जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी कैबिनेट फेरबदल की सुबह, 28 अक्तूबर को राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल की तरफ बढ़े तो उन्होंने उस मुख्य दरवाजे से प्रवेश नहीं किया, जिधर से अन्य सांसद और मंत्री जाते हैं. वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जैसे वीवीआइपी के लिए बने गेट से प्रवेश करते हुए सोनिया गांधी के पीछे की तरफ से आए. पहली बार ऐसा हुआ था कि राहुल ने इस खास प्रवेश द्वार का इस्तेमाल किया था. वे एक संदेश दे रहे थे: कि अब वे आधिकारिक रूप से 'दिग्गजों’ में शामिल हो चुके हैं. लेकिन इस प्रतीकवाद का खास महत्व नहीं था.
फेरबदल के बाद कैबिनेट में न तो खुशी मनाने जैसी कोई बात थी और न ही यह प्रशासनिक सख्त जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया युवा आधारित पुनरुद्धार था. अगले पखवाड़े में किसी समय राहुल का राज्याभिषेक पार्टी में नंबर दो रूप के रूप में किया जा सकता है. फेरबदल से पहले वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने दिल्ली के रेस कोर्स रोड स्थित उनके आवास पर गए थे.
इस मुलाकात के दौरान सोनिया गांधी उनके साथ नहीं थीं. लेकिन फेरबदल में जिन 22 नए चेहरों को शामिल किया गया है उनमें मुश्किल से ही कोई राहुल बिग्रेड का है. सिर्फ कुछ विभागों के आवंटन में उनका असर देखा जा सकता है (देखें बॉक्स).
मनमोहन ने इसे आम चुनाव से पहले 'अंतिम फेरबदल’ करार दिया. प्रधानमंत्री ने इसमें संतुलन साधने का प्रयास किया है. इस फेरबदल में मनमोहन का सुधार एजेंडा दिखता है, सोनिया गांधी का राजनैतिक स्वार्थ दिखता है, राहुल की सामाजिक प्राथमिकताएं दिखती हैं, लेकिन यूपीए सरकार इसके जरिए सकारात्मक शासन का कोई संदेश देती नजर नहीं आती.
सलमान खुर्शीद और कमलनाथ को तरक्की देना राजनैतिक संदर्भों को देखते हुए सरकार की मजबूरी बन गई थी. खुर्शीद को अरविंद केजरीवाल निशाना बना रहे थे. उन्हें तरक्की देकर यूपीए सरकार ने साफ तौर से अपनी साख पर और चोट की है. दूसरी तरफ, संसद के आने वाले हंगामेदार सत्र को देखते हुए लडऩे-भिडऩे में सक्षम कमलनाथ को मृदु व्यवहार वाले पवन बंसल की जगह संसदीय कार्य मंत्रालय में लाया गया है. कमलनाथ से जब पूछा गया कि वे बेलगाम विपक्ष और आलोचक सिविल सोसाइटी से कैसे निपटेंगे तो उन्होंने कहा, ''लोकतंत्र कोई खाने की मेज नहीं है जहां आप वही चीज उठाएं जो आपको पसंद हो, लोकतंत्र सभी तरह के मसाले लेकर आता है.”
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस फेरबदल में तीन तत्व हैं: युवा, अनुभव और विभागों की उपयुक्तता. लेकिन वे एक चीज जोडऩा भूल गए: राजनैतिक दुस्साहस. इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कई राज्यों को दूसरों के मुकाबले अनुचित कृपा मिल सके. आंध्र प्रदेश से पांच मंत्रियों को शपथ दिलाई गई, एक छठे मंत्री को तरक्की देकर कैबिनेट का दर्जा दिया गया.
इस तरह राज्य से कुल मंत्रियों की संख्या 11 तक पहुंच गई है, साफ है कि यह वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी के खतरे की प्रतिक्रिया है. लेकिन कांग्रेस के कई सांसदों को लगता है कि यह निरर्थक प्रयास है क्योंकि पार्टी के लिए राज्य की सत्ता में वापस आना मुश्किल है. इसमें जितनी भूमिका जगन की होगी उतनी ही तेलंगाना पर खुद कांग्रेस के अनिर्णय की. मंत्री बनने के लिए साफ तौर पर अधीर दिख रहे पी. बलराम नाइक केंद्रीय मंत्री बनने के बाद इतने उत्साहित दिखे कि वे तेजी से सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए जाने से पहले रजिस्टर पर दस्तखत करना ही भूल गए.
कई बार तो किसी राज्य को तवज्जो देने के पीछे कोई तर्क ही नहीं दिखता. केरल का ही उदाहरण लें जहां से सात मंत्री हैं. इसकी तुलना में चुनाव वाले कर्नाटक राज्य से सिर्फ चार मंत्री सरकार में हैं. कर्नाटक के एक मंत्री मजाक के लहजे में कहते हैं, ''पहले उन्होंने हमें नजरअंदाज किया, फिर वे विद्या बालन को जयराम रमेश से दूर ले गए” (जयराम रमेश से स्वच्छता विभाग छिन गया है जिसकी विद्या बालन ब्रांड एम्बेसडर हैं).
पूरब की उपेक्षा की गई है. पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सात मंत्री सरकार से हट गए हैं, लेकिन उनकी जगह राज्य से सिर्फ तीन कांग्रेस नेताओं को मंत्री बनाया गया है. प्रणब मुखर्जी के हटने के बाद अब इस राज्य से कैबिनेट स्तर का कोई भी मंत्री नहीं है. इसी तरह, बिहार, झारखंड, ओडीसा और छत्तीसगढ़ से कोई भी कैबिनेट मंत्री नहीं है.
मध्य प्रदेश में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस ने वहां के सिर्फ एक व्यक्ति को कैबिनेट मंत्री बनाया है, जिनके पास दो विभाग हैं (कमलनाथ). यहां तक कि राहुल के वफादार और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी मध्य प्रदेश की उपेक्षा की शिकायत करने को मजबूर हो गए.
लेकिन कुछ निर्णय आश्वस्त करने वाले हैं. कॉर्पोरेट मामलों के नए मंत्री 35 वर्षीय सचिन पायलट ने कारोबार के लिए 'सक्षम वातावरण’ तैयार करने की बात की है. उन्होंने कहा, ''हमें कम और आसान कानून रखने होंगे, जिनको तोडऩे पर दंड भारी हो. हम भारत में कारोबार करने को जटिल नहीं बना सकते.” नए ऊर्जा मंत्री 40 वर्षीय ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्रामीण भारत को रोशन करने की बात की. यहां तक कि आम तौर पर विनम्र रहने वाले बंसल ने दिखा दिया कि वे भी झटका दे सकते हैं, उन्होंने रेल किराया बढ़ाने की बात कही.
क्या इन बदलावों के लिए मनमोहन और सोनिया ने बहुत लंबा इंतजार किया है? आम चुनाव में अब एक साल से थोड़ा ज्यादा समय ही बचा है. टीएमसी के बाहर होने के बाद सरकार समर्थन के लिए गैर भरोसेमंद सपा और बीएसपी पर निर्भर है. इसकी वजह से नई टीम को महत्वपूर्ण निर्णय लेने की ज्यादा छूट नहीं मिलेगी, सरकार के लिए पेंशन, बीमा सुधार और भूमि अधिग्रहण बिल जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना जरूरी है. आदर्श स्थिति यह होती कि राहुल बिग्रेड को कम-से-कम इसके एक साल पहले तरक्की देकर स्वतंत्र प्रभार वाला राज्य मंत्री बनाया जाता. तब कुछ सुधार कर सकने की गुंजाइश भी होती.
अभी हालत यह है कि सरकार एक के बाद दूसरे मुद्दे पर लडख़ड़ाने लगती है. हाल में जब वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से यह पूछा गया कि क्या उन्हें फरवरी में अगला बजट पेश कर पाने का भरोसा है, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि बजट आएगा. यह संसद में पेश होगा, लेकिन इस पर बहस करने के लिए कोई होगा या नहीं, इसके बारे में मैं नहीं जानता.”
इस फेरबदल से कैबिनेट के 'बूढ़े बरगदों’ पर कोई असर नहीं पड़ा है. कैबिनेट मंत्री सुशील कुमार शिंदे और ए.के. एंटनी (इनमें से कोई भी किसी मंत्रिस्तरीय कुशलता के लिए नहीं जाना जाता) के पास दो महत्वपूर्ण विभाग बने हुए हैं—गृह और रक्षा. इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को नहीं हटाया गया, जबकि शासन के बारे में उनकी सोच इतनी भर है कि स्टील की सरकारी कंपनियां मीडिया कर्मियों के लिए लंच का आयोजन करें.
एक और महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र कोयला के प्रभारी मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी अपने मंत्रालय में बने हुए हैं, जबकि कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में उनके खिलाफ कई आरोप लगे हैं. मजेदार बात यह है कि खुद जायसवाल भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि उनके पास यह विभाग रहेगा, शपथग्रहण समारोह में वे बेहद उत्सुकता से यह पता करते देखे गए कि नए मंत्रियों की सूची आ गई या नहीं.
नवंबर के अंत में शीत सत्र के शुरू होने से पहले कांग्रेस राजधानी में एक बड़ी रैली के आयोजन की तैयारी कर रही है. कई मंत्रियों से इसमें मंच से बोलने और अपनी उपलब्धियां गिनाने को कहा गया है. मुख्य रूप से मल्टी-ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआइ पर बात की जाएगी.
कैबिनेट में फेरबदल कांग्रेस में बदलाव की पहली सीढ़ी ही है. इसके अगले चरण में राहुल को तरक्की दी जानी है. राहुल की भावी भूमिका के बारे में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ''सभी महासचिव सीधे राहुल को रिपोर्ट करेंगे और राहुल कांग्रेस अध्यक्ष को रिपोर्ट करेंगे.” फेरबदल में राहुल बिग्रेड के जो सदस्य सरकार में आने से बचे रह गए हैं, उन्हें संगठन में जिम्मेदारी दी जाएगी. अंबिका सोनी और दिग्विजय जैसे अनुभवी नेताओं को भी टीम राहुल में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपने का संकेत दिया गया है.
लेकिन इनमें कोई भी वह चीज देने में सक्षम नहीं दिखता जिसकी कांग्रेस को सबसे ज्यादा जरूरत है: यूपीए की स्थिरता. इसके सबसे बड़े सहयोगी दल डीएमके ने कैबिनेट फेरबदल समारोह का बहिष्कार किया और अपनी तीन खाली पड़े जगहों के लिए मंत्रियों के नाम देने से इनकार कर दिया. कमलनाथ को विपक्ष को नाथने में बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी, उन्हें सहयोगी दलों को मनाना होगा. मनमोहन के लिए यह मान लेने का समय आ गया है कि सहयोगी दलों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है और कांग्रेस में टैलेंट बचा नहीं है.
—साथ में राजेश शर्मा

