आर्थिक तेजी के दौर में वित्त मंत्री होना आसान होता है. लेकिन जब समय खराब हो तो स्थिति बहुत अलग होती है.’’ बेहद संकोची पी. चिदंबरम ने अपने सहयोगियों से यह बात तब कही थी, जब जून के अंतिम हफ्ते में यह साफ हो गया था कि राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़ रहे प्रणब मुखर्जी का उत्तराधिकारी उन्हें ही बनाया जाएगा. चिदंबरम को चिंता इस बात की थी कि आर्थिक पुनरुद्धार के लिए जरूरी कड़े सुधारवादी कदमों को आगे बढ़ाने की खातिर उन्हें राजनैतिक समर्थन मिल पाएगा या नहीं. विडंबना यह कि उन्हें सोनिया गांधी का समर्थन हासिल कर लेने का तो पूरा भरोसा था, लेकिन वे इस बात पर आश्वस्त नहीं थे कि प्रधानमंत्री इसके लिए उनका समर्थन करेंगे.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘चिदंबरम की चिंता इस बात को लेकर थी कि अपने कार्यकाल के अंतिम सुस्त दौर में क्या प्रधानमंत्री के पास जोखिम उठाने की राजनैतिक भूख है, जैसी कि परमाणु करार वाले दिनों में थी.’’ 1 अगस्त को पद ग्रहण करने के बाद चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से कहा था कि काम करने के लिए उनके पास एक महीने का हनीमून (खुशनुमा) दौर है. सूत्रों के अनुसार, चिंतित चिदंबरम ने अधिकारियों से कहा था, ‘‘इसके बाद जो गड़बड़ी विरासत में मिली है, चाहे वह महंगाई हो या वित्तीय घाटा, उसका दंड मुझे भोगना पड़ेगा.’’
केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी के दो माह पूरे होने के बाद 8 अक्तूबर को जब चिदंबरम नई दिल्ली में सरकार के वार्षिक आर्थिक संपादकों के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करने बैठे तो आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहे थे. उनके लिए संकोच करने की बात भी कम ही थी. वित्त मंत्री ने अपने छोटे हनीमून दौर के लिए जो कुछ भी तय किया था, वह सब हासिल कर लिया था. उन्होंने कहा, ‘‘निष्क्रियता के भाव से छुटकारा पाने और फिर से ऊंची बढ़त दर का लक्ष्य हासिल करने के लिए पिछले कुछ हफ्तों में कई कदम उठाए गए हैं.’’
उनके कार्यभार ग्रहण करने के पहले आठ हफ्तों में ही सरकार ने कई बड़े सुधारवादी उपायों की घोषणा की है: मल्टी-ब्रांड रिटेल और एविएशन में एफडीआइ डीजल-एलपीजी सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना. इसे तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का राजनैतिक ब्लैकमेल भी नहीं रोक पाया. यूपीए से उनके बाहर निकलने से सरकार को अपना यह इरादा जाहिर करने की हिम्मत मिल गई कि अरसे से लंबित बीमा क्षेत्र में एफडीआइ सीमा बढ़ाने और पेंशन में एफडीआइ की इजाजत देने जैसे अन्य सुधारवादी उपायों को भी संसद के शीतकालीन सत्र में आगे बढ़ाया जाएगा. आखिरकार 18 महीने के नीतिगत पक्षाघात की स्थिति से सरकार मुक्त हो गई थी.
प्रधानमंत्री के दाहिने हाथ
चिदंबरम ने सुधार की जरूरत को कांग्रेस के सामने उठाया
प्रधानमंत्री की राजनैतिक इच्छाशक्ति संबंधी चिदंबरम की चिंता निराधार साबित हुई. कुछ अधिकारियों का कहना है कि क्रमिक रूप से सुधारवादी घोषणाएं करने की तैयारी तो 27 जून को ही कर ली गई थी, जब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रपति चुनाव में उतरे थे. मनमोहन सिंह फौरन चिदंबरम को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने उन्हें सलाह दी कि वे राष्ट्रपति चुनाव खत्म होने तक इंतजार करें.
यह बात छिपी नहीं है कि मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर मतभेद थे. जब आर्थिक वृद्धि की दर कम होकर वर्ष 2011-12 में 6.4 फीसदी और 2012-13 की पहली तिमाही में 5.5 फीसदी पर आ गई तो मनमोहन को सुधार करना जरूरी लगने लगा. अधिकारियों के मुताबिक, मनमोहन सुधारों को लेकर सहमत हो गए थे, लेकिन उन्हें तसल्ली नहीं थी कि कांग्रेस पार्टी इस मामले में उनका साथ देगी. सुधारों की जरूरत पर पार्टी को मनाने के लिए उन्हें चिदंबरम जैसे वित्त मंत्री की जरूरत थी.
एक अधिकारी ने बताया, ‘‘चिदंबरम और प्रधानमंत्री एक तरह की आर्थिक सोच रखते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के विपरीत चिदंबरम इस मामले में मुखर हैं और पार्टी के पुराने ख्यालात वाले नेताओं से भिडऩे को तैयार रहते हैं.’’
चिदंबरम की एक और खूबी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी करीबी है. एक सूत्र ने बताया, ‘‘चिदंबरम अपने गृह मंत्री के कार्यकाल से भी ज्यादा अब श्रीमती गांधी के करीबी हो गए हैं.’’ चिदंबरम ने सुधारवादी उपायों पर कांग्रेस और गांधी परिवार का पूरी तरह से और काफी खुलकर समर्थन हासिल कर लिया. इसे छोटी उपलब्धि नहीं कहा जा सकता. एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘जनरल तो प्रधानमंत्री ही हैं, लेकिन सेना का नेतृत्व चिदंबरम ने ही किया है.’’
चिदंबरम अपने पुराने फार्म में
पहले से विनम्र वित्तमंत्री ने चुनौतियों को पहचाना
वित्त मंत्री के रूप में अपनी नई पारी में चिदंबरम जिस एक चीज से दूर रहना चाहते हैं, वह है उनका ख्यात बौद्धिक अहंकार. 8 अक्तूबर को आर्थिक संपादकों के सम्मेलन में वे बेहद चतुराई से भविष्य में बढ़त या महंगाई के लिए किसी निश्चित आंकड़े का अनुमान जारी करने के जाल में नहीं फंसे. सरकार में उनके सहयोगी, खासकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन इस मामले में अपनी काफी साख गंवा चुके हैं.
चिदंबरम यह जानते हैं कि आर्थिक वृद्धि को फिर से तेजी के दौर में लाने का लक्ष्य कठिन है और नाटकीय उपायों से काम नहीं चलने वाला. उन्होंने जिस दिन संपादकों के सम्मेलन को संबोधित किया, उसके अगले ही दिन आइएमएफ ने 2012 के लिए भारत के विकास अनुमान को घटाकर 4.9 फीसदी कर दिया. यह आइएमएफ के जुलाई में जारी 6.1 फीसदी के अनुमान से कम है.
अगले छह महीने में महंगाई घटने की संभावनाओं को लेकर भी वित्त मंत्री काफी सचेत हैं. वे बहुत धैर्य से समझते हैं कि महंगाई दो वजहों से बढ़ सकती है: पहला, मांग बहुत ज्यादा होने और उसकी तुलना में सप्लाई कम रहने (यह कृषि जिंसों की कीमतों में तेज बढ़त की मुख्य वजह होती है) और दूसरा, राजस्व के मुकाबले सरकारी खर्च ज्यादा होना, जिससे सरकार उधार लेने को मजबूर होती है, इस प्रकार अर्थव्यवस्था में और धन आ जाता है जिससे महंगाई बढ़ती है.
उन्होंने स्वीकार किया कि इन दोनों स्थितियों से निबटने के लिए कोई तात्कालिक समाधान नहीं है. जब एक पत्रकार ने कीमतों में इजाफे पर जवाब के लिए जोर दिया तो चिदंबरम ने कहा, ‘‘आपके पास यदि कोई तात्कालिक समाधान हो, तो मुझे इसके बारे में आपसे बात करने में खुशी होगी.’’
चिदंबरम धीरे-धीरे रेट्रोस्पेक्टिव (पुरानी तिथि से लागू होने वाले) टैक्स सुधार से हुए नुकसान की भरपाई करने में लगे हैं. इस टैक्स व्यवस्था को फरवरी में पेश बजट में मुखर्जी लेकर आए थे. उन्होंने यूपीए1 के दौर के अपने सलाहकार पार्थसारथी सोम की सेवाएं लीं और उन्हें रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स के मामले में सुझाव देने के लिए बनी एक समिति का प्रमुख बनाया.
समिति ने सुझाव दिया है कि रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स व्यवस्था को हटा देना चाहिए. लेकिन इसके लिए संसद से मंजूरी लेना जरूरी है. चिदंबरम इससे बचना चाहते हैं. एक अधिकारी ने बताया, ‘‘चिदंबरम ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं जिसके लिए संसद से मंजूरी की जरूरत न पड़े.’’ सोम समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स मामलों में कोई भी जुर्माना या ब्याज न वसूला जाए. इससे वोडाफोन को भी न्यूनतम जुर्माना लेकर राहत दी जा सकती है.
भविष्य के प्रधानमंत्री
चिदंबरम अपने दोस्तों की मदद से शीर्ष पद के दावेदार हो सकते हैं
चिदंबरम के एजेंडे में अगला काम है विधेयकों को पारित करवाने के लिए सहयोगी दलों और विपक्ष को साधना. सुधार की गति बनाए रखने के लिए उन्हें बीमा, पेंशन और नए कंपनी बिल को संसद के शीत सत्र में पारित कराना होगा जो नवंबर के अंतिम हफ्ते से शुरू हो सकता है.
अधिकारियों के मुताबिक, चिदंबरम अरुण जेटली से इन विधेयकों पर समर्थन हासिल करने के लिए मिल चुके हैं. जेटली से चिदंबरम की घनिष्ठता के बारे में सबको पता है. लेकिन सवाल है कि क्या खुद जेटली में आर्थिक सुधारों के मामले में बीजेपी के विभिन्न नेताओं को मना सकने की कितनी क्षमता है.
इसमें चिदंबरम की परीक्षा हो जाएगी. प्रणब मुखर्जी के विपरीत चिदंबरम का विपक्ष या सहयोगी दलों के नेताओं से बहुत प्रगाढ़ रिश्ता नहीं है. उन्हें जेटली के अलावा और दूसरे दोस्त भी बनाने होंगे. चिदंबरम ने कहा है कि वे इस मामले में जल्दी ही सहयोगी दलों से बात करेंगे. लेकिन डीएमके नेता एम. करुणानिधि और एनसीपी के शरद पवार के अलावा उनके क्षेत्रीय नेताओं से करीबी संबंध नहीं हैं.
उदाहरण के लिए राष्ट्रपति के नामांकन में प्रणब मुखर्जी के समर्थन पर यूपीए के सहयोगी दलों को धन्यवाद देने के लिए जब जुलाई में सोनिया गांधी ने उन्हें दोपहर भोज दिया तो चिदंबरम सपा नेता मुलायम सिंह की बगल में ही बैठे हुए थे. लेकिन दोनों में सामान्य औपचारिकता के अलावा और शायद ही कोई बात हुई. चिदंबरम के लिए अब सिर्फ अर्थव्यवस्था को उबारना ही नहीं बल्कि काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है.
प्रणब मुखर्जी के बाद कांग्रेस और सरकार में चिदंबरम का भाव अचानक काफी बढ़ गया है. आधिकारिक रूप से एंटनी नंबर दो हो सकते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से इस जगह पर चिदंबरम ही हैं. जीओएम के प्रमुख के रूप में वे मीडिया में सरकार के प्रमुख संकटमोचन के रूप में सामने आते हैं. अब यह साफ है कि मनमोहन को अगले आम चुनाव में कांग्रेस प्रधानमंत्री के चेहरे की तरह नहीं पेश करने वाली है. यदि राहुल गांधी मनमोहन की जगह लेने से इनकार करते हैं तो एंटनी के साथ चिदंबरम प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में सामने आ सकते हैं. वे यदि सुधार के भीमकाय रथ को खींचने में सफल रहते हैं तो उनकी संभावना और मजबूत हो जाएगी.
टॉप गियर पर चलने की जरूरत
असली बदलाव के लिए समय बहुत कम है
आर्थिक संपादकों के सम्मेलन में चिदंबरम ने भारत की जनता को श्साफ सच्य बताने का वादा किया है. अभी तक उन्होंने काफी हद तक ऐसा नहीं किया है. अपने पूर्ववर्ती की तरह वे भी भारतीय अर्थव्यवस्था की कठिनाई के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था के विपरीत हालात को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उन्होंने यह स्वीकार करने का साहस नहीं किया है कि काफी हद तक यह दुर्दशा उनकी अपनी सरकार की वजह से ही है.
चिदंबरम को यह बात भी अच्छी तरह पता है कि उनके भरोसेमंद अर्थशास्त्री विजय केलकर की अगुआई वाली समिति की सिफारिशों के मुताबिक वित्तीय घाटे में कमी लाना आसान काम नहीं है.
वित्त मंत्री ने गरीबों के लिए खाद्य, उर्वरक और ईंधन पर सब्सिडी का बचाव किया है. कुल मिलाकर वे बस यह वादा कर रहे हैं कि सरकार आधार नेटवर्क के जरिए नकदी देकर लीकेज को कम करेगी. नंदन निलेकणि के नेतृत्व वाले आधार प्रोजेक्ट के गुणों के बारे में चिदंबरम का यह तात्कालिक बयान विलक्षण ही कहा जा सकता है, यह देखते हुए कि गृह मंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ज्यादातर समय इसका विरोध किया था. ऐसा लगता है कि वे अपने अहं को परे रखकर एक ऐसी संस्था से सहयोग करने को तैयार हैं जो उनके वित्त मंत्री के रूप में काम में काफी मददगार हो सकती है.
चिदंबरम के लिए असली चिंता की बात यह है कि क्या असल में बदलाव लाने के लिए उनके पास पर्याप्त समय बचा है. सरकार यदि अपना कार्यकाल पूरा करे तो भी उन्हें सिर्फ 19 महीने मिलेंगे. एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘इस बात की आधी संभावना ही है कि बचे हुए समय में ऊंची वृद्धि दर, ज्यादा नौकरियों के सृजन और महंगाई घटाने के मामले में असल बदलाव लाया जा सके.’’
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि चिदंबरम को शायद पूरे 19 महीने भी न मिल पाएं. वे चर्चा के विषय को भ्रष्टाचार से हटाकर सुधार की तरफ ले जाने के लिए अपना जी-जान लगा ही रहे थे कि 5 अक्तूबर को अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ अनियमितता का आरोप लगाकर उनके इस प्रयास को जबरदस्त झटका दे दिया. सरकार को सुधारों के पैडल पर से अपने पैर हटाने पड़े हैं क्योंकि अब उसकी सारी ऊर्जा कांग्रेस के प्रथम परिवार की प्रतिष्ठा को बचाने में लग गई है. एक अफसरशाह कहते हैं, ‘‘वाड्रा के बारे में खुलासा हाल में आगे बढ़ाए गए सुधारों के लिए अवरोध जैसा है.’’
फिर भी, दृढ़निश्चयी चिदंबरम अपने कदम आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश करेंगे. लेकिन शायद वह कांग्रेस को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने के लिए काफी न हो.
-साथ में प्रिया सहगल

