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खड़े होने से पहले ढहने लगे 6 एम्स

वाजपेयी के कार्यकाल में देश ने छह नए एम्स का सपना देखा था. आज 10 साल बाद हजारों करोड़ रु. तो खर्च हो गए लेकिन मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा का वह सपना जमीन पर नहीं उतर पाया.

अपडेटेड 30 मई , 2013

अगस्त के महीने में पिछले साल जब एमबीबीएस के उस स्टुडेंट ने ऋषिकेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पैर रखा तो लगा जैसे उसके पांव तले जमीन से खिसक गई हो. शिवालिक की हरी-भरी पहाडिय़ां और पशुलोक बैराज में गंगा का खूबसूरत नजारा जैसे उसके सामने था ही नहीं, वह देख रहा था कि जिस एम्स में दाखिले के लिए उसने जीवन के तीन बेहतरीन साल लगा दिए थे वहां न टीचर हैं, न लैब और न ही हॉस्पिटल.

क्या ऐसे ही ब्रांड एम्स के भरोसे उसने दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के बाद नाम कटा लिया था. उसके मन में तो एम्स के रूप में ऐसे अस्पताल की कल्पना थी जिसकी ओपीडी में हर साल 25 लाख से ज्यादा मरीज इलाज कराते हैं और जहां के 50 से ज्यादा डिपार्टमेंट के डॉक्टर दुनिया का कठिन से कठिन ऑपरेशन करने के लिए रात-दिन एक पांव पर खड़े रहते हैं. यह लड़का अकेला नहीं है.

दिल्ली के एम्स की तरह देश में खुले सभी छह एम्स जोधपुर, भोपाल, रायपुर, पटना, ऋषिकेश और भुवनेश्वर का यही हाल है. पिछले शिक्षा सत्र में हर कॉलेज में 50-50 यानी कुल 300 छात्र-छात्राओं को दाखिला दिया गया. ये सारे छात्र देश में मेडिकल दाखिले की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा यानी एम्स, दिल्ली की प्रवेश परीक्षा की मैरिट के आधार पर यहां आए थे.

इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा छात्र ऐसे हैं जो एम्स में दाखिला लेने से पहले किसी न किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला पा चुके थे. पिछले साल जहां 300 छात्रों को एमबीबीएस में दाखिला मिला वहीं, इस साल यह संख्या बढ़ाकर 600 कर दी गर्ई है. इसके अलावा 360 नर्सिंग स्टुडेंट्स भी इस बार छह नए एम्स में दाखिले को तैयार हैं. सरकार का दावा है कि 1 जुलाई, 2013 से अस्पताल चालू कर दिए जाएंगे.

एम्स ऋषिकेश बंद करने की सिफारिश
लेकिन दावे की कलई खुलती है ऋषिकेश एम्स के निदेशक डॉ. राजकुमार के 2 अप्रैल, 2013 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव केशव देसीराजू को लिखे गोपनीय पत्र से. ''मैं आपको बताना चाहता हूं कि एम्स के रेजीडेंशियल कॉमप्लेक्स में काम पूरी तरह से ठप पड़ा है. बड़ी विनम्रता से आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि लगातार रिमाइंडर भेजने, निजी तौर पर बातचीत करने, कमेटी की मीटिंगों में बात उठाने और जांच कराने के बावजूद अधोहस्ताक्षरित के एम्स ऋषिकेश में आने के बाद से एचएलएल ने साइट पर कोई काम नहीं कराया है.”

एचएलएल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड का छोटा नाम है, जो कंडोम बनाने के लिए मशहूर है, लेकिन ऋषिकेश में एम्स के रेजीडेंशियल कॉम्प्लेक्स का सिविल वर्क करा रही है. इस कंपनी के गैर-जिम्मेदाराना काम से तंग आकर एम्स प्रशासन कंपनी के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज करा चुका है. ''यह सब देखते हुए, यह सूचित किया जाता है कि यदि एचएलएल लिमिटेड का इसी तरह का तांडव जारी रहा तो आगामी शिक्षा सत्र में एमबीबीएस छात्रों के नए बैच, शिक्षकों की भर्ती, नर्सिंग स्टाफ की भर्ती और नर्सिंग पाठ्यक्रम के छात्रों की भर्ती की प्रक्रिया तुरंत रोक दी जाए.” दुनियाभर में सम्मान पाने के बाद देवभूमि में ब्यूरोक्रेसी के हाथों पस्त हुआ न्यूरोसर्जन यहीं नहीं रुका. उन्होंने लिखा, ''एचएलएल के कामकाज के बारे में यह मेरी आखिरी खतो-किताबत है, क्योंकि इससे पहले मेरा लिखा-पढ़ा सब कूड़े में गया.”

जब इस संवाददाता ने एम्स ऋषिकेश की टोह ली तो समझ आया कि यह खत नहीं था, बल्कि एम्स ऋषिकेश के हालात का शब्दचित्र था. हालांकि निदेशक पद की गरिमा से बंधे डॉ. राजकुमार का स्वर था, ''मैं अपने विभागीय पत्राचार के बारे में कोई बात नहीं करूंगा. यहां की स्थिति आप खुद देख सकते हैं.” स्थिति यह है कि हॉस्पिटल के प्रवेश द्वार पर कीचड़ पड़ा है. रेजीडेंशियल कॉम्लेक्स की सारी सड़कें अधूरी पड़ी हैं. गर्ल्स और ब्वायज हॉस्टल के छोटे-छोटे हिस्सों को किसी तरह रहने लायक बनाया गया है.

काम कराना गैर-कानूनी है
कुछ ऐसा ही इंतजाम भोपाल एम्स के डायरेक्टर डॉ. संदीप कुमार ने भी कराया था. दरअसल कुमार जानते थे कि अगर बच्चों को एडमिशन दे दिया गया है तो पहले साल के चार विषयों एनॉटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकैमिस्ट्री और कम्युनिटी मेडिसिन की प्रयोगात्मक पढ़ाई के लिए उपकरणों की न्यूनतम व्यवस्था करनी होगी. उनकी चिंता गैरवाजिब भी नहीं थी.

एम्स निर्माण में लगातार देरी की परंपरा को देखें तो 8 जुलाई, 2009 को स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने लोकसभा को बताया, ''पीएमएसएसवाइ योजना के तहत छह नए एम्स बनाने में कुछ देरी हुर्ई है. शुरुआती देरी सिंगल प्रोजेक्ट कंसल्टेंट खोजने के लिए आमंत्रित निविदा के नाकाम होने से आई. दिसंबर, 2006 से शुरू की गई पूरी प्रक्रिया को समाप्त माना गया और अब नए सिरे से पहल की जा रही है. अब एम्स के लिए रेजीडेंशियल परिसर 2009-10 में तैयार हो जाएंगे. अस्पताल और मेडिकल कॉलेज 2011 तक तैयार हो जाएंगे.” लेकिन 2 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में आजाद का स्वर बदल गया, ''सभी छह एम्स में अकादमिक सत्र 2012-13 से और अस्पताल अकादमिक सत्र 2013-14 में शुरू हो जाएंगे.”

इन घोषणाओं के बावजूद फर्स्ट इयर के छात्रों के लिए उपकरण आज तक नहीं मंगाए जा सके हैं.  यही सब देखते हुए भोपाल और पटना एम्स ने कुछ जरूरी उपकरण खरीदे. लेकिन इसका क्या असर हुआ इसकी बानगी एम्स डायरेक्टर संदीप कुमार के सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को 21 फरवरी, 2013 को भेजे पत्र से मिलती है. ''आप निश्चित तौर पर मेरे उन प्रयासों की सराहना करेंगे जिसके तहत मैंने फर्स्ट इयर के छात्रों को उपकरणों की कमी महसूस नहीं होने दी....लेकिन मैं बड़ी पीड़ा से कहता हूं कि हमने तकरीबन जो कुछ भी किया है, उसे फालतू, अस्तित्वहीन, गैरकानूनी और अनधिकृत घोषित कर दिया गया है. मेहरबानी करके हमारा कार्यक्षेत्र स्पष्ट कर दें ताकि समीक्षा बैठकों के दौरान हमें हतोत्साहित न होना पड़े.”

इस खत के बावत जब डॉ. कुमार से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''एक आदमी के कहने से हमारा काम गैरकानूनी नहीं हो जाएगा.” भोपाल में सर्व-सुविधायुक्त अस्पताल के जुलाई तक चालू होने की उम्मीद नहीं दिख रही है. यहां काम बिखरा हुआ है. अगर अस्पताल नहीं होगा तो द्वितीय वर्ष के छात्रों को किस हॉस्पिटल से अटैच करेंगे. यही हाल जोधपुर, रायपुर और भुवनेश्वर का है.

तौबा कर सकते हैं दिग्गज डॉक्टर
नए एम्स को लेकर अब तक थोड़ी-सी उम्मीद यही रहती थी, कि अत्याधुनिक उपकरण औैर सुविधाएं तो वक्त के साथ आती रहेंगी, लेकिन कम-से-कम बढिय़ा डॉक्टरों को नब्ज तो दिखा ही लेंगे. लेकिन 8 अप्रैल, 2013 को एम्स पटना के डायरेक्टर डॉ. जी.के. सिंह ने सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को जो पत्र लिखा उससे यह टिमटिमाता दिया भी बुझता नजर आ रहा है.

डॉ. सिंह की व्यथा देखिए, ''फैकल्टी सदस्यों की रिहायश का इंतजाम पूरी तरह अंधकारमय है. अगर एम्स ने जल्द ही कोई कदम न उठाया तो अच्छी फैकल्टी (नामचीन डॉक्टरों) एम्स के साथ बनाए रखना नामुमकिन हो जाएगा.”  पहले ही चार वरिष्ठ डॉक्टर एम्स का डायरेक्टर बनने से मना कर चुके हैं. ऐसे ही हालात से तंग आकर इस साल फरवरी में एम्स भोपाल के डीन डॉ. किशोर चौधरी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

क्या आजाद ने संसद में झूठ बोला
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने 5 मार्च, 2013 को राज्यसभा में कहा, ''सभी नए एम्स में डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर, फाइनेंशियल एडवाइजर, सुपरिटेंडेंट इंजीनियर औैर एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफीसर जैसे अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गर्ई है. इन अधिकारियों को डायरेक्टर की ओर से प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए गए हैं. इन शक्तियों में इंस्टीट्यूट के लिए उपकरण खरीदना, इमारत का रख-रखाव करना और अन्य छोटे-मोटे काम शामिल हैं.”

निदेशकों को उपकरण खरीदने का अधिकार देने संबंधी इस बयान पर तब सवाल खड़े होते हैं जब एक महीने बाद 8 अप्रैल, 2013 को एम्स पटना के निदेशक डॉ. जी.के. सिंह स्वास्थ्य सचिव केशव एन. देसीराजू को लिखे खत में कहते हैं, ''मंत्रालय ने कहा है कि उपकरणों की खरीद के बारे में डायरेक्टर कोई भी फैसला नहीं कर सकते क्योंकि सभी छह एम्स के लिए  मंत्रालय यह काम कर रहा है....इंस्टीट्यूट इस (रेजीडेंशियल कॉम्पलेक्स) बारे में कोई भी कदम नहीं उठा सकता क्योंकि ऐसा करने से मंत्रालय ने हमें रोका है.... सभी छह एम्स के निदेशकों की ओर से उठाए जाने वाले किसी भी कदम पर मंत्रालय सवाल खड़ा कर देता है.”

डायरेक्टरों के सामान खरीदने के अधिकार पर स्वास्थ्य सचिव देसीराजू ने कहा, ''अगस्त, 2012 की अधिसूचना के तहत डायरेक्टरों को एक करोड़ रु. तक का सामान खरीदने की छूट है. इस तरह का आरोप लगाना गलत है.” बिना हॉस्पिटल के पहले बैच को भर्ती करने के सवाल पर देसीराजू ने कहा, ''यह सवाल स्वास्थ्य मंत्री ने भी उठाया था लेकिन बिहार, ओडीशा और उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्रियों ने एम्स को राज्य अस्पतालों से अटैच करने का भरोसा दिलाया था. इसके अलावा इस साल जल्दी से जल्दी अस्पताल शुरू किए जाएंगे.”

लेकिन जमीनी हालात इन महत्वाकांक्षी दावों के साथ नहीं है. पहला सत्र समाप्त होने तक राज्य अस्पतालों से भी मदद नहीं मिली है. अगर अल्लादीन का चिराग भी आ जाए तो कम-से-कम इस साल छह राज्यों की 30 करोड़ आबादी को अपने इलाके में एम्स जैसी स्वास्थ्य सेवा मिलना नामुमकिन है.

—साथ में  हनुमंत चंद

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