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आतंक के खिलाफ जंग: खुफिया तंत्र की खुल गई पोल

हैदराबाद में हाल के धमाकों से एक बार फिर साबित हुआ कि आइबी के नेतृत्व वाला हमारा खुफिया तंत्र आतंकियों को उनकी मर्जी के मुताबिक हमला करने से नहीं रोक सकता

अपडेटेड 12 मार्च , 2013

शनिवार, 23 फरवरी को राजधानी दिल्ली के 35, सरदार पटेल मार्ग पर स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुख्यालय में आला अधिकारी  84 इंच के टीवी स्क्रीन पर कुछ धुंधली तस्वीरें देख रहे थे. वे दो रोज पहले हैदराबाद विस्फोट स्थल की सीसीटीवी फुटेज में संदिग्धों की पहचान करने की कोशिश कर रहे थे. धमाकों में 16 लोगों की मौत हो गई और 156 लोग घायल हो गए.

अधिकारियों ने साइकिल पर सवार एक व्यक्ति की तस्वीर को ध्यान से देखा. उसकी साइकिल के कैरियर पर एक डिब्बा रखा हुआ था. एक अधिकारी बोला, ‘‘यही है वह. इसी ने बम रखा है.’’ उस व्यक्ति की तुलना इंडियन मुजाहिदीन के प्रमुख 30 साल के यासीन भटकल की बड़ी-सी तस्वीर से करते हुए दूसरे अधिकारी ने कहा, ‘‘वह यासीन भटकल जैसा दिख रहा है.’’ लेकिन तभी तीसरे अधिकारी ने सारे उत्साह पर यह कहते हुए पानी फेर दिया, ‘‘स्क्रीन पर दिख रही साइकिल में घंटी लगी है जबकि धमाके में इस्तेमाल की गई साइकिल बगैर घंटी की थी.’’

यह फुटेज उन 60 घंटों की रिकॉर्डिंग का हिस्सा थी जो जांचकर्ताओं को आतंकियों का निशाना बने दिलसुखनगर क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरों से मिली थी. धुंधले से ही एक अन्य शॉट में एक साइकिल के नजदीक तीन संदिग्ध लोग दिख रहे थे. इन फुटेज की जांच आंध्र प्रदेश पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) भी कर रही है. लेकिन ज्यादातर फुटेज बेहद धुंधले हैं.Hyderabad Blast

आइबी आतंकी हमलों को रोकने में नाकाम रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पास ऐसी कोई ठोस जानकारी नहीं होती जिसके बल पर कोई कदम उठाया जाए, और फिर वह जांचकर्ताओं को खुफिया जानकारी समझने में भी नाकाम रहता है. वह भी इस तथ्य के बावजूद कि आइबी के मल्टी एजेंसी सेंटर (एमएसी) में विभिन्न एजेंसियों और राज्यों से मिलने वाली जानकारी जमा होती है. एमएसी से उम्मीद की जाती है कि वह संबंधित राज्यों को ‘अलर्ट’ के रूप में जानकारी उपलब्ध कराएगा. यह जानकारी शायद कभी सटीक होती है.

आपसी लड़ाई में उलझे
26/11 को मुंबई में हुए हमले के बाद तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने एमएसी का गठन किया था. उन्होंने नेशनल काउंटर टेरेरिज्म सेंटर (एनसीटीसी) और नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नैटग्रिड) बनाने की भी कोशिश की थी ताकि देश की अलग-अलग डाटाबेस से प्राप्त जानकारी को एक जगह इकट्ठा किया जा सके. लेकिन एनसीटीसी अब केंद्र और राज्यों के बीच की लड़ाई में फंस गया है. दरअसल, आइबी स्वतंत्र एनसीटीसी नहीं चाहता है जबकि राज्य नहीं चाहते कि एनसीटीसी आइबी के अंतर्गत काम करे. वहीं, लालफीताशाही के कारण नैटग्रिड ने तो अब तक काम करना भी शुरू नहीं किया है.

अमेरिका 9/11 (2001) को अपने यहां हुए हमले और ब्रिटेन 7/7 (2005) के बाद सभी बड़े हमलों को रोक पाने में सफल रहे हैं, वहीं भारत का बुरी तरह से बिखरा हुआ खुफिया तंत्र अब तक आपस में जूझ रहा है. अमेरिका ने न केवल फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआइ) को और मजबूत बनाया है, बल्कि आतंक से एकजुट होकर निबटने के लिए उसने एनसीटीसी का गठन भी किया है. एफबीआइ भारत के आइबी और सीबीआइ के मेल की तरह है.

आइबी की अपनी समस्याएं भी कम नहीं हैं. उसके पास जमीनी स्तर पर काम करने के लिए काफी कम लोग (ऑपरेटिव) हैं. जो लोग आइबी के लिए काम कर रहे हैं, उनके पास भी सूचनाओं को समझने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और तकनीकों का अभाव है. एजेंसी राज्यों को जितने भी अलर्ट जारी करती है, किसी से भी स्थान या समय विशेष की जानकारी नहीं मिल पाती है. ऐसे में ये सभी अलर्ट ‘कार्रवाई योग्य नहीं’ की श्रेणी में आ जाते हैं. उस पर, राज्यों की पुलिस आइबी के इन अलर्ट को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती क्योंकि उन्हें हर दिन इस तरह के लगभग 250 अलर्ट मिलते हैं.

कोलकाता के शेक्सपियर सरणी पुलिस थाने के पास इसकी कोई सफाई मौजूद नहीं है कि दिसंबर 2009 में चोरी के एक मामले में गिरफ्तार किए गए यासीन भटकल को आखिर उसने क्यों छोड़ दिया. यासीन पुलिस को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हो गया कि वह ‘नंबर 9 नॉर्थ रेंज, कोलकाता-17’ के निवासी कार्तिक मल्लिक का बेटा बुल्ला मल्लिक है. और पुलिस ने उस पर विश्वास भी कर लिया क्योंकि उनके पास भारत के इस मोस्ट वांटेड आतंकवादी और हैदराबाद में अगस्त 2007 में हुए बम धमाकों तथा सितंबर 2008 बम धमाकों के मुख्य आरोपी की कोई तस्वीर मौजूद नहीं थी. ऐसा इसलिए क्योंकि आइबी ने यासीन और आइएम के सह-संस्थापक इकबाल और रियाज भटकल की तस्वीरों को सिर्फ उन्हीं खुफिया एजेंसियों के साथ साझ किया था,  जो एमएसी का हिस्सा हैं. आदर्श स्थिति तो यह होती कि आइबी इन तस्वीरों को एमएसी की राज्य इकाइयों के साथ साझ करता, फिर ये इकाइयां तस्वीरों को जिला और स्थानीय पुलिस थानों तक पहुंचातीं. लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जो खुफिया चेन में दरार की तरह है. देश में 2007 के बाद से हुए आतंकी हमलों के पीछे भटकल बंधुओं का ही हाथ रहा है लेकिन वे अब भी आइबी की पहुंच से बहुत दूर हैं.

आइएम की जड़ भारत में ही है, इसका गठन यहीं हुआ है और पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से इसका संबंध बहुत ज्यादा नहीं है. आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आइएम को आइएसआइ से पैसा मिलता है. भारत में सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद उसके कई कार्यकर्ताओं को आइएम ने अपने साथ शामिल कर लिया. ऐसा माना जाता है कि आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए आइएम स्थानीय और एक सदस्यीय स्लीपर सेल का इस्तेमाल करता है. आइबी का कहना है कि इस संगठन में सेंध मारना उसके लिए मुश्किल है क्योंकि इसमें अकेले लोग काम को अंजाम देते हैं और फिर से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं.hyderabad blast

कोशिश में कमी
आइबी को तब भी यासीन के बारे में कोई खबर नहीं थी जब वह दिल्ली में रह रहा था. वह दक्षिण दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में 2008 और फिर 2011 में रहा था. 2008 में उसके साथ यहां पर रियाज और इकबाल भी रहे थे. फरवरी 2010 में पुणे में धमाके और मुंबई में जुलाई 2011 में सीरियल ब्लास्ट सहित अन्य शहरों को दहलाने के बाद 2011 के अंत में यासीन फिर से दिल्ली आकर रहा था.

फील्ड ऑपरेटिव के रूप में काम कर चुके आइबी के पूर्व डायरेक्टर अजित कुमार डोभाल कहते हैं कि ‘खतरे से भिडऩे’ के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. डोभाल के मुताबिक, सुराग अब भी मिलते हैं लेकिन उन्हें उनके तार्किक अंत तक पहुंचाने के लिए प्रयास करने की जरूरत है. नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर बनाने की जोरदार पैरवी करने वाले डोभाल के मुताबिक, ‘‘चूंकि ऑपरेटिव झटपट हल चाहते हैं, लिहाजा सूचनाएं इकट्ठी करने का काम सुस्त पड़ गया है.’’

इंटरनेट पर नजर रखना और फोन टैप करवाना सूचना इकट्ठा करने का प्रमुख स्रोत बन गया है. लेकिन विश्वसनीयता के मामले में ये सूत्रों से मिली जानकारी की बराबरी नहीं कर सकते. व्यक्ति से खोद-खोदकर मनचाही जानकारी प्राप्त  की जा सकती है ताकि उसे कार्रवाई करने योग्य सूचना में तब्दील किया जा सके. जबकि फोन टैप के जरिए हासिल की गई सूचना से अतिरिक्त जानकारी नहीं मिल पाती. यही वजह है कि ‘अलर्ट’ दिन-ब-दिन और भी अस्पष्ट होते जा रहे हैं. दोभाल कहते हैं, ‘‘एक सक्षम नेतृत्व की जरूरत है, जो अपने लोगों को प्रोत्साहित कर सके. काम के तरीके और रणनीति को बदलने की भी जरूरत है क्योंकि वर्तमान प्रणाली हमारे काम नहीं आ रही है.’’

नई तकनीकों की जरूरत
सितंबर 2011 में एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए तत्कालीन आइबी प्रमुख नेहचल संधु ने यह स्वीकार किया था कि पुलिस तंत्र इतना तेज और चुस्त नहीं है कि आतंकवादियों के मुकाबले अपनी चालों और रणनीतियों को बदल सके. उन्होंने कहा, ‘‘आतंकवादी छोटे-छोटे समूहों में काम करते हैं. इसलिए हो सकता है कि हमें अपनी पुरानी तकनीकों को छोड़कर उनकी जगह नई तकनीकें अपनानी पड़ें.’’hyderabad blast

लेकिन एक ओर जहां आइबी तकनीक पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होता जा रहा है, वहीं वह अब भी तकनीक के मामले में आतंकवादियों से पीछे है. जब खुफिया एजेंसियों ने आतंवादियों की मोबाइल फोन पर बातचीत सुननी शुरू की थी, तब तक आतंकवादी सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल करने लगे थे. 26/11 हमले के बाद तत्कालीन रॉ प्रमुख बी.के. चतुर्वेदी ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि थुराया सैटेलाइट फोन की निगरानी से उन्हें आतंकियों के आकाओं के ठिकाने की जानकारी मिली थी जिसे उन्होंने साझ किया था. इसके बाद आतंकवादियों ने रातोरात 10 डॉलर में उपलब्ध लोकेशन स्पूफिंग एप्लिकेशन (लोकेशन को गुप्त रखने वाली एप्लिकेशन) का इस्तेमाल शुरू कर दिया था. जिससे खुफिया एजेंसियों का सूचना एकत्र करने का यह जरिया भी बंद हो गया. अब आतंकवादी संगठन नए इनमारसैट सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं. ये फोन वायस को जटिल एनक्रिप्शन में बदल देते हैं.

मानव संसाधन की भारी कमी
आइबी में लगभग 25,000 लोग काम करते हैं. यह संख्या आइबी के लिए मंजूर मानव संसाधनों के आंकड़े से लगभग 10,000 कम है. सबसे ज्यादा कमी ग्रेड 2 स्तर के अधिकारियों की है-ये फील्ड ऑपरेटिव होते हैं जिन्हें एजेंसी की रीढ़ की हड्डी माना जाता है. आइबी के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘‘ग्रेड 2 पद के लिए आवेदन करने वाले युवा महज सुरक्षित सरकारी नौकरी चाहते हैं. उनका प्रयास यह होता है कि उन्हें सुरक्षित और आरामदायक असाइनमेंट मिले.’’

यहां तक कि आला स्तर के अधिकारी भी डेपुटेशन पर आइबी में नहीं आना चाहते. अधिकारी कभी आइबी में नियुक्ति को अपने करियर के लिए अच्छा मानते थे लेकिन इस प्रमुख जांच एजेंसी में कोई जाना नहीं चाहता और उसमें नियुक्ति मानो जबरन होती है. राज्यों के पुलिस बल में पदोन्नति जल्दी होती है और पैसा भी बढ़ता है. वक्त बदलने के साथ ही आइबी के ऑपरेटिव की ट्रेनिंग में भी कई बदलावों की जरूरत है क्योंकि पिछले कई दशकों से इसकी प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आया है.

आइबी के नए डायरेक्टर सैयद आसिफ इब्राहिम क्या कोई बदलाव ला पाएंगे? आइबी के 125 साल के इतिहास में 1977 बैच के आइपीएस अधिकारी इब्राहिम इसके पहले मुस्लिम प्रमुख हैं. लेकिन दशकों तक खुफिया विभाग में रह चुके अधिकारियों को संदेह है कि आइबी खासकर विपक्ष के नेताओं की खुफिया जानकारी निकालने के अपने काम से छुटकारा पा सकेगा. यूपीए सरकार के लिए राष्ट्र की सुरक्षा प्राथमिकता की सूची में नहीं आती.

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