अक्तूबर, 2010 में उद्योगपति अनिल अंबानी की रिलायंस पावर कंपनी ने 32,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए शंघाई इलेक्ट्रिक ग्रुप से 10 अरब डॉलर मूल्य के बिजली उपकरण खरीदने का ऑर्डर दिया. भारत और चीन की किसी कंपनी के बीच इस सबसे बड़े कारोबारी सौदे में शंघाई इलेक्ट्रिक को भारत में बिजली उपकरण बनाने के लिए कारखाने भी लगाने हैं. इस सौदे पर हस्ताक्षर हनोई में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की बैठक के मौके पर हुए. यह महज संयोग नहीं था. इससे दोनों देशों के बीच की इस समझ का संकेत मिलता है कि चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को पूरा करने का एक तरीका यह है कि चीन को भारत में निर्यातपरक क्षेत्रों में भारी निवेश की अनुमति दी जाए.
खाई को पाटना है
दोनों देशों में व्यापार असंतुलन बहुत ज्यादा है. चीन के साथ भारत का व्यापार पिछले एक दशक में चौदह गुना बढ़ गया है. 2002-03 में यह 4.77 अरब डॉलर था जो 2012-13 में 67.83 अरब डॉलर पहुंच गया. फिर भी जबरदस्त व्यापार असंतुलन की वजह से भारत चिंतित है. इसमें 54.3 अरब डॉलर का माल चीन से आयात हुआ जबकि भारत ने सिर्फ 13.53 अरब डॉलर का माल निर्यात किया यानी 40.77 अरब डॉलर का व्यापार घाटा रहा. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी का कहना है, ''यह रकम हमारे कुल चालू खाता घाटे की आधी है जो फिक्र की बात है.”
व्यापार के मामले में औपनिवेशिक रुख भी नजर आता है. चीन के लिए भारत के ज्यादातर निर्यात में अयस्क, कपास और धागा, रत्न और कच्चा माल शामिल है. गोवा में खनन और निर्यात पर सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बाद लौह अयस्क का निर्यात लगभग खत्म हो गया. चीन के सीमा कस्टम्स विभाग के आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर, 2012 में चीन का भारत से आयात वार्षिक आधार पर 19.6 फीसदी कम हुआ. विदेश मंत्रालय की रिसर्च टीम रिसर्च—ऐंड इन्फार्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज के महानिदेशक विश्वजीत धर के अनुसार, ''चीन के लिए भारत के निर्यात में 93 फीसदी तक हिस्सेदारी कच्चे माल और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली बीच की सामग्री की है. इससे व्यापार संतुलन का पलड़ा चीन के पक्ष में झुका हुआ है. इस संतुलन को ठीक करने का एक ही तरीका है कि चीन को निर्यात के लिए भारत में प्रतिष्ठान स्थापित करने के वास्ते प्रोत्साहित किया जाए.”
19 मई से चीन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा से पहले नई दिल्ली में वाणिज्य सचिव एस.आर. राव और चीन के वाणिज्य सचिव चेन जियान के बीच बढ़ते व्यापार घाटे पर चर्चा होगी. भारत चाहता है कि चीन नियमों में ढील दे ताकि दवा और कृषि वस्तुओं का निर्यात बढ़ाया जा सके. मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से चीन के साथ व्यापार संबंध मजबूत हो सकते थे लेकिन उसके कोई आसार नहीं हैं. क्रिसिल के जोशी का कहना है कि स्थानीय मुद्रा में व्यापार की अनुमति देने जैसे तरीकों से मदद मिलनी चाहिए.
पिछले कुछ साल में बिजली के सामान से लेकर घरेलू वस्तुओं और रेडीमेड गारमेंट्स से लेकर दीवाली के पटाखों तक चीन के सामान की आमद बहुत अधिक हुई है, लेकिन जमीनी स्तर पर निवेश बेहद कम है. चीन की कंपनियों ने 2012 तक भारत में 72.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया जबकि चीन में भारतीय कंपनियों का निवेश 48.6 करोड़ डॉलर ही रहा.
चीन में भारत की मौजूदगी
चीन सेवा क्षेत्र की अपनी भूख मिटा रहा है और भारत की आइटी तथा बीपीओ कंपनियों और बैंकों को बहुत अधिक बढ़ावा दे रहा है. इन्फोसिस, एप्टेक, विप्रो, टीसीएस, महिंद्रा सत्यम और एनआइआइटी जैसी कंपनियों और पंजाब नेशनल बैंक, स्टेट बैंक, इलाहाबाद बैंक, आइसीआइसीआइ जैसे बैंकों ने बीजिंग और शंघाई में शाखाएं खोली हैं.
चीन में मौजूद अन्य प्रमुख भारतीय कंपनियों में डॉक्टर रेड्डीज लेबोरेटरीज, भारत फोर्ज, अरबिंदो फार्मा, रिलायंस इंडस्ट्रीज, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और टाटा संस शामिल हैं.
टाटा ग्रुप का चीन से संबंध 1859 में जुड़ा था जब टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा को अपने पिता की बैंकिंग कंपनी की एक शाखा खोलने के लिए हांगकांग भेजा गया था. कुछ महीने बाद टाटा कंपनी कपास, रेशम और चाय का व्यापार करने के लिए शंघाई चली गई और 1863 तक वहीं रही. आज टाटा ग्रुप की 10 कंपनियां चीन में चल रही हैं. इनमें टाटा स्टील, जगुआर लैंड रोवर, टीसीएस और टाटा ग्लोबल बेवरेजेज शामिल हैं. चीन से टाटा ग्रुप की कमाई 2007-08 में एक अरब डॉलर थी जो 2010-11 में बढ़कर 3.7 अरब डॉलर हो गई. उसने पहले से ज्यादा जगुआर और लैंड रोवर गाडिय़ां बेचीं. चीन 2010 में अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया का सबसे बड़ा कार बाजार हो गया. महिंद्रा ऐंड महिंद्रा ने चीन में दो संयुक्त उपक्रम कंपनियों महिंद्रा (चीन) ट्रैक्टर कंपनी और महिंद्रा यूएदा (यानचेंग) ट्रैक्टर कंपनी स्थापित की हैं और वहां 75 हॉर्सपावर से कम शक्ति के ट्रैक्टर बाजार में उसकी हिस्सेदारी 10 फीसदी की है. चीन में सीआइआइ के मुख्य प्रतिनिधि माधव शर्मा का कहना है, ''कंपनियों को चीन में अपने इन्वेस्टमेंट के बारे में धीरज से काम लेना चाहिए और इन्वेस्टमेंट के अनुपात में तेजी से लाभ की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. मजदूरी की कीमतें बढ़ रही हैं इसलिए कंपनियों को तटवर्ती इलाकों की बजाए भीतरी हिस्सों में जाने के बारे में सोचना चाहिए.”
कोयंबटूर की लक्ष्मी मशीन वर्क्स कंपनी ने चीन में 2008 में अपने पूर्ण स्वामित्व में एलएमडब्ल्यू टेक्सटाइल मशीनरी कंपनी शुझेऊ में खोली, जहां साल में कताई में काम आने वाले 5 लाख रिंगफ्रेम तकुए (स्पिंडल) बनते हैं. एलएमडब्ल्यू के फाइनेंस डायरेक्टर आर. राजेंद्रन के अनुसार, ''चीन में अच्छी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं. सरकारी मंजूरी तेजी से मिलती है और स्थानीय स्तर पर कच्चा माल मिलने की खूब गुंजाइश है, लेकिन बाजार में कीमतों का बहुत ध्यान रखना पड़ता है.” विदेशी कंपनियों को चीन में कामयाब होने के लिए वहां निवेश की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझना जरूरी है. माधव शर्मा इसकी मिसाल देते हुए बताते हैं, ''अमेरिका की डायरेक्ट सेलिंग कंपनी एमवे को चीन में दुकानें खोलनी पड़ीं क्योंकि वहां डायरेक्ट सेलिंग की अनुमति नहीं है. यह सबक भारतीय कंपनियों के लिए फायदेमंद होगा.”
लागत कम करना है
भारतीय कंपनियों ने देखा कि चीन से तैयार माल जुटाना लागत के हिसाब से बहुत फायदेमंद होता है. मिसाल के तौर पर हैंडसैंट बनाने वाली माइक्रोमैक्स कंपनी ने चीन में ठेके पर माल तैयार करने वाली बड़ी कंपनियों से हैंडसैट बनवाकर लागत में 40 प्रतिशत की बचत कर ली. गोदरेज ग्रुप अपने सभी माइक्रोवेव ओवन और बेबी डाइपर तथा कुछ एयरकंडीशनर चीन से लेता है. यह बात कंपनी के अध्यक्ष आदी गोदरेज ने इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू में बताई थी.
चीन में भारतीय दूतावास के अनुसार सरकारी कंपनियों सहित करीब 100 चीनी कंपनियां भारत में कारोबार कर रही हैं. भारत को नीतिगत पाबंदियां कम करनी होंगी. सुरक्षा कारणों से भारतीय अधिकारी चीन की टेलीकॉम कंपनियों पर कड़ी नजर रखते हैं. ताजा खबरों के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय ने चीन की हुयावेई और जेडटीई जैसी कंपनियों को ठेके देने से देश की सुरक्षा के लिए खतरों की चेतावनी दी है, क्योंकि यही कंपनियां चीनी सेना को भी सामान देती हैं. फिर भी हुयावेई भारत के बारे में बहुत उत्साहित है. भारत में कंपनी के प्रवक्ता सुरेश वैद्यनाथन कहते हैं, ''पिछले एक दशक में हुयावेई उस क्षेत्र में सबसे आगे हो गई है जिस पर पश्चिमी कंपनियों का कब्जा रहा करता था. यहां हमारा अनुभव कुल मिलाकर अच्छा रहा है.”
लेकिन जांच पड़ताल और नियंत्रण के दबाव में चीनी निवेश कम होगा. विश्वजीत कहते हैं, ''हमें डर के साये से बाहर निकलना होगा. हम अपने पड़ोसियों को चुन नहीं सकते.” उनका मानना है कि भारत को नियंत्रण लगाने की बजाए चीन से मुकाबला करने की नीति बनानी होगी.

