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शुरू होते ही खत्म हुई यात्रा

वीएचपी की असफल यात्रा ने अयोध्या मुद्दे की अप्रासंगिकता के साथ ही संघ परिवार के मतभेदों को उजागर किया

अपडेटेड 9 सितंबर , 2013
राज्यसभा में 26 अगस्त को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की चौरासी कोसी परिक्रमा के मुद्दे पर बीजेपी की सही तस्वीर देखने को मिली. एक ओर विनय कटियार, तरुण विजय, प्रभात झा, एम. वेंकैया नायडु और रविशंकर प्रसाद समेत तकरीबन सभी बीजेपी नेता काफी उत्तेजित थे. उनमें से कुछ नेता तो सदन की कार्यवाही में बाधा डालते हुए लगातार नारेबाजी भी कर रहे थे. लेकिन दूसरी ओर विपक्ष के नेता अरुण जेटली बिल्कुल खामोश बैठे थे. उनके चेहरे पर कठोरता के भाव साफ झलक रहे थे.

जेटली उन लोगों में से हैं, जो 2014 के चुनावों से पहले राम मंदिर के मुद्दे को उठाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे. लेकिन पार्टी में ज्यादातर दूसरे लोगों की तरह वे भी खुलकर इस बात का विरोध नहीं कर पाए. दरअसल जब उनसे इस बाबत सवाल पूछा गया तो उनकी प्रतिक्रिया काफी तीखी और नाराजगी भरी थी, “इस पर प्रतिबंध लगाकर, उन्होंने इस मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है. उत्तर प्रदेश की सरकार अगर चाहती तो इसे आसानी से टाला जा सकता था.”

इस यात्रा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सहमति हासिल थी. संघ का विश्वास है कि हिंदुत्व पर वापस लौटने से बीजेपी को फायदा होगा. लेकिन बीजेपी को यह पसंद नहीं आया. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि उन्हें वीएचपी की योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

बहरहाल अब जब परिक्रमा पूरी तरह असफल हो चुकी है तो इसके नतीजे में संघ परिवार में दरार पडऩा लगभग तय है. चौरासी कोसी परिक्रमा के मुद्दे ने न सिर्फ संघ के भीतर प्रवीण तोगडिय़ा और अशोक सिंघल के बीच के टकराव को उजागर कर दिया है,  बल्कि इससे बीजेपी और आरएसएस के बीच बढ़ता मतभेद भी सामने आ गया है. अगर इस यात्रा का मकसद चुनावी रूप से बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण करना था तो लगता है, यह चाल उलटी पड़ गई है. समाजवादी पार्टी (सपा) ने उनकी इस चाल को अपने पक्ष में कर लिया क्योंकि उसने इसे बीजेपी की माहौल बिगाडऩे की कोशिश के तौर पर पेश किया.

वीएचपी को अयोध्या में स्थानीय जनता की ओर से कोई खास समर्थन नहीं मिला. यहां तक कि साधु-संतों को भी यह योजना पसंद नहीं आई. सपा सरकार की ओर से उठाए गए कड़े सुरक्षा प्रबंध के कारण यात्रा में शामिल होने के इच्छुक मुट्ठी भर श्रद्धालु अयोध्या से 20 किमी दूर मखौदा बांध तक पहुंच ही नहीं पाए. इसी जगह से 25 अगस्त को यात्रा शुरू होने वाली थी.

इसके एक दिन पहले सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी और उत्तर प्रदेश पुलिस ने तोगडिय़ा व सिंघल समेत वीएचपी के 500 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था. यात्रा टांय-टांय फिस्स हो गई. हकीकत तो यह है कि दिल्ली में गृह मंत्रालय भी इस बात को लेकर चिंतित था कि वीएचपी के लोग कहीं दूसरी जगह परेशानी खड़ी कर सकते हैं, लेकिन वह भी नहीं हुआ.

राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े साधु-संतों ने भी इस यात्रा के प्रति ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया. श्रीराम जन्मभूमि न्यास के महंत नृत्य गोपाल दास ने परिक्रमा के बारे में किसी तरह की अपील नहीं जारी की. हर साल परिक्रमा का आयोजन करने वाली साधुओं की समिति के प्रमुख महंत गया दास ने इंडिया टुडे को बताया कि यह परिक्रमा हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र के महीने में की जाती है. राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि परिक्रमा पहले ही 25 अप्रैल से 15 मई के बीच संपन्न हो चुकी थी. उन्होंने कहा, “वीएचपी की यात्रा निश्चित ही राजनैतिक थी और उससे अयोध्या का माहौल बिगड़ सकता था.”

अयोध्या में साधारण जनमत भी राम मंदिर मुद्दे को राजनैतिक रंग देने के पक्ष में नहीं था. लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखा. निर्मोही अखाड़ा के महंत राम दास का आरोप है कि वीएचपी की मंशा पूरी तरह से राजनैतिक थी और वह गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के चुनाव प्रचार प्रमुख नरेंद्र मोदी के अयोध्या में प्रवेश से पहले एक माहौल तैयार करना चाहती थी. महंत की बात सही भी लगती है. बीजेपी में सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रभारी अमित शाह की ओर से इस यात्रा को हरी झंडी मिली हुई थी.

पार्टी में लालकृष्ण आडवाणी, जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार समेत बहुत से वरिष्ठ नेता इस यात्रा के पक्ष में नहीं थे. पार्टी के एक नेता कहते हैं, “पार्टी एक तरफ तो सोशल मीडिया के जरिए पहली बार वोट देने वाले युवा वोटरों को लक्ष्य करके मिशन 272+ की बात कर रही है और दूसरी तरफ वह राम मंदिर का मुद्दा उठाना चाहती है. यह दोहरी नीति कामयाब नहीं होने वाली है.” वे जानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में राम मंदिर के मुद्दे में अभी भी कुछ दम हो सकता है और यह अब भी कारगर हो सकता है, लेकिन इसे सही तरीके से उठाना होगा.

सपा को उलटे इस यात्रा से कुछ फायदा ही हुआ. वह न सिर्फ ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही, बल्कि उसने यह भी दिखा दिया कि लोगों की भावनाएं हिंदुत्व का एजेंडा फिर से खड़ा करने के पक्ष में नहीं हैं. कांग्रेस में ज्यादातर लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण होगा-परिक्रमा पर नहीं, बल्कि मोदी पर.

लगता है, बीजेपी ने भी इससे सबक सीख लिया है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “इस तरह की परिक्रमा आयोजित करने का कोई फायदा नहीं है. अगर ध्रुवीकरण करना ही मकसद है तो उसे करने का एक ही रास्ता है. इसके लिए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए और उन्हें उत्तर प्रदेश से चुनाव मैदान में उतारना चाहिए.”  
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