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ऑनलाइन सेंसरशिप: नन्हें मीडिया से कांपती सरकार

इंटरनेट पर 'भड़काऊ' सामग्री पर रोक लगाने की सरकार की कोशिश दरअसल जनसंपर्क की तबाही साबित हुई है.

अपडेटेड 5 सितंबर , 2012

यह बात 20 अगस्त की सुबह की है. 11 बजे संचार भवन में 'रेस्ट्रिक्टेड/इमिडिएट' मार्क वाली एक फाइल दूरसंचार विभाग (डीओटी) के डायरेक्टर सुबोध सक्सेना के डेस्क पर पहुंची. फाइल गृह मंत्रालय से आई थी और इसमें कई दस्तावेजों का पुलिंदा था जिसमें सबसे ऊपर था, साफ-सुथरा चार पन्नों का एयरटेल, बीएसएनएल और टाटा जैसे इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आइएसपी) को लिखा गया लेटर.

इस लेटर में उन्हें आदेश दिया गया था कि वे सूची में दिए गए 39 यूट्यूब वीडियो, 10 फेसबुक पेज, 21 वेब पेज (जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया न्यूज रिपोर्ट भी शामिल थीं) और 16 ट्विटर एकाउंट (जिसमें इस संवाददाता का एकाउंट भी शामिल था) पर रोक लगा दें.

सक्सेना तो असल में बस उस ऑपरेशन के जरिया मात्र थे जिसका आदेश सरकार के उच्चतम स्तर-प्रधानमंत्री कार्यालय, दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से आया था. सक्सेना ने इस पर तत्काल दस्तखत कर दिए और इसके लिए रास्ता तैयार कर दिया. सरकार को उम्मीद थी कि यह सोशल मीडिया पर पहली बड़ी कार्रवाई सिद्ध होगी. कार्रवाई एक जनसंपर्क संकट ही साबित हुई जिसमें सरकार की छवि न सिर्फ दमनकारी और मनमानी करने वाली बल्कि निकम्मा होने की भी बनी.

सरकार ने उम्मीद की थी कि यह डिजिटल घृणा के सौदागरों और शायद राजनैतिक विरोध पर प्रभावी चोट साबित होगी, उसे अंत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मनमाने हमले के रूप में ही देखा गया.Online Block

सरकार के जवाबी हमले का इरादा फेसबुक डिस्कशन ग्रुप्स जैसी भड़काऊ सामग्रियों पर रोक लगाना था जिनमें ''असम में हिंदू मुसलमानों को कत्ल कर रहे हैं'' के बारे में सामग्री पोस्ट की जा रही थी. कुछ फेसबुक यूजर नफरत फैलाने और हिंसा उकसाने में लिप्त पाए गए. कई ऐसे यूट्यूब वीडियो थे, जिन्हें उन्माद भड़काने के इरादे से तैयार किया गया था और अन्य यूजर से आह्वïन किया गया था कि वे इन नए वीडियो के जवाब में सांप्रदायिक हिंसा करें. इनमें 16 ट्विटर एकाउंट भी थे, जिन पर असम और मुंबई की हिंसा के बारे में जोशीले तरीके से ट्वीट किए गए थे.

बंगलुरू के सेंटर फॉर इंटरनेट सोसाइटी (सीआइएस) में इंटरनेट की आजादी और प्रशासन पर रिसर्च करने वाले प्रणेश प्रकाश का प्रतिबंधित वेबसाइट्स पर 22 अगस्त को जारी विश्लेषण मीडिया के लिए एक कसौटी बन गया है. वे कहते हैं, ''यह साफ नहीं हो पाया है कि इस परिस्थिति में क्या सरकार ने अपनी ताकत का इस्तेमाल जिम्मेदारी से किया है. इस लिस्ट में शामिल बहुत-सी सामग्रियों पर रोक पर कानूनी तौर पर सवाल उठाया जा सकता था. हालांकि मेरे हिसाब से कुछ ऐसी सामग्रियां थीं जिन्हें हटाया जाना चाहिए था. ''

सरकार की गोपनीय 'ब्लॉक लिस्ट' में हिंसा की रिपोर्ट देने वाली मीडिया की खबरें, मुख्यधारा के दो पत्रकारों के ट्विटर एकाउंट और खुद को तुच्छ समझने वाले पुणे के 40 वर्षीय सॉफ्टवेयर उद्यमी अमित परांजपे का नाम था. परांजपे कहते हैं, ''मुझे वास्तव में इस बात पर हैरत है कि इस ब्लैक लिस्ट में मेरा नाम क्यों रखा गया जबकि आम तौर पर मैं क्रिकेट, विज्ञान एवं तकनीक, अर्थशास्त्र और पुणे से जुड़ी जानकारियों पर ही ट्वीट करता हूं. ''

20 अगस्त को जारी हुए गोपनीय आदेश में जो हिट लिस्ट जारी हुई, वह गृह मंत्रालय के आदेश से चले 72 घंटे तक आनन-फानन चलाए गए ऑनलाइन तलाशी अभियान के बाद बनी थी. 2004 में 750 करोड़ रु. के बजट से स्थापित नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) तथा कुछ और सरकारी एजेंसियों जैसे भारत के ऑनलाइन इमरजेंसी रेस्पांस यूनिट सीईआरटी-इन और इंटेलीजेंस ब्यूरो (आइबी) ने 'भड़काऊ' सामग्री की तलाश के लिए इंटरनेट को खंगाला.

देश के नेशनल इंटरनेट गेटवे में इलेक्ट्रॉनिक सेंटीनल फिल्टर्स की प्रोग्रामिंग असम, असम हिंसा, पूर्वोत्तर, अमर जवान, म्यांमार, मुस्लिम और दंगा जैसे शब्दों के साथ की गई. आइटी विभाग ने 17 अगस्त की रात को गूगल, फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल नेटवर्कों को एक एडवाइजरी भेजकर उनसे संभावित खतरनाक सामग्रियों की अपने स्तर से जांच करने को कहा.Online block

कार्रवाई से एक दिन पहले कम्युनिकेशन और आइटी राज्यमंत्री सचिन पायलट ने हेडलाइंस टुडे से कहा, ''जब हमें यह लगेगा कि सामग्रियों को नहीं हटाया जा रहा है (सोशल मीडिया फर्मों द्वारा) तो हम तत्काल कदम उठाएंगे. अब भी रोक का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा. यदि वे (सोशल मीडिया फर्म) बात पर अमल नहीं करती हैं तो हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने से नहीं हिचकेंगे. ''

कड़ी कार्रवाई की खबर ट्विटर पर तेजी से फैलने के कुछ ही मिनट बाद कॉलम्निस्ट और दक्षिण एशिया के विद्वान सदानंद धुमे ने लिखा, ''भारत का इंटरनेट सेंसरशिप इतना अनाड़ी है कि यह निश्चित रूप से चीनियों के लिए हंस-हंसकर मर जाने का गुप्त हथियार बन सकता है.'' चीन ने 2009 में जब से ट्विटर पर रोक लगा रखी है, वहां के करोड़ों लोग ट्विटर के बेहद रेगुलेटेड और निगरानी किए जाने वाले हाइब्रिड वर्जन वीबो का इस्तेमाल करते हैं.

जनता की आलोचनाओं की बरसात के बाद सरकार ने सफाई देने की जरूरत महसूस की:
-23 अगस्त को दूरसंचार सचिव आर. चंद्रशेखर ने पहली बार ऑन रिकॉर्ड एक टीवी चैनल पर इस बात से साफ  इनकार किया कि सोशल मीडिया पर कोई कार्रवाई की जा रही है.
- 23 अगस्त को ही जब रोक लगाने के निर्देश वाला दूरसंचार विभाग का लेटर मीडिया में सार्वजनिक हो गया (और तत्काल ऑनलाइन इसकी चर्चा होने लगी), जिससे यह साबित हो गया कि सख्त कार्रवाई की बात सच है तो सरकार ने चुप्पी साध ली. संचार एवं आइटी राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने उसी रात ट्वीट किया, ''निश्चित रूप से सरकार का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की आजादी पर रोक लगाने का कोई इरादा नहीं है. '' लेकिन मजेदार बात तो यह रही कि सरकार की कार्रवाई शुरू होने के एक दिन बाद ही कुछ समय के लिए देवड़ा के भी आधिकारिक एकाउंट को ट्विटर ने गलती से सस्पेंड रखा—इस एकाउंट को गलती से फर्जी एकाउंट समझ लिया गया, जिसके बाद दूरसंचार मंत्रालय काफी हड़बड़ा गया और उसने सैन फ्रांसिस्को स्थित कंपनी से इस बारे में कई बार बात कर गलती को दुरुस्त कराया.Blacklist twitter account 
- 24 अगस्त को आखिरकार गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे (जिनके मंत्रालय ने इस पूरी कवायद का नेतृत्व किया) ने यह स्वीकार किया कि एक तरह की कार्रवाई चल रही है. संसद के बाहर उन्होंने कहा, ''हम केवल उन वेबसाइट्स के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं जो नुकसान पहुंचा सकते हैं. हम बेवजह किसी पर आरोप नहीं लगाएंगे चाहे वह फेसबुक हो, ट्विटर हो या एसएमएस हो. इसके लिए निश्चंत रहें. किसी प्रकार की कोई सेंसरशिप नहीं है. ''
- 24 अगस्त को दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने एक लिखित बयान में कहा, ''ये आरोप पूरी तरह गलत हैं कि हम किसी के एकाउंट या वेबसाइट को निशाना बना रहे हैं. ''
- 26 अगस्त को दूरसंचार सचिव चंद्रशेखर एक बार फिर टीवी पर आए और उन्होंने कहा कि इस रोक से जिन 'व्यक्तियों' को परेशानी हो रही है वे सरकार के सामने अपना पक्ष रख सकते हैं कि उन पर रोक लगाना क्यों सही नहीं है अन्यथा वे कोर्ट का सहारा ले सकते हैं.

उत्तेजना तब चरम पर पहुंच गई जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर अपने फॉलोअर्स को एक सौर ऊर्जा परियोजना के दौरे के बारे में बताया, इसमें उन्होंने 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन' के पीडि़त लोगों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए अपने डिस्प्ले तस्वीर को काला कर दिया. इसके बाद उनके सैकड़ों फॉलोअर्स ने उनका स्वागत करते हुए जवाब दिया.

सरकार ने जिस बेढंगे तरीके से कार्रवाई की उसको लेकर बड़े पैमाने पर ऑनलाइन दुनिया में चुटकी ली गई. एक ऐसी ही प्रतिक्रिया में कहा गया 'ट्विटर को सरकार से बेहतर तो पूनम पांडे (बॉलीवुड की नई अभिनेत्री) समझती है. ' कुछ लोगों के ट्विटर एकाउंट को हिट लिस्ट में रखने पर बहुत लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ. 

मुख्यत: ट्विटर से ही खबरों तक पहुंचने वाले अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई के पहले सरकार ने कानून की समुचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है. उन्होंने कहा, ''इस उम्मीद में एकाउंट को विभिन्न तरीकों से आनन-फानन रोक दिया गया कि कहीं यह मसला खत्म हो जाएगा. जिन लोगों पर रोक लगाई गई उन्हें इसकी कोई वजह नहीं बताई गई. इसे अक्षमता ही कहा जा सकता है.'' यह धारणा जल्दी ही जोर पकड़ने लगी कि सरकार ने पूर्वोत्तर के मसले और कानून व्यवस्था बनाने की अनिवार्यता का इस्तेमाल विरोधियों को चुप कराने के लिए किया है.

अभिनेता कबीर बेदी ने ट्वीट किया, 'ट्विटर एकाउंट और कई वेबसाइट्स पर रोक लगाना सत्ता का प्रतिशोधी और मनमाना इस्तेमाल है.'' कुछ इसी तरह की बात एक और अभिनेता अनुपम खेर ने भी कही, ''ऐसा लगता है कि अब सिर्फ सरकार के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. बाकी सब लोगों का तो दम घुट रहा है. ''

पलटवार चरम पर पहुंच गया, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) सरकारी एजेंसियों के माध्यम से ट्विटर को काफी दबाने में सक्षम हुआ और पीएमओ एकाउंट से मिलते-जुलते (पैरोडी) छह ट्विटर एकाउंट पर रोक लगा दी गई. प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने अपने ट्विटर एकाउंट पर स्पाइडरमैन का उद्धरण लगाना उचित समझा: ''ज्यादा ताकत के साथ ज्यादा जिम्मेदारी भी आती है. '' ऐसे समय में उनकी यह टिप्पणी और ऑनलाइन मूड को न समझ् पाने की वजह से उनके ट्वीट का काफी घृणित तरीके से मजाक उड़ाया गया.

पैरोडी एकाउंट अकेले भारत की समस्या नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, क्वीन एलिजाबेथ-2 और यहां तक कि फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का भी मजाक उड़ाने वाले ऐसे एकाउंट बनाए गए हैं. ऐसे लोगों की उपस्थिति को अच्छी तरह से समझ, स्वीकार किया और कुछ लोगों द्वारा प्रशंसा भी की जाती है.

यहां तक कि ट्विटर में भी यह नियम है कि ऐसे एकाउंट तब तक चलते रहने दिए जाएं जब तक कि वे खुद साफ तौर से यह घोषित नहीं कर देते कि वे पैरोडी एकाउंट हैं. लेकिन पीएमओ का मानना है कि पैरोडी एकाउंट को असल समझा जा सकता है. खबरों के व्यंग्य की लोकप्रिय वेबसाइट फेकिंग न्यूज चलाने वाले राहुल रौशन कहते हैं, ''यह उतना ही अविश्वसनीय और मूर्खतापूर्ण है जितना इसे समझा जा सकता है.'' रौशन नियमित रूप से और अक्सर निर्दयता से ट्विटर पर अपने 1,00,000 फॉलोअर के बीच सरकार की नकल करते हैं.

वैसे ट्विटर और फेसबुक को उकसावे, सांप्रदायिक रूप से भड़काने वाली टिप्पणियों और सीधे हिंसा या गैर-कानूनी काम के आह्वान के लिए इस्तेमाल से इनकार नहीं किया जा सकता. इनसे विवादास्पद सामग्रियां जंगल में आग की तरह फैल सकती हैं.

नाम न छापने की शर्त पर इंटेलीजेंस ब्यूरो (आइबी) के एक अधिकारी ने कहा, ''गृह मंत्रालय ने गलत लोगों को निशाना बनाने की जो कोशिश की है उससे समस्या पैदा करने वाले असल लोगों को भी महत्वपूर्ण चेतावनी मिल गई है. तो हम अगर कुछ एकाउंट की निगरानी कर रहे थे तो उनके बारे में अब जानकारी नहीं मिल पा रही क्योंकि इनके यूजर सचेत हो गए हैं और वे किसी और रूप में या अलग पहचान से सक्रिय हो सकते हैं. ''

सरकार की कार्रवाई का अंतरराष्ट्रीय असर तत्काल देखने को मिला. इस कार्रवाई के एक दिन बाद अमेरिका के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड ने 23 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ''भारत सरकार अपनी सुरक्षा बनाए रखना चाहती है, लेकिन हम उनसे अनुरोध करते हैं कि वे ऑनलाइन दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व का भी ध्यान रखें.ÓÓ

अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा की मीडिया में इस सख्ती की एक स्वर से आलोचना की गई और इसे बेढंगा तथा तकलीफदेह बताया गया. सोशल मीडिया कंपनियां लंबे समय से चीन और भारत दो एक समान महत्व वाले लेकिन काफी अलग तौर के देश की तरह देखती रही हैं, लेकिन इस कदम ने इस छवि को कमजोर किया है. सरकार द्वारा सामग्रियों पर रोक के निवेदन के बाद इसके लिए कुछ समय मांगने वाली ट्विटर अपने पत्ते सावधानी से खेल रही है.

दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों में से एक चीन में बंद हो चुकी यह कंपनी अब भारत में उसी गति को प्राप्त होना नहीं चाहती. आधिकारिक रूप से यह अब भी अगले कदम के बारे में सोच-विचार कर रही है. लेकिन गैर-आधिकारिक तौर पर कंपनी को यह लगता है कि मौजूदा पलटवार से सरकार कुछ पीछे हट जाएगी. ट्विटर भारत में अपना मानव संसाधन और तकनीकी पहुंच बढ़ाना चाहती है. भारत सरकार की कार्रवाई के बाद कंपनी के विचारों और योजनाओं के बारे में हमारे कुछ सवालों पर ट्विटर की प्रवक्ता कारोलिन पेनर ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

टेक्नोलॉजी के टिप्पणीकार नरेंद्र नाग ने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि ट्विटर को ज्यादा चिंता होनी चाहिए. यदि वे कुछ कर सकते हैं तो बस इतना कि शांत रहें, लो प्रोफाइल रहें और इस पूरे हो-हंगामे को खत्म हो जाने दें. ''

उन्होंने कहा, ''सरकार को इस तथ्य से वाकिफ  हो जाना चाहिए कि सोशल मीडिया अब यहां रहने वाली है चाहे एक रूप में या किसी और रूप में, चाहे भले के लिए हो या बुरे के लिए. उन्होंने इस विचार को भी समझ लेना चाहिए कि सभी टेलीकॉम नेटवर्क को ठप करके भी वे ज्यादा समय तक लोगों के एक-दूसरे से संवाद की क्षमता पर नियंत्रण नहीं कर पाएंगे.''

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