नए साल की उस रात जब सारा शहर मौज-मस्ती में डूबने को तैयार था, अजय के पिता ने उसे नोएडा सेक्टर 62 के ठेके से देसी शराब लेने भेजा. अजय अपने फूफा की मोटर साइकल खड़ी कर, देसी पव्वा खरीद ही रहा था, तभी पुलिस ने छापा मारा. दो घंटे बाद अजय ने खुद को हवालात में पाया और तब जाकर उसकी समझ में आया कि वह मोटरसाइकल चुराने के जुर्म में गिरफ्तार हो चुका है.
जब तक उसके घरवाले हवालात की खिड़की खुलवाने की जुगत करते, तब तक वह जेल के दरवाजे तक पहुंच चुका था. अगले हफ्ते उसकी सगाई थी जो कुछ ही घंटों में टूट गई. 13 साल से वह अदालत में तारीख पर हाजरी दे रहा है और यह नहीं समझ पा रहा कि सहस्राब्दी बदलने वाली 31 दिसंबर, 1999 की रात में आखिर उसने ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे ऐसी सजा मिली.
टैक्सी चलाने वाला 31 साल का अजय अकेला नहीं है. उसके जैसे एक लाख से ज्यादा लोग दिल्ली-एनसीआर की सबसे बड़ी खोड़ा कॉलोनी में रहते हैं. वे ड्राइवर हैं, प्लंबर हैं, गार्ड हैं, फेरी वाले हैं, मध्यवर्गीय घरों में काम करने वाले नौकर हैं, नोएडा और दिल्ली की एक्सपोर्ट कंपनियों में काम करने वाले कारीगर हैं और उनमें से कई सरकारी नौकर भी हैं. यानी यहां वे सब लोग रहते हैं जिनके बिना आपकी जिंदगी नहीं चल सकती, लेकिन आप चलकर उनकी बस्ती तक नहीं जा पाते.
आप ही क्या, सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल, पीने के पानी का नल, स्ट्रीट लाइट का बल्ब या बैंक का एटीएम भी इस कॉलोनी में कभी नहीं गया. इतनी बड़ी कॉलोनी में सिर्फ मुख्य सड़क ही पक्की है. लेकिन जब 16 दिसंबर की रात दिल्ली में एक चलती बस में गैंग रेप हुआ और सभी छह आरोपियों का पता किसी न किसी झुग्गी बस्ती का निकला तो खुद पर इतराते मध्यम वर्ग को अपने पड़ोस में बसे उस नारकीय जीवन की ओर पलट कर देखना ही पड़ा, जहां किशोर इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने की बजाए मैकेनिक, ड्राइवर या दिहाड़ी मजदूर बनने से ऊपर की बात सोच भी नहीं सकते. अगर वे यह भी नहीं बन सके औैर फिसल गए, तो अपराध की दुनिया का दरवाजा रात-दिन उनके लिए खुला है.
एक कमरा और पांच आदमी का परिवार
एक तरफ नोएडा सेक्टर 62 और 63, दूसरी तरफ मयूर विहार, एनएच 24 के उस तरफ इंदिरापुरम के पॉश इलाके और पीछे गाजीपुर का सड़ांध मारता कूड़े का ऊंचा पहाड़, इनके बीच में है खोड़ा कॉलोनी. ऊपर मंडराती हैं हजारों चीलें. खोड़ा की कच्ची गलियों में आपके घुसने से पहले गाजीपुर से उठने वाली दुर्गंध आपके फेफड़ों में घुस जाती है. यहीं रहते हैं पवन कुमार.
20 साल के पवन 8 गुणा 8 फुट के एक कमरे वाले घर में अपने माता-पिता, 17 और 9 साल की दो बहनों के साथ रहते हैं. इस अंधेरे-से कमरे में एक डबल बेड, ओढऩे-बिछाने के ढेर सारे कपड़े, एलजी का पोर्टेबल टेलिविजन और शीशे के सामने ढेर सारी नेलपॉलिश रखी हैं. ये नेलपॉलिश उनकी छोटी बहन का सौंदर्य प्रसाधन हैं. पवन की मां पार्वती समझ गईं कि एक कमरे में इतने लोग, यही सवाल आने वाला है.
पार्वती ने कहा, ''हम चार लोग पलंग पर सोते हैं और इनके पिता जमीन पर बिस्तर लगाते हैं. कौन रहना चाहता है यहां. लेकिन पैसा ही नहीं है. पवन को पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन ये पढ़ा ही नहीं. '' पवन अब पानी के टैंकर वाला ट्रैक्टर चलाते हैं. सुबह पांच बजे से काम पर लग जाते हैं और कॉलोनी में 2 रु. में एक बाल्टी पानी बेचते हैं. इस तरह महीने में 5,000 रु. कमा लेते हैं. पिता एक्सपोर्ट हाउस में काम करके करीब 10,000 रु. कमा लेते हैं. बहन सविता 11वीं में पढ़ रही हैं, कंप्यूटर का भी कोर्स कर रखा है. परिवार को उम्मीद है कि शायद सविता परिवार की पहली ऐसी सदस्य बने जो साहब लोगों की तरह काम कर सके.
यह क्लास का फर्क है
मलिन बस्ती की दुनिया ऐसी ही है. ये बस्तियां आपस में बहुत दूर हो सकती हैं, लेकिन इनका चरित्र एक-सा रहता है. दिल्ली गैंग रेप के दो आरोपी राम सिंह और उसका भाई मुकेश आर.के. पुरम के जिस रविदास कैंप में रहते थे, वहां से बमुश्किल 3 किमी दूर अमीरों की रिहाइश वसंत विहार से सटी है कुसुमपुर पहाड़ी, जिसकी गोद में पैबस्त है एक झुग्गी. दिल्ली की दूसरी दरारों की तरह यहां भी ख्वाहिशों और अंदेशों की हवा चलती है.
सुबह की हवा कुछ सुस्त है. ईंट के कच्चे मकानों और संकरी गलियों की भूलभुलैया को बीच से काटते रास्ते के दोनों किनारों पर कसाई, परचून और सब्जी की दुकानें लगी हैं. खेल के एक मैदान के ठीक सामने वाली गली इस रिहाइश में अलग से दिख रहे चमकदार गुलाबी दोमंजिला मकान तक ले जाती है, जिसके टेरेस पर कपड़े सूख रहे हैं. मकान मालिक 42 वर्षीय राजेश कुमार बताते हैं कि वे तीस साल पहले हरियाणा से कुसुमपुर पहाड़ी आए थे. एक कमरे के टप्पर में तब वे अपने माता-पिता और दो भाइयों के साथ रहते थे, जब उन्होंने वसंत विहार और वसंत कुंज के इलाकों में घरेलू सेवाएं देनी शुरू कीं. रह-रहकर लगातार बजते दो मोबाइलों के बीच वे बताते हैं कि आज उनके पास 250 कर्मचारी हैं.
इस कॉलोनी में 15,000 मकान हैं और रहने वाले एक लाख लोग, जिन्हें अपनी तरक्की पर नाज है. इन्होंने प्रवासियों के आधार पर कॉलोनी को अलग-अलग ब्लॉक में बांटा हुआ है. 'ए' ब्लॉक हरियाणा, 'बी' ब्लॉक उत्तर प्रदेश और 'सी' ब्लॉक राजस्थान से आए हुए लोगों के लिए है. ज्यादातर के पास टीवी, वॉशिंग मशीन आदि हैं. लोग फेसबुक भी इस्तेमाल करते हैं. पढ़ाई-लिखाई की यहां दिक्कत नहीं है. मेन रोड पर बड़े मकानों और फैंसी कारों के बीच बसने का सपना यहां लगातार हिलोरें मारता है. लोग बहुत अच्छे से नहीं, तो बहुत बुरे में भी नहीं जी रहे.
अधिकतर लोगों में हालांकि बहुत गहरे एक डर जरूर समाया है. चाहे जिस भी वजह से, लेकिन इनकी डिग्रियां अमीरों जितनी चमकदार नहीं हैं, इसलिए बगैर सिफारिश के इन्हें नौकरी नहीं मिल सकती. सरकार को इन लोगों के होने पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई थी कि 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान उसने समूची कॉलोनी को होर्डिंगों से ढक दिया था.
खदेड़े जाने का डर
अब लोगों को हटा दिए जाने का डर है. कॉलोनी में परचून की दुकान चलाने वाले नौजवान विजय दलाल कहते हैं, ''आर.के. पुरम के उन लड़कों ने (बलात्कार के आरोपी) पूरे इलाके को बदनाम कर दिया. लोग अब हमें यहां नहीं देखना चाहते. हो सकता है, किसी सुबह आंख खुले तो बुलडोजर हमारे स्वागत में खड़ा हो. हमें हटाना इतना आसान नहीं है. आजकल अपनी रोटी बचाने के लिए लोग मरने-मारने को भी तैयार हैं. हम नहीं चाहते कि हमें बाहर ले जाकर फेंक दिया जाए. ''
अखबारों में खबर आई थी कि 2015 तक दिल्ली से सारी झुग्गियां हटा दी जाएंगी. इन लोगों ने वह खबर पढ़ी है, कि कुसुमपुर पहाड़ी के लोगों को बसों में भरकर उन जगहों पर पहुंचा दिया जाएगा जहां यह शहर हमेशा से परित्यक्तों को फेंकता रहा है. बवाना के रास्ते में दिल्ली मेट्रो का आखिरी पड़ाव रिठाला है, जहां से नए बनते मॉल और सरसों के खेत शुरू हो जाते हैं. शहरी चकाचौंध और ग्रामीण सुंदरता के इस मिश्रित नजारे के बाद आती हैं गड्ढों के बीच बमुश्किल सड़कें और उनके किनारे 'फ्रेश ऐंड लवली क्रीम' या 'टोनी डिस्कमैन्स' जैसे फर्जी नामों वाले सामान बेचते छिटपुट बाजार.
कंक्रीट की सड़क तक ले जाते सर्पीले रास्तों के बीचोबीच बसा ब्लॉक 'जी' एक नजर में पर्याप्त बड़ा दिखता है. ईंट के सादे मकानों की दो कतारें हैं और बीच में परचून, बिल्डर और सब्जीवाले की दुकान भी. पेड़ भी हैं. एक पार्क है जहां लोग अलग-अलग झुंड में बैठे पत्ते खेल रहे हैं. यहां बिजली के मीटर भी लगे हैं. टीवी की तेज आवाज आ रही है. एक टेरेस से डीटीएच डिश लटक रहा है और एक नाई ने हवा में अभी-अभी कटे बालों पर लतीफा उछाला है.
मुहल्ले के नल पर बतियाती कुछ औरतें कपड़े धो रही हैं. यहां अधिकतर निचली जाति के हिंदू हैं, लेकिन हर जाति-धर्म के लोग आपको मिल जाएंगे. माथे पर तिलक लगाए और मुस्लिम टोपी पहने लोग. सरकार ने जिस जमीन पर स्कूल, सामुदायिक केंद्र और श्मशान बनाने का वादा किया था, वहां कुकुरमुत्तों की तरह झुग्गियां उग आई हैं. इनके बीच पहुंचते ही एक उदास-सी तस्वीर से आपका सामना होता है.
करीब सत्तर पार की चंपा देवी छह साल पहले यहां आई थीं. बुनकर परिवार से हैं, पहले अशोक विहार में काम किया करती थीं और फिलहाल शर्ट की बांह सिल रही हैं. वे कहती हैं, ''तुम्हारा कपड़ा मेरा सिला हुआ है. '' चंपा देवी से वादा किया गया था कि यहां उन्हें घर मिलेगा, पोते-पोतियों को स्कूल, इलाज की सुविधा और पुलिस का पहरा.
इन बुनियादी सुविधाओं के लिए उन्होंने अपनी रोजी-रोटी के नियमित साधन से समझौता कर लिया. नतीजा? उनके पास सिर्फ कागज हैं—पांच या सात साल के पट्टे पर 18 वर्ग मीटर का प्लॉट लेने के लिए सारे जरूरी कागजात, दिल्ली सरकार का कार्ड, एक राशन कार्ड और उनकी भाषा में एक 'वी.पी. सिंह कार्ड', क्योंकि यह तब मिला था जब वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री थे.
श्मशान के लिए तय जमीन पर उगे टप्परों के समुंदर में एस्बेस्टस और पॉलीथीन के बेतरतीब जोड़ का नतीजा है एक सन्नाटा, जिसे वे अपना घर कहती हैं. कुछ महीने पहले उनके पति गुजर चुके हैं. उनके पैर में चोट आ गई थी. वे कहती हैं कि 10 किमी दूर पूठ कलां में सरकारी डॉक्टरों ने उन पर ध्यान नहीं दिया. निजी अस्पताल में इलाज कराने को पैसे नहीं थे. जहर फैला, तो आज कुछ यूं निकल रहा है, ''अब शायद हम ठीक जगह पर हैं. हमें श्मशान में मरने के लिए ही तो भेजा गया है. '' इन मायूस शब्दों में इस बस्ती के जीवन की विडंबना खुद उजागर हो जाती है.
मौत के नुस्खे हजार
बवाना में मरने के सौ तरीके हैं. यह बस्ती तकरीबन रोज मर ही रही है. बमुश्किल कोई घर होगा जहां से पिछले कुछ दिनों में जनाजा न उठा हो. अशोक विहार की ही बुनकर 60 पार की अंगूरी देवी का बेटा गैस्ट्रोएंट्राइटिस से चला गया. दो हिस्सों में बंटे उनके आशियाने में आज एक चारपाई खाली है. एक हिस्से में चूल्हा और खाट है. दूसरे में एक खाट और खाली डिब्बे हैं, जिनमें फिलहाल दो जून की रोटी का एक अंगूरी सपना भरा है. हाथ से दिखाते हुए वे कहती हैं, ''ये रहा मेरा ड्रॉइंगरूम, और बेडरूम भीतर है. ''
कुछ सांप के काटे से मर गए, कुछ बिजली के झ्टके से. हारी-बीमारी आम बात है. पास में एक नहर भी है जो कभी-कभार हमेशा के लिए खींच ले जाती है. विषाद की इसी जमीन पर गुस्से, पस्तहिम्मती और जरायम की फसल पनपती है. उजली दाढ़ी वाले साठ पार के उमेश सिंह से यहां की बदनामी की बातें पूछिए, तो वे बगलें झांकते हैं. वे बवाना संघर्ष समिति के लीडर हैं जिन्हें लोग 'नेताजी' कहते हैं. दूसरे हालांकि चोरी-छिनैती, गुंडों और पुलिस की झड़प वगैरह का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हत्या अब यहां खबर नहीं रह गई. औरतें यहां डर के मारे सूरज डूबने के बाद घर से बाहर नहीं जातीं. आदमी झुंड बनाकर चलते हैं. उन्हें भी लुटने का डर है. पगार के दिन यह डर खास होता है. पिछले दो साल में बवाना नहर से कम से कम दर्जन भर लाशें निकाली जा चुकी हैं. कुछ के होंठ कटे पाए गए थे.
पिछले साल 13 नवंबर को नहर में लाल मोहम्मद की लाश मिली. उसे मोबाइल चुराते कुछ लोगों ने पकड़ा था. लोग चोरी-छिनैती से इतना तंग आ गए थे कि उन्होंने पीट-पीट कर उसे मार डाला. उसकी हत्या का आरोप तीन लोगों पर लगा, जिसमें बवाना के विस्थापितों के लिए लडऩे वाले कार्यकर्ता रमन जायसवाल का 25 वर्षीय बेटा सज्जन जायसवाल भी है. रमन कहते हैं कि उनके बेटे को फंसाया गया है. आधा दर्जन बच्चों की मां शीला देवी बमुश्किल तीसेक साल की होंगी. वे कहती हैं, ''हमारे बच्चों के पढऩे के लिए कोई जगह नहीं. सरकारी स्कूल प्लॉट आवंटन के कागज मांगते हैं. प्राइवेट स्कूल बहुत महंगे हैं. दिनभर बच्चे मारे-मारे फिरते हैं. '' दिल्ली अरबन आर्ट कमीशन के अध्यक्ष प्रो. के.टी. रवींद्रन कहते हैं कि झुग्गीवासियों को शहर की सीमा पर फेंक देना संघर्ष को न्योता देना है. वे कहते हैं, ''जिन झुग्गियों में वे रहते थे, वहां कम-से-कम एक सामाजिक दायरा तो था ही जो उनकी जिंदगी को घेरे रहता था. आर्थिक स्थिति के आधार पर नागरिकों को विस्थापित करना अलोकतांत्रिक है. ''
दिल्ली दर-बदर
हफ्ते में कम-से-कम दो बार जायसवाल, उमेश और संघर्ष समिति के कुछ साथी बेघरों के लिए प्लॉट, पुलिस स्टेशन या अस्पताल आदि के आवेदन देने बस से पुरानी दिल्ली स्टेशन और फिर वहां से आइएनए स्थित दिल्ली विकास प्राधिकरण के दफ्तर जाते हैं. उनसे तीन-चार घंटा बैठने को कहा जाता है, फिर आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है कि उनकी दिक्कतें जल्द ही हल होंगी. पांच साल से यह नाटक चल रहा है.
पहली बार 1977 में दिल्ली आए और अब पचास पार कर चुके रामाधीन बताते हैं, ''हम में से ज्यादातर लोग कंस्ट्रक्शन मजदूर थे. इस शहर को हमने अपने हाथों से बनाया है. हमने रोहिणी, सरस्वती विहार, और तकरीबन नक्शे पर दिखने वाली आधी दिल्ली खुद बनाई है. हम जबरन नहीं आए थे. हमें बुलाया गया था. आज शहर के पास हमारे लिए जगह नहीं है. हम जब बवाना में आए थे तो यहां जंगल था. धीरे-धीरे हमने इसे भी तैयार कर दिया है. कुछ साल बाद दिल्ली जब फैलती हुई यहां पहुंच जाएगी, मॉल और अपार्टमेंट यहां बन जाएंगे, तो क्या हमें फिर से उठा कर वे दूर फेंक देंगे? '' रामाधीन कह रहे थे कि डीडीए के एक अधिकारी ने एक बार उनसे कहा था कि झुग्गी में रहने वाले लोगों को राष्ट्रीय राजधानी से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. वे बोले, ''फिर मैंने उनसे कहा कि अगर हम ऐसे नहीं रहते, तो आप भी अपने भव्य बंगले में नहीं रह रहे होते. फिर वह चुप हो गया. ''
उधर दूर खोड़ा में अजय ने भी जीतने की कहानी लिखी है. वे भले ही 13 साल से अदालत के चक्कर काट रहे हों, लेकिन उन्हें बखूबी याद है कि किस तरह डासना जेल में बंद कैदी उन्हें अपराध की दुनिया में आने के आकर्षक ऑफर देते थे. लेकिन बाहर आकर उन्होंने गाड़ी चलाने का काम सीखा और शराब से खुद को दूर रखा. रात-दिन की मेहनत के बदौलत आज उनके पास अपनी तीन गाडिय़ां हैं. उनकी शादी भी हो गई और दो बच्चे भी हैं. पहले बच्चे को प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल भेज रहे हैं. लेकिन एक कसक उनके मन में हैं कि वे क्या अपने ऊपर लगे खोड़ा के ठप्पे से कभी उबर पाएंगे?

