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जम्मू और कश्मीर: घाटी में बढ़ा उबाल

जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की 'उग्रवादी पुनर्वास नीति’ रंग नहीं ला रही है. समर्पण करने वाले आतंकवादी की गिरफ्तारी पर उनके विरोध को भी चुनावी हथकंडे के तौर पर देखा गया है. तो क्या कश्मीर घाटी में अलगाववादी हिंसा का एक और ज्वार उठेगा?

उमर अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला
अपडेटेड 20 अप्रैल , 2013

उमर अब्दुल्ला गुस्से में हैं. जम्मू के अपने दफ्तर में बैठकर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की ब्लैक ऐंड व्हाइट तस्वीरों को गौर से देखते, उमर की पेशानी पर पड़ी सिलवटों को आप आसानी से चढ़ी हुई त्यौरी मानने की भूल कर सकते हैं. तस्वीरों में कैद इन चारों हस्तियों ने उस राज्य में अहम भूमिका निभाई है, जिसके वे मुख्यमंत्री हैं.

25 मार्च को प्रदेश विधानसभा में अपने अहम, लेकिन विवादास्पद भाषण में 43 वर्षीय मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर केंद्र सरकार को याद दिलाया कि 1947 में जम्मू-कश्मीर का विलय शर्तों से बंधा था और उसे भारतीय संघ में पूर्ण विलय नहीं माना जा सकता. सार्वजनिक रूप से उनका यह रुख उस स्टैंड से ज्यादा कड़ा माना जा सकता है जिसके लिए उनके दादा मरहूम शेख अब्दुल्ला को जेल हुई थी.

उन्होंने 2 अप्रैल को इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, '' मेरे गुस्से की वजह है.” इसके लिए उन्होंने संसद पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को 9 फरवरी को फांसी देने में केंद्र सरकार की जल्दबाजी और कश्मीर घाटी तथा जम्मू इलाके में अपेक्षाकृत हिंसामुक्त क्षेत्रों से सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को आंशिक रूप से हटाने पर भी विचार करने में केंद्र सरकार की जाहिर तौर पर आनाकानी की मिसाल दी.

लेकिन जुलाई, 2011 में एएफएसपीए हटाने की उनकी अपील आज के मुकाबले करीब-करीब विनम्र थी. आज तो वे ज्यादा गुस्से में, मुट्ठी उछाल-उछालकर विरोध कर रहे हैं और भारत सरकार पर कश्मीर के प्रति गहरे पूर्वाग्रह का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि वे राज्य में शांति के लिए खतरनाक हो सकने वाला एजेंडा अपनाने के केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैए और दोहरेपन से आहत हैं.https://smedia2.intoday.in/aajtak/images/stories/042013/omar--5_280-2_325_042013015348.jpg

तो क्या अपने स्वभाव के विपरीत उमर की इस नाराजगी के पीछे कोई खास मकसद है? बहुत से लोगों को लगता है कि 20 मार्च को दिल्ली पुलिस की हिज्बुल मुजाहिदीन के पूर्व उग्रवादी सैयद लियाकत शाह की गिरफ्तारी के मद्देनजर उनकी ताजा नाराजगी घाटी में सुलगते असंतोष को भुनाने के साथ-साथ दिल्ली की कठपुतली होने के ठप्पे से जान छुड़ाने की कोशिश भी है. उनके सार्वजनिक भाषणों में लगातार बढ़ती तल्खी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीपीपी) की मुखिया महबूबा मुफ्ती जैसे राजनैतिक विरोधियों के बयानों को मात दे रही है और उसमें करीब-करीब चरमपंथियों की आवाज की गूंज है.

यह आवाज पूरी घाटी में गूंज रही है. जम्मू से 300 किमी दूर उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में अब भी ऊंची पहाडिय़ों पर कुछ बर्फ बाकी है और यहां के दर्दपोरा इलाके में लियाकत शाह  की 45 वर्षीया बीवी अख्तर-उन-निसा जिलानी को किसी तरह चैन नहीं आता. वे कहती हैं,''मेरा तो मुकद्दर ही जला हुआ है.’’ 1995 में उनके पहले शौहर नूर हसन जिलानी को भी भारतीय सैनिकों ने गोली मार दी थी. वह हिज्बुल मुजाहिदीन का आतंकवादी था, अब दिल्ली पुलिस ने लियाकत को गिरफ्तार करके उस पर राजधानी में फिदायीन हमले की साजिश रचने का इल्जाम लगाया है.

अख्तर-उन-निसा ने बताया कि किस तरह उसने अपने शौहर को नवंबर, 2011 में घोषित आतंकवादी पुनर्वास नीति से फायदा उठाने के बारे में समझाया, ''हमें लग रहा था कि वादी में अमन कायम हो गया है.” जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक मकबूल बट्ट के पैतृक गांव त्रेहगाम से सिर्फ 5 किमी ऊपर दर्दपोरा में उनकी बहन के मकान के चारों ओर लगे चेरी तथा बादाम के पेड़ों पर सफेद और हल्की गुलाबी कलियां खिल रही थीं. पर शायद उनकी नजर इन फूलों पर नहीं पड़ती. उनकी थकी हुई आंखों में रह-रहकर आंसू भर आते हैं. उनका सवाल था, ''भला कौन आदमी हमले की साजिश रचते समय अपनी बीवी और बेटी को साथ लेकर आएगा?” इन शब्दों में मुख्यमंत्री की 25 मार्च की असेंबली की तकरीर की गूंज साफ सुनाई देती है.

असलियत से बेखबर नीतियां
श्रीनगर से 40 किमी उत्तर में क्रिरी गांव में भी इसी तरह की हताशा साफ दिखती है. दिसंबर, 1988 में 18 साल के सैयद बशीर अहमद ने कुपवाड़ा के उत्तर में नियंत्रण रेखा पार करने के लिए बर्फीला सफर इस उम्मीद में तय किया कि कश्मीर की आजादी के लिए जेकेएलएफ की जंग में बंदूक उठाएंगे. आतंकवादी बनने गए बशीर ने बताया, ''मुझे बंदूक चलाना नहीं सिखाया गया. सबसे पहले तो पहाड़ चढऩे में बर्फ से हाथ-पांव गल गए.” उसने जून, 2012 में हथियार डाले और मुजफ्फराबाद में 24 साल निर्वासन में बिताने के बाद जो कुछ देखा वह एक दुस्वप्न लगा. बशीर ने निराशा के साथ बताया, ''यहां सब बदल चुका है. न पहले वाले लोग हैं, न पहले वाला माहौल.” 10 310 फुट के टिन की चादरों वाले शेड में टपकते बरसात के पानी से बचते हुए, खुद को गर्म रखने की कोशिश में बशीर और उसकी 38 वर्षीया बीवी सफीना तथा पांच बच्चे एक-दूसरे में सिमटे जा रहे थे.

अन्य 'रिटर्नीज’ (वापस आए लोगों के लिए यही सरकारी शब्द है) की तरह, बशीर भी जिंदा रहने के लिए हाथ-पांव मार रहा है. उसने बताया कि वह अपने पिता की जमीन पर अपने हिस्से में जो मकान बना रहा था उसे गिराने में पुलिस ने उसी के छोटे भाई नजीर अहमद की मदद की. न कोई बचत और न कोई रोजगार. लाचार बशीर रोजाना स्कूलों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है कि किसी तरह उसके 18 साल के बेटे फैजान को दाखिला मिल जाए. उसका कहना है, ''कोई भी स्कूल चलेगा.”

इससे जाहिर है कि आतंकवादी रह चुके लोगों के पुनर्वास और उन्हें फिर से बसाने की उमर की महत्वाकांक्षी नीति काम नहीं कर रही है. उनका दावा है कि दिल्ली पुलिस के हाथों लियाकत शाह की गिरफ्तारी से यह योजना खतरे में पड़ गई है. विरासत और आजीविका के मुद्दों के अलावा रिटर्नीज के सामने एक और मुसीबत यह भी है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) या पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में जन्मे उनके बच्चों या नियंत्रण रेखा के पार जिन औरतों से उन्होंने शादी की, उन औरतों में से किसी के पास जम्मू-कश्मीर की नागरिकता नहीं है. उमर बड़े भरोसे के साथ जोर देकर कहते हैं, ''जो महिलाएं पीओके की हैं. वहां की रेजिडेंसी दिखा सकती हैं, वे भारत की नागरिक हैं.” इसके लिए वे भारत के नक्शों और संसद के प्रस्तावों का हवाला देते हैं जिनमें पीओके के भारत का इलाका होने का दावा है.

लेकिन जमीनी हकीकत एकदम अलग है. नेपाल के रास्ते लौटे 241 रिटर्नीज के साथ आई 704 महिलाओं और बच्चों में से एक के पास भी नागरिकता के सबूत के तौर पर कोई दस्तावेज नहीं है. हिज्बुल मुजाहिदीन के पुराने सदस्य नजीर अहमद शाह के साथ जून, 2012 में बारामूला लौटे 32 वर्षीय हम्जा जिलानी बताते हैं, ''काठमांडू में उतरते ही हमारा पासपोर्ट जब्त कर लिया गया.” पुनर्वास नीति पर अमल से जुड़े जम्मू-कश्मीर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना था कि इस बारे में कभी सोचा ही नहीं गया. उनका कहना है कि इस नीति में इस सच्चाई को अनदेखा किया गया है कि 20 साल पहले जो किशोर गए थे

वे जब लौटेंगे तो बीवियों के शौहर और बच्चों के बाप होंगे.

पुनर्वास या छलावा?

नईम अख्तर नाउम्मीद भी हैं और परेशान भी. उनकी नजर में अफजल गुरु की फांसी और लियाकत शाह की गिरफ्तारी, दोनों पर मुख्यमंत्री के तीखे बयान, ''अपनी हुकूमत की नाकामी को दिल्ली के खिलाफ  नारेबाजी की शक्ल देने की नाकाम कोशिश है.” 2005 में सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता बने अख्तर ने कहा, ''लगता है, उमर घाटी में असंतोष की नई लहर भड़काने पर उतारू हैं.” उन्हें लगता है कि मुख्यमंत्री का यह अडिय़ल रवैया सिर्फ पीडीपी जैसे दूसरे गुटों और अलगाववादियों को तेज आवाज और ज्यादा भड़कीले नारों के साथ इस शोर में शामिल होने के लिए उकसाएगा. उन्होंने यह भी कहा, ''उमर एएफएसपीए हटवाना चाहते हैं पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के हाथों हो रही हत्याओं और उत्पीडऩ का जिक्र नहीं करते.” पीपल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन, उमर की नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी दोनों पर इल्जाम लगाते हैं कि वे अलगाववादियों की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''कश्मीरी असली और नकली का फर्क समझ्ते हैं. झेलम में इतना खून बह चुका है कि ऐसी नौटंकी के लिए कोई जगह नहीं है.”

बडगाम जिले में सोईबुग में पाकिस्तान स्थित हिज्बुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाउद्दीन के पुश्तैनी मकान से बेहद करीब एक गमगीन बाप अपने बेटे की ताजा कब्र पर दुआ करता दिखाई दिया. 64 वर्षीय अब्दुल खालिक मीर ने पिछले 30 साल से जम्मू-कश्मीर में फैली कभी न खत्म होने वाली बदअमनी की आंधी में अपने दो जवान बेटे खोए हैं. मीर श्रीनगर में एचएमटी के घड़ी कारखाने में काम करते थे. उनका बड़ा बेटा 23 साल तक पीओके और पाकिस्तान में गुजारने के बाद पिछली अगस्त में लौटा और गांव के कब्रिस्तान में दफन हो गया. गर्व से भरे बाप की हैसियत से उन्होंने बताया, ''हफीजुल्ला बहादुर लड़का था.” उसके मुजफ्फराबाद पहुंचते ही आतंकी बनने का ख्वाब हवा होने लगा था. उसने पढ़ाई-लिखाई की और उसे इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास में मीडिया एनलिस्ट की नौकरी मिल गई. हफीजुल्ला अपनी जिंदगी के आखिरी सात साल कैंसर से लड़ता रहा और घर लौटने के बाद बकरीद से सिर्फ  चार दिन पहले 23 अक्तूबर, 2012 को मर गया. उसकी उम्र सिर्फ 35 साल थी.

अब्दुल खालिक अपने छोटे बेटे नजीबुल्ला मीर की मौत का भी शोक मना रहे हैं जिसे 16 मई, 2000 को सेना ने गोली मार दी थी. वे कोई विशेषज्ञ नहीं हैं लेकिन उन्हें डर है कि अफजल गुरु की फांसी उस चरमपंथी जज्बे को फिर भड़का देगी जो भारत या पाकिस्तान, किसी सरहद को नहीं पहचानती.

पूर्व आतंकी बोझ हैं
अपने छोटे से, लेकिन कुछ लोगों की नजरों में महंगे सजे हुए श्रीनगर के माइसूमा घर में जेकेएलएफ के मुखिया यासीन मलिक घर में नजरबंद हैं और हिफाजत से हैं. लेकिन 50 साल के मलिक अपने मैकिनटोश लैपटॉप और हाल में मिले आइफोन 5 के साथ बहुत खुश नजर आते हैं. पाकिस्तान में जमात-उद-दावा के मुखिया हाफिज सईद के साथ अपनी विवादित मुलाकात के बाद लौटे इस अलगाववादी नेता का कहना था कि अफजल गुरु की फांसी के बाद पैदा हुए हालात 1980 के दशक के शुरुआती दिनों की याद दिलाते हैं. मलिक, ज्यादातर कश्मीरी अलगाववादी नेताओं की तरह लियाकत शाह की गिरफ्तारी पर उमर की आपत्तियों को सिरे से खारिज करते हैं. सरकार की सरेंडर नीति के तहत घर लौटने की कोशिश कर रहे पुराने आतंकवादियों को वे गुजरा हुआ कल बताते हैं.

लेकिन उमर के गुस्से को नए साथी भी मिल रहे हैं. मार्च में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के भीतर भारतीय संविधान को सिरे से खारिज कर तहलका मचाने वाले निर्दलीय विधायक इंजीनियर राशिद का कहना है कि भारत में कश्मीर के विलय से इनकार करते समय उमर महज एक ऐतिहासिक सच्चाई बयान कर रहे थे. उन्होंने 3 अप्रैल को इंडिया टुडे से बातचीत में सवाल किया, ''जब वे एएफएसपीए हटवाने की मांग करते हैं तो आप उन्हें अलगाववादी क्यों कहते हैं? क्या सारे कश्मीरी यही नहीं चाहते?”

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