हरियाणा में रोहतक जाने वाली सड़क एक ओर ऊबड़-खाबड़ गलियों की ओर बढ़ जाती है. इनमें से एक गली हरियाणा के सोनीपत के आर्या नगर को जाती है. 13 अक्तूबर शनिवार की सुबह यहां ट्रैक्टरों की भारी भीड़ जमा थी. गली में अगल-बगल दिख रहे घर चमकीले रंगों से पुते थे. आयरन नाम के जिम और लवली नाम के फोटो स्टुडियो के बगल की दीवार पर ‘अंग्रेजी बोलना सीखें’ लिखा था. एक पतली पथरीली सड़क पर औरतें बच्चों को संभालते हुए झुंड में बैठी थीं.
पूछने पर कि छोटू राम जाट की धर्मशाला कहां है? बच्चों की मां फूलपत्ती देवी ने एक नारंगी इमारत की ओर इशारा किया. फिर उसने पूछा, ‘‘हां क्या चल रहा है?’’ बलात्कार की घटनाओं को लेकर पूरे हरियाणा के खापों की सभा सर्व खाप महापंचायत. उसने बेपरवाही के साथ पूछा, ‘‘वे किसके बारे में बातें कर रहे हैं?’’ हमने कहा, ‘‘वे औरतों के बारे में बातें कर रहे हैं.’’
हरियाणा में बलात्कार की घटनाओं की मानो बाढ़-सी आ गई है: पिछले एक महीने में 16, जनवरी से जून तक 367 और पिछले साल 733. खाप पंचायत अपनी मर्जी की अदालतें या कंगारू कोर्ट चलाता हैं और गांवों में अपनी तरह के नियम-कानून थोपते हैं. इस पंचायत की ओर से जारी एक मध्ययुगीन फैसले ने राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है. लड़के-लड़कियों की शादी छोटी उम्र में हो जानी चाहिए जिससे उनकी ‘‘शारीरिक जरूरतों की पूर्ति हो सके.’’
फूलपत्ती को वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता. वह एक ऐसी दुनिया में जी रही है जहां औरतों से जुड़े सभी फैसले पुरुष लेते हैं. वह जानती है कि औरतों की बात तो छोड़ ही दें, मर्दों में भी शायद ही कोई होगा जो खाप के फरमान के खिलाफ जाएगा. ऐसा करने पर उसकी संपत्ति, इज्जत और जिंदगी भी दांव पर लग सकती है.
सोनीपत के एक गांव के प्रधान मलिक खाप के सतबीर सिंह कहते हैं, ‘‘खापों का इतिहास सातवीं सदी में थानेसर के राजा हर्षवर्धन के समय से चला आ रहा है.’’ ईसा पूर्व पहली सदी में क्षत्रपी या कबीलों की रियासतों का जिक्र मिलता है जिससे यह शब्द निकला. आज खाप वंशों, जातियों और उप-जातियों या गोत्र का एक समूह है. पौराणिक काल की आचार संहिता के मर्यादा के पैमाने को इसने अपने शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बनाया है.
सतबीर ने कहा, ‘‘खाप राजा हर्ष के तय किए गए मर्यादा के नियमों को मानते हैं, हमारे लिए एक ही गोत्र में शादी करना दुराचार कहलाता है. जो भी इसे नकारता है उसे कठोर फरमानों का सामना करना पड़ता है और कड़ी-से-कड़ी सजा भुगतनी पड़ती है. “हुक्का-पानी बंद.’’ वास्तविकता और भी अमानवीय है. सजा झेल रहे परिवार से गांव में कोई बात नहीं करता. संपत्ति छीन ली जाती है, यहां तक कि मौत का हुक्म भी सुनाया जाता है.
वे कहते हैं, ‘‘हम अपने नैतिक मूल्यों के अनुसार रहते हैं, मर्यादा की रक्षा किसी भी कीमत पर करनी होती है और इसके लिए लोग किसी की जान ले सकते हैं और जान भी दे सकते हैं. पर लोगों को यह बात नहीं समझ आती और हमें तालिबानी या दबंग करार दिया जाता है.’’
मर्यादा और आर्थिक संकट मिलकर एक विस्फोटक स्थिति पैदा करते हैं. जाटों की पहचान खेती-बाड़ी से जुड़े समुदाय के रूप में होती है. आर्या नगर में मलिक खाप के एक सदस्य और सेना के रिटायर्ड मेजर ओम पाल सिंह का कहना है, ‘‘परंपरागत रूप से राज्य की आबादी का एक-तिहाई हिस्सा हम लोगों का है और लगभग 60 फीसदी जमीन हमारी है.’’
दरअसल, पंजाब लैंड एलीनिएशन ऐक्ट 1901 ने जाटों को जमीन का मालिकाना हक दिया पर दलितों को नहीं. हाल के वर्षों में रिजर्वेशन की वजह से नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में दलितों को हो रहे फायदे और उनकी बढ़ती समृद्धि देखकर तनाव का माहौल बनने लगा है. शायद यही वजह है कि हरियाणा में बलात्कार की जितनी भी घटनाएं हुईं उनमें ज्यादातार में दलित लड़कियां ही शिकार बनी हैं.
धर्मशाला में 10 बजे से लोग इकट्ठा होने लगे. पांच सबसे बड़े कुलों-मलिक, दहिया, हुड्डा, नैन और दलाल-के अलावा राज्यभर की 100 पंचायतों और करीब सभी 300 गोत्रों के प्रतिनिधि वहां मौजूद हैं. झ्क सफेद जैकेट, सफेद धोती-कुर्ते, कलफदार पगड़ी में सजे-संवरे अपनी छड़ी ठुकठुकाते बुजुर्ग वहां पहुंच रहे हैं. एक-दूसरे से गले लगकर वे चारपाई पर बैठते हैं और हुक्का गुडग़ुड़ाने लगते हैं.
इनमें कुछ रिटायर्ड फौजी भी हैं जो शर्ट, कैप और स्पोर्ट्स शूज में हैं. वहीं चाय का एक स्टॉल भी लगा है. वहां मौजूद उम्रदराज लोगों में इक्का-दुक्का युवा चेहरे मौजूद हैं जो बुजुर्गों के लिए बीड़ी सुलगा रहे हैं, उनके हुक्के घुमा रहे हैं.
अपने प्रमुख का इंतजार करते विभिन्न खाप के लोग अपना अलग-अलग समूह बनाकर बातचीत कर रहे हैं. पीली पगड़ी में एक युवक हरेक झुंड में जाकर अपना नजरिया जता रहा है, ‘‘सरकार को खापों के साथ उलझना नहीं चाहिए, खासकर शादी के मुद्दे पर. यहां तक कि हिंदू विवाह अधिनियम भी कहता है कि रीति-रिवाज पवित्र हैं. खाप को लोक अदालत का दर्जा मिलना ही चाहिए.’’ बुजुर्ग उसकी बात पर सहमति जताते हैं.
कंवर वंश का एक सदस्य कहता है, ‘‘सोनिया को बता दें कि खाप कभी भी अन्याय नहीं करता. बिना ताकत दिखाए हम समाज को कैसे संरक्षित कर सकते हैं.’’ यह सोनिया गांधी की उस टिप्पणी के जवाब में था जो उन्होंने उस समय दी थी जब वे बलात्कार की शिकार दलित लड़की के परिवार से मिलने जींद पहुंची थीं. उन्होंने कहा था, ‘‘खाप कानून नहीं तय कर सकते हैं.’’ लेकिन जब उनसे पूछिए कि हरियाणा में ज्यादातर दलित लड़कियां ही क्यों बलात्कार का शिकार हो रही हैं और दोषी जाट हैं तो सब चुप हो जाते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह खापों को बदनाम करने के लिए किया जा रहा राजनैतिक दुष्प्रचार है. हमारे होंठों पर ताला लगा दिया गया है. आजकल सिर्फ मीडिया या अदालतें ही बोलती हैं.’’
ओम पाल सिंह कहते हैं कि खाप प्रमुख ‘‘घर जाकर या फोन’’ से हमेशा अपने क्षेत्र का हाल-चाल लेते रहते हैं, वे अपने क्षेत्रों का ‘‘ध्यान’’ रखते हैं और सबकी भलाई का ख्याल रखते हैं. वे कहते हैं, ‘‘अगर किसी की बेटी की शादी नहीं हो पा रही है तो हम शादी के खर्चे की जिम्मेदारी उठाते हैं.’’ अगर किसी ने किसी के साथ गलत किया या किसी की हत्या की तो खाप का न्याय सबसे सस्ता और सबसे अच्छा होता है. वे एक घटना याद करते हुए बताते हैं जब दो परिवारों के बीच संपत्ति विवाद के कारण प्रतिशोध में कई हत्याएं हो गई थीं.
वे कहते हैं, ‘‘तीन साल की लगातार मेहनत के बाद हम दोनों परिवारों को आमने-सामने लाने में कामयाब हुए. हमने कहा, तुम एक-दूसरे का हाथ थामो और साथ में बैठकर खाना खाओ. अगर तुम नहीं खाओगे तो हम भी नहीं खाएंगे.’’ उनका दावा है कि खाप अदालतें बेहतर काम करती हैं. वे कहते हैं, ‘‘अगर आप लोगों को आमने-सामने खड़ा कर देंगे तो वे कैसे झूठ बोल सकते हैं, लेकिन अगर आप अदालत जाते हैं तो मामला किस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाएगा, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. सरकार को हमसे सीखना चाहिए.’’
एक-एक करके सभी खाप प्रमुख इकट्ठे हो रहे थे. सबसे आखिर में दो सबसे बड़े कुलों के प्रमुख दादा बलजीत सिंह मलिक और रणबीर दहिया पहुंचते हैं. सभी ने अपनी जगह ले ली और कार्यवाही शुरू की गई. खाप सदस्य वहां की कार्यवाही से जुड़ी बातों को नोट करने लगे. वे एक-दूसरे के कानों में फुसफुसाकर कुछ पूछते-बतियाते और सभी समूह से उस पर चर्चा करने लगते. कुछ अपनी बात को पुरजोर तरीके से बताने के लिए छपे हुए पर्चे बांट रहे थे.
हंसी मजाक भी साथ-साथ चल रहा था और खींच-तान भी चल रही थी. महापंचायत के प्रवक्ता सूबे सिंह सामैन ने जोर की आवाज लगाई: ‘‘माइक्रोफोन का इस्तेमाल न करें. आप आपस में वैसे ही बात करें जैसे पंचायत में करते हैं. यहां रिपोर्टर्स भी मौजूद हैं.’’ महापंचायत के अध्यक्ष नफे सिंह नैन ने उन मामलों को पेश किया जिस पर चर्चा होनी है: बलात्कार, आरक्षण और खाप की छवि.
नैन की अनुमति लेकर सदस्य एक-एक करके खड़े होकर बलात्कार के मसले पर अपनी बात रख रहे थे: ‘‘जब तक लड़की इशारा नहीं करती, मर्द उसके पास नहीं जाते,’’ ‘‘अगर तुम दो इंच की चड्ढी पहनकर बाहर निकलोगी तो तुम बलात्कार को न्योता दे रही हो’’, ‘‘बलात्कार की बढ़ती घटनाओं की वजह टीवी और मीडिया है. हर तरफ अश्लीलता का नाच हो रहा है.’’
महिलाओं, सरकार और अदालतों के विरुद्ध आवाज उग्र होने के साथ ही दादा बलजीत सिंह मलिक ने अचानक एजेंडा बदलते हुए माइक्रोफोन पर ऐलान किया, ‘‘हम सरकार के साथ हैं. अगर सरकार कहती है कि लड़कियों के लिए शादी की उम्र 18 साल हो, तो हम इसे मान लेते हैं. बलात्कारियों की न तो कोई उम्र होती है, न जाति और न ही धर्म. हम उन सबकी निंदा करते हैं. हम कन्या भ्रूण हत्या को हत्या मानते हैं और इसकी भी निंदा करते हैं. हरियाणा ऐसा राज्य नहीं जहां देशभर के मुकाबले सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हुई हों, न ही हमारे यहां किसी वीआइपी का नाम इन मामलों में उछला है.’’
कुछ देर के लिए सब सकते की हालत में दिखे और उसके बाद शोर होने लगा. किसी भावी हंगामे की आशंका से आयोजकों के पसीने छूटने लगे थे. सतबीर सिंह ने माइक्रोफोन से आवाज लगाई, ‘‘भाइयो, शांत हो जाएं, क्या यह पंचायत है या कुछ और?’’ फिर शांति छा गई.
जिन लोगों ने सरकार, महिलाओं और अदालत के खिलाफ बोला था, उन्होंने पाला बदल लिया. अब तक शांत बैठी संतोष दहिया ने, जो कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं और सर्व खाप की महिला विंग की प्रमुख हैं, बोलना शुरू किया: ‘‘हमने कभी नहीं कहा कि शादी की उम्र बदल दो. बेटी बेटी ही है. हम बस यह कहना चाहते हैं कि औरतों को अपनी मान-मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए. मीडिया हमारे नजरिए को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है.’’
इस लंबे दिन के खत्म होने पर दादा बलजीत सिंह मलिक सभी सदस्यों के पास जाकर प्यार और दोस्ताना अंदाज में बातें कर रहे हैं. अपने उग्र साथियों के पास आकर वे हौले से बातें करते हैं. एक संभ्रांत जमींदार परिवार में जन्मे 61 साल के लंबे और सुडौल गठन वाले बलजीत सिंह 100 एकड़ जमीन के मालिक हैं. उन्होंने कानून की पढ़ाई की है और राज्य सरकार की विभिन्न इकाइयों में शीर्ष पदों पर काम किया है. बिना पगड़ी के वे दिल्ली के कोई नेता लगते हैं.
लेकिन अपने कुल में वे इसी पगड़ी की बदौलत राज करते हैं. यह पगड़ी कई पीढिय़ों से उनके परिवार की थाती है जो अगली पीढ़ी में पहले जन्मे बच्चे को प्रमुख की मौत के बाद मिलती है. मलिक कुल के प्रमुख के तौर पर वे इस पगड़ी की जिम्मेदारी 1993 से संभाल रहे हैं. वे भी एक दिन इसे अपने बड़े बेटे को सौंप देंगे.
वे कहते हैं, ‘‘पुरानी परंपरा गलत ही हो, ऐसा नहीं है, पर इसे आज के समय के साथ मेल बिठाना होगा.’’ तभी तो यह जानकर अचरज नहीं होता कि उनकी बेटी एमबीए कर चुकी है और कॉर्पोरेट क्षेत्र में मैनेजर है. उन्होंने खाप के सामाजिक प्रभुत्व का इस्तेमाल कर कई सुधार किएरू मद्यपान, शादियों में होने वाली फिजूलखर्ची, दहेज प्रथा के खिलाफ मुहिम चलाई और विधवा विवाह का समर्थन किया.
फिर भी उन्हें महसूस होता है कि आने वाले समय में खाप की शक्तिको आजमाया जाना बाकी है. वे कहते हैं, ‘‘मेरी पगड़ी मेरी इज्जत है पर इससे भी बढ़कर यह मेरा फर्ज और लोगों के प्रति मेरी जिम्मेदारी है.’’
अगर कोई अपनी घड़ी का समय दुरुस्त करना भूल जाए तो क्या होता है? वह यही कहता है, ‘‘मेरी घड़ी बिल्कुल सही समय बता रही है. मेरी घड़ी सबसे अच्छी है.’’ ऐसा लगता है कि खाप के मन के भीतर भी एक घड़ी टिक्-टिक् कर रही है, पर उसकी सुई आगे की ओर खिसक ही नहीं रही. उधर बाहर की दुनिया विकास की राह पर तेजी से बढ़ती रही है जो उनके लिए रुक नहीं सकती.
राष्ट्र को आधुनिक बनाने वाली सारी संस्थाओं-राज्य, अदालतें, मीडिया वगैरह से उनका विश्वास उठ चुका है, उधर अतीत से एक सिरा पकड़कर वे अपनी ही औरतों को खुद से अलग काट रहे हैं. खाप के सामने दो ही रास्ते हैं: या तो वे समय के पंख लगाकर भविष्य की राह पर चल पड़ें या अपनी चारदीवारियों के अंदर ही टूटकर बिखर जाएं. चुनना उन्हें ही है.

