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नीतीश कुमार: निश्चित से अनिश्चय की ओर

एनडीए से नाता तोडऩा बीजेपी के मुकाबले जेडीयू के लिए ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है. सत्ता विरोधी लहर और लालू के उभार से जूझते नीतीश मुश्किल परिस्थितियों में घिरते नजर आ रहे हैं.

अपडेटेड 25 अप्रैल , 2013

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हमेशा नीतीश कुमार के प्रति उदार रही है. 2000 के बिहार विधानसभा चुनावों में उसने 67 सीटें जीती थीं जो नीतीश कुमार की समता पार्टी (एसपी) की 34 सीटों से लगभग दुगनी थीं. फिर भी उसने मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार का नाम ही आगे किया था. उन्होंने सात दिनों के अंदर ही इस्तीफा दे दिया था लेकिन वह एक लंबी दोस्ती की शुरुआत थी जिसमें नीतीश को वरिष्ठ साझेदार की भूमिका सौंपी गई. यह गठबंधन 2005 में विजयी रहा और 2010 में तो यह जबरदस्त तीन चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आया. जाहिर है, बीजेपी आए दिन नीतीश द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाए जाने और गठबंधन तोडऩे की उनकी धमकियों से व्यथित है. लेकिन नीतीश एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की दौड़ से मोदी को बाहर रखने की अपनी जिद में असल नुकसान उठाने वाले साबित हो सकते हैं.

नीतीश की पार्टी जनता दल (यूनाईटेड) जेडीयू का मानना है कि बीजेपी से अपना गठबंधन तोडऩे से उन्हें कोई खास नुकसान नहीं होगा. नीतीश ने सत्ता में रहते हुए लक्षित सामाजिक कल्याण उपाय अपनाकर वंचित वर्गों का एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार किया है. अपने मूल कुर्मी वोट बैंक को सहारा देने के लिए उन्होंने अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी), महादलितों, पिछड़े मुसलमानों और महिलाओं जैसे जाति निरपेक्ष तटस्थ मतदाताओं तक को मिलाकर सफलतापूर्वक नया समर्थन समूह तैयार कर लिया है और इस तरह बिहार में वे लगभग अजेय हो गए हैं.

नीतीश का सफल सामाजिक गठबंधन यादव, पासवान, भूमिहार और ब्राह्मणों के परंपरागत रूप से ताकतवर सामाजिक गुटों के दबदबे को उलटने के लिए तैयार किया गया है. ऐसा करते हुए उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वियों लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान को कमजोर किया है. पहले उन्होंने लालू को कमजोर करते हुए मंडल ढांचे से अति पिछड़ी जातियों, जो कुल मतदाताओं की तकरीबन 33.5 फीसदी हैं, अलग किया. फिर उन्होंने अनुसूचित जाति में आने वाली 22 में से 21 उपजातियों को मिलाकर महादलितों का एक नया सामाजिक समूह तैयार किया और लोक जनशक्तिपार्टी (एलजेपी) के पासवान को तगड़ा झटका दिया. उन्होंने इस महादलित सूत्रीकरण के बाहर जो इकलौती जाति छोड़ी, वह पासवान थी. सरकार ने मुफ्त जमीन, शिक्षा तथा अन्य सहायता जैसे कल्याणकारी उपाय अपनाकर महादलितों को, जो कुल मतदाताओं के 11 प्रतिशत हैं, संतुष्ट किया है.Nitish Kumar

उनके प्रतिद्वंद्वियों के लिए उनके सामाजिक गठबंधन का गणित उन्हें मिले वोटों के प्रतिशत से प्रमाणित नहीं होता. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता राम कृपाल यादव कहते हैं, ‘‘बिहार में जेडीयू को आज तक कभी कुल पड़े वोटों के एक चौथाई वोट भी नहीं मिले हैं.’’ पिछले विधानसभा चुनावों में जेडीयू को अकेले 25 प्रतिशत से कम वोट मिले थे, लेकिन बीजेपी के साथ उसके गठबंधन ने 40 प्रतिशत के आस-पास वोट हासिल किए. 2010 में बुरी तरह हारने के बावजूद आरजेडी को 20 प्रतिशत वोट मिले थे. बीजेपी के बगैर नीतीश लालू के सामने कमजोर पड़ेंगे, खासतौर पर तब यदि लालू-पासवान अथवा कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लें.  

बीजेपी ने 2010 के विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन करते हुए 90 प्रतिशत सीटें जीती  थीं. उसे मुख्य रूप से वैश्य जातियों, सवर्णों और जाति निरपेक्ष निरपेक्ष मध्यम वर्ग के एक समूह का समर्थन हासिल है. 2009 में उसने 12 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त की थी. पार्टी को लगता है कि वह और भी बेहतर कर सकती है. प्रदेश के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता कहते हैं, ‘‘बिहार की जनता का नीतीश से मोहभंग हो रहा है. बीजेपी की सीटें निश्चित रूप से बढ़ेंगी.’’

सच तो यह है कि नीतीश को 2010 के विधानसभा चुनावों के विपरीत, 2014 के लोकसभा चुनाव की दौड़ में एक प्रबल सत्ता विरोधी लहर से जूझना है. बीजेपी की मुख्य आधार ऊंची जातियां नाराज हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि नीतीश चुन-चुनकर अपने ईबीसीए महादलित और मुसलमान मतदाता समर्थकों की जरूरत का ही ध्यान दे रहे हैं. नवादा जिले की रुखी पंचायत के पूर्व मुखिया आशुतोष सिंह कहते हैं, ‘‘जेडीयू ने हमें सिर्फ एक सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया है. यदि वह बीजेपी से नाता तोड़ता है तो हमारा वोट बीजेपी को जाएगा.’’

नीतीश का मजबूती से विरोध करने वाले कुछ अन्य ताकतवर समूह भी हैं. ठेके पर रखे गए लगभग 2,50,000 स्कूल टीचर उनसे इसलिए नाराज हैं कि वे नियमित शिक्षकों के बराबर वेतन दिए जाने की उनकी मांग नहीं मान रहे हैं.

बीजेपी और जेडीयू की राहें जुदा होने पर बिहार के विभिन्न समुदायों के मतदान व्यवहार में बदलाव दिखेगा. फिर भी लगता है कि कुर्मी, ईबीसी और महादलित जेडीयू को वोट देंगे जबकि ऊंची जातियां बीजेपी का साथ देंगी. तब भी नीतीश को मुस्लिम वोटों के एक बड़े हिस्से के समर्थन की जरूरत होगी. उनके वोट के लिए उन्हें लालू से लडऩा होगा. जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक 2010 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले उपचुनावों में प्रदेश के लगभग 25 प्रतिशत मुसलमानों ने एनडीए को वोट दिया था. ये बचे हुए 75 प्रतिशत ही जेडीयू के संभावित मतदाता हो सकते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यदि मोदी के मुद्दे पर नीतीश एनडीए से अलग हो जाते हैं तो वे मुसलमानों के चहेते के रूप में उसी तरह उभरेंगे जैसे आडवाणी को गिरफ्तार करने के बाद लालू उभरे थे.’’    

बिहार की कुल आबादी में 16.53 प्रतिशत मुसलमान हैं और वहां की 40 लोकसभा सीटों में से आठ में उनके पास निर्णायक मत होना बताया जाता है. जिन जिलों में उनका अधिकतम चुनावी प्रभाव है उनमें अररिया, जहां वे आबादी का 41.14 प्रतिशत हैं, पूर्णिया (36.76 प्रतिशत), कटिहार (42.53 प्रतिशत) तथा किशनगंज  (67.58 प्रतिशत) हैं. अन्य सीटों पर उनका असर कुछ कम है. चुनावी सफलता पाने के लिए अगर नीतीश एक ही समुदाय पर अपना दांव लगाते हैं तो वे एक जोखिम ही लेंगे. इस जोखिम को वे कांग्रेस के साथ गठबंधन कर कम कर सकते हैं. कांग्रेस लगभग 10 प्रतिशत मत हासिल करती है और मुस्लिम वोटों को जोडऩे में भी मदद कर सकती है. दूसरी तरफ, इसके चलते उन्हें दोहरी सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि पटना में वे सत्ता में हैं और केंद्र में कांग्रेस. अगर कांग्रेस लालू और पासवान के साथ भी समझौता करती है तो नीतीश को अपने विरोधी एक मजबूत गठबंधन से भी जूझना होगा.

नीतीश की राह वाकई कठिन है. क्योंकि एक बहुकोणीय मुकाबले में वोटों का छोटा-सा झुकाव भी अप्रिय अचंभे खड़े कर सकता है. बिहार की राजनीति अब दिलचस्प मोड़ पर है.

-साथ में भावना विज़ अरोड़ा

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