रक्षा मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय समिति ने थल सेना के लिए 2,995 करोड़ रु. में खरीदे जा रहे 197 हेलिकॉप्टरों में परीक्षण उड़ानों के दौरान खामियां पाई हैं. आर्टिलरी स्कूल के पूर्व कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल गुरदीप सिंह की अध्यक्षता वाली इस समिति ने पिछले साल सितंबर में रक्षा मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट दी थी. समिति ने इस प्रोजेक्ट के लिए फिर से टेंडर मंगाने की सिफारिश की है. पांच साल में दूसरी बार इस ठेके की यह गति हुई है.
भारत को हिमालय की चोटियों पर करीब 3,000 सैनिकों के अपने बेड़े को कायम रखने के लिए सेना के एविएशन पाइलटों द्वारा उड़ाए जाने वाले ये हल्के हेलिकॉप्टर बहुत मायने रखते हैं. इन सैनिकों को करीब 20,000 फुट की ऊंचाई पर सालतोरो चोटी के समानांतर बनी चौकियों पर तैनात किया गया है. 1984 से ही भारतीय सैनिकों से आबाद यह चोटी दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि है.
सेना के बेड़े में मौजूद 1970 के दशक के पुराने चीता हेलिकॉप्टरों से सैनिकों को गोला-बारूद, रसद और ठंड से बचने के लिए ईंधन की आपूर्ति की जाती है. सेना एक दशक से भी ज्यादा समय से इन पुराने हेलिकॉप्टरों को हटाने के लिए जूझ रही है. लेकिन इनको बदलने में अब और देर होगी क्योंकि समिति की रिपोर्ट में 2010 में हुए यूरोकॉप्टर और कामोव 226 हेलिकॉप्टरों के परीक्षण पर सवाल उठाए गए हैं. यूरोकॉप्टर की निर्माता यूरोपियन एयरोनॉटिक डीफेंस ऐंड स्पेस (ईएडीएस) है, जबकि कामोव 226 रूस का प्रोडक्ट है. सेना के सूत्रों का कहना है कि दोनों हेलिकॉप्टर तकनीकी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं. सेना चाहती थी कि ये हेलिकॉप्टर एक पाइलट और एक को-पाइलट के साथ दो घायल सैनिकों को स्ट्रेचर पर रखकर ले जाने में सक्षम हों.
बठिंडा में 2010 में किए गए फील्ड परीक्षण में सेना के एक जनरल ने गौर किया कि यूरोकॉप्टर में तो स्ट्रेचर पर लिटाए गए सैनिक को अच्छी तरह से रखा ही नहीं जा सकता. हेलिकॉप्टर के दरवाजे बंद करने के लिए सैनिक के पैर 70 डिग्री तक मोडऩे पड़ते हैं. बताया जाता है कि यूरोकॉप्टर बनाने वाली कंपनी इस पर सहमत हो गई थी कि वह स्ट्रेचर को हेलिकॉप्टर के अंदर सही से रखने के लिए 'उभरा हुआ’ दरवाजा लगा देगी. लेकिन यह टेंडर की शर्तों का उल्लंघन होता क्योंकि उसके मुताबिक उत्पाद में बाद में किसी तरह की तब्दीली नहीं की जा सकती. रिपोर्ट में इस जनरल की आपत्तियों को भी शामिल किया गया है. इसके बाद सेना ने एक तकनीकी निरीक्षण समिति गठित की. खबर है कि इस समिति ने 'उभरे हुए दरवाजे’ वाले फ्रांस के हेलिकॉप्टर को मंजूरी दे दी थी.
सूत्रों के मुताबिक, सेना ने रक्षा मंत्रालय में 2011 में जो परीक्षण रिपोर्ट जमा की उसमें कई स्वीकार न किए जा सकने लायक खामियां थीं. दोनों हेलिकॉप्टरों के इंजन सेना की जरूरतों के मुताबिक ही एक 'अंतरराष्ट्रीय एक्रिडिटेशन सर्टिफाइंग अथॉरिटी’ द्वारा प्रमाणित थे. लेकिन कामोव हेलिकॉप्टर में परीक्षण के सिर्फ नौ माह पहले ही दो फ्रांसीसी इंजन लगाए गए थे (किसी इंजन को प्रमाणित करने में कम-से-कम दो साल लगते हैं). उधर, यूरोकॉप्टर अधिक ऊंचाई वाले कुछ अभियानों पर नहीं जा सका.
रक्षा मंत्रालय में आई अनाम शिकायतों की बाढ़ से कांट्रैक्ट में इन खामियों पर विशेष ध्यान गया और इससे मंत्रालय की बेचैनी और बढ़ गई. खामियां इतनी ज्यादा थीं कि इस ठेके को अगले चरण में नहीं बढऩे दिया गया. रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की कि यह सौदा अब मृतप्राय हो गया है. उन्होंने कहा, ''यह सौदा इतना विवादास्पद है कि कोई भी इसे छूना नहीं चाहता.” इसे ठंडे बस्ते में सिर्फ इस वजह से डाला गया है क्योंकि इसे रद्द करने से यह संकेत जाता कि रक्षा मंत्रालय में कुछ गड़बड़ है. इससे सैन्य अभियानों के लिए महत्वपूर्ण साधनों के चयन में सेना की अयोग्यता उजागर हो जाती है.
सेना के 120 चीता हेलिकॉप्टरों के बेड़े के ज्यादातर हेलिकॉप्टर 4,500 घंटे के उडान समय और 1,750 घंटे की इंजन लाइफ के संरचनात्मक उपयोगिता स्तर को पार कर चुके हैं. 2006 से अब तक 11 चीता हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुए जिनमें सेना के नौ पाइलट मारे गए. पिछली ऐसी दुर्घटना मई, 2012 में हुई थी जब सियाचिन ग्लेशियर की 19,000 फुट की ऊंचाई पर सामान उतारने के बाद एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और मेजर चंद्रशेखर सिंह की जान चली गई थी. चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों के लिए 1970 के दशक के अंत में फ्रांस से उत्पादन लाइसेंस हासिल करने वाली सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लि. (एचएएल) का कहना है कि पुर्जों की कमी की वजह से इन पुराने हेलिकॉप्टर की सर्विसिंग में दिनोदिन मुश्किल होती जा रही है.
सेना का कहना है कि उसके पास इन पुरानी मशीनों के सहारे रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि वह तय समय के भीतर इनके विकल्प खरीदने में असमर्थ है. लेकिन रिपोर्ट से पता चलता है, आर्मी एविएशन कोर द्वारा चलाई जाने वाली खरीद प्रक्रिया विवादों में घिर गई है.
बदलने की कोई व्यवस्था न होते देख सेना ने अंतरिम उपाय के तौर पर एचएएल द्वारा ही बनाए गए चीतल हेलिकॉप्टरों का सहारा लेने का सोचा है. असल में चीता हेलिकॉप्टरों को ही शक्तिशाली टर्बोमेक्का इंजनों के साथ नया रूप देकर चीतल में बदल दिया गया है. भारतीय वायु सेना ने 19 चीतल हेलिकॉप्टरों को खरीदने के 189 करोड़ रु. के सौदे पर 2007 में हस्ताक्षर किए थे. अब उसे ये हेलिकॉप्टर मिलने शुरू हो गए हैं. एचएएल के सीएमडी अशोक बवेजा ने बताया, ''थल सेना को तो पांच साल पहले ही चीतल देने की पेशकश की गई थी, लेकिन वे विदेशी विकल्प लेने के इच्छुक दिख रहे थे.” अब थल सेना भी बेमन से वायु सेना के रास्ते पर जा रही है.
दिसंबर, 2012 में सुरक्षा मामलों की मंत्रि-मंडलीय समिति ने 334.70 करोड़ रु. की लागत से 20 चीतल हेलिकॉप्टरों की खरीद को मंजूरी दी थी. लेकिन थल सेना आखिर कब तक 1950 के दशक के हेलिकॉप्टर के सुधरे हुए मॉडल पर निर्भर रह सकती है. क्या इतने महत्वपूर्ण अभियानों के लिए यह स्वीकार किया जा सकता है?

