सरकारी विश्वविद्यालयों की बजाए निजी विश्वविद्यालयों में प्रतिभाशाली छात्रों के प्रवेश लेने का जो सिलसिला 2000 में शुरू हुआ, वह आज समूचे देश में उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग के साथ एक स्थायी चलन की शक्ल ले चुका है. देश में कई निजी विश्वविद्यालय खुल चुके हैं जो अपनी अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ बदलते हुए समय से कदमताल कर रहे हैं, जिनके चलते सरकारी विश्वविद्यालयों में छात्रों की कमी पड़ गई है. शिक्षण के तरीके और माध्यम भी समय के साथ बदल रहे हैं, जहां अध्यापन में क्लाउड कंप्यूटिंग, वाइ-फाइ समर्थ परिसरों और विदेश के शिक्षकों के साथ स्काइप पर कॉन्फ्रेंस और नए विविध पाठ्यक्रमों का सहारा लिया जा रहा है. ये सब सिखाने के साथ बहुआयामी कौशल भी प्रदान करते हैं.
कंटेंट पर है जोर
निजी विश्वविद्यालयों की प्राथमिकता परंपरागत विषयों के साथ ऐसे पाठ्यक्रम मुहैया कराने की है जो रोजगार के लिहाज से प्रासंगिक हों. ग्रेटर नोएडा में 2011 में स्थापित शिव नाडर यूनिवर्सिटी की खूबी यह है कि वहां अंतरविषयक अनुसंधान पर ज्यादा जोर दिया जाता है. ऐसी पढ़ाई के लिए वहां सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स ऐंड क्रिटिकल थियरी, बिग डेटा एनालिटिक्स सेंटर, सेंटर फॉर इमर्जिंग सोसाइटीज और सेंटर फॉर इन्फॉर्मेटिक्स हैं. यहां 14 स्नातक, 12 स्नातकोत्तर और 13 शोध पाठ्यक्रम चलते हैं. यूनिवर्सिटी में चार स्कूल हैं&इंजीनियरिंग, नेचुरल साइंसेज, ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज और मैनेजमेंट एंड आंट्रप्रेन्योरशिप. स्नातक स्तर का पाठ्यक्रम यहां इस तरह से बनाया गया है जो छात्रों को किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ पढऩे के अलावा अन्य विषयों में भी अध्ययन की छूट देता है. पाठ्यक्रम की खूबी यह है कि इसमें व्यावहारिक शिक्षण और अतिरिक्त पाठ्येतर गतिविधियों पर जोर है जहां सभी छात्रों को किसी न किसी रूप में इंटर्नशिप या सेवा शिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लेना होता है. इसके अलावा कक्षा या प्रयोगशाला के भीतर और बाहर दोनों जगह शोध भी करना होता है. एसएनयू के संस्थापक कुलपति निखिल सिन्हा कहते हैं, “यहां छात्रों को वास्तविक दुनिया के हिसाब से सीखने का मौका मिलता है.”
ग्रेटर नोएडा में ही 2011 में स्थापित गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने उद्योग केंद्रित पाठ्यक्रम के मामले में अपनी अलग पहचान बनाई है. इसके कुछ विभागों को उद्योग इकाइयों के सहयोग से मिलकर बनाया गया. मसलन, बिजनेस स्कूल में केपीएमजी का सहयोग है तो नर्सिंग स्कूल को मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजूकेशन ऐंड रिसर्च और कंप्यूटिंग साइंस स्कूल को आइबीएम के गठजोड़ से चलाया जा रहा है.
2005 में नोएडा में अपनी स्थापना के बाद से एमिटी यूनिवर्सिटी कई राज्यों में अपने कुल आठ परिसर चला रही है. इनके अलावा इसके दस अंतरराष्ट्रीय परिसर हैं और दुबई में एक संपूर्ण विश्वविद्यालय है. यहां कई पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं जिनमें एक्चुअरियल साइंस, अप्लाइड साइंस, आर्किटेक्चर, डिजाइन, फैशन, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, न्यूरोसाइकोलॉजी, सोलर इंजीनियरिंग, फोरेंसिक साइंस और रोबोटिक्स वगैरह शामिल हैं. हर पाठ्यक्रम में विदेशी भाषा और कारोबारी संप्रेषण जैसे कौशल विकास कार्यक्रम जोड़े गए हैं. एमिटी यूनिवर्सिटी के चांसलर अतुल चौहान कहते हैं, “हमारा मानना है कि एक सशक्त देश की नींव विज्ञान और प्रौद्योगिकी के खंभों पर निर्मित होती है. इसीलिए हम इन क्षेत्रों को प्रोत्साहन देते हैं. इस क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के लिए एमिटी साइंस, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन फाउंडेशन की भी स्थापना की गई है.” यूनिवर्सिटी का दावा है कि उसने बायो-टेक्नोलॉजी, नैनो-टेक्नोलॉजी और सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 607 से ज्यादा पेटेंट करवाए हैं.
तमिलनाडु के कृष्णनकोइल में कलसलिंगम यूनिवर्सिटी की स्थापना 1984 में की गई थी. यहां छात्रों को प्रयोगशालाओं में यह छूट दी जाती है कि वे कुछ नया और दिलचस्प खोजने पर पाठ्यक्रम में बदलाव भी कर सकते हैं. हर सेमेस्टर में तीन से पांच छात्रों को विदेश के सम्मेलनों में परचा पढऩे के लिए भेजा जाता है.
आइआइटी कानपुर के दो स्वर्ण पदक विजेताओं पंकज अग्रवाल (चांसलर) और पूजा अग्रवाल (प्रो-चांसलर) द्वारा लखनऊ में 2012 में स्थापित श्री रामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी (एसआरएमयू) प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी और प्राकृतिक विज्ञान जैसे अलग-अलग विषयों में छह अकादमिक संस्थान चलाती है, जहां 35 से ज्यादा स्नातक, स्नातकोत्तर, शोध और अंतरविषयक कार्यक्रमों में शिक्षा दी जाती है. पंकज अग्रवाल कहते हैं, “हमने आधुनिक सॉफ्टवेयर के प्रयोग से लैब व्यू को अपने यहां लगाया है ताकि छात्र और शोधार्थी एक बटन दबाकर ही वर्चुअल प्रयोग कर सकें.”
विशिष्ट क्षेत्रों के लिए निजी विश्वविद्यालयों में मौलिक अवसर मौजूद हैं. नवी मुंबई की अजिंक्य डीवाइ पाटिल यूनिवर्सिटी में दिलीप छाबडिय़ा को चाहने वाले उनसे डिजाइन सीख सकते हैं, क्योंकि वे डीवाइपीडीसी स्कूल ऑफ डिजाइन के संरक्षक हैं, जहां डिजाइन और डिजिटल मॉडलिंग में छह पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं. यहां छात्रों को पाठ्यक्रम के तहत प्रोटोटाइप डिजाइन बनाने पड़ते हैं और उद्योग केंद्रित डिजाइन परियोजनाओं पर काम करना पड़ता है. यह कार्यक्रम मोटे तौर पर स्टुडियो केंद्रित है जो शोध, प्रयोग, विश्लेषण और आत्मालोचना को प्रोत्साहित करता है.
हरियाणा के सोनीपत में अशोका यूनिवर्सिटी 40 लोकोपकारियों ने मिलकर बनाई थी, जिन्होंने अपने विचारों, संसाधनों और जिम्मेदारियों से कलाओं के लिए समर्पित इस संस्थान की स्थापना की. यहां 2014 में स्नातक छात्रों के लिए एक लिबरल आट्र्स कॉलेज खोला गया है. यह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रदान करता है जो विज्ञान और कला की विभाजक सीमाओं को लांघ जाता है. अशोका यूनिवर्सिटी के संस्थापक और प्रो-वीसी विनीत गुप्ता कहते हैं, “हमारा लक्ष्य 2025 तक दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल होना है.”
यहां छात्रों को तमाम विषयों का अन्वेषण करने का एक मौका पहले साल में दिया जाता है. इससे पहले कि वे अगले दो वर्षों के लिए अपनी विशेषज्ञता के विषय का चयन कर सकें. पाठ्यक्रम इतना लचीला है कि छात्रों को तमाम विषयों में विशेषज्ञता का विकल्प हासिल होता है&कंप्यूटर विज्ञान, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी, मनोविज्ञान, इतिहास, गणित, समाजशास्त्र और नृशास्त्र. इसके अलावा 15 अतिरिक्त विषय हैं जिनमें मंचीय कलाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक लंबी फेहरिस्त है.
कुछ इसी तरह 2011 में जयपुर में स्थापित मणिपाल यूनिवर्सिटी इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी पर जोर देते हुए मेकाट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, कंप्यूटर और कम्युनिकेशन में पाठ्यक्रम चलाती है. यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट संदीप संचेती कहते हैं, “हमारा उद्देश्य ज्ञान को इतना बढ़ाना है कि छात्र खुद अपनी डिग्रियां हासिल करने के लायक बन जाएं.” यहां छात्रों को मध्य सेमेस्टर की उत्तर पुस्तिकाएं लौटा दी जाती हैं ताकि वे अपना आकलन कर सकें.
शोध में इजाफा
ऐसे कुछ पुराने निजी विश्वविद्यालयों में एक 1987 में स्थापित चेन्नै की सत्यभामा यूनिवर्सिटी है जहां इंजीनियरिंग के 24 विषयों में शिक्षा दी जाती है. इंजीनियरिंग शिक्षण और शोध के क्षेत्र में यहां अत्याधुनिक सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं. नेशनल सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के साथ मिलकर यहां खोला गया सेंटर फॉर वेस्ट मैनेजमेंट एनर्जी साइंस में एमएससी, ग्रीन इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी में एमटेक और अन्य उपाधियां प्रदान करता है. यूनिवर्सिटी की डीन टी. शशिप्रभा कहती हैं, “शोध केंद्र का जोर नवाचारी प्रौद्योगिकी के माध्यम से कचरे के निस्तारण और पुनरोपयोग पर है. 50 लीटर की क्षमता का एक बायो-डीजल प्लांट है, जो हमारे मेस में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल को बायो-डीजल में बदल देता है. इससे यूनिवर्सिटी की दो बसें चलती हैं.”
इस यूनिवर्सिटी ने 2014 में सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन एनर्जी रिसर्च की स्थापना की, जहां सोलर सेल, फ्यूल सेल और जैव ऊर्जा पर शोध होता है. सत्यभामा यूनिवर्सिटी में नैनो साइंस, जलवायु परिवर्तन, समुद्र विज्ञान और नैनो-टेक्नोलॉजी के भी केंद्र हैं. शशिप्रभा ने बताया, “हमारे यहां अत्याधुनिक मार्शल साइंस शोध केंद्र है जहां उच्च तापमान की कोटिंग, सैटेलाइट एप्लिकेशन और वियर-रेजिस्टेंस कोटिंग का विकास किया जाता है. छात्रों और फैकल्टी ने इसरो के साथ मिलकर एक उपग्रह विकसित किया है, जिसे मार्च 2016 में प्रक्षेपित किया जाएगा. इसका इस्तेमाल भारतीय उपमहाद्वीप में प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर निगरानी रखने में किया जाएगा.”
अत्याधुनिक सुविधाएं
नए विश्वविद्यालय इस मायने में फायदे में हैं कि उनके पास आधुनिक सुविधाओं से युक्त परिसर बनाने का मौका है. जैसे, बृजमोहन लाल मुंजाल यूनिवर्सिटी (बीएमयू) का उदाहरण लें, जो गुडग़ांव में 2014 में स्थापित की गई. इसका परिसर नए तरीके से बनाया गया है. इसे एचओके नाम की एक अमेरिकी डिजाइन, वास्तु और शहरी नियोजन फर्म ने बनाया है. यहां नए दौर की प्रयोगशालाएं हैं, एक विशाल सभागार है, खाने की कई जगहें हैं और एक व्यायामशाला है. यहां छात्रों के व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए आधुनिक सीएनसी (कंप्यूटर न्यूमरिकल कंट्रोल) मशीनें भी हैं, जो हमारे यहां के उद्योगों में इस्तेमाल की जा रही मशीनों से काफी आगे की हैं. बीएमयू में लगे 3डी प्रिंटरों का इस्तेमाल कंपनियां प्रोटोटाइप बनाने में करती हैं.
लखनऊ की एसआरएमयू ने एक एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी) आधारित प्रणाली अकादमिक, वित्त और एचआर समाधानों के साथ विकसित की है, जिसकी मदद से परिसर में मौजूद हर व्यक्ति पर चौबीसों घंटे नजर रखी जा सकती है. यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि शिक्षक कक्षा लेने से पहले अपनी पाठ योजना ईआरपी पर अपलोड कर दें और छात्रों की उपस्थिति को उसमें दर्ज करें. इन सुविधाओं के कारण यह यूनिवर्सिटी अभिभावकों को खासा आकर्षित कर रही है.
कृष्णनकोइल, तमिलनाडु में केएलयू के पास एक स्टुडेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (एसआइएस) है, जिसके माध्यम से सभी छात्रों की अकादमिक जरूरतें उन छात्रों, उनके अभिभावकों और उनके स्थानीय संरक्षकों को एक ही डेटाबेस में उपलब्ध करा दी जाती हैं. इस विस्तृत नेटवर्क में छात्रों के प्रदर्शन को सेमेस्टर, क्रेडिट और उपस्थिति के हिसाब से दर्ज किया जाता है जिससे उनके बारे में खोजने में आसानी होती है. केएलयू के कुलपति एस. सरवणा शंकर कहते हैं, “हम अध्यापकों की ओर से ज्यादा प्रभावोत्पादकता और छात्रों के मामले में सीखने की प्रक्रिया के सरलीकरण के लिए प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में विश्वास करते हैं.”
कनार्टक के मंगलूरू स्थित डेरलाकट्टी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और लोकसभा के स्पीकर रह चुके के.एस. हेगड़े द्वारा स्थापित निट्टी यूनिवर्सिटी अलग ही रास्ते पर चल रही है. यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार एम.एस. मूडिथाया कहते हैं, “हम हर छात्र को एक शिक्षक के जिम्मे सौंपते हैं, जो उसका संरक्षक होता है. वह न सिर्फ उसकी शिक्षा बल्कि उसके सामाजिक कल्याण के लिए भी जिम्मेदार होता है. धीरे सीखने वालों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और उन्हें विशेष सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं.” यहां शिक्षण की एक असामान्य विधि यह अपनाई जाती है कि छात्रों को ऑनलाइन उपलब्ध पाठ्य-पुस्तकों से पढऩा होता है, प्रेजेंटेशन तैयार करना होता है और फिर उसे अपलोड करना होता है.
सबसे बढिय़ा साथ
कई निजी विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ करके अपनी फैकल्टी और छात्रों को कुछ समय के लिए बाहर भेजते हैं ताकि वे शिक्षण के नए माध्यमों और तकनीकों से परिचित हो सकें.
गुडग़ांव के बीएमयू का संरक्षक लंदन का इंपीरियल कॉलेज है, जहां से उसने प्रबंधन का पाठ्यक्रम तैयार करवाया है और वहां से शिक्षकों को अपने यहां बुलवाता है. यहां एमबीए के छात्रों को लंदन से एक सेमेस्टर पढ़कर आने का भी अवसर दिया जाता है. स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी के डीन अमिताभ मित्रा कहते हैं, “स्नातक छात्रों के लिए हम केपीएमजी के सहयोग से पाठ्यक्रम मुहैया कराते हैं जो कि दुनिया की चार शीर्षस्थ अकाउंटिंग फर्मों में एक है. स्नातकोत्तर के लिए हम आइबीएम के साथ मिलकर बिजनेस एनालिटिक्स में एमबीए की पेशकश करते हैं.” यूनिवर्सिटी ने हाल ही में यूरोप के सबसे बड़े अप्लाइड रिसर्च संगठन फ्रॉनहॉफर के साथ गठजोड़ पर दस्तखत किए हैं.
गलगोटिया का अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ मलेशिया की यूनिवर्सिटी टेक्नोलॉजी, गोएथे यूनिवर्सिटी, परड्यू यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के रॉबर्ट एच. स्मिथ स्कूल ऑफ बिजनेस और एंडग्लया रस्किन यूनिवर्सिटी के साथ विनिमय कार्यक्रमों के लिए है. छात्रों में सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास जगाने के लिए यहां विभिन्न गतिविधियों से उन्हें जोड़ा जाता है जैसे स्कूल ऑफ नर्सिंग के छात्र पड़ोस के गांवों में निःशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर लगाते हैं तो स्कूल ऑफ लॉ के छात्र गांववालों को निःशुल्क कानूनी सलाह देते हैं.
केएलयू के छात्रों को विनिमय कार्यक्रमों में नियमित तौर पर कोरिया की सूंगसिल यूनिवर्सिटी और हम्माम यूनिवर्सिटी में भेजा जाता है. बेंगलूरू और कोयंबटूर स्थित सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग सेवा कंपनी टेसोल्व के साथ एक और गठजोड़ के तहत केएलयू की फैकल्टी को प्रशिक्षण दिया जाता है और छात्र अपने तीसरे सेमेस्टर में पारिश्रमिक के बदले वहां इंटर्नशिप करते हैं. इसके बाद केएलयू और टेसोल्व छात्रों का संयुक्त मूल्यांकन करते हैं. योग्य छात्रों को कंपनी में नौकरी मिल जाती है.
अशोका ने किंग्स कॉलेज लंदन, यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, येल और कई अन्य के साथ विनिमय कार्यक्रमों के लिए गठजोड़ किया है जहां उनके छात्र अपनी रुचि के विषय सेमेस्टर में या गर्मियों में सीख सकते हैं.
अन्य विश्वविद्यालय अपना पाठ्यक्रम तैयार या अद्यतन करते वक्त रोजगार की संभावनाओं को संज्ञान में रखते हैं. उत्तर प्रदेश के मथुरा में 2010 में स्थापित जीएलए यूनिवर्सिटी के चेयरमैन नारायण दास अग्रवाल कहते हैं, “कोर्स तैयार करते वक्त हमने उन बातों को ध्यान में रखा है जो शिक्षा और रोजगार के मामले में नैसकॉम और विश्व बैंक अपनी रिपोर्टों में कहते हैं.”
एक ओर जहां छात्र नए-नए कौशल हासिल कर के अपनी पसंद के क्षेत्रों में प्रयोग कर रहे हैं तो वहीं ये निजी विश्वविद्यालय ऐसे अंतरविषयक पाठ्यक्रम अपने यहां लागू कर रहे हैं, जो रोजगार की जरूरतों के हिसाब से भी प्रासंगिक हों. इन विश्वविद्यालयों की पढ़ाई सरकारी विश्वविद्यालयों के मुकाबले काफी महंगी होती है, लेकिन बच्चों को अवसर मुहैया कराने के लिए यहां वजीफों और अन्य सुविधाओं की भी व्यवस्था होती है. कुछ संस्थान तो आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को 25 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक शिक्षण शुल्क अनुदान देते हैं.
आज के छात्र चाहते हैं कि शिक्षण संस्थान से उन्हें कार्यस्थल तक पहुंचने में सहजता हो. निजी विश्वविद्यालय बाजार को समझते हुए छात्रों को ऐसा कर पाने में समर्थ बनाने में लगातार सक्षम होते जा रहे हैं.
(-साथ में अदिति पै, आशीष मिश्र, अरविंद गौड़ा, करिश्मा गोयनका, सरण्या चक्रपाणि और रोहित परिहार)
निजी विश्वविद्यालयों में दिखने लगी नई चमक
देश में उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग के कारण अपने नए पाठ्यक्रमों और अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ निजी विश्वविद्यालयों ने सरकारी संस्थानों को पीछे छोड़कर बनाई अपनी जगह.

अपडेटेड 20 जुलाई , 2016
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