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बदलेगी गांवों की सूरत

निर्मल भारत अभियान में इस्तेमाल होंगे बायो-डाइजेस्टर युक्त जैव शौचालय. ग्वालियर स्थित डीआरडीई के वैज्ञानिकों ने खोजी है यह तकनीकी, जिसमें मल बदल जाता है पानी में और प्रदूषण नहीं होता.

अपडेटेड 11 सितंबर , 2013
मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास स्थापना (डीआरडीई) के वैज्ञानिकों ने मानव मल को पानी में बदलने की ऐसी तकनीकी विकसित की है जिससे देश की सूरत बदल सकती है. इसका इस्तेमाल रेलवे के बाद अब भारत सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय करने जा रहा है. गांवों में शौचालय की कमी को दूर करने के लिए चलाए जा रहे निर्मल भारत अभियान में इसकी मदद ली जाएगी. इसी तकनीकी को देखने बीते 25 अगस्त को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश पहली बार डीआरडीई आए. उन्होंने उम्मीद जताई है कि अगले 10 वर्षों में इस तकनीक से बने जैव शौचालय गांवों की तस्वीर बदल कर रख देंगे.

इस तकनीक के शौचालय बायो-डाइजेस्टर युक्त होते हैं. डीआरडीई के वैज्ञानिकों ने रिसर्च के दौरान यह पाया कि प्रकृति में ऐसे बैक्टीरिया मौजूद हैं, जो मानव मल को पूरी तरह ऐसे पदार्थों में बदल देते हैं, जो प्रदूषण नहीं फैलाते. ऐसे बैक्टीरिया को माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला में विकसित किया गया. वैज्ञानिकों ने इस बैक्टीरिया का पांच डिग्री सेल्सियस तापमान से लेकर 50 डिग्री जैसे उच्च तापमान पर परीक्षण किया है. परीक्षण पूरी तरह सफल रहा. वैसे ये बैक्टीरिया शून्य से नीचे तापमान (-55 डिग्री तक) पर भी जीवित रहते हैं. डीआरडीई ने इसे बायो-डाइजेस्टर नाम दिया है.

इस परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक बताते हैं कि ये बैक्टीरिया तब तक जिंदा रहेंगे, जब तक इनके ऊपर फिनाइल या एसिड नहीं डाला जाए. मानव मल के संपर्क में आते ही ये रसायनिक क्रियाएं करके इसे कई कार्बनिक पदार्थों, जैसे एमिनो एसिड व प्रोटीन में बदल देते हैं. यही पदार्थ फिर से रसायनिक क्रियाएं करके पानी व मीथेन में बदल जाते हैं, जो प्रदूषण नहीं करते. यह प्रक्रिया अपने आप होती है. इसमें किसी प्रकार की ऊर्जा या रसायनिक एजेंट की जरूरत नहीं होती.

मानव मल का निबटान भारत में समस्या ही रहा है. आज भी देश में 60 फीसदी लोग खुले में शौच करने के लिए जाते हैं. निर्मल भारत अभियान के तहत जुटाई गई जानकारी के अनुसार देश के 57 फीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं. मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में तो अभी भी 73 फीसदी घरों (वर्ष 2012 के आंकड़ों के मुताबिक) में शौचालय नहीं हैं. इसी को ध्यान में रखकर भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने निर्मल भारत अभियान चलाया है, जिसमें शौचालय बनाने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद दी जाती है, लेकिन गंदगी की समस्या इसमें बनी हुई है.

इसी खामी के चलते जयराम रमेश का ध्यान इस तकनीक पर गया, जिसे हाल ही में भारतीय रेल ने अपनाया है. रेलवे ने डीआरडीई ग्वालियर में विकसित बायो-डाइजेस्टर का उपयोग करके अपनी ट्रेनों और रेलवे ट्रैक को साफ रखने का काम शुरू कर दिया. रेलवे ने इसकी शुरुआत ग्वालियर से चलने वाली बुंदेलखंड एक्सप्रेस में की और इसे देश की पहली जैविक शौचालय युक्त ट्रेन का दर्जा मिला. इसकी सफलता से उत्साहित रेलवे सभी यात्री कोचों में बायो-डाइजेस्टर युक्त शौचालय लगाने की योजना बना रहा है. सिर्फ रेलवे ही नहीं, बल्कि ऐसे स्थानों पर यह तकनीक कारगर साबित हुई है, जहां पर मानव मल पानी में जाता है. 2,500 किमी लंबे गंगा बेसिन से लेकर लक्षद्वीप में 10,000 से ज्यादा बायो-डाइजेस्टर युक्त शौचालय लगाने का काम शुरू हो चुका है.

बायो-डाइजेस्टर तकनीक वाला शौचालय महंगा भी नहीं है. 5,000 से 10,000 रु. में यह बन जाता है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसे किसी भी सीवर लाइन या सेप्टिक टैंक से नहीं जोडऩा है. इसमें सफाई करने की भी जरूरत नहीं होती. इसके अलावा इससे निकले पानी का इस्तेमाल खेत में भी किया जा सकता है.

जयराम रमेश ने कहा है कि इस तकनीक को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण दिया जाएगा. पहले चरण में मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के स्वयं सहायता समूह ग्वालियर आकर प्रशिक्षण लेंगे. देश में ढाई लाख पंचायतें हैं. इसमें से 25,000 निर्मल ग्राम का दर्जा पा चुकी हैं, यानी वे साफ-सुथरी हैं. एक दशक में सभी ग्राम पंचायतों को साफ करने का लक्ष्य है. इसमें डीआरडीई का बायो-डाइजेस्टर एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा. वे उम्मीद करते हैं कि इससे गांवों की सूरत बदल जाएगी.      
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