ता बनाया. उसने भी अक्तूबर, 2010 में चार शावकों को जन्म दिया. उसने अप्रैल, 2012 और जुलाई, 2013 में भी तीन-तीन शावकों को जन्म दिया.
पन्ना टाइगर रिजर्व में आराम फरमाता एक बाघ
पन्ना के वन्य इतिहास में तब एक और अध्याय जुड़ा, जब 27 मार्च, 2011 को एक तीसरी बाघिन को पन्ना में लाया गया. टी-4 नाम की इस बाघिन को टी-3 बाघ के करीब लाने के लिए कर्मचारियों ने फिर वही तरीका अपनाया. उन्होंने बाघिन के मूत्र को घास-फूस पर छिड़क दिया. 1 अप्रैल, 2011 को टी-4 टी-3 के करीब आ गई.

दोनों मई के अंत में जब जोड़ा बनाकर घूम रहे थे तो टी-3 ने एक नीलगाय का शिकार किया. टी-4 ने भी उसकी नकल करनी शुरू कर दी और अगले 10 दिन में उसने पांच जानवरों का शिकार किया. इस तरह टी-4 ने जल्द ही जंगल में जीवित रहने का गुर सीख लिया.

उसने नवंबर, 2011 में दो और जुलाई, 2013 में तीन शावकों को जन्म दिया. यहां टी-5 नाम की आखिरी बाघिन को नवंबर, 2011 में लाया गया था. अब टी-5 भी जंगल के नए माहौल में अच्छी तरह ढल गई है.

मैथुन मूर्तियों के लिए मशहूर खजुराहो के मंदिरों से करीब 25 किमी दूर स्थित यह मनोरम बाघ अभयारण्य दुनिया का पहला संरक्षित क्षेत्र है, जहां बाघों के पुनर्वास का कार्यक्रम इतने कम समय में इतना सफल रहा, जबकि विशेषज्ञ कहते थे कि पन्ना में बाघों की संख्या 15 से अधिक होने में कम-से-कम 10 साल लग जाएंगे. इस सफलता से प्रभावित होकर चीन अपनी एक टीम यहां अध्ययन के लिए भेज रहा है.

बाघों की संख्या बढऩे के बारे में पन्ना के फील्ड डायरेक्टर रंगैया श्रीनिवास मूर्ति कहते हैं, ''हमने कुछ टीमें बना रखी हैं जो रात-दिन बाघों पर नजर रखती हैं. रेडियो कॉलर लगे होने की वजह से हमें उनकी नब्ज तक की जानकारी होती है. यहां हमने एक गुप्तचर इकाई भी बनाई है, जिसकी जानकारियां काफी मददगार साबित हो रही हैं.

हम दोषी कर्मचारियों को भी नहीं बख्शते. शिकारियों की मदद करने वाले एक कर्मचारी को हमने जेल भी पहुंचा दिया. '' वे बताते हैं कि कृत्रिम तरीके से पाली गई दो बाघिनों के प्राकृतिक विकास में सफल होने वाला यह दुनिया का पहला रिजर्व है. उनमें से एक बाघिन ने दो शावकों को भी जन्म दिया है.

पन्ना के पास गर्व करने के लिए काफी उपलब्धियां हैं. लेकिन यहां के अधिकारियों की खुशी शायद अभी अधूरी है, क्योंकि यहां जन्मे 11 शावकों में से सिर्फ एक ही मादा है. पिछली जुलाई में पैदा हुए 6 शावकों के लिंग की जानकारी अभी उपलब्ध नहीं हो पाई है.

बाघ इलाके के लिए आपस में खूनी लड़ाइयां लडऩे के लिए जाने-जानते हैं. पी-111 नामक एक वयस्क बाघ पहले ही पी-213 नाम की एक बाघिन के एक शावक को मार चुका है.

राज्य सरकार की जांच के मुताबिक, नर बाघों की संख्या बढऩे से ही 2009 में पन्ना में बाघों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी. जब नर बाघों की संख्या बढ़ती है तो वे दूसरों के इलाके में चले जाते हैं और फिर मारे जाते हैं.

नर और मादा के बीच अंतर को कम करने के लिए पन्ना में एक और बाघिन को लाया जा रहा है. यहां नब्बे के दशक में 30 से भी ज्यादा बाघ थे. पन्ना अपने उसी गौरवशाली अतीत की ओर वापस लौटता दिखाई दे रहा है. 
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