उन्हें सुर्खियां बटोरने में कोई दिलचस्पी नहीं. यूपीए के लिए तीसरी पारी यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जादू की छड़ी बताई जाने वाली योजना की कमान संभालने के सर्वश्रेष्ठ क्षणों में इन्फोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलेकणी पत्रकारों से अलग-थलग ही रहे. आम तौर पर मीडिया के साथ उनकी दोस्ती रही है, पर 26 नवंबर को केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम और जयराम रमेश ने जैसे ही घोषणा की कि सरकार 1 जनवरी, 2013 से देश के 51 जिलों में नीलेकणी की आधार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सीधे नकद हस्तांतरण की शुरुआत करने जा रही है, वे हर इंटरव्यू के लिए नम्रता से मना करने लगे.
नीलेकणी को सरकार की बिसात पर 'गेम चेंजर’ बनने से परहेज है, इसका श्रेय बेशक यूपीए के कद्दावर नेताओं को जाए, उन्हें फर्क नहीं पड़ता. कम बोलने की उनकी आदत उनके पूर्व कॉर्पोरेट अवतार का ही एक अंदाज है. इन्फोसिस के सीईओ के तौर पर 2002 और 2007 में जीवन के सबसे सफल दौर में भी उन्होंने अपने संरक्षक एन.आर. नारायणमूर्ति को ही इस दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी का सार्वजनिक चेहरा माना.
नीलेकणी विचार और क्रियान्वयन का प्रतीक हैं. विशिष्ट पहचान संख्या (यूआइडी) के बारे में उन्होंने सबसे पहले 2009 में लिखी अपनी मशहूर किताब इमेजिनिंग इंडिया में जिक्र किया था. 2009 में जब यूपीए दोबारा सत्ता में आया तो प्रधानमंत्री ने उन्हें योजना आयोग का सदस्य बनने की पेशकश की, जिसे नीलेकणी ने ठुकरा दिया.
वे ऐसे आयोग में नहीं जाना चाहते थे जो काम नहीं कर रहा हो और जहां कोई ढंग का अधिकार न हो. अपने श्रेष्ठ प्रबंधन कौशल का व्यर्थ होना उन्हें मंजूर नहीं था. फिर प्रधानमंत्री ने उनसे यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआइडीएआइ) की स्थापना करने के लिए कहा, जिसे नीलेकणी मना नहीं कर पाए. तीन साल में उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था का ढांचा तैयार किया है जो हिंदुस्तान के बड़े कल्याणकारी राज्यों की व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार और पैसे के हस्तांतरण में मौजूद गलत गतिविधियों पर अंकुश लगा सकती है.
अगर यह व्यवस्था सफल हो गई तो यूपीए मनरेगा के वार्षिक भुगतान के बराबर राशि की बचत कर दूसरी योजनाओं पर खर्च कर सकेगा. यह बात मतदाताओं को भी इतना खुश कर सकती है कि वे 2014 की बाजी यूपीए के हाथ में खुद-ब-खुद थमा दें.
आधार से जुड़ी संभावनाओं से चिदंबरम जरूर खुश हुए होंगे जो अगस्त में गृह मंत्रालय छोड़ वित्त मंत्रालय की कुर्सी पर विराजमान हुए. बतौर गृह मंत्री वे आधार के कड़े विरोधी थे और गृह मंत्रालय के नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के जरिए बायोमीट्रिक रजिस्ट्रेशन की वकालत कर रहे थे. लेकिन उन्होंने जैसे ही वित्त मंत्रालय में कदम रखा, वे पाला बदलकर इसके फायदे गिनाने लगे.
नीलेकणी ने अपने उस सबसे बड़े विरोधी को जीत लिया था, जिसने उनकी जिंदादिली पर पिछले दो साल में न जाने कितनी बार निराशा की सियाही उड़ेली थी. वैसे चिदंबरम क्षेत्राधिकार की लड़ाई पर अब भी गंभीर हैं. योजना आयोग के एक अधिकारी के अनुसार, ''कुछ जगहों पर आधार शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि एनपीआर अधिकारी उन्हें आगे नहीं बढऩे दे रहे.” अब यह गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की जिम्मेदारी है कि इस नुकसानदेह लड़ाई को खत्म करें, इसी में यूपीए की भलाई है.
आम धारणा से उलट यूपीए के सबसे ताजा कदम की खासियत हस्तांतरण नहीं है. योजना आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ''मनरेगा में पहले से ही डायरेक्ट कैश ट्रांसफर व्यवस्था चल रही थी.” आधार में नकद हस्तांतरण को ज्यादा प्रभावी बना दिया गया है. पहला, इससे नकली, फर्जी और मृत व्यक्ति का नाम लाभार्थी की फेहरिस्त में नहीं शामिल हो पाएगा.
नई प्रणाली में नकद हस्तांतरण तब ही होगा जब व्यक्ति के पास आधार संख्या होगी, इसलिए फर्जी या मृत व्यक्ति के नाम किए गए हस्तांतरण से हो रही पैसे की बर्बादी पर रोक लगेगी. दूसरा, सरकारी अधिकारियों के साथ आम तौर पर होने वाले कड़वे अनुभवों से लाभार्थियों को राहत मिलेगी. यह अनुभव चाहे पोस्ट ऑफिस में हो या पेंशन ऑफिस में. क्योंकि इन्हीं जगहों पर घूस की मांग के रूप में भ्रष्टाचार पनपता है.
आधार प्रणाली के तहत पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा होता है. बैंक खाते को खोलने की प्रक्रिया में आधार संख्या को पर्याप्त मानकर कॉमर्शियल बैंकों की 'नो योर कस्टमर’ (पहचान संबंधी) कसौटी की जटिलता को आसान किया गया है. गांवों में बैंकों की कमी के मद्देनजर नीलेकणी ने ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुंचने के सिलसिले में बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट यानी 'बिजनेस प्रतिनिधि’ के इस्तेमाल का सुझव दिया है. बिजनेस प्रतिनिधि को कॉमर्शियल बैंक से ही प्रशिक्षण लेना होगा और बैंक ही उसे नियुक्त करेगा.
कोई भी बिजनेस प्रतिनिधि बन सकता है—किराने की दुकान के मालिक से लेकर स्थानीय स्व-सहायता समूह का संयोजक तक. हर धारक को एक एटीएम लिंक मिला होता है जो उसके मोबाइल फोन नेटवर्क से संपर्क के लिए जुड़ा होता है. माइक्रो-एटीएम लाभार्थियों की बायोमीट्रिक्स (उंगलियों की छाप और रेटिना स्कैन) की जांच के लिए इस्तेमाल किया जाता है और कार्डधारक की ओर से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के तहत बकाया कैश का भुगतान किया जाता है. कार्डधारक के बैंक खाते में समान राशि तुरंत जमा कर दी जाती है.
कुछ सरकारी अधिकारियों ने आशंका जाहिर की कि बिजनेस प्रतिनिधि और लाभार्थी के बीच भी भ्रष्टाचार पनप सकता है. एक वरिष्ठ नीतिनिर्माता ने कहा, ''पोस्ट ऑफिस के अधिकारी की तरह ये प्रतिनिधि भी घूस मांग सकता है.” नीलेकणी ने इस पहलू पर गौर किया है. इस चुनौती का जवाब लाभार्थी को दिए जाने वाले विकल्प में छिपा है. विचार किया जा रहा है कि गांव में एक नहीं, बल्कि कई बिजनेस प्रतिनिधि नियुक्त किए जाएं. अगर किसी एक ने घूस मांगी तो लाभार्थी दूसरे के पास चला जाए. जैसे कि शहरों के एटीएम में दिखाई देता है. अगर किसी बैंक का एटीएम काम नहीं कर रहा होता तो लोग दूसरे एटीएम से पैसा निकाल लेते हैं.
दूसरे शब्दों में लोगों के पास विकल्प होता है. इसी तरह अगर गांवों में भी भ्रष्टाचारियों से बचने के लिए विकल्प हो तो लोग उसका फायदा उठाएंगे. लाभार्थी को अपने बैंक में कार्यरत बिजनेस प्रतिनिधि के पास जाने की जरूरत नहीं. वे किसी भी बैंक के बिजनेस प्रतिनिधि के पास जा सकते हैं. एक अन्य अधिकारी के अनुसार, ''अगर बैंक अलग-अलग एटीएम का इस्तेमाल कर रहे लोगों को संभाल सकते हैं तो वे अलग-अलग व्यावसायिक धारकों के साथ संपर्क बना रहे लोगों को भी संभाल सकते हैं.”
आधार के विभिन्न उद्देश्यों में लाभ का भुगतान करने के संबंध में सरकारी अधिकारी का वर्चस्व खत्म करना पहली उपलब्धि होगी. एक अधिकारी का कहना था, ''अब लोगों को लंबी दूरी तय कर भ्रष्ट अधिकारियों से निबटने की कवायद नहीं करनी होगी, यही तो वोट बटोरेगा.” नीलेकणी की कॉर्पोरेट पृष्ठभूमि में विकसित काबिलियत ने खास तौर पर अंतिम लाभार्थी और कैश का भुगतान करने वाले के बीच के पेचीदा व्यवहार को आसान बनाने में कमाल कर दिखाया है.
नवंबर में यूआइडीएआइ को जबरदस्त समर्थन मिला जब सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान (एनआइपीएफपी) ने इस परियोजना से होने वाले बड़े फायदे को समर्थन दिया. कई अर्थशास्त्रियों ने आधार के संबंध में अगले 10 साल के समय को लेते हुए लागत-लाभ से जुड़ा विश्लेषण पेश किया. उन्होंने सभी प्रमुख योजनाओं—मनरेगा, पीडीएस, फर्टिलाइजर सब्सिडी, एलपीजी सब्सिडी, शिक्षा और इंदिरा आवास योजना—में हो रही पैसे की बर्बादी को रोकने में आधार को समर्थ बताया. उन्होंने पैसे की बर्बादी का बड़ा कसा हुआ ब्योरा पेश किया—भुगतान किए गए कुल कोष में मनरेगा में 7 फीसदी और पीडीएस में 11 फीसदी. आम तौर पर यह माना जाता है कि सरकारी योजनाओं को अमली रूप में देने में ही काफी पैसा बर्बाद हो जाता है, लिहाजा यह आकलन काफी कम लगता है.
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने 2008-09 में इन योजनाओं के तहत 3.25 लाख करोड़ रु. की कुल राशि (जीडीपी का लगभग 4 फीसदी) दी. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह राशि आज जरूर बढ़ गई होगी. अगर बर्बादी को कम-से-कम भी मापा जाए (लगभग 10-15 फीसदी ) तो सरकार हर साल 40,000 करोड़ रु. बचा सकती थी. यह राशि मनरेगा के तहत सरकार के सालाना भुगतान के बराबर है. गैर-सरकारी तौर पर माना जा रहा है कि आधार के शुरू हो जाने के बाद सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं के कुल खर्च में 30 से 40 फीसदी की बचत कर पाएगी.
आधार को लागू करने और उसे चलाने की लागत से बर्बादी को घटाकर जब एनआइपीएफपी के अर्थशास्त्रियों ने लाभ की तुलना की तो उन्होंने पाया कि परियोजना 52 फीसदी का बड़ा इंटर्नल रेट ऑफ रिटर्न दे रही है. अध्ययन के सह-लेखक अजय शाह ने बताया, ''सरकारी बुनियादी परियोजनाओं के लिए 15 फीसदी का इंटर्नल रेट ऑफ रिटर्न आगे बढऩे के लिए काफी माना जाता है. यह तो उससे कई गुना ज्यादा है.’’
आधार बर्बादी को रोक सकता है पर भ्रष्टाचार नहीं हटा पाएगा. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ''यह मानना बचकाना होगा कि आधार सरकारी तंत्र के मनमाने रवैए पर रोक लगा देगा. सच्चाई तो यह है कि आधार यह नहीं पहचान सकता कि किस कार्यक्रम के लिए किस समूह के लोगों को लाभ मिलना चाहिए. गरीबी की परिभाषा आगे भी केंद्र और राज्य तय करेंगे.” एक ओर यह भी माना जा रहा है कि लाभार्थियों की फेहरिस्त में नाम डालने के समय हो रहा भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा. एक अन्य अधिकारी के अनुसार, ''लाभार्थियों की पहचान कर उनका नाम फेहरिस्त में डालने के समय मांगी जाने वाली राशि बढ़ जाएगी क्योंकि आगे की चेन में कोई ऐसी जगह नहीं जहां पैसे बनाए जा सकते हैं.”
कुछ और व्यावहारिक समस्याएं भी सिर उठाएंगी. दूर-दराज के इलाकों में सबसे बेहतरीन टेक्नोलॉजी में भी गड़बड़ी आ सकती है. सरकार इस तरह के अड़ंगों से वाकिफ नहीं है. उसने 1 जनवरी से कुछ ही योजनाओं को शुरू करने का फैसला किया है. इसमें ज्यादातर छात्रवृत्ति कार्यक्रम हैं. सरकारी कोष पर सबसे भारी पड़ रही खाद्यान्न और फर्टिलाइजर सब्सिडी को इस एजेंडा में 2013 के अंत तक शामिल नहीं किया जाएगा, जबकि यही असली बदलाव होना है. पेट्रोलियम मंत्री ने आग्रह किया है कि एलपीजी की नकद सब्सिडी की शुरुआत 2013 में जनवरी से तीन महीने बाद की जाए.
सरकार के लिए जरूरी है कि 2013 के अंत तक यह प्रणाली अच्छे से काम करने लगे, जिससे वह 2014 के चुनाव के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए समय पर सब्सिडी देना शुरू कर दे. एक अधिकारी ने कहा, ''वे जल्दबाजी में हैं.”
वैसे जल्दबाजी से समस्याओं की बाढ़-सी आ जाती है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि लंबे समय बाद आधार धराशायी होती कल्याणकारी योजनाओं को पुख्ता बुनियाद देने के प्रयास में जरूर जीतेगा. यह नीलेकणी को सक्रिय राजनीति में आगे बढ़ाएगा, जिन्हें राहुल गांधी का सैम पित्रोदा माना जा रहा है.

