जब ऋतु मल्होत्रा का 12 साल का बेटा आरव (नाम बदला हुआ) फुटबॉल प्रैक्टिस के बाद दोस्तों के साथ समय बिताने या बर्गर ऑर्डर करने के बजाए थका-हारा घर लौटता है, तो उनका दिल बैठ जाता है. आरव को ग्रेड 1 फैटी लिवर डिजीज हुई है.
यह नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) का शुरुआती चरण है, जिसे आम तौर पर बड़ों से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है. आरव को तला-भुना खाना छोड़ना पड़ा है. दिल्ली की 42 साल की बैंकर ऋतु के लिए बेटे को यह समझा पाना मुश्किल हो रहा है कि उसकी उम्र का बच्चा खाने-पीने के मामले में इस तरह की पाबंदियां और रोक आखिर क्यों झेले.
सच तो यह है कि बच्चों की हालत ठीक नहीं. भारत के कई शहरी घरों में पांच से साल की उम्र के बच्चों को ऐसी बीमारियां घेर रही हैं, जो इस उम्र में आम नहीं मानी जाती थीं. ग्रेटर नोएडा के शारदाकेयर-हेल्थसिटी अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. चिराग टंडन कहते हैं, ''10-15 साल पहले के मुकाबले अब हमें अस्थमा, मोटापा, एलर्जी, पाचन की समस्या और यहां तक कि तनाव के शारीरिक असर वाले बच्चे कहीं ज्यादा दिख रहे हैं.’’
उनके मुताबिक, ''इसका मतलब है कि अब कम उम्र में ही सेहत खराब हो जा रही है.’’ हर दूसरे घर में चल रही इस कहानी के खलनायक हैं सुस्त जीवनशैली, जंक फूड पर टूट पड़ना, बाहर खेलने-कूदने का कम समय, बढ़ता स्क्रीन टाइम और नींद की कमी.
यह समस्या कितनी व्यापक है, मेडिकल अध्ययनों के परेशान करने वाले आंकड़े इसे जाहिर कर रहे हैं. मई में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) ने भारतीय बच्चों और किशोरों के लिए बेसलाइन हेल्थ पैरामीटर तय करने के मकसद से एक राष्ट्रीय अध्ययन शुरू किया. यह संकेत है कि कम उम्र में क्रॉनिक बीमारी को अब छोटी समस्या नहीं माना जा रहा.
इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन की 2025 की स्टडी के मुताबिक, भारत के कई शहरी इलाकों में स्कूली बच्चों में मोटापे की दर अब 10 से 30 फीसद के बीच है. क्लिनिकल एपिडेमियोलॉजी ऐंड ग्लोबल हेल्थ जर्नल में 2023 के मेटा-एनालिसिस ने देश में बच्चों में मोटापे की दर 8.4 फीसद आंकी गई, जिसमें शहरों में यह दर ज्यादा है.
जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऐंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी (2022) और इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेडिकल ऐंड फार्मास्युटिकल रिसर्च (2025) के अध्ययन बताते हैं कि तीन से 10 फीसद बच्चों में एनएएफएलडी मौजूद है और यह तेजी से बढ़ रहा है. लंग इंडिया में 2022 में प्रकाशित एक स्टडी में बच्चों में अस्थमा की दर 7.9 फीसद आंकी गई.
कमरों में कैद रहने वाले बच्चे
इस बारे में विशेषज्ञों के मुताबिक, कई बीमारियों की जड़ है बच्चों का खेल के मैदानों की धूल-मिट्टी और उछलकूद से दूर होना. बचपन अब एअर-कंडीशंड कमरों में गुजर रहा है और उसके समय का बड़ा हिस्सा छोटी-छोटी स्क्रीन पर आंखें गड़ाए बीतता है.
रिसर्च बताती है कि ये बदलाव शरीर में जैविक स्तर पर असर डालते हैं. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेडिकल ऐंड फार्मास्युटिकल रिसर्च में 2026 के एक अध्ययन ने शहरी स्कूली बच्चों में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर को नींद की गड़बड़ी से जोड़ा.
घर से बाहर की जिंदगी सिकुड़ने से जो खाली जगह बनी है, उसे स्क्रीन पर निर्भरता भर रही है. मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल में पीडियाट्रिक्स के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. दीपक उगरा कहते हैं, ''मोटापे और कब्ज से लेकर व्यवहार से जुड़ी समस्याएं...हम ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर से जुड़ी सेहत की कई समस्याएं देख रहे हैं.’’
हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि यह मसला सिर्फ स्क्रीन तक ही सीमित नहीं. गुरुग्राम के सी.के. बिरला हॉस्पिटल में कंसल्टेंट चाइल्ड स्पेशलिस्ट, ऑब्स्टेट्रिक्स ऐंड गाइनेकोलॉजी डॉ. श्रेया दुबे कहती हैं, ''शरीर को बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग रखने के लिए नहीं बनाया गया है. उसे उसके साथ लगातार, सक्रिय संवाद में रहने के लिए बनाया गया है.’’ वे उन सबूतों की ओर इशारा करती हैं जो बचपन में माइक्रोब्स से कम संपर्क को शहरी आबादी में बढ़ती एलर्जी और सूजन से जुड़ी बीमारियों से जोड़ती हैं.
बच्चे जितना थोड़ा-बहुत वक्त बाहर बिताते भी हैं, उस दौरान वे ट्रैफिक के जहरीले धुएं और धूल से घिरे रहते हैं. लंग इंडिया में 2025 की एक स्टडी ने प्रदूषण को अस्थमा का बड़ा ट्रिगर बताया. नई दिल्ली के मलिक रेडिक्स हेल्थकेयर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. रवि मलिक कहते हैं, ''वायु प्रदूषण, खराब वेंटिलेशन, आसपास मौजूद धूम्रपान करने वालों के छोड़े धुएं और घरों के भीतर बढ़ती सुस्त जीवनशैली शहरों के बच्चों में अस्थमा, एलर्जी, बार-बार सांस के इन्फेक्शन और फेफड़ों की कमजोर ग्रोथ के बड़े कारण हैं.’’
महामारी के वर्षों में मुंबई के 12 साल के रोहन मेहता की ज्यादातर दिनचर्या जब ऑनलाइन हो गई तो उसके बाद उसे घरघराहट और एलर्जी की समस्या हुई. उसके पिता संदीप मानते हैं कि बाहर निकलना बिल्कुल बंद हो गया था. उनके शब्दों में, ''स्कूल, मिलना-जुलना, यहां तक कि एक्सरसाइज वीडियो, सब कुछ इनडोर हो गया था.’’
भारत के तमाम शहरी बच्चों के दिन बहुत जल्दी शुरू होते हैं और स्कूल, कोचिंग तथा एक्स्ट्राकरिकुलर गतिविधियों के बीच देर शाम तक उनकी व्यस्तता बनी रहती है. इससे आराम करने का वक्त मुश्किल से बचता है. यही वजह है कि खराब नींद को मोटापे, भावनात्मक अस्थिरता, तनाव में ज्यादा खाने और मेटाबॉलिक गड़बड़ी से जोड़ा जा रहा है.
डॉ. दुबे कहती हैं, ''नींद का कम होना आज बच्चों की सेहत का शायद सबसे कम आंका गया संकट है. आधी-अधूरी नींद लेने वाले बच्चों को मानसिक सेहत, मेटाबॉलिज्म और सोचने-समझने की क्षमता पर लंबे समय के असर की तरफ धकेला जा रहा है.”
बच्चों के आसपास का भावनात्मक माहौल भी बदल गया है. डॉ. उगरा कहते हैं, ''ज्यादातर शहरी मिडिल-क्लास परिवारों में माता-पिता दोनों काम करते हैं, और ऐसे में बच्चे अक्सर डे केयर में या घरेलू नौकरों या परिवार के सदस्यों की निगरानी में रहते हैं.”
इसमें जो चीज गायब हो जाती है, वह है बिना बंधे-बंधाए ढंग से बिताया जाने वाला समय. माता-पिता के साथ, हमउम्र बच्चों के साथ और यहां तक कि खुद के साथ भी. ''इससे तनाव, चिंता और असुरक्षा पैदा हो सकती है.’’
इस बीच, खाने-पीने की आदतों में बुनियादी बदलाव आ गया है. अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स, मीठे पेय और डिलिवरी वाला खाना अब कभी-कभार मिलने वाली ट्रीट नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदत बन चुके हैं. नई दिल्ली के आइएसआइसी मल्टीस्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन ऐंड रेस्पिरेटरी सर्विसेज के डायरेक्टर डॉ. (कर्नल) विजय दत्ता कहते हैं, ''बहुत-से बच्चे ताजे फल, सब्जियां और घर का पारंपरिक खाना कम ही पसंद करते हैं, जिससे इम्युनिटी कमजोर हो सकती है.’’
डॉक्टरों के मुताबिक, इन सबका नतीजा शरीर पर एक साथ पड़ रहे छोटे-छोटे जैविक दबावों के रूप में दिखता है. नई दिल्ली के द्वारका स्थित मणिपाल हॉस्पिटल में पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी ऐंड हेपेटोलॉजी की एचओडी डॉ. सुफला सक्सेना कहती हैं, ''हमें बच्चों की सेहत में जो बदलाव दिख रहा है, वही चिंता की बात है. कम उम्र में ही एक साथ रिफ्लक्स (भोजन का पेट से मुंह में आना), मोटापा, फैटी लिवर और सूजन से जुड़ी स्थितियां ज्यादा दिख रही हैं.’’
सेहत का यह बदलता माहौल मां-बाप को लगातार चौकन्ना रहने को मजबूर कर रहा है. 14 साल की कियारा सेठी के स्कूल बैग में सैनिटाइजर वाइप्स, प्रोबायोटिक्स, इमरजेंसी दवाएं और थर्मामीटर रहता है. उसकी मां नेहा कहती हैं कि बार-बार एलर्जी और पेट के इन्फेक्शन ने उन्हें हर चीज पर नजर रखने के लिए मजबूर कर दिया है, मल त्याग से लेकर नींद के चक्र तक. बकौल नेहा, ''हर खांसी किसी गंभीर चीज की शुरुआत जैसी लगती है.’’
झटपट राहत वाली दवा भी कम चिंता का सबब नहीं. डॉ. दत्ता कहते हैं, ''कई माता-पिता डॉक्टर की सलाह के बिना जरूरत से ज्यादा सप्लीमेंट या एंटीबायोटिक देने लगते हैं. उन्हें लगता है कि इससे इम्युनिटी बेहतर होगी.’’ हालात को देखते हुए इलाज के विकल्प भी तेजी से बढ़ रहे हैं.
मसलन, टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे से जूझ रहे बच्चों का इलाज अब मेटाबॉलिक क्लिनिक, ग्लूकोज मॉनिटरिंग और नई वेट-मैनेजमेंट थेरेपी के जरिए हो रहा है. इसी तरह, गंभीर अस्थमा और एग्जिमा को हाइ-प्रीसिजन बायोलॉजिक दवाओं से संभाला जा रहा है, जो इम्यून सिस्टम के खास हिस्सों को निशाना बनाती हैं. एलर्जी इम्यूनोथेरेपी भी इस्तेमाल हो रही है, जिसमें धीरे-धीरे एलर्जन के संपर्क में लाकर इम्यून सिस्टम को उसके प्रति कम संवेदनशील बनाया जाता है. डॉक्टरों के लिए उपाय बेहद सीधे और साफ हैं.
आसान समाधान
हर स्पेशिएलिटी में सलाह आखिर उन्हीं चीजों पर लौटती है, जिन्हें आधुनिक शहरी जिंदगी ने कमजोर कर दिया है. डॉ. सक्सेना कहती हैं, ''जंक फूड से बचना, स्क्रीन टाइम सीमित करना, नियमित शारीरिक गतिविधि और हमउम्र बच्चों के साथ मेलजोल, ये वे आदतें हैं जिन्हें बच्चों को फिर से सीखने की जरूरत है.’’
बाहर खेलना अब भी मजबूत सुरक्षा कवच है. डॉ. दुबे कहती हैं, ''शरीर की सहनशक्तिबचाव से नहीं, बल्कि अलग-अलग अनुभवों और एक्सपोजर से बनती है.’’ इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बिहेवियरल न्यूट्रिशन ऐंड फिजिकल एक्टिविटी में 2025 के एक निष्कर्ष ने बाहर खेलने को बच्चों में बेहतर नींद और बेहतर मानसिक सेहत से जोड़ा.
इसलिए जोर अब सेहतमंद जैविक लय-ताल को फिर से बनाने पर है. नींद को अब बच्चों की सेहत का केंद्रीय स्तंभ माना जा रहा है. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित चेन्नै की 2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि उसमें शामिल करीब 40 फीसद प्री-स्कूल बच्चों में नींद का चक्र बिगड़ा हुआ था, जिसका संबंध ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल से था. सोने से पहले स्क्रीन देखने से समस्या और बढ़ रही थी.
डॉ. उगरा आधुनिक माता-पिता को एक और सलाह देते हैं: ''बच्चों को सिर्फ बहुत ज्यादा मैनेज्ड शेड्यूल नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से उपलब्ध माता-पिता चाहिए. भावनात्मक सुरक्षा सेहत के लिए पोषण या एक्सरसाइज जितनी ही जरूरी है.’’ विशेषज्ञ कहते हैं कि अच्छी सेहत दवा पर जितनी निर्भर करती है, उतनी ही प्यार भरे सहारे, आराम, खेल और नियमित दिनचर्या के मेल पर भी.
बच्चों को घेरती बीमारियां
मोटापा
भारत के शहरी बच्चों में मोटापे की दर 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब नौ फीसद है.
लक्षण: तेजी से वजन बढ़ना, थकान, स्टैमिना कम होना
वजह: प्रोसेस्ड फूड, बहुत ज्यादा स्क्रीन टाइम यानी कंप्यूटर, टीवी या मोबाइल फोन की स्क्रीन को देर तक देखना, कम शारीरिक गतिविधि, नींद पूरी न होना
इलाज: वेट-मैनेजमेंट प्रोग्राम, ग्लूकोज मॉनिटरिंग, दवा
बचाव: नियमित रूप से चलना-फिरना, जंक फूड कम करना, घर से बाहर निकलकर खेलना-कूदना
फैटी लिवर डिजीज
अध्ययनों के मुताबिक, भारत में मोटापे से जूझ रहे 40-70 फीसद बच्चों तक में फैटी लिवर डिजीज हो सकती है
लक्षण: थकान, पेट खराब होना
वजह: ज्यादा प्रोसेस्ड फूड और चीनी का सेवन, सुस्त जीवनशैली
इलाज: लिवर स्कैन, मेटाबॉलिक स्क्रीनिंग, हेपेटोलॉजी केयर, मोटापे और इंसुलिन रेजिस्टेंस का इलाज
बचाव: वजन पर नियंत्रण, एक्सरसाइज, खानपान में बदलाव
अस्थमा और एलर्जी
लंग इंडिया के मुताबिक भारतीय बच्चों में अस्थमा की दर 7.9 फीसद आंकी गई है
लक्षण: सीने में घरघराहट, खांसी, छींक आना, सांस लेने में दिक्कत
वजह: प्रदूषण, इनडोर जीवनशैली, माइक्रोब्स से कम संपर्क
इलाज: स्मार्ट इनहेलर, नेबुलाइजेशन, डिसेंसिटाइजेशन थेरेपी, नई बायोलॉजिक इंजेक्शन दवाएं
बचाव: जल्दी पहचान, साफ माहौल और नियमित इलाज
कब्ज/पेट की परेशानियां
बच्चों को क्लिनिक लाने की सबसे आम वजहों में से एक
लक्षण: पेट दर्द, पेट फूलना, मल त्याग में अनियमितता
वजह: कम फाइबर वाला खाना, पानी कम पीना, शारीरिक गतिविधि की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम
इलाज: बाउल रीट्रेनिंग प्रोग्राम, पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी केयर, गट मोटिलिटी की दवाएं
बचाव: फाइबर से भरपूर खाना, पर्याप्त पानी, शारीरिक गतिविधि
नींद से जुड़ी समस्याएं
2025 की एक स्टडी में पाया गया कि चेन्नै के 40 फीसद प्री-स्कूल बच्चों में स्क्रीन इस्तेमाल के चलते उनके सोने का पूरा सिलसिला ही बिगड़ गया था
लक्षण: चिड़चिड़ापन, थकान, ध्यान एकाग्र करने में दिक्कत
वजह: देर रात स्क्रीन देखना और बुरी तरह व्यस्त शेड्यूल
इलाज: बिहेवियरल स्लीप थेरेपी, बढ़े हुए टॉन्सिल/एडिनॉइड का इलाज, एंग्जाइटी मैनेजमेंट
बचाव: सोने-जागने का तय समय, स्क्रीन टाइम कम करना
तनाव से जुड़े लक्षण
शहरी बच्चों में तनाव से जुड़े सिरदर्द और पेट दर्द के मामले बढ़ रहे हैं
लक्षण: एंग्जाइटी, सिरदर्द, पेट दर्द, थकान
वजह: पढ़ाई का दबाव, आराम करने का समय न मिलना
इलाज: कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी, एंग्जाइटी पर काम करने वाले खास प्रोग्राम
बचाव: भावनात्मक सहारा, धीमा शेड्यूल, बाहर की गतिविधियां
मेटाबॉलिक गड़बड़ी
भारत में 11-13 साल के बच्चों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम के संकेत दिखने लगे हैं
लक्षण: हाइ ब्लड शुगर, थकान, मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस
वजह: प्रोसेस्ड डाइट, कम शारीरिक गतिविधि, नींद पूरी न होने का सिलसिला लंबे समय तक चलना
इलाज: ग्लूकोज मॉनिटर, इंसुलिन थेरेपी, मेटफॉर्मिन, ब्लड शुगर की निगरानी
बचाव: जल्दी निगरानी और इलाज, सेहतमंद खाना, खेलकूद और दूसरी शारीरिक गतिविधियां

