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अमन-चैन की वादी में उबलते नौजवान

उमर अब्दुल्ला से घाटी के युवाओं का मोहभंग हो चुका है. नई पीढ़ी अब सरकारी दमन या धार्मिक कट्टरता की त्रासदी से उबरकर नौकरी और आर्थिक तरक्की चाहती है.

जम्‍मू और कश्‍मीर
जम्‍मू और कश्‍मीर
अपडेटेड 17 अक्टूबर , 2012

जब 5 अक्तूबर को राहुल गांधी कश्मीर पहुंचे, तो उनसे संवाद के लिए कश्मीर यूनिर्वसटी ने जिन 1,500 युवाओं को चुना उनमें 22 वर्षीय आमिर खान का नाम छूट गया. यूनिर्वसटी कनवेंशन सेंटर के भीतर राहुल कश्मीर के युवाओं को कॉर्पोरेट भारत से जोडऩे का पुल तैयार कर रहे थे, तो एमबीए का छात्र आमिर बाहर जुटे नाराज प्रदर्शनकारियों के साथ नारे लगा रहा था.

घाटी के युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए यहां प्राइवेट सेक्टर की ओर से बड़े निवेश आकर्षित करने संबंधी उमर अब्दुल्ला के चुनावी वादे के सिलसिले में उनकी इस पहल को सिरे से खारिज करते हुए वह कहता है, ‘‘यह अब तक का सबसे बड़ा धोखा है. ये लोग सिर्फ फोटो खिंचवाने आए थे.” आमिर के शब्द उसकी पीढ़ी की हताशा को बयान कर रहे हैं, जिनकी संख्या एक करोड़ दस लाख आबादी वाले इस राज्य की आधी है.

इत्तेफाक ही है कि इस मोहभंग के बीच घाटी में कट्टर वहाबी इस्लाम की जड़ें मजबूत हो रही हैं. इसके प्रसार में लगे सऊदी अरब से चलने वाले अमीर संगठन अहल-ए-हदीस का दावा है कि राज्यभर में आज उसके 15 लाख अनुयायी हैं और वह यहां के प्रभावशाली समुदाय हनफी सुन्नी युवाओं को पिछले पांच साल के दौरान बनी 700 नई मस्जिदों की ओर खींच रहा है.

आमिर कश्मीर की गाजा पट्टी कहे जाने वाले श्रीनगर के नौहट्टा के पत्थरबाजों में से नहीं है. वह वहाबी भी नहीं है, न ही उसका अलगाववादी हुर्रियत से कोई सरोकार है. वह ईमानदार छात्र है जो पढ़ाई के बाद बढिय़ा नौकरी करना चाहता है. हम उसकी तस्वीर खींचना चाहते थे, लेकिन हमें रोकते हुए वह कहता है, ‘‘इससे तो मेरा करियर ही चैपट हो जाएगा.” वह बताता है कि यहां सिर्फ फेसबुक पर सरकार को नापसंद सामग्री पोस्ट करने के आरोप में छात्रों को उठा लिया गया है और जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत जेलों में डाल दिया गया है.

चार साल पहले तक जो पीढ़ी 42 वर्षीय उमर अब्दुल्ला के उत्साह और सीधे बोलने की अदा की कायल थी, आज उनके छह साल के कार्यकाल के बीच में ही उनसे नाराज हो गई है. उनका राज कांग्रेस के साथ अजीब किस्म के डावांडोल गठजोड़ का नतीजा है, जहां केंद्र से उन्हें थपकियां मिलती हैं तो घाटी के भीतर कांग्रेसी दबी जुबान में उनके खिलाफ  बोलते नजर आते हैं.

कुपवाड़ा के लंगाटे से निर्दलीय विधायक और पेशे से इंजीनियर 45 वर्षीय राशिद कहते हैं, ‘‘उनकी हालत मनमोहन सिंह से अलग नहीं है.” राशिद की तरह ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जो मानते हैं कि उमर अब्दुल्ला के टिके होने के पीछे 10 जनपथ का हाथ है.

वे कहते हैं, ‘‘मनमोहन सिंह की ही तरह उमर अब्दुल्ला भी अपनी नौकरी बचाने में लगे हुए हैं और दिल्ली से जारी हुए आदेशों का पालन करना ही अपना परम कर्तव्य समझते हैं.” कुलगाम से विधायक और राज्य सीपीएम के सचिव मोहम्मद यूसुफ तारिगामी का कहना है, ‘‘लोंगों ने उनसे जो उम्मीद पाली थी और उन्होंने बदले में जो दिया है, दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है.”

अनंतनाग जिले के अवंतीपुरा में एक खूबसूरत पहाड़ी पर बना नया संस्थान इस्लामिक यूनिर्वसटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी (आइयूएसटी) कश्मीर के युवाओं की बेचैनी की सबसे सटीक अभिव्यक्ति है. घाटी का दूसरा एयरफील्ड इसी जगह स्थित है. इस संस्थान को महबूबा मुफ्ती सरकार ने 2005 में बनवाया था. इसके पड़ोस में सूफी संत हज़रत सैयद हसन मंतकी की दरगाह है.

आइयूएसटी का खूबसूरत कैंपस हर किस्म के विचारों और असहमतियों को जगह देता है. यहां कोई ड्रेस कोड नहीं है, श्रीनगर के दुर्गानाथ रोड पर स्थित कैफे कॉफी डे यहां के छात्रों की पसंदीदा जगह है तो हिजाब पहनना यहां अकसर फैशन समझ जाता है. यहीं पढऩे वाली 24 साल की एमबीए द्वितीय वर्ष की छात्रा आसिमा अल्ताफ  कहती हैं, ‘‘हम कुछ भी पहनें, इससे किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए.”

पत्रकारिता विभाग की प्रमुख 27 वर्षीया मुनिसा कादरी बताती हैं कि आइयूएसटी में कश्मीर के सामाजिक रूप से पिछड़े इलाकों के विद्यार्थी पढऩे आते हैं. लेकिन यहां भी मुख्यमंत्री में भरोसा कम होता जा रहा है. रोजाना की दिनचर्या से फेसबुक और ट्विटर के गायब हो जाने पर गुस्साए 22 वर्षीय सलमान इरशाद कहते हैं, ‘‘वे ठीक-ठाक शख्स हैं, लेकिन उन्होंने सोशल नेटवर्क को ही ब्लॉक कर दिया जो हमारी आजाद अभिव्यक्ति का आखिरी मंच था.”

हाल ही में एक इस्लाम विरोधी वीडियो यू-ट्यूब पर डाले जाने के बाद हुए सार्वजनिक प्रदर्शनों के मद्देनजर यहां फेसबुक और ट्विटर पर रोक लगा दी गई है. सलमान पूछते हैं, ‘‘जिस अमेरिकी ने यह वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड किया था, अगर उसे अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है तो हमें क्यों नहीं?”

दूसरी ओर मुख्यमंत्री दावा करते हैं कि किसी भी साइट पर रोक नहीं लगाई गई है. उन्होंने बताया, ‘‘हमने सर्विस प्रोवाइडर को नेटवर्क की स्पीड सिर्फ कम करने को कहा था ताकि उस वीडियो वाली साइटों के खुलने में दिक्कत पैदा हो सके.” लेकिन राज्य के गृह मंत्री नासिर असलम वानी कुछ और ही कहते हैं, ‘‘हमने गूगल से वह वीडियो हटा लेने को कहा था.” दोनों अधूरे सच हैं. घाटी के युवा बड़े पैमाने पर प्रीपेड मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उन पर एसएमएस सुविधा अब भी बंद है.

कश्मीर यूनिर्वसटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के मोहम्मद अराफात ब्लैकबेरी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उनके जैसे लोगों को मैसेंजर सेवा का इस्तेमाल करने के लिए एक साल तक यह साबित करने की जरूरत रखी गई है कि उन्होंने जिम्मेदारी से मोबाइल का इस्तेमाल किया है. कश्मीर के युवा मोबाइल फोन पर लगी इन बंदिशों को ‘भेदभाव’ के तौर पर देखते हैं. आइयूएसटी में पढऩे वाली 22 वर्षीया एमबीए सेकेंड ईयर की छात्रा जिल्लेहुमा शाह कहती हैं कि उन्हें लगातार ‘सौतेला नागरिक’ होने का एहसास होता है जिसके साथ भारत सरकार और राज्य प्रशासन भेदभाव बरत रहे हैं.

उमर अब्दुल्ला की बेरोजगारी भत्ता योजना भी संकट में है. दिवंगत शेख अब्दुल्ला की जन्मशती पर 5 दिसंबर, 2009 को राज्य सरकार ने शेरे-कश्मीर युवा रोजगार और कल्याण योजना शुरू की थी, जिसमें बेरोजगार शिक्षित युवाओं को बेरोजगारी भत्ता और छोटे कर्ज दिए जाने का प्रस्ताव था.

शुरू में 2010-11 के दौरान 24,548 लाभार्थियों को इसमें शामिल किया गया, लेकिन अगले ही साल 33,000 से ज्यादा लाभार्थियों को इसमें शामिल करने के लिए राज्य सरकार को अपने बजट में बदलाव करना पड़ा. हर महीने भत्ता समय पर मिलना तो दूर की बात है, राज्य के रोजगार केंद्रों में दिसंबर, 2008 तक रजिस्टर्ड 80,529 बेरोजगार युवाओं में से यह योजना बमुश्किल आधे तक पहुंच सकी है. उमर का अपना अंदाजा है कि राज्य में छह लाख से ज्यादा शिक्षित बेरोजगार युवा हैं लेकिन सरकार में खाली पड़े एक लाख पदों के आंकड़े को देखें तो हकीकत ज्यादा साफ हो जाती है.

उमर की कामयाबी का अगर इकलौता दावा कुछ हो सकता है, तो वह अप्रैल, 2011 के पंचायत चुनाव हैं, जिसमें करीब 85 फीसदी ग्रामीण कश्मीरियों ने वोट दिया था ताकि उनकी जिंदगी संवर सके. यह दावा भी आज खतरे में है क्योंकि अब तक इस बात पर सहमति नहीं बन सकी है कि स्थानीय निकायों को अधिकार दिए जाएं अथवा नहीं.

उमर की नई दिक्कत यह है कि सरपंचों पर आतंकवादियों की नजर गड़ गई है. सितंबर में दो सरपंचों की हत्या से यह संकट सामने आया. 23 सितंबर को बारामुला के नौपुरा जागीर गांव के उप-सरपंच 38 वर्षीय मोहम्मद शफी तेली की दो लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी.

उससे पहले महीने की 10 तारीख को पलहालन गांव के सरपंच 60 वर्षीय गुलाम मोहम्मद यातू की भी ऐसे ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इन घटनाओं ने एक बार फिर उत्तरी कश्मीर में आतंकवाद की वापसी की आशंकाओं को बल दिया है जिसके डर से कई सरपंचों और उप-सरपंचों ने अपने पद से इस्तीफा दे डाला. नौपुरा के रहने वाले 21 वर्षीय सादिक राही कहते हैं, ‘‘हम अब अकेले बाहर नहीं निकलते.”

पुलिस अफसरों का कहना है कि जेलों से लौटकर अपने गांवों में वापस आए 20,000 पूर्व आतंकियों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. कश्मीर घाटी की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार आइजी एस.एम. सहाय का कहना है, ‘‘यही लोग आगामी किसी भी समस्या का हिस्सा हो सकते हैं.” घाटी में 2001 के बाद अब जाकर आतंक और घुसपैठ में भले सबसे ज्यादा कमी देखने को मिल रही हो, लेकिन सहाय पिछले दो महीनों के दौरान सोपोर में हथगोले फेंकने के आरोप में पकड़े गए तीन लड़कों का हवाला देते हुए उनकी कम उम्र पर अचरज जताते हैं. इनकी उम्र 12, 13 और 14 साल है.

इसके बावजूद घाटी में अमन लौटाने के लिए उमर की तारीफ  की ही जानी चाहिए. इस जुलाई तक 10 लाख से ज्यादा सैलानी घाटी में आए जबकि इन गर्मियों में अमरनाथ यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अभूतपूर्व रूप से सवा छह लाख रही. पर्यटन से होने वाली कमाई की उम्मीद और उत्साह में अब कश्मीर के युवा सड़क पर उतरने से कतराने लगे हैं, जो कि 2009 और 2010 में रोज का नजारा हुआ करता था. अश्लील कपड़ों में आने वाले विदेशी सैलानियों के खिलाफ 4 जुलाई को प्रस्तावित कार्रवाई के संबंध में जमात-ए-इस्लामी के प्रवक्ता जाहिद अली के आह्वान को भी इन नौजवानों ने कोई तवज्जो नहीं दी.

बदलाव श्रीनगर में भी आया है, जहां पहले शाम सात बजे के बाद कफ्र्यू लग जाता था. आज यहां खाने-पीने की दुकानें देर तक खुली रहती हैं. खय्याम चैक पर आज आपको सैलानी रोगन जोश और टिक्के के लिए कतारों में खड़े दिख जाएंगे. एक ओर ब्रॉडवे होटल में उज़्बेक फूड फेस्टिवल चालू है तो दूसरी ओर अहदूस होटल की इकलौती पहचान उससे छिन गई है जहां आधी रात के बाद भी वाजवान मिल जाया करता था. अब कई होटलों में वाजवान मिलता है.

इन गर्मियों में आया बदलाव 31 वर्षीय खुर्रम हुसैन जैसे उद्यमियों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है. खुर्रम नगीन झील के किनारे अपना खानदानी होटल दार-एस-सलाम चलाते हैं.

5 अक्तूबर को वे भी राहुल गांधी, रतन टाटा, कुमार मंगलम बिरला और दूसरी बड़ी शख्सियतों से ताज विवांता में मिल आए हैं. उन्हें उम्मीद है कि आठवें दशक के मध्य में यहां जैसे हालात थे, उनकी वापसी होगी ‘‘जब आप सड़क पर बैठकर साथ में बियर पी सकेंगे.” इसके बावजूद उन्हें डर है कि कश्मीर के पर्यटन उद्योग की राह में बढ़ता कट्टरपंथ कहीं रोड़ा न बन जाए.

21 वर्षीय काशिफ अहमद खान ने इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में बढिय़ा करियर छोड़कर ई-कॉमर्स पोर्टल कश्मीर बॉक्स तैयार किया है. यह पोर्टल हजारों शिल्पकारों को उनका माल विदेश में बेचने की सहूलियत देता है और उनके उत्पाद की डिजाइन और तकनीक को भी दुरुस्त करने में मदद करता है. वे कहते हैं, ‘‘आज के कश्मीरी नौजवानों के लिए आदर्श चेहरा बॉलीवुड में नहीं है. उन्हें अब नारायणमूर्ति जैसों की जरूरत है.”

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