बाल ठाकरे को भी यह भरोसा नहीं था कि 30 अक्तूबर, 1966 को शिवसेना की उद्घाटन रैली में इतने लोग जुट जाएंगे. यह रैली मुंबई के शिवाजी पार्क में आयोजित की गई थी और उनके कई दोस्तों का यह मानना था कि इसके लिए मैदान काफी बड़ा चुन लिया गया है. आखिर शिवसेना बिल्कुल नई पार्टी थी जिसमें कोई स्टार नहीं था. लेकिन उस ऐतिहासिक दिन यह साबित हो गया कि शिवाजी पार्क इतना बड़ा भी नहीं है!
मैं पहली बार 1971 में ठाकरे से जब मिला तो वे उस क्षण को याद करते हुए रोमांच में बेकाबू-से हो गए, जबकि उस वाकए को पांच साल हो गए थे. उन्होंने वे दिन भी याद किए जब वे मुंबई के फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट थे. उनकी तीखी टिप्पणियों और सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी विचारों की वजह से उनके सहकर्मी उनकी जड़ें खोदने में लगे रहते थे, जिनमें से कई दक्षिण भारतीय थे. पहली यादों को लेकर वे खुश होते थे, तो दूसरी यादें कड़वाहट से भर देती थीं.
लेकिन दक्षिण भारतीयों के खिलाफ उनकी तेवरों ने आखिरकार उन्हें इतनी प्रसिद्धि दिला दी जिसके बारे में वे कल्पना भी नहीं कर सके थे. नौकरी छोडऩे के बाद उन्होंने खुद का कार्टून साप्ताहिक मार्मिक शुरू किया, जिसमें वे मुंबई में बसे प्रवासियों के बारे में अपने गुस्से का इजहार करते थे. लेकिन बाल ठाकरे इस तरह के विचार व्यक्त करने वाले कोई सनकी और इकलौते आदमी नहीं थे, असल में वे शहर में बड़ी संख्या में रहने वाले मराठियों की भावना का ही प्रतिनिधित्व कर रहे थे. उस समय तक शिवसेना दूर की बात थी, लेकिन हवा में जहर घुल चुका था.
1970 के दशक की शुरुआत में कई शिव सैनिकों ने मुझे बताया कि जब वे उपनगरीय ट्रेनों से यात्रा करते हैं तो चरनी रोड के आगे उन्हें दबी जबान से मराठी में बात करनी पड़ती है. इसमें संदेह नहीं कि यह बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही थी, लेकिन पूरी तरह से गलत भी नहीं थी. चरनी रोड स्टेशन के बाद दक्षिण मुंबई आता है, शहर का फैशनेबल इलाका जहां धनी गैर-मराठी लोगों का वर्चस्व था. उनके पास सबसे अच्छे मकान थे, वे फैंसी स्टोर में शॉपिंग किया करते थे और उनके बच्चे खास स्कूलों में पढ़ते थे. शहर के उत्तरी हिस्से में रहने वाले मध्य वर्गीय मराठी इस चकाचौंध से अलग-थलग महसूस करते थे.
वर्ष 1965 की दूसरी छमाही में ठाकरे ने मार्मिक में बॉक्स कॉलम शुरू किया जिसने शिवसेना की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया. हफ्ते-दर-हफ्ते ठाकरे ने इस जगह पर मुंबई की कॉर्पोरेट दुनिया में जमे दिग्गज गैर-मराठियों की सूची देनी शुरू की. हर बार ऐसी सूची के अंत में वे एक ही सवाल रखते थे: 'इनमें मराठी नाम कहां हैं?’ उन्होंने इस कॉलम का उकसाने वाला नाम भी रखा था, वात्सछा एणि थंड बसा ('पढ़ें और चुप रहें’). ठाकरे अगर अपने पाठकों में नपुंसक होने की भावना का गुस्सा भरना चाहते थे तो वे कुशलता से ऐसा करने में सफल रहे.
अचानक, नाटकीय रूप से उन्होंने बॉक्स का शीर्षक बदल कर वात्सछा एणि उठा ('पढ़ें और उठ खड़े हों’) कर दिया. कई शिवसैनिकों ने मुझे तब बताया था कि इस बदले हुए शीर्षक का उनके ऊपर कितना असर पड़ा. अब, कुछ कदम उठाने का आह्वान था. ठाकरे ने बताया था कि उसके बाद से मार्मिक के ऑफिस में पत्रों की बौछार होने लगी और पत्रिका का सर्कुलेशन भी काफी तेजी से बढऩे लगा. पाठकों में उत्साह साफ देखा जा सकता था—उन सबके पास यह कहानी थी कि मुंबई में उन्हें किस तरह से बाहरियों (तब करीब सभी दक्षिण भारतीयों की बात करते थे) ने हाशिए पर ढकेल दिया है.
ठाकरे को जल्दी ही यह एहसास हो गया कि उनका यह कॉलम बिजली की कौंध जैसा है. यह शहर के बहुत से मराठियों के निराशाजनक मनोदशा को उत्साह से भर देता है. तो जब आखिरकार उन्होंने शिवसेना को स्थापित करने का मन बनाया तो उनके समर्थक इसके लिए बिल्कुल तत्पर और तैयार थे. शिवसेना नाम भी अपने आप में काफी महान था क्योंकि यह 17वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के वीर योद्धा राजा की याद दिलाता था. इसके बाद बाल ठाकरे खुद को आधुनिक शिवाजी के रूप में देखने लगे और उनके कई समर्थकों ने उन्हें इस कल्पना के लिए प्रोत्साहित किया.
निस्संदेह अपनी शुरुआत से ही शिवसेना ने उस भावना को अभिव्यक्त किया जो मुंबई में रहने वाले मराठी प्रबल रूप से अनुभव करते थे. यहां तक कि जब बाल ठाकरे ने अपने सैनिकों को हिंसा का सहारा लेने की सलाह दी तो भी बहुत से मध्यवर्गीय मराठियों ने इसे गलत नहीं माना. इसकी सामान्य वजह यह थी कि शिवसेना ने उन्हें अपने प्रांत की राजधानी मुंबई में गर्व से रहना सिखाया था. वे अब कम से कम उपनगरीय ट्रेन से चलते हुए चरनी रोड गुजर जाने के बाद भी सिर ऊंचा करके चल सकते थे.
तब तक मुंबई की आबादी में सिर्फ 43 फीसदी मराठी थे और शहर में उनका बहुमत नहीं था. बॉलीवुड भी पूरी तरह से हिंदी प्रभुत्व वाला था और उसमें कोई भी मराठी स्टार नहीं था. शिव सेना के 1966 में जारी पहले घोषणापत्र में लगभग हर चीज के लिए दक्षिण भारतीय प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराया गया. मराठियों को कठोरता से यह सलाह दी गई कि वे अपने यहां तमिनाडु, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश के लोगों को नौकरी पर मत रखें. यहां तक कि ठाकरे तमिलनाडु सरकार के लॉटरी टिकट भी खरीदने के विरोधी थे! उन्होंने सभी दक्षिण भारतीयों को डीएमके के अलगाववादी तत्वों के समर्थक के रूप में दिखाना शुरू किया. उनका और अपमान करते हुए वे उन्हें 'येंडुगेंडुवाला’ कहते थे.
मुंबई में 1960 के दशक में करीब 9 फीसदी आबादी ही दक्षिण भारतीय थी. गुजराती उनसे ज्यादा करीब 14 फीसदी थे. लेकिन शिवसेना उनके खिलाफ नहीं बोलती थी. ठाकरे ने कई मौकों पर कहा था कि गुजराती बहुत उदार एम्प्लॉयर होते हैं और किसी को अपने पेट भरने वाले हाथ में डंक नहीं मारना चाहिए. यह मुंबई के गुजरातियों के लिए बहुत राहत की बात थी. जब मुंबई राजधानी वाले महाराष्ट्र राज्य के गठन के लिए संयुक्त महाराष्ट्र समिति (एसएमएस) का आंदोलन चला था, तब गुजराती मुख्य रूप से निशाने पर थे.
1960 में समिति की मांगे मान ली गईं. इसके छह साल बाद ही शिवसेना सामने आई थी और इसलिए अकसर लोग यह मान लेते थे कि यह एसएमएस का ही अगला चरण है, लेकिन यह सच नहीं था.
शिवसेना का एजेंडा पूरी तरह से अलग था, चीजों को दुरुस्त करने का और साथ ही उसके दुश्मनों का अलग वर्ग भी था: केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से आए प्रवासी. दक्षिण भारतीय ठाकरे के गुस्से का मुख्य निशाना इस वजह से थे क्योंकि व्हाइट कॉलर जॉब में उनकी संख्या बहुत ज्यादा थी.
ठाकरे मुंबई के पेशेगत ढांचे के इस हिस्से को अच्छी तरह से समझते थे क्योंकि वह खुद इससे ताल्लुक रखते थे. इसलिए जब उन्होंने पहले दक्षिण भारतीयों के खिलाफ अपनी कलम चलानी शुरू की और फिर अपने लोगों को उनके खिलाफ किया तो उनके मन में कोई हिचक नहीं थी.
1971 में शिवसेना ने संसदीय चुनाव में जनरल करियप्पा का समर्थन किया जो कर्नाटक से थे. इसमें जनरल का हारना इतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना यह संकेत कि शिवसेना की दिशा बदल रही है. अब इसके मुख्य दुश्मन दक्षिण भारतीय नहीं बल्कि कम्युनिस्ट हो गए. इससे शिवसेना कारोबार जगत के दिग्गजों को प्रिय हो गई जो 1960 के दशक में पूरे मुंबई में कामगारों के आंदोलन का सामना कर रहे थे. कुछ साल पहले ही ठाकरे ने अपने लोगों को मुंबई के कामगारों वाले इलाके लालबाग-परेल में प्राचीन गिरनी कामगार यूनियन ऑफिस जला देने का आदेश दिया था. यह प्राचीन, जर्जर इमारत ऐतिहासिक महत्व रखती थी क्योंकि यह मुंबई के सबसे पुराने ट्रेड यूनियन का मुख्यालय थी.
शुरुआत से ही हिंसा शिवसेना की पहचान रही है. दक्षिण भारतीय फिल्में दिखाने वाले थिएटरों में तोड़-फोड़, ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या से लेकर भिवंडी के मुसलमानों पर हमले तक शिवसैनिकों ने हर जगह हिंसा का सहारा लिया है. उनके लिए हिम्मत बढ़ाने वाली बात यह थी कि उन्हें कभी इन सबके लिए जिम्मेदार नहीं बनाया गया. दहाड़ते बाघ को प्रतीक चिन्ह के रूप में दिखाने के बावजूद यह तथ्य छुप नहीं सकता कि शिवसेना असल में दिल से कागजी बाघ ही है.
जब 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी, तो ठाकरे सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ करने लगे. इस तरह शिवसेना ने खुद को बैन होने से बचा लिया. 1993 में शिवसेना मुख्यालय पर बम विस्फोट के बाद उन्होंने उग्र तेवर अपनाने से परहेज किया. वे इस बात से सहम गए थे कि विरोधी उनके करीब पहुंच कर वार कर सकते हैं.
शिवसेना के अस्तित्व में आने की पुरानी वजह अब काफी दूर चली गई है. मुंबई का चेहरा, लहजा और मिजाज काफी हद तक मराठी हो चुका है. इधर के सालों में शिवसेना के आगे बढ़ते रहने की वजह उसकी धौंस जमाने वाली चालें रही हैं. इस वजह से आज शहर में शिवसेना से लोग डरते हैं. अमिताभ बच्चन से लेकर राहुल बजाज तक मुंबई का संभ्रांत वर्ग अंतिम सांस लेते ठाकरे को देखने जाता है. ठाकरे ने समर्थकों को एक सबक अच्छी तरह सिखाया है. किसी मकसद के लिए मरने से बेहतर है मारना.
प्रो. दीपांकर गुप्ता, समाजशास्त्र विभाग, जेएनयू ,नई दिल्ली

