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मेड इन रायबरेली की हकीकत

सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र को कहने के लिए रेल कोच फैक्टरी की सौगात मिली लेकिन फैक्टरी के नाम पर वहां कपूरथला के अधबने कोचों को सजाने का ही काम हो रहा है. यहां सिर्फ 75 लोगों को मिली नौकरी.

अपडेटेड 24 नवंबर , 2012

सवाल का जवाब दीजिए. रेल कोच फैक्टरी का मतलब क्या है? स्वाभाविक है, वह कारखाना जहां रेल के डिब्बों का निर्माण होता हो. लेकिन इस सीधे से जवाब को रायबरेली रेल कोच फैक्टरी पर लागू करने पर आप गलत साबित हो सकते हैं. असल में 7 नवंबर को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में जिस रेल कोच फैक्टरी का लोकार्पण किया, वहां पर रेल कोच बनाने का कोई कारखाना अभी तक नहीं लगा है. यहां तो केवल कपूरथला रेल कोच फैक्टरी से सारा सामान 900 किमी दूर रायबरेली रेल कोच फैक्टरी लाकर उसे रेल कोच में ढाला जा रहा है और यह सारा काम कपूरथला से रायबरेली आए कर्मचारी और ठेकेदार ही कर रहे हैं. 

541 हेक्टेयर में फैली रायबरेली रेल कोच फैक्टरी का निर्माण मार्च, 2009 में शुरू हुआ, लेकिन तीन वर्ष से ज्यादा समय बीतने के बाद अभी तक फैक्टरी का पहला चरण ही पूरा हुआ है. जो कोच आसानी से कपूरथला फैक्टरी में तैयार किए जा सकते थे, उन्हें वहां से रायबरेली लाकर 900 किमी का अकारण परिवहन खर्च, कर्मचारियों के भत्ते, ठेकेदारी का खर्च जोड़कर उनकी कीमत बढ़ाई गई.Coach Factory

रायबरेली रेल कोच फैक्टरी से जुड़े एक अधिकारी स्वीकारते हैं कि सामान्य तौर पर एक कोच तैयार करने में 2.50 करोड़ रु. का खर्च आता है, लेकिन कपूरथला से रायबरेली लाकर कोच को तैयार करने में कीमत में 10-15 फीसदी का इजाफा हो रहा है. जबकि रायबरेली फैक्टरी के मुख्य प्रशासन अधिकारी अनिल हांडा कहते हैं, ''कपूरथला से सिर्फ बेयर शेल आते हैं, जबकि फ्लोरिंग का पूरा काम, कांच, खिड़कियां और बर्थ फिटिंग, वायरिंग, फर्निशिंग और एयर कंडिशनिंग का काम यहां होता है.”

वहीं दूसरी ओर कपूरथला कोच फैक्टरी के जनरल मैनेजर बी.एन. राजशेखर कहते हैं, ''जब भी कोर्ई नई फैक्टरी स्थापित होती है तो उसे सहयोग दिया जाता है. कपूरथला फैक्टरी भी जब बनी थी तो जर्मनी से पाट्र्स आए थे.”

भारतीय रेल की प्रोडक्शन यूनिट के तौर पर तीन चरणों में रायबरेली रेल कोच फैक्टरी अप्रैल, 2013 में तैयार होनी थी, इसके लिए 1,685 करोड़ रु. के बजट का प्रावधान था. लेकिन भूमि अधिग्रहण में देरी के चलते अब यह योजना 2014 में पूरी होगी. समय बढऩे के कारण फैक्टरी का बजट भी बढ़कर 2,500 करोड़ रु. हो गया है.

पहले तीन वर्ष में भले ही अभी तक रायबरेली रेल कोच फैक्टरी में केवल कोच के मेंटेनेंस से जुड़ी मशीनें ही लगाई गई हों, लेकिन रेल अधिकारियों का दावा है कि अगले छह महीनों के भीतर वह यहां पर कोच फैक्टरी के निर्माण से जुड़ी 'जिग’, स्किन टेंसिंग, ईओटी क्रेन जैसी बड़ी मशीनें भी लग जाएंगी. फिलहाल काम की रफ्तार को देखते हुए छह महीने में मशीनें लगने की संभावना न के बराबर है. लेकिन जो मशीनें लगी हैं, उन पर यहां काम कर रहे कर्मचारी ही सवाल उठा रहे हैं.

रायबरेली रेल कोच फैक्टरी में इस वक्त कुल 350 कर्मचारी काम कर रहे हैं लेकिन इनमें से 275 कर्मचारी कपूरथला रेल कोच फैक्टरी से आए हैं. कोच में बिजली का काम करने वाले एक तकनीकी कर्मचारी बताते हैं कि रायबरेली रेल कोच फैक्टरी में फिटिंग से जुड़ी मशीनें उस गुणवत्ता की नहीं हैं जैसा कि कपूरथला में हैं.

वे बताते हैं, ''स्क्रू, वॉशर, नट-बोल्ट जैसे सामान खत्म होने के बाद कपूरथला से इन्हें मंगाने में काफी समय लग जाता है” कपूरथला से रायबरेली रेल कोच फैक्टरी में आए कर्मचारी यहां अपनी सेवा संबंधी दशाओं से भी नाखुश हैं. जनवरी, 2012 में अब रायबरेली रेल कोच फैक्टरी आने वाले 50 कर्मचारियों को तो अभी तक एक भी वेतन वृद्धि नहीं मिली है. दो माह के भीतर 40 तकनीकी कर्मचारियों ने वापस कपूरथला रेल कोच फैक्टरी में तैनात किए जाने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है.

संतुष्ट वे भी नहीं हैं जिन्होंने रायबरेली रेल कोच फैक्टरी के लिए अपनी जमीन दी. लालगंज इलाके के यूसुफपुर, बन्नामऊ, एहार, डकवामऊ, सिधौली, गोविंदपुर, बिसवापुर समेत कई गांवों के 1,436 परिवारों की जमीन फैक्टरी को मिली. यूसुफपुर में रहने वाले जगतपाल बताते हैं कि जमीन लेते वक्त अधिकरियों ने हर परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था लेकिन पहले चरण में जिन 136 लोगों को नौकरी मिल रही है, उनमें से किसी की तैनाती रायबरेली में नहीं होगी. फैक्टरी के अधिकारी आधिकारिक तौर से कुछ बोलने को तैयार नहीं. नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी बताते हैं कि गांववालों से भारतीय रेल में नौकरी देने का वादा किया था, जिसे उन्होंने रायबरेली कोच फैक्टरी समझ लिया.

रेल कोच फैक्टरी की अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले बीएसपी नेता और रायबरेली संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी रामलखन पासी कहते हैं, ''यह फैक्टरी रायबरेली के लोगों को रोजगार नहीं देगी. न ही यहां के कारखानों से कोई सामान खरीदेगी. लोकसभा चुनाव से पहले जनता को बरगलाने के लिए यह धोखाधड़ी है.

यह भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला भी हो सकता है.”  रायबरेली के उद्योगपति और इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य प्रदीप आजाद बताते हैं कि रेल कोच फैक्टरी तभी सफल होगी जब यहां काम आने वाला सामान रायबरेली के उद्योगों से ही तैयार कराया जाए. इससे खर्च में कमी होगी अन्यथा आने वाले दिनों में रायबरेली की बंद फैक्टरियों की सूची में एक और नाम जुड़ जाएगा.

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