हम निरंकुश राजा के शासन वाले कोई बनाना रिपब्लिक नहीं हैं.’’ यह कहना है उस अफसर का जिसने सियासी संबंधों के दम पर कारोबारी बने रॉबर्ट वाड्रा की बची-खुची विश्वसनीयता भी खत्म कर दी. 1991 में हरियाणा कैडर ज्वाइन करने के बाद से ही 47 वर्षीय अशोक खेमका ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के अनाधिकारिक आदेश-हुकुम मंत्री का, दस्तखत तुम्हारे-का लगातार उल्लंघन किया है.
वे कहते हैं, ‘‘हम सभी (सिविल सेवक) सरकार का हिस्सा हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हमारे मालिक नहीं बल्कि जनसेवक हैं, जैसे कि बाकी हम सब लोग हैं. लेकिन हमने इन लोगों को राजा-रानी की तरह समझना शुरू कर दिया, जिनके हर आदेश का पालन बिना कोई चूं किए करते रहा जाए.’’
खेमका के इस गुस्से को समझ जा सकता है. रॉबर्ट वाड्रा और रियल एस्टेट दिग्गज डीएलएफ के बीच एक-दूसरे की मदद करने वाले संबंधों पर उंगली उठाने वाले खेमका को 11 अक्तूबर को हरियाणा के भूमि रजिस्ट्रेशन विभाग के प्रमुख पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया. कई नेता और अफसर यही चाहते थे. एक डिस्पैच क्लर्क रात को 10 बजे के बाद चंडीगढ़ स्थित उनके आवास पर ट्रांसफर आदेश लेकर गया. क्योंकि तीन दिन पहले खेमका ने हरियाणा के चार जिलों गुडग़ांव, फरीदाबाद, पलवल और मेवात में वाड्रा के सभी जमीन सौदों की सूची मांगी थी. यह खबर 8 अक्तूबर को अखबारों और टीवी की सुर्खियां बनी थी. खेमका ने चारों जिलों के डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिया था कि वे 1 जनवरी, 2005 के बाद वाड्रा या उनकी तरफ से की गई रजिस्ट्री के बारे में सारे दस्तावेजों की सूची बनाकर उन्हें दें.
खेमका को सितंबर के अंत में ही यह पता लग गया था कि वाड्रा के स्वामित्व वाली स्काइलाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने फरवरी, 2008 में शिकोहपुर गांव के किसानों से 3.53 एकड़ जमीन खरीदी है. दिल्ली से करीब 40 किमी दूरी पर स्थित इस प्लॉट के लिए स्काइलाइट ने 7.5 करोड़ रु. दिए थे. इस जमीन का मालिकाना हक 24 घंटे के भीतर ही 13 फरवरी से लागू कर दिया गया जबकि आम तौर पर इसमें छह महीने तक लग जाते हैं. 28 मार्च, 2008 को वाड्रा की कंपनी को इस बात की भी इजाजत मिल गई कि वह 2.7 एकड़ जमीन के लिए लैंड यूज के लाइसेंस में बदलाव (सीएलयू) कर सके और उस पर आवासीय मकानों का निर्माण कर सके.
लेकिन इसके चार माह से भी कम समय में वाड्रा ने यह जमीन डीएलएफ यूनिवर्सल को 58 करोड़ रु. में बेच दी. खेमका के मुताबिक, वाड्रा की कंपनी ने इस जमीन में बस इतना किया कि उसने लैंड यूज लाइसेंस में बदलाव करा लिया, इससे इस जमीन की कीमत छह गुना बढ़ गई. स्काइलाइट को आवेदन के 18 दिन के भीतर और प्लॉट खरीदने के एक माह के बाद ही लाइसेंस में बदलाव का आशय पत्र (एलओआइ) थमा दिया गया. इस एलओआइ को मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने मंजूर किया और इसकी जानकारी वाला एक पत्र हुड्डा के प्रमुख सचिवों में से एक छतर सिंह के हस्ताक्षर के साथ स्काइलाइट को भेजा गया. छतर सिंह का दावा है कि उन्हें इस मामले का विवरण याद नहीं है और उन्होंने जोर दिया कि हर काम कानून के मुताबिक ही हुआ है. महत्वपूर्ण बात यह है कि आम तौर पर सीएलयू आवेदनों पर एलओआइ मंजूर होने में 90 दिन तक लग जाते हैं.
इंडिया टुडे द्वारा भेजी गई एक विस्तृत प्रश्नावली पर डीएलएफ ने जवाब देने से इनकार कर दिया. इसमें हमने पूछा था कि क्या उन्होंने हरियाणा सरकार की अनुचित कृपा से शिकोहपुर प्लॉट का मूल्य बढ़ जाने का लाभ उठाया है और वाड्रा के साथ उनके किस तरह के रिश्ते हैं.
खेमका के रुचि लेने को 8 अक्तूबर को मीडिया में जोर-शोर से उठाया गया और खबरों में ऐसा संकेत दिया गया कि संभवत: वाड्रा के स्वामित्व वाली स्काइलाइट रियल्टी, रियल अर्थ एस्टेट, ब्ल्यू ब्रीज ट्रेडिंग, आर्टेक्स और नॉर्थ इंडिया आइटी पार्क्स ने भी इसी तरह का तरीका अपनाया हो. खेती की जमीन खरीदी गई, लैंड यूज में तब्दीली कराई गई और उसे रियल एस्टेट कंपनियों को बेच दिया गया.
लेकिन इसकी जांच करने वाले व्यक्ति को अपनी 21 साल की सेवा में 43वीं बार ट्रांसफर के आदेश का सामना करना पड़ा. हालांकि खेमका अपने तबादले से ‘संतुष्ट’ हैं लेकिन वे हरियाणा के ‘सबसे ज्यादा धकियाए गए अफसर’ के रूप में प्रसिद्ध हैं और उनके लिए श्सजा के तौर पर पोस्टिंग आम बात है. उनके दोस्त उन्हें ‘‘एहतियात’’ ईमानदार और दृढ़्य व्यक्ति बताते हैं. राज्य के इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम हरट्रॉन में मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से हटाए जाने से पहले 20 जुलाई, 2012 को उनकी तैनाती भूमि चकबंदी, रिकॉर्ड्स और रजिस्ट्रेशन विभाग में की गई थी. उन्होंने बिना टेंडर के बढ़ाई गई राशि पर प्रोजेक्ट्स के आवंटन पर सवाल उठाए थे.
ट्रांसफर के बाद भी खेमका डरे नहीं. मुख्य सचिव को 12 अक्तूबर को एक पत्र लिखकर उन्होंने अपने को अचानक हटाए जाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने को कहा. उन्होंने इस पत्र में सात ऐसे गांवों की सूची दी जिनमें ‘‘पंचायतों की सैकड़ों करोड़ रु. मूल्य की जमीन ऐसी रियल एस्टेट कंपनियों को दे दी गई जो कुछ दिनों पहले ही खड़ी हुई थीं.’’ इन गांवों में दिल्ली के पास गुडग़ांव-फरीदाबाद रोड के समानांतर स्थित बाद-गूजर, रोजका-गूजर, कोट, चिरसी, अंखिर, शिकोहपुर, मलिकपुर, बांगड़ और कालेसर हैं.
इसके बाद 15 अक्तूबर को उन्होंने हरियाणा के चकबंदी और भूमि रिकॉर्ड विभाग के डायरेक्टर जनरल सह रजिस्ट्रेशन इंस्पेक्टर जनरल के रूप में अपना अंतिम धमाका किया. उन्होंने तीन पेज का एक आदेश जारी कर शिकोहपुर के 3.53 एकड़ प्लॉट के मालिकाना हक तब्दीली को रद्द करने का आदेश दिया. लेकिन 24 घंटे के भीतर ही राज्य सरकार ने इस आदेश को खारिज कर दिया. 16 अक्तूबर को जारी स्पष्टीकरण में इस आदेश को नियम विरुद्ध बताते हुए कहा गया कि इसमें किसी भी पार्टी को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया.
खेमका का कहना है कि इस मामले में पक्षों को अपनी बात रखने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि इसके तथ्यों के बारे में कभी कोई विवाद नहीं रहा है. उन्होंने कहा, ‘‘सरकार यह जानती है कि मालिकाना हक तब्दीली को कोई भी सक्षम राजस्व अधिकारी ही नए सिरे से लागू कर सकता है.’’ उन्होंने इसे इसलिए खारिज किया था क्योंकि यह काम गुडग़ांव के सहायक चकबंदी अधिकारी ने किया था जो मालिकाना बदलाव के लिए सक्षम अधिकारी नहीं है.
खेमका का जन्म कोलकाता के एक मध्य वर्गीय मारवाड़ी परिवार में हुआ था. उनके पिता शंकरलाल खेमका एलायंस जूट मिल में एकाउंटेंट के रूप में काम करते थे. खेमका आइआइटी-खडग़पुर के टॉपर छात्र थे. उन्होंने 1990 में मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की. इसके एक साल बाद ही उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) में हो गया. खेमका और उनका परिवार 1997 से ही चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सरकार के ट्रांजिट क्वार्टर में दो कमरों के एक साधारण से मकान में रहता है, जबकि 2007 में उन्हें वित्तीय कमिश्नर के रूप में सीनियर रैंक में प्रमोशन मिल चुका है और कायदे से उन्हें एक बड़ा बंगला मिलना चाहिए. उनके स्टडी रूम में स्टील के फर्नीचर, एक बेड और एक जंग लगी पुरानी गोदरेज आलमारी दिखती है.
वाड्रा-डीएलएफ सौदे को रद्द करने के आदेश जारी करने से एक दिन पहले 14 अक्तूबर को उन्हें कई धमकी भरे फोन आए, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि उनका और उनके परिवार का बहुत बुरा हश्र होगा. ऐसी कॉल में उनको जान से मारने के लिए सुपारी देने की भी धमकी दी जा रही थी. खेमका ने इसे ‘‘चिंताजनक’’ बताया. उनके परिवार को कोई सुरक्षा नहीं मिली हुई है और उनका 18 वर्ष से कम उम्र का बेटा अक्सर चंडीगढ़ से दक्षिण भारत के अपने कॉलेज तक आता-जाता रहता है. इस अधिकारी के सुरक्षा मुहैया कराने के अनुरोध को हरियाणा के मुख्य सचिव पी.के. चौधरी ने नजरअंदाज कर दिया है.
अशोक खेमका पर बहुत ज्यादा दबाव है जो साफ दिख रहा है. 16 अक्तूबर को टीवी पर चलने वाली लंबी बहसों में कम-से-कम दो बार खेमका फफक कर रो पड़े. वे कहते हैं कि उन्हें किसी बात का डर नहीं है क्योंकि वे सही हैं. फिर भी वे कहते हैं कि, ‘‘इसके बावजूद अगर कोई कीमत चुकानी पड़ती है तो मैं इसे अपना नसीब ही समझूंगा.’’

