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प्रधान संपादक की कलम से

उस सुरक्षा कवच को अब बाहर जा रहे पैसों के पैमाने के मुकाबले परखना होगा. जिन चीजों पर ‌किफायत बरतने की बात कही गई है, वे वित्त वर्ष 26 के 775 अरब डॉलर के आयात बिल का लगभग आधा हिस्सा थीं.

3 जून 2026 इंडिया टुडे हिंदी अंक
3 जून 2026 इंडिया टुडे हिंदी अंक
अपडेटेड 1 जून , 2026

—अरुण पुरी.

महज तीन साल पहले भारत उस दौर से कामयाबी के साथ बाहर निकला था, जिसे अर्थव्यवस्था का 'लाँग कोविड' कहा जा सकता है. इससे यह साबित हुआ कि देश के पास इतने मजबूत आर्थिक बफर हैं कि वह अप्रत्याशित झटकों को भी झेल सकता है.

लेकिन अब हमारे सामने एक और बाहरी संकट खड़ा है और यह शायद हमारी क्षमता की उससे भी कठिन परीक्षा ले सकता है. ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य में आई सप्लाई बाधा ने कच्चे तेल, उर्वरक और दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतों को लंबे समय की अनिश्चितता में धकेल दिया है.

भारत के लिए यह सीधे उसकी सबसे कमजोर रग पर चोट है. ऊर्जा जरूरतों और खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत इन्हीं वस्तुओं के आयात पर काफी हद तक निर्भर है. इसीलिए 10 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश से संयम बरतने का आह्वान दरअसल आने वाले कठिन समय के लिए पहले से दी गई चेतावनी माना जा रहा है.

मोदी ने लोगों से यथासंभव वर्क फ्रॉम होम अपनाने, विदेश यात्राएं और डेस्टिनेशन वेडिंग कम करने, सोना न खरीदने, खाने के तेल और उर्वरकों का सीमित इस्तेमाल करने और स्वदेशी सामान खरीदने की अपील की.

ये बातें सुनने में बेतरतीब मितव्ययिता जैसी लग सकती हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. इन सबके पीछे एक ही बड़ी चिंता है: भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी). यह वह अंतर है जो विदेशी मुद्रा के आने और बाहर जाने के बीच पैदा होता है, और बढ़ती कीमतों की वजह से यह तेजी से बिगड़ रहा है.

भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें पिछले साल मई के मुकाबले 55.3 फीसद बढ़ चुकी हैं. ‌‌वित्त वर्ष 26 में भारत का शुद्ध तेल और गैस आयात बिल 117.5 अरब डॉलर रहा, जो देश के कुल 775 अरब डॉलर के आयात बिल का करीब 15 फीसद है. अब इसके और बढ़ने की आशंका है. खाने के तेल की कीमतें भी पिछले साल के मुकाबले 12 फीसद ज्यादा हैं.

भारत अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा खाद्य तेल आयात करता है और इस पर पिछले साल 20 अरब डॉलर खर्च हुए थे. वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतें 60 फीसद तक उछल चुकी हैं. इसका मतलब है कि उर्वरक आयात पर भी खर्च बढ़ेगा, जो पिछले साल 15 अरब डॉलर था. ये दोनों मद मिलकर वित्त वर्ष 26 के आयात बिल में 5 फीसद से कहीं ज्यादा हिस्सेदारी तक पहुंच सकते हैं.

इसके बाद वे चीजें आती हैं जिन्हें अपेक्षाकृत गैर-जरूरी खर्च माना जा सकता है. पिछले साल सोने का आयात मूल्य के हिसाब से दोगुना हो गया और इस पर भारत ने 72 अरब डॉलर खर्च किए. यह देश के कुल आयात बिल का लगभग 10 फीसद था. विदेश यात्राएं (35 अरब डॉलर) और आयातित उपभोक्ता सामान (90 अरब डॉलर) जैसे बड़े खर्च भी विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डाल रहे हैं.

ये दोनों मिलकर हमारे विदेशी मुद्रा भंडार के करीब 18 फीसद के बराबर आउटफ्लो बनाते हैं. भारत का व्यापार घाटा, जो फरवरी में 310 अरब डॉलर था, अब और बढ़ने की आशंका है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि चालू खाता घाटा, जो अभी जीडीपी का 1 फीसद यानी 30 अरब डॉलर है, वित्त वर्ष 27 में बढ़कर 2.3 फीसद तक पहुंच सकता है.

यह अभी भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स का संकट नहीं है. मई में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 697 अरब डॉलर था, जो सैद्धांतिक रूप से अब भी मजबूत स्थिति मानी जाती है. 2000 के दशक में यह औसतन 150 अरब डॉलर के आसपास था, 2010 के दशक में करीब 360 अरब डॉलर तक पहुंचा और फरवरी में 728.49 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से इसमें सिर्फ मामूली गिरावट आई है.

लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा आंकड़ा कई बार भ्रम भी पैदा कर सकता है. इन 697 अरब डॉलर में करीब पांचवां हिस्सा सोने का है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक लगातार खरीदता रहा है. असल नकद उपलब्धता दिखाने वाला हिस्सा, फॉरेन करेंसी ऐसेट्स फरवरी से मई के बीच 4 फीसद घटकर 552.4 अरब डॉलर रह गया. इस दौरान रिजर्व बैंक को रुपया संभालने के लिए अपने भंडार का इस्तेमाल करना पड़ा. रुपया डॉलर के मुकाबले 100 रुपए का स्तर पार करने के खतरे के करीब पहुंचता दिख रहा है.

उस सुरक्षा कवच को अब बाहर जा रहे पैसों के पैमाने के मुकाबले परखना होगा. जिन चीजों पर ‌किफायत बरतने की बात कही गई है, वे वित्त वर्ष 26 के 775 अरब डॉलर के आयात बिल का लगभग आधा हिस्सा थीं. ये अब महंगी होने वाली हैं. और ऐसा भी नहीं दिखता कि इस दबाव की भरपाई पूंजी निवेश के जरिए हो पाएगी.

पिछले छह महीनों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का रुख काफी हद तक नकारात्मक रहा है. जनवरी से अब तक रिकॉर्ड 26 अरब डॉलर भारत से बाहर भेजे जा चुके हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश घटकर 850 अरब डॉलर पर आ गए हैं.

इसी बीच चार साल से स्थिर पेट्रोल और डीजल की कीमतें मई में दो बार बढ़ानी पड़ीं. महंगे उर्वरक आयात की वजह से वित्त वर्ष 27 में कृषि सब्सिडी का बोझ भी 2 लाख करोड़ रुपए से ऊपर जा सकता है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 27 में विकास दर एक फीसद तक गिरकर 6.5 फीसद रह सकती है.

इस हफ्ते की कवर स्टोरी इस पूरे संकट का विस्तृत खाका सामने रखती है, हम इस आर्थिक भूलभुलैया में कहां खड़े हैं और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या हो सकता है. सरकार ने सिर्फ लोगों की समझदारी पर भरोसा करने के बजाए सोने और चांदी आयात हतोत्साहित करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाकर 15 फीसद से ज्यादा कर दिया है.

साथ ही गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम फिर से सक्रिय करने की चर्चा भी तेज है, ताकि भारतीय घरों में रखे करीब 30 हजार टन सोने का कुछ हिस्सा आर्थिक गतिविधियों में इस्तेमाल हो सके. बाकी क्षेत्रों में विकल्प इतने आसान नहीं हैं.

इलेक्ट्रिक वाहन उम्मीद जगाते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी समस्या सीमित रेंज है. यह उम्मीद करना कि लोग अचानक तली-भुनी चीजें खाना छोड़ देंगे, आदर्शवादी सोच होगी. फिर भी अगर इन सभी क्षेत्रों में संयम अपनाया जाए, तो भारत करीब 15 अरब डॉलर तक बचा सकता है.

दुनिया अर्थव्यवस्था में ठहराव और महंगाई के बढ़ने वाले दौर यानी स्टैगफ्लेशन की ओर जा रही है. कमजोर निर्यात, खाड़ी देशों से आने वाली रकम में कमी और, प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, अगर संकट गहराया तो 'भारी गरीबी की वापसी’ जैसी आशंकाओं के लिए तैयार रहना होगा. भारत पहले भी बड़े संकटों से निकल चुका है.

उसने ऐसा नीतिगत फुर्ती, संस्थाओं पर भरोसे और नागरिकों की सहनशक्ति के दम पर किया है. इस बार भी इन तीनों की एक साथ जरूरत पड़ेगी. आर्थिक उथल-पुथल शुरू हो चुकी है. सवाल यह नहीं कि इसका असर होगा या नहीं. असली सवाल यह है कि हम उसे झेलने के लिए कितने तैयार हैं. सीधी बात यह है कि अब कमर कसने का समय आ गया है.

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