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रेगिस्तान में आ रही बाढ़

राजस्थान के रेगिस्तान में मौसम चक्र बदला. थार का मरूस्थल अब पाकिस्तान की ओर खिसक रहा है. खेती, पर्यटन और जीवन-शैली पर इसका असर

अपडेटेड 2 सितंबर , 2013
अभी पिछले हफ्ते की ही बात है. राजस्थान में बाड़मेर-जैसलमेर जैसे धुर मरुस्थली इलाके के सिणधरी कस्बे में चौबीस घंटे में बादलों ने टूटकर 204 मिलीमीटर पानी बरसाया. सिवाना कस्बे में 185 मिमी बारिश हुई. कुछ साल पहले तक जिले में पूरे साल में इतनी बरसात नहीं होती थी. जैसलमेर के चूंधी क्षेत्र में काक नदी एक तरह से अपना अस्तित्व ही खो चुकी थी.

ऐन उसके पेटे में मंदिर जैसे निर्माण हो गए थे. पिछले पखवाड़े बारिश के बाद उसमें इतना पानी आया कि चूंधी गणेश नाम का मंदिर उसमें डूब गया. जोधपुर-बाड़मेर और समदड़ी-भीलड़ी रेलमार्ग पर कई जगह पर पटरियां बह गईं. लूणी नदी के बहाव वाले क्षेत्र में भी कई बस्तियां जलमग्न हो गईं. पोकरण उपखंड में इतनी बारिश हुई कि बस्तियां पानी से घिर गईं और स्कूलों में पानी भर गया.

राजस्थान में एक कहावत है: 'चैत चिड़पड़ो सावन निरमलो’ यानी अगर चैत्र के माह में थोड़ी-थोड़ी बूंदें गिरती हैं तो आगे सावन महीने में बारिश नहीं होगी. पर अब लगता है, यह कहावत यहां अप्रासंगिक होने लगी है. पाली, नागौर, जोधपुर, जालौर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चूरू और गंगानगर जैसे पश्चिमी राजस्थान के जिलों में बदलता मौसम चक्र तो यही बताता है.

बदल गई फिजा
मौसम क्यों बदला, इसे लेकर तमाम तरह की पुष्ट और अपुष्ट व्याख्याएं की जा रही हैं. मौसम विभाग के जैसलमेर के निदेशक डॉ. बी. आर. विश्नोई बताते हैं, ''दसेक साल पहले इंग्लैंड के वैज्ञानिकों ने एक शोध में दावा किया था कि पृथ्वी एक हजार साल में अपनी धुरी से आधा डिग्री झुक रही है. इस वजह से मौसम चक्र में भारी बदलाव होगा. तब किसी ने इस पर यकीन नहीं किया था. अब सर्दी देर से शुरू होकर मार्च तक पडऩे लगी है.

मानसून का समय लंबा होने लगा है.” विश्लेषण में यह भी बताया गया था कि 2030 तक पश्चिमी राजस्थान का रेगिस्तानी इलाका दलदली इलाके में तब्दील हो जाएगा. इन सबके संकेत दिखने भी लगे हैं. रेगिस्तानी इलाकों में वर्षा का औसत बढ़ रहा है. यहां महीनों तक चलने वाली धूल भरी आंधियां बंद हो गई हैं. दक्षिण-पश्चिम से समुद्री हवाएं चलने से रेगिस्तानी इलाकों में नमी बढ़ती जा रही है.

बाड़मेर-जैसलमेर में 2006 में आई जबरदस्त बाढ़ के दृश्य लोगों को अब भी याद हैं. हजारों मकान ध्वस्त हो गए थे और दर्जनों जान गई थीं. यह वही इलाका था, जहां बीसेक साल पहले तक नाम मात्र की बारिश होती थी. चारों ओर  रेगिस्तान नजर आता था. धीरे-धीरे बरसात ने जो इधर का रुख किया तो इलाके की पूरी फिजा ही बदल गई.

वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ. एन.डी. इणखिया इस बदलाव के पीछे कुछ और वजहें भी देखते हैं. उन्हीं में से एक है यहां बढ़ता कृषि क्षेत्र. वे कहते हैं, ''जैसलमेर जैसे मरुस्थली जिले में नब्बे के दशक से शुरू हुए भूजल आधारित कृषि कार्य ने इसमें अहम भूमिका निभाई है.” जैसलमेर जिले के चांधण क्षेत्र में शुरू हुई नलकूप आधारित खेती अब जिले के मध्य भाग से लेकर दक्षिण-पश्चिम में फैले बसिया क्षेत्र तक पहुंच गई है.

इणखिया के ही शब्दों में, ''वातावरण में नमी के अलावा यहां वनस्पतियों की भी संख्या बढऩे से हवाओं की रफ्तार कम हुई है. आंधियां रुकने से भी माहौल वर्षा के अनुकूल बना है.” पर्याप्त बारिश होने से अब खरीफ की फसल को नलकूपों का पानी कम पिलाना पड़ रहा है.

कहीं धूप-कहीं छांह
इन सबके बीच एक और नया रुझन देखने को मिल रहा है. इसमें वर्षा का औसत तो बढ़ा है लेकिन कई इलाकों में बहुत ज्यादा बरसात हो रही है तो उन्हीं से सटे इलाकों में नाम-मात्र को पानी बरस रहा है. वहां सूखा तक भी देखा जा रहा है.
जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) के निदेशक टी.एस.राठौड़ इसे रेखांकित करते हैं, ''बारिश सब ओर बराबर नहीं हो रही है. इसके पीछे स्थानीय कारण हो सकते हैं.

इस संबंध में अभी सही वजहों का पता नहीं लग पाया है. शोध अभी चल रहे हैं.” उनके हिसाब से भी ग्लोबल वार्मिंग एक वजह हो सकती है. राठौड़ का कहना है कि वर्षा तो भरपूर हो रही है लेकिन वर्षा के दिन कम हुए हैं. यानी जिस दिन वर्षा शुरू होती है, तो भारी वर्षा होती है. इस तरह से यह जानोमाल के नुकसान का भी सबब बन जाती है. ''पिछले साल नागौर में कई इलाके सूखे रह गए जबकि कई इलाकों में भारी बारिश हुई. इसी तरह जैसलमेर, बीकानेर और बाड़मेर के कई इलाकों में बारिश न होने से राज्य सरकार को उन गांवों को अकालग्रस्त घोषित करना पड़ा.”

उलटा-पुलटा
खैर, रेगिस्तान में वर्षा का औसत बढऩे से खुशहाली तो जरूर आई है लेकिन यह बढ़ता स्तर रेगिस्तान को न केवल खत्म कर रहा है बल्कि शुष्क क्षेत्र में पाई जाने वाली अनाज और पशुओं की कई प्रजातियों के लिए भी अस्तित्व का संकट खड़ा कर रहा है. इसके अलावा फसलों का क्रम बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.

कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि अनुकूल तापमान के दौरान 5 से 20 अक्तूबर के दरम्यान सरसों की बुआई कर ली जानी चाहिए, लेकिन अब वैसा तापमान नवंबर में आने लगा है. गेहूं की फसल को औसतन 22 डिग्री तापमान की दरकार रहती है और इस वजह से नवंबर को बुआई के लिए उपयुक्त बताया गया है. पर पिछले दो-तीन साल से वैसा तापमान दिसंबर में जाकर मिल रहा है.

घटते रेगिस्तान ने पर्यटन को भी प्रभावित किया है. जैसलमेर घूमने आए गुजरात के वडोदरा के पंकज शाह कहते हैं, ''डेजर्ट के बारे में काफी सुन रखा था, सो बीवी और बेटे के साथ आ पहुंचा पर यहां तो सम और खुहड़ी इलाके में ही थोड़ी-बहुत रेत नजर आई.” थार का रेगिस्तान अब पाकिस्तान की ओर खिसकने लगा है.

बीकानेर के पर्यावरणविद् शुभू पटवा इस क्षेत्र में पारिस्थितिकीय बदलाव पर नजर रखते आए हैं. मौसम तंत्र में बदलाव के बारे में वे कहते हैं, ''इंदिरा गांधी नहर परियोजना के आगमन को एक अहम वजह माना जा सकता है. इससे आई हरियाली कई तरह की दूसरी समस्याओं को भी साथ लेकर आई है.”

पश्चिमी राजस्थान को आमतौर पर भारत का गर्म प्रदेश माना जाता है. कुछ साल पहले तक यहां आबादी का घनत्व भी कम था. रेत के टीले सूर्यास्त के बाद ठंडे हो जाते थे. लेकिन अब आबादी के घनत्व में बढ़ोतरी के चलते सीमेंट और कंकरीट के जंगल मकानों के रूप में खड़े हो रहे हैं. टीले कम हुए हैं और रातें ठंडी नहीं रह गईं.

नए इलाकों में नहर आने के साथ ही किसानों को नगदी फसलें लेने के लिए प्रेरित करना शुरू किया गया, लेकिन इसकी वजह से 10-12 साल में ही जमींन की उर्वरा शक्तिनष्ट हो गई. अब किसानों को लगने लगा है कि उनके साथ धोखा हुआ. बीकानेर जिले में श्रीडूंगरगढ़ तहसील के बाना गांव के एक जागरूक किसान रामचंद्र बाना कहते हैं, ''एक समय था जब थोड़ी-सी बारिश से बारानी खेतों में फसलें लहलहा उठती थीं.

अब हालत यह है कि ट्यूबवेल का भरपूर इस्तेमाल और खूब खाद डालने के बावजूद जमीन में पहले वाली रौनक नहीं आ पाती. बारिश पहले से ज्यादा हो रही है, लेकिन वर्षा चक्र नियमित नहीं रह गया है.”

लब्बोलुबाब यह कि रेगिस्तानी इलाकों में बढ़ती बारिश ने यहां की जिंदगी के पूरे मिजाज को ही बदलकर रख दिया है. अब बदलते मौसम चक्र पर चल रही रिसर्च के निर्णायक नतीजों का इंतजार है.
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