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सचिन तेंडुलकर : श्रद्धालुओं के बीच भगवान

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर की क्रिकेट मैदान पर आखिरी बाजी ने दूरदराज के इलाकों से उनके चाहने वालों को अपनी ओर खींचा.

साल-दर-साल सचिन को लेकर दीवानगी में इजाफा होता आया है
साल-दर-साल सचिन को लेकर दीवानगी में इजाफा होता आया है
अपडेटेड 25 नवंबर , 2013
लाहली जाते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मेले में जा रहे हों. ईंटों के मकान वाले गांव से बाहर राजमार्ग के दोनों किनारों पर सफेदे के ऊंचे-ऊंचे पेड़ लगे थे. सड़क से थोड़ी दूरी पर रेल की पटरी दिखाई दे रही थी. लाहली के चमचमाते स्टेडियम के चारों तरफ दूर-दूर तक गन्ने और धान के खेत फैले हुए थे. यह मेला सिर्फ एक भगवान के दर्शन के लिए लगा था—स्टेडियम के बाहर विशाल होर्डिंग लगा था, जिस पर लिखा था, “क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर” का स्वागत है. उस भगवान की एक झलक पाने के लिए अलग-अलग मार्ग थे. दर्शन के लिए कोई टिकट नहीं रखा गया था. दर्शनार्थी स्टेडियम के अंदर जाने के लिए सरपंच, डीसी, एसपी, डीएसपी या क्रिकेट के किसी प्रशासक के पास जा सकते थे, या फिर मल्होत्रा जी से अनुरोध कर सकते थे, जिन्होंने स्टेडियम के निर्माण के लिए अपने खेत बेचे थे. अगर इन लोगों की कृपा से कोई वंचित रह गया तो वह स्टेडियम के बाहर एक स्टॉल पर पर्ची पर अपना नाम और फोन नंबर इस उम्मीद पर छोड़ सकता था कि शायद ऊपर वाले भगवान की इनायत हो जाए.

हम तीर्थयात्रियों में कई तरह के लोग थे. कुछ परम भक्त थे, कुछ समय गुजारने के लिए वहां आने वाले लोग थे, कुछ हुल्लड़बाज थे, कुछ पारखी थे, कुछ आशंकित तीर्थयात्री थे तो कुछ नास्तिक. सचिन के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ में लाहली और रोहतक के युवा, भिवानी के पहलवान, हरियाणा की एक महिला क्रिकेटर की मां, चंडीगढ़, कोलकाता और मुंबई के पत्रकार, दिल्ली से 300 निजी सुरक्षाकर्मी, और कम-से-कम 1,400 पुलिसकर्मी शामिल हैं.

हम लोगों में सबसे बड़ा भक्त 33 साल का था. उसे सचिन की एक-एक पारियां जुबानी याद थीं. आप उससे किसी भी टेस्ट के बारे में पूछें, वह एक सेकंड में आपको बता देगा कि वह टेस्ट कहां खेला गया था, किसके खिलाफ खेला गया था और उसके भगवान ने कितने रन बनाए थे. अजित सिंह तंवर एक दिहाड़ी मिस्त्री था. वह राजस्थान में सीकर जिले के डाबला गांव से आया था. वह अपने साथ एक पत्र लाया था, जिसमें उसने अपने बारे में सचिन को जानकारी दी थी. इसमें सचिन की प्रशंसा में एक कविता भी थी. वह यह पत्र सचिन को देना चाहता था.

मैंने सोचा कि मैं मुंबई नहीं, बल्कि लाहली जाऊंगा, क्योंकि मुंबई में किसी भव्य शादी जैसा माहौल, नेताओं और मशहूर हस्तियों की भीड़-भाड़, टिकट कोटा का नाटक, मेहमान टीम का विशिष्ट तरह का स्वागत वगैरह बहुत बोझिल हो जाएगा. सचिन पर आखिरी बार रिपोर्ट लिखना मेरे लिए बिल्कुल उसी तरह का अनुभव था, जिस तरह पहली बार रिपोर्ट लिखे जाने का अनुभव.

मैं 12 साल पहले बांद्रा (पूर्व) में मिडल इनकम ग्रुप क्लब में सुबह के समय नेट पर प्रैक्टिस वाले दिनों की बात सोच रहा हूं. मैं वहां इसलिए गया था ताकि यह देख सकूं कि यह जीनियस नेट पर कैसे खेलता है. क्या जीनियस एकांत में प्रैक्टिस करना पसंद करता है?

“आला का (वह आ गया क्या)?” क्लब के सदस्यों ने वहां खड़े गार्ड से धीमे से पूछा. और वे फिर पूल या जिम में जाने को टालने लगे ताकि बरामदे से जाते हुए उसे देख सकें. तेंडुलकर ने पांच गेंदबाजों के खिलाफ एक घंटे तक बल्लेबाजी की, उन्होंने नेट के पीछे 20 मिनट तक अपने कवर ड्राइव का अभ्यास किया, और उनके स्ट्रोक्स की आवाज सुबह के समय कानों को सुखद एहसास दे रही थी. बीच-बीच में वे अपने साथी अतुल रानाडे और अपने भाई अजीत से सलाह ले लेते थे. गेट पर खड़े होकर जो लोग उन्हें देख रहे थे, उनमें फोटोग्राफर, ऑटोग्राफ लेने वाले और बच्चे शामिल थे. हम लोगों के बीच एक छोटा लड़का भी शामिल था, जो अपनी चमकदार आंखों से बड़ी उत्सुकता से सचिन को निहार रहा था.
मैंने उस लड़के के अभिभावक से पूछा, “क्या यह क्रिकेट खेलता है?”
बेटे अर्जुन के साथ सचिन
उन्होंने मुस्कराकर जवाब दिया, “यही तो एक चीज है, जिससे यह प्यार करता है...दरअसल वह लातूर से है. वह दिमाग के ट्यूमर के ऑपरेशन के लिए मुंबई आया है. वह पास के ही एक अस्पताल में रुका हुआ है और पूरा दिन क्रिकेट देखता है. उसे किसी ने बता दिया कि सचिन यहां प्रैक्टिस के लिए आते हैं, इसलिए सचिन को देखने के लिए मुझे यहां ले आया.”

खेल पत्रकार और उनके संपादक कई बार पक्षपाती हो जाते हैं. सीएलआर जेम्स ने जब लिखा कि ‘वेस्ट इंडीज में टेस्ट मैचों के दर्शक अपने साथ पूरा एक अतीत और भविष्य की उम्मीदें भी लेकर आते हैं“ तो उन्होंने एक तरह से लेखकों की पूरी एक पीढ़ी को दिशा दे दी. दूसरे खेल लेखक इसके शिल्प को महत्व देते हैं और दुनिया से अलग अपनी राय पेश करते हैं. लेकिन खुशकिस्मती से हम सचिन की बल्लेबाजी को उनके वास्तविक रूप में ही देखते हैं. वाकई सचिन को हम मास्टर ब्लास्टर सचिन के रूप में ही देखते हैं.

अपने आखिरी घरेलू मैच में सचिन अपना बल्ला लेकर उस समय मैदान में उतरते हैं, जब पहले चार घंटे में 12 विकेट गिर चुके हैं. वे भारी शोर और तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच आगे बढ़ते हैं. फोटोग्राफर उनकी फोटो लेने के लिए आपस में धींगामुश्ती करते हैं. सचिन के लिए यह वाहवाही कभी फीकी नहीं पड़ी और न ही कभी फीकी पड़ेगी. हां, एक हरियाणवी शायद उनसे ज्यादा प्रभावित नहीं है, जो उन्हें देखकर टिप्पणी करता है, ढाई फुट का दिखता है ये.” उसके लिए सचिन का कद भी मायने रखता है. लेकिन सचिन का कद भले ही छोटा हो, उनका आकार विशाल है.

पिच शानदार है. हमें बताया गया कि लाहली में पानी का स्तर इतना ऊपर है कि पिच की घास कभी खत्म नहीं होती है, यह हर मैच के बाद और भी हरी हो जाती है. खेतों में अस्थायी रूप से बनाई गई पार्किंग में खड़ी कारें जमीन में धंस जाती हैं. मैदान में हरियाली पसरी है. तेज गेंदबाजों की चांदी है. टीवी वालों को अपने लिए सीमेंट का एक प्लेटफार्म बनाना पड़ा है, जिससे कि वे 40 फुट की ऊंचाई से सचिन के सिर पर ही न आ गिरें.

सचिन अपना जाना-पहचाना स्ट्रोक लगाते हैं और गेंद मैदान पर भागती सीमा रेखा के पार चली जाती है. कुछ देर बाद ही वे आउट हो जाते हैं. गेंद उनके बल्ले को छूती हुई विकेटों को बिखेर देती है. वे पिछले दो साल से इसी तरह की गेंद पर आउट हो रहे हैं. उनके आउट होने के बीस मिनट के भीतर छोले-कुल्चे और गन्ने का रस बेचने वाले खेतों से गायब हो जाते हैं. 6,000 लोगों की भीड़ छंट जाती है. और सिर्फ रणजी ट्रॉफी मैच का साया ही वहां रह जाता है. इससे पता चलता है कि तेंडुलकर क्या हैं और क्रिकेट में वे क्या मायने रखते हैं. वे पैविलियन में आ गए हैं और हर कोई यही सोच रहा है कि आखिर वे क्या सोच रहे हैं.
हरियाणा के लाहली में सचिन ने रणजी का आखिरी मैच खेला
एक बार मैंने उन्हें अपने साथी से यह कहते हुए सुना था, “अगर मेरी बल्लेबाजी का दिन अच्छा रहता है तो मेरा दिन भी अच्छा रहता है.” लेकिन वास्तव में अच्छे या खराब दिन का सवाल ही नहीं है. सचिन के जीवन में हर दिन सचिन का दिन है. खेल के बाद वे दिल्ली से भेजी गई सफेद रंग की 5 सीरीज की एक बीएमडब्लू कार में बैठकर लौटते हैं. एक करार के मुताबिक वे सार्वजनिक मौकों पर किसी दूसरे ब्रांड की कार में सफर नहीं कर सकते. कुछ लड़के अपनी बाइक पर सवार होकर उनकी कार के साथ सरपट दौड़ते हैं और कार की खिड़की से उनकी तस्वीरें खींचते हैं. सचिन डरते हैं कि कहीं कोई सड़क दुर्घटना न हो जाए, इसलिए वे अपने ड्राइवर से गाड़ी धीरे चलाने के लिए कहते हैं. वे अकसर लोगों के जुनून को लेकर काफी सावधानी बरतते हैं.

कैनाल रेस्ट हाउस के गेट पर पहले से ही भारी भीड़ उनका इंतजार कर रही है. यहां उन्हें मुंबई के चार ‘सीनियर’ खिलाडिय़ों के साथ ठहराया गया है. कुछ रसूख वाले लोग सुरक्षा घेरे को तोड़कर अंदर मौजूद हैं. इन लोगों की संख्या करीब 100 है. वे सचिन से हाथ मिलाना चाहते हैं, उनकी फोटो खींचना चाहते हैं, उनका ऑटोग्राफ लेना चाहते हैं, अपने बच्चों को मिलवाना चाहते हैं और कुछ उन्हें बहुत करीब से देखना चाहते हैं. सचिन सबकी इच्छा पूरी करते हैं. उनके विदाई दौरे की डॉक्यूमेंटरी बनाने वालों ने मुझे यह बात बताई. वे चाहते थे कि सचिन उन्हें पर्याप्त समय दें. सचिन ने ही उन्हें फिल्म बनाने की मंजूरी दी है.

दिल्ली के आइटीसी मौर्या से छह लोगों की टीम आई है, जो रेस्ट हाउस में उनके लिए खाना तैयार करती हैः उनके खाने में फूड पॉयजनिंग जैसी कोई बात हो गई तो क्या नतीजा होगा, अंदाज लगाया जा सकता है. सुबह और शाम को एक बार वे मीठी लस्सी पीते हैं. प्रेस के लोगों को उनके खान-पान की आदतों को लेकर काफी दिलचस्पी रहती है. सचिन को रोहतक की मीठी लस्सी बहुत पसंद आती है.

दूसरे दिन शाम को जिन लोगों को सचिन से मिलने का मौका मिलता है, उनमें अजीत सिंह तंवर भी हैं. वे सचिन को अपना एक पत्र देते हैं. बदले में उन्हें सचिन के दस्तखत वाली बनियान मिली और साथ में ढेर सारा प्यार भी. सचिन ने उनकी परीक्षा के लिए उनसे टेस्ट नंबर 130, 80 और 155 के बारे में पूछा तो अजीत ने बिना देरी किए सही-सही जवाब दे दिया (130वें टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाफ 130 रन नाबाद बनाए थे और यह 26/11 के बाद खेला गया था.).

मैंने अजीत सिंह से पूछा, “द्रविड़ क्या सचिन के बराबर नहीं हैं?” उन्हें भड़काने के लिए यह काफी था. यह बात मैंने इफ क्रिकेट इज अ रिलिजन, सचिन इज गॉड नाम की किताब से सीखी थी.
उन्होंने तड़ाक से जवाब दिया, “ब्रैडमैन भी सचिन का मुकाबला नहीं कर सकते. वेस्ट इंडीज के खिलाफ ब्रैडमैन का औसत देखोः 74.5.”

“सचिन का इतना औसत किसी के खिलाफ नहीं.”

सीकर के इस सचिन भक्त ने मुझे चुप करा दिया, “बांग्लादेश के खिलाफ सचिन का औसत 136.66 है.”

जल्दी ही अजीत को लेकर टीवी पत्रकारों में जंग छिड़ जाती है. एक चैनल ने उन्हें 50,000 रु. पर अनुबंधित कर लिया है. यही है सचिन का करिश्मा.

क्रिकेट पूरी तरह अनिश्चितताओं का खेल है, कोई नहीं जानता इसमें कब क्या हो जाएगा. कुछ भी तय नहीं है. ब्रैडमैन अपने विदाई टेस्ट मैच में ओवल के मैदान पर शून्य पर आउट हो गए थे. पांच महीने बाद प्रथम श्रेणी के एक मैच में एमसीजी में उन्हें विदाई देने के लिए 94,000 लोगों की भीड़ जुटी थी, सिर्फ शनिवार को ही 52,000 दर्शक उन्हें एक और शतक लगाते देखना चाहते थे. इसके बाद कुछ महीनों तक वे दोस्तों के लिए भीड़ जुटाने की खातिर खेलते रहे. एडिलेड में एक मैच के दौरान टॉस फिक्स था ताकि ब्रैडमैन शनिवार को मैदान में आ सकें. इस बात का खुलासा लंबे समय बाद हो सका. लेकिन खेल की स्थिति बदलने से उन्हें शुक्रवार की शाम को ही मैदान पर आना पड़ा और अगले दिन शनिवार को वे जल्दी ही 30 रन पर आउट हो गए. टखने में मोच आ गई और वे मैदान से चले गए. यह ब्रैडमैन का प्रथम श्रेणी का आखिरी मैच था.

पाकिस्तान के खिलाफ सुनील गावसकर ने अपनी आखिरी पारी में उखड़ती पिच पर 96 रन बनाए थे. फिर भी भारत हार गया था. उन्होंने प्रथम श्रेणी के अपने आखिरी मैच में लॉड्र्स में एमसीसी के खिलाफ रेस्ट ऑफ द वल्र्ड की ओर से 188 रनों का अंबार खड़ा कर दिया था. दूसरी पारी में मैल्कम मार्शल की गेंद पर वे शून्य पर आउट हो गए थे. 1987 में उन्होंने अपनी आखिरी अंतरराष्ट्रीय पारी वल्र्ड कप सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ खेली थी. वे सिर्फ 4 रन बनाकर आउट हो गए थे और भारत को हार का मुंह देखना पड़ा था.

विवियन रिचड्र्स ने ब्रैडमैन की तरह ओवल के ही मैदान पर आखिरी टेस्ट खेलते हुए 60 रन बनाए थे, लेकिन 17 साल में पहली बार वेस्ट इंडीज इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज नहीं जीत पाई. दो सीजन के बाद उन्होंने कैंटरबरी में ग्लैमॉर्गन के लिए अपना आखिरी मैच खेला था. यह मैच संडे लीग टाइटल के लिए था. वहां युवा गेंदबाज केंट ने उन्हें बहुत परेशान किया. एक तेज गेंद उनकी छाती तक आई, वे उसे हुक नहीं कर सके और गेंद लपक ली गई. लेकिन वह नो-बॉल थी. उन्होंने अपने योगदान से ग्लैमॉर्गन को जीत दिलाई थी.
पत्नी अंजलि और बेटी सारा के साथ सचिन
लाहली में सस्ते में आउट होने के बावजूद सचिन पस्त नहीं हैं. किन्हीं भी मायनों में वे रिचड्र्स से अलग नहीं हैं. वे अपने शरीर के निचले हिस्से में वजन बढऩे से जूझ रहे हैं और अब भी उससे निबटने में लगे हैं. वे खेलते समय दो बार अपनी टांगों को एडजस्ट करते हैं. पहले तो क्रीज के कोने पर और दूसरा स्टांस लेने से पहले. वे सिर भी इतना हिलाने लगे हैं कि उनके हेलमेट के गिर जाने का डर लगता है. विकेटों के बीच भागने में भी वे मौका पडऩे पर पहले जैसी तेजी दिखाते हैं. अगर वे यह देख लें कि फील्डर खतरा पैदा कर सकता है तो वे कुछ-कुछ चीते जैसे और कुछ-कुछ रणतुंगा जैसे भागते हैं. उनकी बॉडी लैंग्वेज में किसी तरह का हल्कापन नहीं आया है. स्ट्रोक लगाने में भी किसी तरह की लापरवाही की झलक नहीं दिखाई देती है, जो सचमुच बहुत महत्वपूर्ण बात है. हां एक मौका ऐसा जरूर है जब वे खुद को थोड़ा ढीला छोड़ देते हैं, और वह है धीमी बाउंसर. इस पर वे जरूर चूक जाते हैं और समय से पहले ही अपना बल्ला चला देते हैं. अपर-कट लगाने में वे देरी कर जाते हैं और गेंद निकल जाती है. वे थोड़ा शर्मिंदा नजर आते हैं.

किसी स्पिनर को फ्रंट फुट पर खेलने में वे हिचकिचाते हैं. तेज उठती गेंदों पर बल्ला लगाने से बचते हैं. पिच के लिए यह एक अच्छी रणनीति है. तेंडुलकर भी जानते हैं कि उनकी तेजी में थोड़ी-बहुत कमी आई है, जैसा उन पर नजर रखने वाले काफी समय से संदेह करते रहे हैं. फिर भी वे कायम हैं, पूरे दमखम के साथ अपनी जगह पर बने हुए हैं. मुंबई के कोच सुलक्षण कुलकर्णी बताते हैं कि बाकी खिलाड़ी रिटायरमेंट की घोषणा के बाद खेल के मामले में ढीले पड़ जाते हैं लेकिन सचिन ने ऐसा नहीं किया.

सुलक्षण सचिन के साथ उनके पहले रणजी मैच में खेल चुके हैं. सचिन नेट पर अभ्यास के लिए उसी लगन के साथ आते रहे, जैसे पहली बार अभ्यास के लिए आए थे. वे पहले की ही तरह पांच बार नेट प्रैक्टिस करते हैं. उन्होंने मुंबई में अपने टीम के युवा साथियों से कहा, “क्रिकेट के साथ ईमानदार रहो.” आचरेकर सर ने उन्हें यही सबक सिखाया था, जिसे उन्होंने हमेशा याद रखा. सचिन अब भी क्रीज पर हैं. वे अपना धर्म निभाने के भाव में बल्लेबाजी करते हैं. वे हर तरह के शॉट खेल रहे हैं, कभी ग्लांस करते हैं तो कभी दूसरा शॉट लगाते हैं. इस तरह वे एक बढिय़ा मैच में जीत दिलाते हैं. जीतने पर वे हवा में भुजाएं लहराते हैं.

जल्दी ही वे हजारों फोटुओं में नजर आने लगते हैं—टीम के साथ, प्रशासकों के साथ, ग्राउंड्समेन के साथ, साफ-सफाई करने वालों के साथ, पुलिस और खुद फोटोग्राफरों के साथ (स्डैंट्स में जहां सचिन नहीं होते, मुजफ्फरपुर के सुधीर गौतम इस कमी को परा करते हैं, जो पूरे शरीर पर ही उनका नाम लिखकर आए हुए होते हैं).

ड्रेसिंग रूम में मुंबई की टीम कुछ देर के लिए जश्न मनाती है. कुलकर्णी कहते हैं, “मैंने लड़कों से कहा था कि हमें मैच जीतकर सचिन को विदाई का तोहफा देना चाहिए. लेकिन सचिन ने अपनी बेहतरीन पारी खेलकर खुद ही हमें तोहफा दे दिया.” इसके बाद सचिन ने हरियाणा के चेंजिंग रूम में एक घंटा बिताया, जहां वे युवा टीम के साथ बातें करते रहे. उनमें से एक युवा खिलाड़ी राणा ने अपना नाम प्रमोद से बदलकर सचिन रख लिया. देश में एकदिवसीय मैच का खिलाड़ी अपनी जर्सी के नीचे सचिन के नाम का टी-शर्ट पहन रहा है. हाल ही में एक टेस्ट खिलाड़ी ने प्लास्टर ऑफ पेरिस पर सचिन पाजी की दाहिनी हथेली के निशान को अपने नए घर में टांगा है. ये सब क्रिकेटरों तीर्थयात्री हैं और यह उनकी विश्वकर्मा पूजा है, जैसे कारीगर लोग शिल्पकारों के देवता की पूजा करते हैं. उनके लिए सचिन के मायने बहुत ही स्वाभाविक हैं, उन्हें इसे समझने की कतई जरूरत नहीं है.

पत्रकार लोग मुंबई के लिए उनकी महान पारियों पर विचार कर रहे हैं: 1988 में रणजी के पहले मैच में बनाया गया शानदार शतक, 1991 में फाइनल में शानदार 96 रन, 2000 में सेमीफाइनल में 233 रन पर नाबाद. मैं व्यक्तिगत रूप से उस पारी को याद कर रहा हूं, जिसमें उन्होंने मुंबई की ओर से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 204 रन बनाए थे और आउट नहीं हुए थे. दो सत्रों में खेली गई वह पारी सचमुच लाजवाब थी, जिसमें उन्होंने बल्लेबाजी का हर रंग बिखेरा था. उनका हैंडवर्क, फुटवर्क सब कुछ इतना शानदार था कि आज भी वह पारी मन को रोमांचित करती रहती है. जब भी वह पारी याद आती है तो हम अतीत के झ्रोखों पर सवार होकर मीठी यादों में गोते लगाने लगते हैं. कौन-सा स्टेडियम था वह? ब्रेबोर्न, और साल? 1998. सचिन बेशक क्रिकेट को अलविदा कह दें, लेकिन हमारे दिल में हमेशा, यह शब्द गूंजते रहेंगे, “सचिन...सचिन...”

राहुल भट्टाचार्य द स्लाइ कंपनी ऑफ पीपल हू केयर के लेखक हैं.
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