मनमोहन सिंह के चेहरे पर आम तौर पर कोई भाव नहीं आते. नाराज तो वे कभी नहीं दिखते और उनके चेहरे पर हल्की सी-मुस्कान की झलक एक दुर्लभ घटना होती है. लेकिन जब देश चाहता है कि वे दृढ़ हों, कड़े निर्णय लें, और देश की कामयाबी के साथ खुश हों तब यह मशीनी चेहरा देशवासियों का भरोसा नहीं बढ़ाता.
भारत जब अपने खुराफाती पड़ोसियों की ओर से सीमा पर अतिक्रमण और अमानवीय संवेदनहीनता झेल रहा है, वे पूरी तरह से स्थितप्रज्ञ बने हुए हैं. उनके चारों ओर जब घोटालों का बवंडर मचा है और उनके अपने लोग छिटक कर दूर जा रहे हैं, वे इन सबसे ऊपर कुछ नहीं देखने, कुछ नहीं सुनने और कुछ महसूस नहीं करने की अवस्था को प्राप्त कर चुके दिखते हैं. वे संदेह से परे हैं और जवाबदेही से उनका कोई वास्ता नहीं. वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, जो काफी तेजी से देश के लिए नहीं तो कम-से-कम सरकार के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी में तब्दील होते जा रहे हैं. कभी यूपीए का पोस्टर ब्वॉय रहा यह शख्स आज उसी के लिए बोझ बन गया है.
इस देश को एक अदद नेतृत्व की कितनी सख्त जरूरत है, यह बात याद दिलाने के लिए पाकिस्तान की जेल में एक भारतीय कैदी की मौत काम आई. पाकिस्तान के हाथों प्रताड़ित और भारत से परित्यक्त सरबजीत सिंह की लाहौर में मौत हो गई. भारत ने उसकी जान बचाने के लिए खास कुछ नहीं किया. पाकिस्तान पर उसे इलाज के लिए भारत या विदेश भेजने का दबाव डाला जा सकता था लेकिन सरबजीत एक ऐसे देश में पैदा हुआ, जिसे पाकिस्तान ने बहुत पहले गंभीरता से लेना बंद कर दिया था. जब देश को सबसे ज्यादा जरूरत थी, ऐन उस वक्त पर भारत के पास एक ऐसा नेता नहीं था, जो इस्लामाबाद के सामने सीना तानकर खड़ा हो सकता.
महज एक दिन पहले 30 अप्रैल को कांग्रेस सांस रोक कर सरकार के संशोधित किए गए सीबीआइ के कोयला घोटाले वाले हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही थी. आम तौर पर प्रधानमंत्री के बचाव में खड़ी रहने वाली पार्टी घोंघे की तरह अपने कवच में घुसी हुई थी. अपनी दैनिक ब्रीफिंग में कांग्रेस ने बस इतना कहा, ‘‘मामला न्यायाधीन है.’’ आखिरकार कोर्ट ने सीबीआइ से दूसरा हलफनामा दायर करने को कहा, जिसमें उसे बताना है कि उसकी रिपोर्ट में किसने क्या-क्या बदलाव किए हैं. अपनी सुनवाई के अहम हिस्से को उसने 6 मई तक के लिए टाल दिया. इससे कांग्रेस को कुछ वक्त मिल गया.
उधर, कांग्रेस मुख्यालय से एक किलोमीटर दूर संसद में विपक्ष ने वित्त विधेयक को बख्शते हुए बाकी सारी कार्यवाही ठप कर डाली. इस जरा से मिले वक्त में भी बीजेपी ने सरकार पर हमला करने का मौका खोज निकाला. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यूपीए 2 को आजादी के बाद की सबसे भ्रष्ट सरकार करार दिया.
संसद की कार्यवाही शुरू करने की पूर्वशर्त के तौर पर कोयला घोटाले की जांच से छेड़छाड़ करने के आरोप में कानून मंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की विपक्ष की मांग कांग्रेस को भारी पडऩे वाली है. भोजन का अधिकार और भूमि अधिग्रहण जैसे अहम विधेयक जुलाई-अगस्त में मानसून सत्र के लिए टल सकते हैं.
विपक्ष के पास मनमोहन सिंह को सताने के लिए कई हथियार हैं. लद्दाख में चीन की घुसपैठ पर प्रधानमंत्री की कमजोर प्रतिक्रिया ने उन्हें हंसी का पात्र बना दिया है. इसके अलावा 2जी घोटाले पर परदा डालने में जेपीसी के अध्यक्ष पी.सी. चाको की हरकत भी प्रधानमंत्री के गले की हड्डी बन चुकी है. नौ साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि सत्ताधारी गठबंधन के लिए मनमोहन सिंह बोझ बन गए हैं.
उनकी ताजा दिक्कतें बीते 5 मार्च को शुरू हुई थीं, जब केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने अटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती को फोन मिलाकर कोयला घोटाले पर सीबीआइ की उस जांच रिपोर्ट की स्थिति जाननी चाही थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में जमा किया जाना था. अश्विनी कुमार यह अंदाजा लगाना चाहते थे कि आखिर प्रधानमंत्री पर इस घोटाले का कितना दोष आएगा, जो 2008 और 2009 में विवादित कोयला ब्लॉकों के आवंटन के वक्त खुद कोयला मंत्री भी थे.
वाहनवती ने उन्हें एक बैठक बुलाने की सलाह दी और कहा कि इसमें सीबीआइ के वकील अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल हरीन पी. रावल को तलब किया जाए. इसके बाद रावल उस बैठक में अपने स्तर पर सीबीआइ के जांच अधिकारी को तलब करेंगे. वाहनवती ने अश्विनी कुमार को यह सलाह भी दी कि उस बैठक में कोयला मंत्रालय और पीएमओ से एक-एक संयुक्त सचिव को भी बुलाया जाए. बैठक की तारीख अगले दिन 6 मार्च रखी गई. सीबीआइ के निदेशक रंजीत सिन्हा को भी बुला लिया गया.
यह अतिगोपनीय बैठक थी. इसके बाद 12 मार्च को रावल ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट तौर पर बताया कि सीबीआइ की रिपोर्ट में कोई राजनैतिक दखलंदाजी नहीं हुई है. उन्होंने झूठ बोला था. लेकिन सरकार की इस बेहतरीन योजना की उस वक्त हवा निकल गई जब कोयला घोटाले की सुनवाई कर रही तीन जजों की पीठ के सदस्य वरिष्ठ जज आर.एम. लोढ़ा ने इस बात पर जोर दिया कि सीबीआइ स्टेटस रिपोर्ट नहीं बल्कि हलफनामा दाखिल करे. कोर्ट को स्पष्ट तौर पर यह जानना था कि क्या सरकार ने सीबीआइ की रिपोर्ट से छेड़छाड़ की है? जांच की सामग्री साझा करके अब तक कानून मंत्री और दूसरे अधिकारियों की मदद करते रहे सीबीआइ निदेशक सिन्हा इस मोड़ पर मुकर गए.
उन्होंने जोर देकर कहा कि वे हलफनामे में झूठ नहीं बोल सकते. उन्होंने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट को यह बताना ही पड़ेगा कि कानून मंत्री और दूसरे अफसरों के साथ उन्होंने जांच रिपोर्ट साझा की थी. सूत्रों की मानें तो सीबीआइ निदेशक हलफनामे में झूठ लिखकर शपथ भंग का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे. इसके बाद 15 अप्रैल को एक प्रमुख दैनिक ने खबर छाप दी कि सीबीआइ सुप्रीम कोर्ट से यह कहने जा रही है कि उसकी रिपोर्ट से सरकारी अफसरों ने छेड़छाड़ की है. इस खबर में 6 मार्च की बैठक में शामिल हुए बाकी सारे अधिकारियों के नाम थे लेकिन वाहनवती का नाम गायब था. सरकार का गोरखधंधा पूरी तरह बेनकाब हो चुका था.
सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को सरकार पर ‘‘प्रतिज्ञा भंग करने’’ का आरोप लगाया. उस दिन भी वाहनवती लगातार कहते रहे कि उन्होंने रिपोर्ट नहीं देखी है. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार में कानून के दो सबसे वरिष्ठ अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने झूठ बोला क्योंकि वे कोयला घोटाले की आंच से मनमोहन सिंह को बचा ले जाना चाह रहे थे. वाहनवती ने 28 अप्रैल को प्रधानमंत्री से 7 रेसकोर्स रोड पर मुलाकात कर काफी लंबी बातचीत की थी कि 30 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में सरकार की रणनीति क्या रहेगी. अंतत: यह तय हुआ कि सरकार रक्षात्मक मुद्रा नहीं अपनाएगी.
यह पहला बड़ा घोटाला नहीं है जिसके साक्ष्यों का सिरा प्रधानमंत्री तक पहुंचा है. न ही कोई बात दबाने का कांग्रेस का यह पहला प्रयास है. तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा को 2जी घोटाले के लिए उकसाने में प्रधानमंत्री की भूमिका की जांच अब भी लंबित है, बावजूद इसके कि पी.सी. चाको ने प्रधानमंत्री को सवाल-जवाब के लिए तलब किए बगैर ही जांच को बंद करने का पूरा प्रयास किया. इस घोटाले पर डाला गया परदा कोयला घोटाले के मुकाबले कुछ ही आसान रहा क्योंकि 2जी मामले में सरकार (और चाको) ने लगातार पूरी कोशिश की कि सारा दोष ए. राजा पर मढ़ दिया जाए.
कोयला घोटाले में बीच में कहीं कोई मंत्री नहीं है, जिसे बलि का बकरा बनाया जा सके. प्रधानमंत्री ने खुद संदिग्ध विश्वसनीयता वाली कंपनियों को मुफ्त कोयला ब्लॉक देने संबंधी फाइलों पर दस्तखत किए थे. वास्तव में 27 अगस्त, 2012 को संसद में दिए अपने बयान में उन्होंने कोयला मंत्रालय में लिए गए सारे फैसलों की जिम्मेदारी खुद के ऊपर ली थी.
उन्होंने कहा था, ‘‘मंत्रालय का प्रभारी होने के नाते मैं मंत्रालय के सारे फैसलों की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं.’’ इसके अलावा वे मनमोहन ही थे जिन्होंने जनवरी 2005 में कोयला मंत्रालय की सुझाई गई नीलामियों को तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज की मदद से रोक दिया था. मंत्रालय ने अपनी पहली राय में एक प्रशासनिक आदेश से नीलामी करने की बात की थी लेकिन मनमोहन ने इस पर उसकी दूसरी राय मांग ली थी.
प्रधानमंत्री को अब कुछ तो बोलना ही पड़ेगा. यदि वास्तव में हरीन रावल, अश्विनी कुमार, गुलाम वाहनवती, सीबीआइ, पीएमओ और कोयला मंत्रालय के अफसरों ने बगैर उनकी सहमति और जानकारी के यह सब कांड किया है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का साफ उल्लंघन किया है, तो प्रधानमंत्री को इन सबका इस्तीफा मांग लेना चाहिए जबकि हो यह रहा है कि प्रधानमंत्री अपने बदनाम हो चुके कानून मंत्री के पीछे मजबूती से खड़े हैं. यदि ऐसा नहीं है तो इसका अर्थ सीधे खुद उनकी कुर्सी का जाना होगा. मनमोहन ने 27 अप्रैल को राष्ट्रपति भवन में रक्षा अधिष्टापन समारोह के दौरान कड़े शब्दों में बयान दिया था, ‘‘कानून मंत्री के इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता.’’ इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि मैं नहीं जाने वाला. उनकी खुद की भूमिका पर जब सवाल हुआ तो वे अपने पुराने रक्षात्मक अवतार में आ गए, ‘‘मामला अदालत में है.’’
पीएमओ के अधिकारी जोर देकर कहते हैं कि मनमोहन सिंह के पास छुपाने को कुछ भी नहीं है. पीएमओ के एक सूत्र का कहना है, ‘‘सीबीआइ सरकार की नहीं, कंपनियों की जांच कर रही है. प्रधानमंत्री ने तो कोयला घोटाले पर पहले ही संसद में पारदर्शी बयान दे दिया है. सरकार दरअसल कॉर्पोरेट झगड़े का शिकार बन गई, बिलकुल वैसा ही जैसा 2जी में हुआ था.’’
पार्टी आधिकारिक तौर पर खुद को काफी कड़ा दिखा रही है. कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी कहते हैं, ‘‘जहां तक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का सवाल है, मेरा मानना है कि उसकी आखिरी राय आनी अभी बाकी है और जैसे ही यह होगा, उपयुक्त फैसला लिया जा सकता है.’’ यूपीए के वरिष्ठ मंत्री हालांकि अंदरखाने मायूस हैं. वे मानते हैं कि विपक्ष के आरोप का सामना करने के लिए कुछ कार्रवाई तो करनी ही होगी. वे प्रधानमंत्री से इसकी उम्मीद कर रहे हैं. एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री का मानना है कि कानून मंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए लेकिन शायद ऐसा होने वाला नहीं. एक और मंत्री सीधे शब्दों में कहते हैं, ‘‘अश्विनी कुमार को बचाने पर जोर देकर प्रधानमंत्री पार्टी के लिए शर्मिंदगी पैदा कर रहे हैं.’’
कांग्रेस के भीतर कई लोगों का मानना है कि अश्विनी कुमार का इस्तीफा सिर्फ प्रधानमंत्री ही दिलवा सकते हैं क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री का आदमी माना जाता है. इसके अलावा, इस पर भी शक है कि अश्विनी कुमार ने यह सब प्रधानमंत्री के प्रति वफादारी के चलते उन्हें बचाने के लिए किया या फिर इसके पीछे किसी और का हाथ था.
कांग्रेस के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 6 मई के बाद भी उसे कुछ और वक्त मिल जाए. इसकी संभावना हो सकती है क्योंकि 10 मई से अगले 45 दिनों के लिए सुप्रीम कोर्ट ग्रीष्मावकाश के लिए बंद रहेगा. इसी दिन संसद का मौजूदा सत्र भी खत्म होगा और फिर जुलाई के अंत में मानसून सत्र शुरू होगा. कांग्रेस की एक और उम्मीद यह है कि 8 मई को उसे कर्नाटक के चुनाव में जीत हासिल होगी और इस तरह भ्रष्टाचार की संगीन को वह बीजेपी की ओर मोड़ देगी. राहुल गांधी ने अपनी चुनावी रैलियों में इसे पहले ही मुद्दा बना दिया है.
लेकिन बीजेपी पीछे हटने नहीं जा रही है. उसके निशाने पर प्रधानमंत्री हैं. राज्यसभा में बीजेपी के उपनेता रविशंकर प्रसाद कहते हैं, ‘‘सरकार ने रावल के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है. हम यह जानने को लेकर ज्यादा चिंतित हैं कि प्रधानमंत्री की जवाबदेही क्या बनती है क्योंकि वे खुद इस बार जांच का विषय हैं.’’
सरकार को हिला देने वाले घोटाले रहे हों चाहे और जरूरी मुद्दे, प्रधानमंत्री ने अपनी विश्वसनीयता को दुरुस्त करने के लिए कुछ खास नहीं किया है. उनके रूखे बयान शायद उनकी सबसे छोटी समस्या हैं. लद्दाख में चीनी घुसपैठ की खबरें सार्वजनिक हुए दो हफ्ते हो गए, लेकिन अब तक प्रधानमंत्री का इकलौता बयान इस मसले पर 27 अप्रैल को आया था जिसमें उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पास भी एक योजना है. हम स्थिति को और ज्यादा खींचना नहीं चाहते.’’ लगातार हो रहे अतिक्रमण के बरक्स उनका यह बयान कमजोरी की गवाही देता है.
मनमोहन की सबसे पसंदीदा रणनीति यह रही है कि नीति और राजकाज के सारे अहम मामलों से दूरी बनाए रखी जाए. यह अब कारगर साबित नहीं हो रही. विपक्ष के मुताबिक, प्रधानमंत्री होने के बावजूद उनके पास ज्यादा अधिकार नहीं हैं. यशवंत सिन्हा कहते हैं, ‘‘सत्ता के दो केंद्रों वाली प्रणाली आदर्श मानी गई थी: सोनिया पार्टी में और मनमोहन सरकार में. लेकिन वे अपनी सारी ताकत सोनिया से ही लेते हैं. जब से राहुल कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने हैं, मनमोहन नंबर तीन पर आ गए हैं. गठबंधन को तो छोड़िए, वे पार्टी का भी नेतृत्व नहीं कर सकते.’’
प्रधानमंत्री की बदतर स्थिति पर यह एक सहानुभूतिपूर्ण बयान माना जा सकता है. बहरहाल, वे गठबंधन के अपने सहयोगियों के साथ तो कड़ाई बरत ही सकते थे. मसलन, 2009 में जब पूरा यूपीए उनकी छत्रछाया में मजबूत खड़ा था, वे डीएमके को ए. राजा की जगह कोई और दूरसंचार मंत्री सुझाने को कह सकते थे. तब तक जनवरी 2008 में की गईं ए. राजा की कारस्तानियां सार्वजनिक भी हो चुकी थीं. वे उस वक्त राजनैतिक तौर पर मजबूत थे, फिर भी उन्होंने गठबंधन के दबाव के आगे घुटने टेकना मंजूर कर लिया. परमाणु सौदे को छोड़ दें तो निर्णायक मामलों पर कड़ाई से खड़े होने की उनकी नाकामी ही है जिसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के नाम पर एक धब्बा बना डाला है.
अब भी यह कयास ही लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव नियत समय यानी अप्रैल 2014 में होंगे या शायद नवंबर 2013 में. कांग्रेस अपने विकल्प देख रही है. यदि उसने लोकसभा चुनाव को राज्य के चुनावों के साथ करवाने का मन बनाया तो उसके पास लोगों से कहने को कुछ नहीं होगा. अगर चुनाव वक्त पर हुए, तो शायद कैश सब्सिडी और खाद्य सुरक्षा विधेयक का लाभ उसे मिल सकेगा. कांग्रेस के प्रबंधकों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी हालत पतली नहीं कर दी तो चुनाव अपने समय पर ही होगा.
कांग्रेस को कम-से-कम इस बात का लाभ तो रहेगा ही कि बीजेपी अपने दुष्चक्र में अब तक फंसी हुई है और वहां नेतृत्व का सवाल हल नहीं हो पाया है. वाम दल भी चाहते हैं कि ममता बनर्जी को और वक्त सत्ता में मिले ताकि उनकी विश्वसनीयता को और नुकसान पहुंचे. समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती फिलहाल अपना सारा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगाए हुए हैं. डीएमके अपने खानदान को घोटालों से बचाने में मसरूफ है जबकि एआइएडीएमके की दिलचस्पी श्रीलंका के तमिलों में ज्यादा है. कुल मिलाकर फिलहाल इस देश से राष्ट्रीय एजेंडा गायब है.
आम चुनावों का वक्त जो भी रहे, मतदाताओं के दिमाग में भ्रष्टाचार और आर्थिक कुप्रबंधन (बुनियादी तौर पर महंगाई) का मुद्दा ही छाया रहने वाला है. अब यह मनमोहन सिंह की बदकिस्मती है कि जनता इन दोनों के प्रतीक के तौर पर उन्हें ही देखती है. कभी इन दोनों मसलों पर उनकी जितनी बेदाग और बेहतरीन छवि थी, वह उतनी ही ज्यादा पतन का शिकार हुई है. विपक्ष के हमले के लिए वे आसान निशाना हैं चाहे बीजेपी हो या छोटे दल, जो एक ‘संघीय मोर्चे’ में साथ आने का सपना देख रहे हैं.
जिस वक्त भारत को एक ऐसे नेता की जरूरत है, जो भरोसा खो चुके सियासी तबके से मोहभंग की शिकार जनता को तसल्ली देकर प्रोत्साहित कर सके, वे देश के सामने चुप हो गए हैं. हवा में एक और कयास है कि हो सकता है, मनमोहन सिंह की जगह कोई ऐसा प्रधानमंत्री बैठा दिया जाए जो बेदाग हो. कांग्रेस हालांकि इसे लेकर ऊहापोह में है. अगर उसने प्रधानमंत्री से निजात पाने की सोची भी तो इसका सीधा-सा अर्थ होगा कि उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है. अगर उसने मनमोहन सिंह को पद पर बनाए रखा तो यह बोझ् उसकी बची-खुची विश्वसनीयता को भी चाट जाएगा और जाहिर है, वोटों का नुकसान तो होगा ही.
पार्टी उन्हें हटाकर परिवार के वफादार एक और शख्स को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने में संकोच कर रही है, लेकिन यह काम अपने आप 2014 के चुनाव के बाद संभव है. दिक्कत यह है कि 2014 की कुर्सी राहुल गांधी के लिए होनी चाहिए थी, लेकिन वे अब तक यह तय ही नहीं कर सके हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठ कर देश को चलाना है या अपनी मां की तरह घर में आराम से बैठकर. इसी वजह से मनमोहन सिंह कांग्रेस के लिए अब एक जरूरी बोझ बन चुके हैं-शायद देश उन्हें इतना जरूरी नहीं मानता हो.
-साथ में जयंत श्रीराम

