राजीव गांधी के जन्म के करीब एक महीने बाद 4 सितंबर, 1944 को जवाहरलाल नेहरू ने अहमदनगर फोर्ट जेल से बेटी इंदिरा गांधी को पत्र लिखा था, ‘‘मैं जानता हूं कि आप लोग नवजात बच्चे को राहुल नाम से बुला रहे हैं. ठीक है, राहुल कोई बुरा नाम नहीं है.’’ इसके बाद वे सवाल करते हैं, ‘‘लेकिन क्या आप जानती हो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब होता है एक जंजीर, जो बांधती है, एक बंधन.’’ बाद में यह पत्र नेहरू और इंदिरा के बीच पत्र व्यवहार के संग्रह टू एलोन टू टुगेदर में प्रकाशित हुआ.
संयोग से इंदिरा के बेटे का नहीं, बल्कि उनके पोते का नाम राहुल रखा गया. सोनिया साफ तौर से अपने बेटे की भूमिका एक ‘जोडऩे वाली ताकत’ के रूप में देखती हैं, लेकिन इस वंश के राजकुमार के सांसद बनने के बाद अपनी आस्तीनें चढ़ाने और सामने आकर कांग्रेस का नेतृत्व संभालने में आठ साल लग गए.
कांग्रेस ने 15 नवंबर को सबसे जोरदार संकेत दिया कि वे अगले आम चुनावों में पार्टी का चेहरा होंगे. पार्टी ने उन्हें अगले लोकसभा चुनावों के लिए बनी छह सदस्यीय समन्वय समिति का चेयरमैन बनाया. इस समिति की मुख्य जिम्मेदारी अगले आम चुनावों के लिए खाका तैयार करने की होगी.
उनके लिए इससे कठिन दौर नहीं हो सकता था. कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार विदाई की मुद्रा में दिख रही है. समय-समय पर उसे बचाने वाले समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) जैसे सहयोगी दल अगले लोकसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दे रहे हैं.
सपा ने उत्तर प्रदेश से अपने 55 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. यहां तक कि डीएमके जैसा दब्बू सहयोगी दल भी कांग्रेस से दूरी बनाने लगा है: उसने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआइ का समर्थन नहीं किया है और पेंशन तथा बीमा क्षेत्र के सुधारों को लेकर आशंका जताई है. एक और पूर्व सहयोगी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार को गिराने के किसी भी मौके की ताक में बैठी है.
ममता ने संसद के शीतकालीन सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की धौंस दिखाई, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने उसे खारिज कर दिया क्योंकि उनके पास इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी 50 सांसदों का
समर्थन नहीं था. कांग्रेस के लिए राहत की बात बस यही दिख रही है कि दागी नितिन गडकरी के नेतृत्व वाली बीजेपी फिलहाल कांग्रेस पर हमले करने की जगह अंदरूनी लड़ाई में ही उलझी हुई है.
बीजेपी के भ्रम ने कांग्रेस को सोनिया और मनमोहन सिंह के दोहरे नेतृत्व वाले दौर से राहुल युग में ले जाने में मदद की है. अपने राजनैतिक ट्रेनिंग काल में राहुल ने दो कठिन माने जाने वाले प्रोजेक्ट हाथ में लिए थे: करीब 20 करोड़ लोगों वाले विशाल राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी को नए सिरे से खड़ा करना और युवक कांग्रेस का लोकतंत्रीकरण करना. इन दोनों का परिणाम उत्साहजनक नहीं रहा लेकिन इनसे राहुल की कार्यशैली की परख जरूर हो गई.
पुरानी दरबार शैली वाली राजनीति खत्म हो गई और इसकी जगह उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं, प्रोफेशनल और एनजीओ के मिले-जुले तंत्र के साथ काम करना पसंद किया. सोनिया की आम सहमति की राजनीति के विपरीत राहुल ने ज्यादा आक्रामक शैली अपनाई. यह बात अगस्त 2011 में साफ हो गई जब बीमार सोनिया अण्णा हजारे के रामलीला मैदान अनशन के दौरान उन पर जिम्मेदारी सौंप कर विदेश चली गईं. राहुल हजारे और अरविंद केजरीवाल से बातचीत करने वाली टीम का हिस्सा नहीं थे. इसकी जगह उन्होंने टकराव का रुख अपनाने की वकालत की-जैसा कि उनके व्यक्तिगत प्रवक्ता दिग्विजय सिंह के बयानों से साफ हो रहा था.
राहुल के 12 तुगलक रोड स्थित निवास पर आयोजित होने वाले साप्ताहिक ‘जनता दरबार’ के दौरान आने वाले चापलूसों पर नजर रखी जाती है और यदि कोई बार-बार आता दिखता है तो उसे उसके क्षेत्र में वापस भेज दिया जाता है.
उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र में न तो किसी को प्रश्रय देने और न ही संगठित रूप से ट्रांसफर और पोस्टिंग की राजनीति की है. इस बारे में उनकी प्रतिष्ठा इस कदर बन चुकी है कि अमेठी में यह अफवाह चलती है कि उनके दिल्ली ऑफिस में यह बोर्ड लगाया गया है कि यहां ‘‘नौकरी या ट्रांसफर के लिए न आएं’. यह सच नहीं है. लेकिन ऐसी धारणा के अपने नुकसान भी हैं, जिसका अंदाजा राहुल को तब हुआ जब वे इस साल उत्तर प्रदेश में भारी हार के बाद अमेठी के दौरे पर गए. गुस्साए क्षेत्र वासियों ने अपनी जरूरतों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाने के लिए राहुल की जमकर खिंचाई की.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल ने राज्य को 10 जोन में बांट रखा था और हर जोन में 40 विधानसभा क्षेत्र शामिल किए गए थे. जोन के सभी अधिकारी अपने इंचार्ज को रिपोर्ट करते थे और सभी इंचार्ज पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह को. अब वे पर्यवेक्षकों की एक टीम बनाने की तैयारी कर रहे हैं. हर पर्यवेक्षक 10 संसदीय क्षेत्र का दौरा करेगा और आम चुनावों के लिए उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिए जाने से पहले उन्हें रिपोर्ट देगा.
जब वे विधानसभा चुनावों में टिकट के इच्छुक लोगों का इंटरव्यू ले रहे थे तो उम्मीदवारों को यह देखकर अचरज हुआ कि राहुल ने उनसे जाति से आधारित सवाल नहीं किए जैसा कि आम तौर पर पूछा जाता है. नवाबगंज से टिकट के इच्छुक एक उम्मीदवार से पूछा गया कि क्या उसे जानकारी है कि उनके क्षेत्र में मोबाइल फोन धारकों की संख्या कितनी है.
राहुल की तरक्की से कांग्रेस की कार्य-संस्कृति में बदलाव आया है. वे अपने साथ 42 वर्ष की कोरी स्लेट लेकर आए हैं जो मनमोहन सिंह की घिरी हुई, भ्रष्टाचार से ग्रस्त सरकार के बिल्कुल विपरीत है. पार्टी के भीतर पहला शिकार ऊपर से चुनकर बिठा देने की संस्कृति होगी. राहुल युवक कांग्रेस में लोकतंत्र और पारदर्शिता को बढ़ावा दे रहे हैं. कांग्रेस कार्य समिति के लिए अंतिम बार चुनाव 1997 में हुए थे और कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव 2000 में हुआ था.
2009 के आम चुनावों के दौरान दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल से यह सवाल किया गया था कि क्या वे सीडब्ल्यूसी के चुनाव कराए जाने के पक्ष में हैं. उन्होंने सवाल को यह कहकर टाल दिया था कि यह उनके कार्यक्षेत्र से बाहर की बात है. अब वे ऐसे बहानों की आड़ नहीं ले पाएंगे. उन्हें अपने बयानों से आगे बढ़कर कुछ कर दिखाना होगा-चाहे भारत को इंडिया से जोडऩे की बात हो या अपराधियों को टिकट न देने की बात. वे अब पार्टी के भीतर रहकर ही विपक्ष जैसी भूमिका भी नहीं निभा पाएंगे, ओडीसा की नियामगिरी पहाड़ी पर हेलिकॉप्टर से उतरने और सरकार द्वारा मंजूर एक प्रोजेक्ट के खिलाफ आदिवासियों को समर्थन का वचन देने जैसे काम नहीं कर पाएंगे. अब पार्टी के नेता के रूप में उन्हें सरकार और पार्टी दोनों को एकसाथ आश्वस्त करना होगा.
राहुल युग में दूसरी गाज चमचागीरी पर पड़ सकती है. चापलूसी ने उनके पिता राजीव गांधी की संभावनाओं को खत्म कर दिया था, जिनकी मिस्टर क्लीन की छवि जल्दी ही एक राष्ट्रीय मजाक बन गई और उन्हें ‘‘बाबालोग गवर्नमेंट’’ (बच्चों की सरकार) का मुखिया तक बताया गया था. अभी तक ‘देश का नेता कैसा हो, राहुल गांधी जैसा हो’ नारा राहुल भइया को प्रभावित करने में विफल रहा है.
पुरानी पीढ़ी के नेता अभी तक राहुल की क्षमता को नहीं आंक पाए हैं. उनकी प्रबंधन शैली में उतावलापन होता है, चाहे वह पिछले साल भट्टा-पारसौल जाने का आधी रात में लिया निर्णय हो या तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से आश्चर्यजनक रूप से विदाई की शिष्टाचार मुलाकात करना.
वित्त मंत्रालय के अधिकारियों को अब भी याद है कि किस तरह राहुल ने 25 जून की सुबह मुखर्जी को फोन किया और पूछा कि क्या वे उनसे मिलने आ सकते हैं. राहुल उस समय संसद में ही थे और नॉर्थ ब्लॉक उनके स्वागत की कुछ तैयारी कर पाता, इसके पहले ही वे वित्त मंत्रालय पहुंच गए. उनके स्वागत के लिए गेट पर एक अधिकारी तो पहुंच गए हैं, लेकिन हाइ-प्रोफाइल विजिटर्स का आम तौर पर इंतजार करने वाले वीआइपी लिफ्ट को ग्राउंड फ्लोर तक आने में पांच मिनट लग गए. अधीर राहुल इसकी जगह सीढिय़ों से ऊपर चले गए.
राहुल अब पार्टी के नेताओं के साथ ज्यादा से ज्यादा संवाद कर रहे हैं, चाहे पार्टी के 15 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड स्थित रणनीति केंद्र में समिति की बैठकें हों या 10 जनपथ में. अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री, जनार्दन द्विवेदी और जयराम रमेश जैसे सदस्यों वाली जिस समन्वय समिति के राहुल प्रमुख हैं, उसकी भी एक अनौपचारिक बैठक हो चुकी है. राहुल के साथ बैठकें देर तक नहीं चलतीं क्योंकि वे लंबे-लच्छेदार भाषण पसंद नहीं करते.
2007 में महासचिव बनाए जाने के समय से ही राहुल ने यह बदलाव कर दिया था कि पार्टी के पत्रक (पैंफलेट) लंबे पैराग्राफ की जगह बुलेट के साथ बिंदुवार बनाए जाएं. इसके अलावा एक सूत्र के अनुसार, ‘‘जलपान को सिर्फ चाय या कॉफी तक सीमित कर दिया गया. चूंकि राहुल को स्नैक्स खास पसंद नहीं हैं तो हम इसे सर्व नहीं करते.’’
लेकिन सिर्फ यह माहौल बनाना ही काफी नहीं है कि राहुल दुविधा में रहने वाले नहीं बल्कि कुछ करने वाले व्यक्ति हैं. गांधी परिवार यदि भारतीय राजनीति में अपनी वंश परंपरा को बनाए रखना चाहता है तो उन्हें लोगों का नेतृत्व करने के लिए राहुल के बारे में बड़ी घोषणा करने का साहस दिखाना होगा. 2009 में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और किसानों की कर्जमाफी जैसी बड़ी घोषणाएं की गई थीं, जिससे आम आदमी को यह लगा था कि यूपीए-2 सही दिशा में काम करेगा.
सोनिया चाहती हैं कि अगले चुनाव के लिए खाद्य सुरक्षा बिल को तुरुप का इक्का बनाया जाए और वह इस पर जोर दे रही हैं कि सरकार इसके बारे में प्रारूप को अंतिम रूप दे. लेकिन नीतिगत मामलों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और उनके पूववर्ती मुखर्जी, दोनों ने पार्टी को साफ तौर से यह संकेत दे दिया है कि वित्तीय घाटे की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राइट टु फूड बिल पर आगे बढऩा सरकार के वश की बात नहीं होगी.
इसके लिए अलग से एक साल में करीब 40,000 करोड़ रु. की जरूरत होगी जो मनरेगा पर सालभर में खर्च होने वाली रकम के बराबर है. बस एक चीज से ही इस बिल पर आगे बढऩा संभव हो सकता है कि सरकार को ज्यादा से ज्यादा राजस्व मिले. इसके लिए यूपीए-2 को रिटेल में एफडीआइ जैसे कई सुधारों के रास्ते पर आगे बढऩा होगा.
लोकलुभावनवाद और सुधारों के बीच संतुलन को कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज से इकोनॉमिक्स में एमफिल राहुल समझते हैं. फिलहाल सोनिया और मनमोहन के बीच एक साफ बंटवारा है. कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी के कल्याणकारी चेहरे का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि प्रधानमंत्री सुधारों के प्रमुख की भूमिका में हैं. दिल्ली में 4 नवंबर को पार्टी की महारैली में दिए अपने भाषण में राहुल गांधी ने मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआइ और खाद्य सुरक्षा बिल, दोनों का समर्थन किया. उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा, ‘‘गरीबों को यदि तरक्की करनी है तो आर्थिक सुधार करने की जरूरत है. उदारीकरण अनिवार्य है.’’
पार्टी के एक महासचिव के मुताबिक खाद्य सुरक्षा बिल और एफडीआइ, दोनों राहुल के अभियानों के आधार बिंदु होंगे. लेकिन सुधारों को गरीबों का हिमायती दिखाने के मामले में राहुल सचेत हैं. वे जब भी मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआइ का समर्थन करते हैं तो हमेशा इससे किसानों को होने वाले फायदों को रेखांकित करते हैं, उद्योगपतियों को मिलने वाले फायदों को नहीं. राहुल ने बीजेपी के 2004 के ‘‘इंडिया शाइनिंग’’ की विफलता से यह सबक लिया है. वे कहते हैं, ‘‘भारत सिर्फ कुछ लोगों के लिए ही चमक रहा था, आम जनता के लिए नहीं.’’
राहुल की कार्ययोजना के लिए नींव अभी तैयार की जानी हैं. यह काफी नहीं है कि किसी एक सिंबल या प्रतीक की पहचान कर ली जाए और उसे चमकता हुआ नया नारा दे दिया जाए. कांग्रेस को संख्या की कमी को भी दूर करना होगा. पिछले चुनाव में कांग्रेस को मिलीं 206 सीटों में से तकरीबन आधी सीटें (101) सिर्फ पांच राज्यों में मिली थीं: आंध्र प्रदेश (33), उत्तर प्रदेश (22), राजस्थान (20), महाराष्ट्र (17) और हरियाणा (9). अब कांग्रेस इन सभी राज्यों में परेशानी से गुजर रही है.
आंध्र प्रदेश में उसकी चिंता यह है कि वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी भारी वोट खींच ले जाएंगे. पार्टी के एक महासचिव कहते हैं, ‘‘ऐसा नहीं लगता कि वे कांग्रेस में वापस लौटेंगे. लेकिन हमें चुनाव के बाद उनके साथ गठबंधन की उम्मीद है क्योंकि वे बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे. ध्यान रहे कि उन्होंने जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कांग्रेसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट किया था.’’ कांग्रेस को यह उम्मीद है कि बाल ठाकरे के बाद के दौर में विभाजित शिवसेना महाराष्ट्र में उसके वोट बचाने में मददगार साबित होगी.
पार्टी कर्नाटक और ओडिसा में इस बार बढ़त की उम्मीद कर रही है. दुर्भाग्य से कांग्रेस के पास ऐसे मजबूत क्षेत्रीय नेता नहीं हैं जो इन दोनों राज्यों में उसे ज्यादा फायदा दिला पाएं. बुजुर्ग एस.एम. कृष्णा अब कोई भरोसा नहीं पैदा कर सकते और ओडीसा में पार्टी के पास कोई जनाधार वाला नेता नहीं है. पार्टी के एक सांसद हंसते हुए कहते हैं, ‘‘हमारा सबसे अच्छा दांव झारखंड पर है जहां हमारे पास सिर्फ एक सांसद है.’’ लेकिन इन सबके बावजूद कांग्रेस का उत्साह कम होता नहीं दिख रहा. राहुल के एक सहयोगी कहते हैं कि कांग्रेस अब भी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी क्योंकि बीजेपी का दक्षिण या पूर्वोत्तर में कोई अस्तित्व नहीं है, जहां से 543 सीटों वाली लोकसभा के 157 सांसद आते हैं.
राहुल अपनी पार्टी के नेताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन सहयोगी दलों से रिश्ते बनाने की कोशिश नहीं कर रहे. सहयोगी दलों का प्रबंधन अब भी सोनिया गांधी के जिम्मे है. गठबंधन मामलों पर समिति के मुखिया उनके पसंदीदा ए.के. एंटोनी हैं. सहयोगी दलों से सौहार्दपूर्ण रिश्ते रखने वाली सोनिया के विपरीत राहुल की पुरानी पीढ़ी के नेताओं से नहीं जमती.
सोनिया गांधी ने यूपीए के सहयोगी दलों को जुलाई में मुखर्जी को राष्ट्रपति बनने के लिए उनके समर्थन पर धन्यवाद के तौर पर लंच दिया था. तब राहुल की सहयोगी दलों के साथ यह संवादहीनता साफ तौर पर दिख गई थी. राहुल के साथ एक ही टेबल पर मुलायम सिंह यादव, प्रफुल्ल पटेल और फारूक अब्दुल्ला बैठे हुए थे. लेकिन प्रभावशाली मुलायम सिंह से पींगें बढ़ाने की जगह उन्होंने पूरे लंच के दौरान उमर अब्दुल्ला और पटेल से कसरत और गोल्फ के बारे में चर्चा की.
ऐसा नहीं है कि राहुल पहली बार पार्टी में जिम्मेदार भूमिका में हैं. वे पहले भी रहे हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर और समीक्षक आलोचक के रूप में. लेकिन 2014 में लड़ाई की रणनीति बदल जाएगी. राहुल को लोगों को एक नया सपना दिखाना होगा, जैसा कि उनके पिता ने तीन दशक पहले किया था, जब उन्होंने कहा था: ‘‘भारत एक पुराना देश है लेकिन युवा राष्ट्र है...मैं युवा हूं और मेरा भी एक सपना है, मेरा सपना है कि भारत मजबूत, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर हो और दुनिया में राष्ट्रों की अग्रिम कतार में हो.’’
बेटे को भी ऐसी ही कोई आह्वाण करने वाली दृष्टि पेश करनी है. आखिर कांग्रेस का ‘चेहरा’ बनना आसान है, क्योंकि फिलहाल पार्टी में कोई भी विश्वसनीय चेहरा नहीं बचा है. लेकिन उन्हें पार्टी के एक अंग से आगे बढ़ते हुए एक अलग तरह का नेता और भविष्य का उत्तराधिकारी बनना होगा.
-साथ में धीरज नैयर

