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चीनी की मिठास के बदले सीमेंट की धूल

बिहार की नई सरकार ने राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने का फैसला किया है. मगर वारसलीगंज के किसानों के लिए यह फैसला कोई खुशखबरी लेकर नहीं आया है, जहां तीन दशक से बंद पड़ी चीनी मिल में सीमेंट फैक्ट्री खुलने जा रही

वारसलीगंज में जहां पहले चीनी मिल थी, वहां अब सीमेंट की ग्राइंडिंग फैक्ट्री बन रही
अपडेटेड 16 फ़रवरी , 2026

नवादा जिले के चैनपुरा गांव में अपने खेतों में लगे बिजली के हाइ टेंशन वायर के खंभों के पास खड़े नवीन कुमार अपने हाथ में बंधी पट्टी को दिखाते हुए कहते हैं, ''भारी पुलिस बल था. अनाउंसमेंट हो रहा था, पांच मिनट में खाली कीजिए. हम लोग अपनी जमीन बचाना चाह रहे थे. तभी उन लोगों ने लाठी चलाना शुरू कर दिया. किसी को नहीं छोड़ा, औरत-बच्चा सबको लाठी से मार-मार कर घायल कर दिया.''

उनके पास खड़े विजय शंकर सिंह कहने लगे, ''हम लोग तो बस इतना कह रहे थे, यह आवासीय जमीन है, तार जरा दूर से ले जाइएगा तो सबको सुविधा हो जाएगी. पहले ही बिन मांगे चीनी मिल के कैंपस में सीमेंट फैक्ट्री खोल रहे हैं, जिससे हम लोगों को नुक्सान के सिवा कुछ नहीं होगा.'' 

दरअसल वे नवादा के वारसलीगंज में खुल रही अंबुजा सीमेंट की ग्राइंडिंग फैक्ट्री की बात कर रहे थे, जिसका निर्माण कार्य मई, 2024 से चल रहा है. यह सीमेंट फैक्ट्री उसी परिसर में खुल रही है, जहां तीन दशक पहले चीनी मिल हुआ करती थी. इसे बिजली देने के लिए हाइ टेंशन तार खींचे जा रहे हैं, जिससे परिसर के आसपास बसे गांवों के लोग इन दिनों नाराज हैं. पड़ोस के मालीचक गांव के किसान निरंजन कुमार कहते हैं, ''समझ नहीं आता कि यहां सीमेंट फैक्ट्री खुलवाने की क्या जरूरत है, यहां तो कच्चा माल भी नहीं है! कहते हैं, इसके लिए जिप्सम राजस्थान और एमपी से आएगा.''

दरअसल, आजादी के ठीक बाद 1952 में वारसलीगंज कस्बे में इस चीनी मिल की शुरुआत हुई थी, पहले इसका नाम मोहिनी शुगर मिल था और यह निजी कंपनी थी. 1980 के दशक में बिहार सरकार ने राज्य की एक दर्जन चीनी मिलों का अधिग्रहण कर लिया. तब इस कंपनी का भी अधिग्रहण किया गया और इसका नाम बदलकर बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, वारसलीगंज कर दिया गया. यह दक्षिणी बिहार की सबसे बड़ी चीनी मिल थी. आस-पास के पांच जिलों के किसान अपना गन्ना लेकर यहां आते थे. 2000 से ज्यादा लोगों को यहां रोजगार मिला था. मगर एक दशक बीतते-बीतते राज्य की दूसरी सरकारी चीनी मिलों की तरह यह भी बंदी की कगार पर पहुंच गई और 1993 में इस पर ताला लग गया.

तब से यहां के किसान और चीनी मिल के बेरोजगार कर्मी लगातार इसे खोले जाने की मांग करते रहे थे. हर चुनाव में इस चीनी मिल को खोले जाने का मुद्दा उठता है. 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नवादा आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सत्ता आई तो इस चीनी मिल की चीनी की बनी चाय वारसलीगंज के लोगों को पिलवाएंगे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इसे चालू करने का वादा करते थे. ''मगर आखिर में उन्होंने इस चीनी मिल की जमीन सीमेंट की फैक्ट्री को बेच दी'', निरंजन कहते हैं.

29 जुलाई, 2024 को जब नीतीश कुमार इसका शिलान्यास करने आने वाले थे तो एक दिन पहले वारसलीगंज के लोगों ने बाजार बंद कराया जिसके चलते यह कार्यक्रम टल गया. फिर 3 अगस्त को इसका शिलान्यास हुआ. इस बीच 27 मई, 2024 को वारसलीगंज नगर परिषद ने नई फैक्ट्री खोले जाने के विरोध में प्रस्ताव पारित किया, जिसमें लिखा कि इससे भीषण प्रदूषण फैलने और लोगों के बीमार पड़ने का खतरा है. यह प्रस्ताव उन्होंने जिला प्रशासन को भेजा. परिषद के उपाध्यक्ष अरुण कुमार अभी भी इस प्रस्ताव से सहमत हैं. वे कहते हैं, ''हमारे प्रस्ताव का तो ध्यान नहीं ही रखा गया, परिषद से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लिए बगैर ही काम शुरू कर दिया गया. यह तो नियम का उल्लंघन है.''

नवादा के वारसलीगंज के जिस परिसर में तीन दशक पहले चीनी मिल

अब इन परिस्थितियों में वारसलीगंज के लोगों ने बिहार लोक शिकायत निवारण अधिनियम के तहत शिकायत की है. और इस कंपनी के शुरू होने से पहले सामाजिक और पर्यावरण संबंधी अध्ययन कराने की मांग की है. शिकायतकर्ता डॉ. सुधांशु सुल्तानिया हैं, जो वारसलीगंज के रहने वाले हैं और दिल्ली भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश संयोजक भी. वे कहते हैं, ''शहर के बीचोबीच सीमेंट फैक्ट्री खोली जा रही है. इसके बिल्कुल पास बस्ती है, अस्पताल, थाना, प्रखंड कार्यालय, बाजार सब तीन सौ मीटर के दायरे में हैं.

इसके अलावा इसके परिचालन के लिए दो हजार फुट गहरी बोरिंग की गई है. इससे पहले से ही जल संकट से जूझ रहे वारसलीगंज का पानी का स्तर और नीचे जाएगा.'' मालीचक गांव के लोग कहते हैं, ''अभी से फैक्ट्री का शोर-शराबा इतना होता है कि रात को हम लोग सो नहीं पाते. कभी धूल उड़ती है तो खेतों में सफेद चादर जैसी बिछ जाती है. इस साल लोगों की मूंग और मसूर की फसल खराब हो गई. मगर शिकायत की कोई सुनवाई नहीं करता.''

इन आरोपों का जवाब तलाशने के लिए इंडिया टुडे ने पहले वारसलीगंज की अंबुजा कंक्रीट नॉर्थ प्राइवेट लिमिटेड के प्लांट अफसर से बात करने की कोशिश की. मगर काफी कोशिशों के बावजूद वे बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हो पाए. नवादा के जिलाधिकारी रवि प्रकाश कहते हैं, ''सीमेंट फैक्ट्री का मामला बियाडा (बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) के अधीन आता है, इसलिए मैं उस बारे में कुछ कह नहीं सकता. मगर जहां तक बिजली के खंभों का मामला है, उसके लिए जमीन अधिग्रहीत नहीं की जाती. विभाग अपनी सुविधा से खाली जमीन पर उसे लगाता है और उस गांव में लाठी चार्ज बिल्कुल नहीं हुआ है.''

इसके बाद इंडिया टुडे ने बिहार सरकार के उद्योग विभाग के निदेशक मुकुल कुमार गुप्ता से संपर्क किया. पहले तो उन्होंने सवाल उठाया, ''आप कैसे कह सकते हैं कि चीनी मिल की जमीन पर सीमेंट फैक्ट्री खुल रही है?'' जब इंडिया टुडे ने उन्हें प्रमाण उपलब्ध कराए तो उन्होंने कहा, ''इस संबंध में मेरा कोई बयान नहीं है.'' अनौपचारिक बातचीत में उद्योग विभाग के एक अधिकारी ने कहा, ''चूंकि सीमेंट फैक्ट्री का 60 से 70 फीसद काम हो गया है, तो अब क्या गुंजाइश बचती है, आप समझ ही सकते हैं.''

खास बातें

> बिहार सरकार अपने चुनावी वादों के अनुरूप राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने जा रही है, मगर उस सूची में वारसलीगंज चीनी मिल का नाम नहीं.

> वारसलीगंज के लोगों का कहना है कि शहर के बीच सीमेंट फैक्ट्री खुलने से इलाके में प्रदूषण बढ़ेगा, चीनी मिल खुलती तो किसानों की भी आय बढ़ती.

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