- अरुण पुरी
हमेशा चुनाव राजनीति में नई हलचल पैदा करते हैं. वे ठहराव खत्म कर नई ऊर्जा भरते हैं. 2026 की गर्मियों में भी ऐसा ही हुआ है. देश को तीन नए मुख्यमंत्री मिले हैं. पश्चिम बंगाल ने स्पष्ट बहुमत के साथ शुभेंदु अधिकारी के रूप में भारतीय जनता पार्टी का पहला मुख्यमंत्री चुना है.
तमिलनाडु ने अभिनेता विजय को सार्वजनिक जीवन में नई और नाटकीय भूमिका दी है. केरल में कांग्रेस नेतृत्व को काफी माथापच्ची करनी पड़ी, तब जाकर विजयी अभियान का चेहरा वी.डी. सतीशन तय हुआ.
अब ध्यान सत्ता जीतने के असली मकसद—शासन—पर जाना चाहिए. चुनावी भाषण और नारों से जनादेश तो मिल सकता है लेकिन उनसे नौकरियां पैदा नहीं होतीं, निवेश वापस नहीं आता, संस्थाएं दुरुस्त नहीं होतीं और न ही सरकारी खजाने का संतुलन बनता है.
बंगाल में अधिकारी के शुरुआती कदम साफ संकेत देते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं. उन्होंने पार्टी और प्रशासन के बीच फर्क बहाल करने की बात कही है. ममता बनर्जी के केंद्रीकृत शासन में यह रेखा लगभग मिट चुकी थी, जहां पुलिस का एक हिस्सा भी पार्टी कैडर की तरह काम करता दिखता था. अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शब्दों को अमली जामा पहनाने की होगी.
उन्हें विचारधारा और शासन की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा. भाजपा ने चुनाव प्रचार में राष्ट्रीय सुरक्षा को राज्य की प्राथमिकताओं के केंद्र में रखने का वादा किया था. उसी दिशा में अधिकारी ने सीमा पर बाड़ लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल को जमीन सौंपी और भारतीय न्याय संहिता, आयुष्मान भारत जैसी उन केंद्रीय योजनाओं को लागू किया जिन्हें ममता सरकार ने रोके रखा था. लेकिन उनकी सबसे बड़ी चुनौती राजनीति से बाहर है. वह है बंगाल की अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करना. यह वही लक्ष्य है जिसे हासिल करने की कोशिश में कई पूर्व मुख्यमंत्री अपनी साख गंवा चुके हैं.
बंगाल की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से करीब 20 फीसद कम है. राज्य में रोजगार की हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 50 लाख से ज्यादा बंगाली काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जा चुके हैं. राज्य पर 7.71 लाख करोड़ रुपए का भारी कर्ज है. भारत में आने वाले कुल विदेशी निवेश में बंगाल की हिस्सेदारी सिर्फ 0.7 फीसद है. यह उस आधी सदी की विरासत है, जिसमें पूंजी पलायन ने बंगाल की उत्पादन क्षमता को कमजोर कर दिया और राज्य को अपने ही जंग लगे औद्योगिक इलाके में बदल दिया.
काफी लंबे समय बाद केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार बनी है. उम्मीद है कि यह मौका सिर्फ भावनात्मक मुद्दों या आसान राजनैतिक फायदे तक सीमित नहीं रहेगा. अगर जनता ने पिछली सरकार को नाकाम माना है, तो इसलिए कि बंगाल अपने पुराने साये से बाहर निकले और राज्य में सचमुच औद्योगिक क्षेत्र का उद्धार शुरू हो.
तमिलनाडु में स्थिरता बनाए रखना विजय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. फिलहाल उन्होंने इसे संभाल लिया है. 13 मई को अन्नाद्रमुक के 25 विधायकों के क्रॉस वोटिंग कर तमिलगा वेत्रि कलगम सरकार के समर्थन में आने के बाद विजय ने नाटकीय तरीके से विश्वास मत जीत लिया. लेकिन उनका 'हनीमून पीरियड' कितना लंबा चलेगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि वे काम करते हुए कितनी जल्दी सीखते हैं.
उनका चुनावी अभियान अब तक ज्यादा सिनेमाई अंदाज वाला था. अब वक्त असली काम का है. उन्हें अपनी स्पष्ट नीतिगत पहचान बनानी होगी, एक मजबूत टीम तैयार करनी होगी और असरदार प्रशासनिक ढांचा खड़ा करना होगा. चूंकि उनकी तुलना एम.जी. रामचंद्रन से की जा रही है, इसलिए उन्हें यह भी याद रखना होगा कि दिवंगत अभिनेता-राजनेता एमजीआर और उनकी राजनैतिक उत्तराधिकारी जे. जयललिता ने सिर्फ करिश्मे के दम पर शासन नहीं किया. उन्होंने द्रविड़ मॉडल की राजनीति को प्रशासनिक मजबूती दी थी. उस दौर में भले इसकी आलोचना हुई हो, लेकिन उसी मॉडल ने तमिलनाडु को कई सामाजिक और आर्थिक सूचकांकों में देश के शीर्ष राज्यों में पहुंचाया.
एक मायने में यही बात विजय के सामने सबसे दिलचस्प चुनौती भी खड़ी करती है. उन्हें कोई कंगाल राज्य नहीं मिला, बल्कि भारत की सबसे ज्यादा औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक मिली है, जहां मजबूत मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर और सामाजिक ढांचा पहले से मौजूद है. एम.के. स्टालिन सरकार पर यह कहकर पहला हमला किया गया कि उसने 'खाली खजाना' छोड़ा है. इस आरोप के पीछे एक सचाई जरूर है—करीब 10 लाख करोड़ रुपए के साथ तमिलनाडु पर देश का सबसे ज्यादा कुल सार्वजनिक कर्ज है, भले ही उसका कर्ज-जीएसडीपी अनुपात अभी संभालने लायक हो.
यह साफ हो गया कि विजय सिर्फ राजस्व बढ़ाने की राजनीति नहीं करेंगे. उनके शुरुआती फैसलों में से एक था स्कूलों और संवेदनशील इलाकों के आसपास मौजूद 700 सरकारी शराब की दुकानों को बंद करना. यह कदम स्वागतयोग्य है. लेकिन उन्हें उद्योग जगत और आम लोगों को भरोसा भी दिलाना होगा कि नैतिक सुधार के नाम पर प्रशासनिक अतिरेक नहीं होगा. तमिलनाडु को खुद अपने खिलाफ किसी क्रांति की जरूरत नहीं है. उसे सुधार के साथ निरंतरता चाहिए.
केरल में अब कहानी राजनैतिक प्रबंधन से आगे बढ़कर वित्तीय प्रबंधन पर टिकेगी. वी.डी. सतीशन लोकप्रिय हैं और अपनी स्वतंत्र सोच के लिए जाने जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे दिवंगत मार्क्सवादी नेता वी.एस. अच्युतानंदन थे. राजनैतिक तौर पर सतीशन ने वही कौशल दिखाया, जिसने उन्हें चुनाव जिताया. उन्होंने लंबी अंदरूनी लड़ाई में राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले के.सी. वेणुगोपाल को मात देकर अपनी बढ़त साबित की. लेकिन राज्य का खजाना इतनी आसानी से साथ देता नहीं दिख रहा.
सरकार को रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है. सरकारी कर्मचारियों का वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान मिलकर राज्य के हाथ आई नकदी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा खा जाते हैं. इससे पूंजीगत खर्च के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है. सतीशन को बेहद रचनात्मक और व्यावहारिक रास्ते निकालने होंगे.
नए मुख्यमंत्रियों ने अपना जनादेश अर्जित किया है. असम में हिमंत बिस्व शर्मा का प्रभुत्व कायम है और उनकी चुनौतियां भी अपनी हैं; अपने प्रभुत्व को गहरे विकास में बदलना होगा.
चुनाव किसी नेता की सहनशक्ति, संगठन क्षमता और राजनैतिक समझ की परीक्षा लेते हैं. लेकिन शासन उससे कहीं कठिन इम्तिहान होता है. यहीं पता चलता है कि कोई नेता भीड़ जुटाने से आगे बढ़कर काम करके दिखा सकता है या नहीं. इस हफ्ते की आवरण कथा उन नेताओं पर केंद्रित है, जो इसी बदलाव के मोड़ पर खड़े हैं. उनका चुनाव अभियान खत्म हो चुका है. असली परीक्षा अब शुरू हुई है.

