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हमारे बीच फूट अंग्रेजों ने नहीं डाली

भारत अब तेजी से शहरी राष्ट्र में तब्दील होता जा रहा है, इसलिए अगर हमारे शहर अनियंत्रित बने रहे तो 'सिर्फ मुसलमानों’ या 'सिर्फ जैनियों’ वाली बस्तियां नस्लभेद की नई मिसाल बन जाएंगी.

अपडेटेड 25 नवंबर , 2013
एक प्रॉपर्टी डीलर विशाल डीसूजा मुंबई की कथित हिंदू कॉलोनी दादर में एक फ्लैट तीन करोड़ रु. में बेचना चाह रहा था. उसने रियल एस्टेट वेबसाइट 99एकर्स.कॉम पर विज्ञापन पोस्ट किया, ''एकदम नया शानदार 2बीएचके, पूरी तरह फर्निश्ड फ्लैट, हवादार और भरपूर धूप वाला, कॉस्मोपोलिटन सोसाइटी, कार पार्किंग, फौरन बिकाऊ, पांचवीं मंजिल, जरूरत हो तो संपर्क करें. मुसलमानों के लिए नहीं.”

वकील शहजाद पूनावाला ने इस विज्ञापन के खिलाफ राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत दर्ज कराई. आयोग बिलाशक इस पर धारा 9(सी) के तहत कार्रवाई करेगा. शिकायत के बाद प्रॉपर्टी डीलर ने विज्ञापन सुधारा और वेबसाइट ने बयान जारी किया कि ''हम एक प्लेटफॉर्म हैं और उद्योग की परंपरा के मुताबिक, हमारी जिम्मेदारी है कि ध्यान में लाए जाने के बाद किसी तरह की गैर-कानूनी सामग्री को हम साइट से हटा दें. ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हम एक प्रक्रिया तैयार कर रहे हैं. हमें खेद है कि हमारी साइट का दुरुपयोग किया गया.”

एक बड़ी बीमारी का यह एक नमूनाभर है. चाहे-अनचाहे अपने ही समुदाय की अविकसित-उपेक्षित बस्तियों में रहना सिर्फ मुसलमानों की समस्या नहीं. दलित भी अकसर अच्छी रिहाइश के अभाव की शिकायत करते हैं. अहमदाबाद में प्रोफेसर अच्युत याज्ञिक के पास ऐसे कई दलितों की दास्तानें हैं जो 'सिर्फ दलित’ सोसाइटियों में रहने को मजबूर हैं. शहर में चांदखेड़ा के कांग्रेस पार्षद और बिल्डर जयंतीभाई जाधव कहते हैं, ''शहर में करीब 300 दलित सोसाइटियां हैं.

200 तो अकेली चांदखेड़ा में हैं. इनमें ज्यादातर 2002 के दंगों के बाद बनी हैं जब लोग गोमतीपुर, बापूनगर और दानी लिमडा इलाके छोड़ आए. हम ऐसे कंस्ट्रक्शन ठेकेदार तलाशते हैं जो सिर्फ दलित सोसाइटियां ही बनाते हैं. ऊंची जाति के खरीदार तो दलित बिल्डरों के पास फटकते भी नहीं.” इसी तरह 'सिर्फ ब्राह्मण’ और 'सिर्फ जैन शाकाहारी’ सोसाइटियों का भी चलन है. वेदिकागृहारम.कॉम नाम की एक वेबसाइट बंगलुरू के उपनगर में सिर्फ ब्राह्मणों के लिए प्लॉट की पेशकश करती है.

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद थी कि वह समानता के अधिकार और धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर इस तरह का भेदभाव न होने देगा. पर 2005 में जोरोआस्ट्रियन को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के मामले में उसने अपने फैसले में उसके उस बाइलॉज को जायज ठहराया, जो किसी गैर-पारसी को 'सिर्फ पारसियों’ की सोसाइटी में जायदाद खरीदने से रोकता था. दो न्यायाधीशों की खंडपीठ की दलील थी कि कानून में बाइलॉज को मंजूरी मिली हुई है.

अदालत ने उस दायरे में जाने से इनकार किया जो उसके मुताबिक, संसद और विधानसभा का क्षेत्र है. फैसले के मुताबिक, ''संविधान भले कहता है कि राज्य की किसी गतिविधि में धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा पर जब तक विभिन्न सहकारी समिति कानूनों में उपयुक्त संशोधन नहीं किया जाता तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि कोई सोसाइटी ऐसे व्यक्ति को सदस्यता देने से मना नहीं कर सकती जो उसके बाइलॉज की शर्तों के हिसाब से योग्य न हो.”

सच है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी खास धर्म, जीवनशैली या पेशे के लोगों तक सीमित सहकारी समितियों की एक तरह से कल्पना भी बेमानी है. लेकिन यह कहना इससे एकदम अलग है कि आप किसी खास पेशे, धर्म, आस्था, जीवनशैली के आधार पर कोई सोसाइटी नहीं बना सकते. यह सही है कि संविधान में हम सभी के लिए लक्ष्य निर्धारित हैं. इनमें एक है धर्म या लिंग वगैरह के आधार पर भेदभाव मिटाना. लेकिन यह लक्ष्य कानून बनाकर से ही हासिल किया जा सकता है, न कि किसी अदालती आदेश से.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कुछ बातें स्पष्ट होती हैं. अदालत ने व्यक्तिगत दुराग्रह को सही नहीं ठहराया है, बल्कि उसका मानना है कि को-ऑपरेटिव सोसाइटियों का ऐसा भेदभाव संविधान के प्रतिकूल है. अदालत ने तो कानून के अभाव में कोऑपरेटिव सोसाइटियों के किसी खास संप्रदाय तक सदस्यता सीमित रखने के अधिकार को जायज ठहराया है. कानून न होने की वजह से ही अदालत ने बाइलॉज को रद्द नहीं किया क्योंकि वह सार्वजनिक नीति के खिलाफ होता.

अदालत उस दायरे में जाने से ठिठक गई, जिसमें प्रवेश करने से विधायिका भी सहमी हुई है. सर्वोच्च अदालत के इस संकोच के बावजूद अब हमारे लिए समस्या पर नए सिरे से विचार करने का वक्त आ गया है. भारत अब तेजी से शहरी राष्ट्र में तब्दील होता जा रहा है. इसलिए अगर हमारे शहर अनियंत्रित बने रहे तो 'सिर्फ मुस्लिम’ या 'सिर्फ जैनी’ वाली बस्तियां नस्लभेद की नई मिसाल बन जाएंगी.

बताते हैं, पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने जब देखा कि इब्राहिम लोदी की सेना में संप्रदाय के आधार पर अलग-अलग चूल्हे जलते हैं तो वह जान गया कि उसकी जीत तय है. बाबर के मुताबिक, जो फौज अलग-अलग खाना खाती है, वह एक होकर कभी नहीं लड़ सकती. सो, अब यह सोचने का वक्त आ गया है कि अगर हमारे बच्चों का पालन-पोषण अलगाव के इन द्वीपों में होगा तो क्या वे कभी समता हासिल कर पाएंगे?

इस संदर्भ में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जोरोआस्ट्रियन सोसाइटी वाले फैसले पर पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल सकता है. आयोग आवास से संबंधित सभी कानूनों में संशोधन की सिफारिश भी कर सकता है. संसद और विधानसभाओं को भी इस सवाल की गंभीरता पर विचार करना चाहिए.

हालांकि यह समस्या कानून बनाने से भी तुरंत नहीं दूर हो जाएगी, पर यथास्थिति जारी रहने देना आधुनिक भारत के लिए कोई विकल्प नहीं.
 
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं)
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