जब बी-62 स्टूडियोज वाले फिल्म- मेकर आदित्य धर और उनके भाई लोकेश जियो स्टूडियोज (मीडिया ऐंड कंटेंट बिजनेस आरआइएल) की प्रेसिडेंट ज्योति देशपांडे को कराची के गैंग्स में घुसे एक भारतीय जासूस की कहानी सुनाने पहुंचे, तो उन्हें जरा भी अंदाजा न था कि वे भारतीय सिनेमा के बॉक्स-ऑफिस पर एक नया इतिहास रचने वाले हैं.
आदित्य अपनी पहली ब्लॉकबस्टर फिल्म उड़ी: द सर्जिकल स्ट्राइक (2019) निर्देशित करने और फिर तीन फिल्में प्रोड्यूस करने के बाद डायरेक्टर की कुर्सी पर फिर से बैठने को बेताब थे. एक बड़े बजट का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट अटकते हुए वे देख चुके थे. पिच मीटिंग में कहानी सुनाने का जिम्मा ओजस गौतम को सौंपा गया था, जो आदित्य की पत्नी और एक्ट्रेस यामी गौतम के भाई हैं.
देशपांडे आज भी वह दिन याद करती हैं. पार्ट-1 की सफलता के बाद एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ''स्क्रिप्ट बहुत लंबी थी.'' इसमें जबरदस्त ऐक्शन सीन थे, और कई तो काफी हिंसक थे, और इनमें से अधिकांश की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ही था. नतीजतन, फिल्म को ए (वयस्क) का प्रमाणपत्र मिला, जिसका मतलब था कि यह फिल्म पूरे परिवार के साथ देखने लायक नहीं है.
देशपांडे ने सोचा, ''किसी भी प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के लिए जो सामान्य फॉर्मूला-बेस्ड कमर्शियल पैमाने अपनाए जाते हैं, उन पर तो यह फिल्म किसी भी स्थिति में खरी नहीं उतर रही थी. यह महंगी फिल्म भी थी.'' बहरहाल, उन्हें इसका फॉर्मेट पसंद आया—जो कहानी के बजाए किरदारों पर ज्यादा केंद्रित था और इसमें देशभक्ति का जो अंदाज दिखाया गया था, वह भी उन्हें काफी भाया. उन्होंने कहा, ''इसमें देशभक्ति का राग नहीं अलापा गया था, फिर भी यह ज्यादातर देशभक्ति वाली फिल्मों के मुकाबले कहीं ज्यादा दिल को छूने वाली थी.''
तो इस अंदाज में हुआ धुरंधर का जन्म. अपना बजट तो फिल्म पहला शेड्यूल पूरा करते-करते ही पार कर चुकी थी लेकिन निर्माताओं ने रफ फुटेज देखे तो लगा कि उनके हाथ एक विनर लग चुका है. रिलीज के चार महीने पहले उन्होंने एक साहसिक फैसला किया: फिल्म को दो हिस्सों में बांट दिया जाए ताकि कहानी से समझौता न करना पड़े. देशपांडे कहती हैं, ''आदित्य और मुझे पता था कि या तो ये सुपरहिट होगी या बुरी तरह फ्लॉफ. दूसरा पार्ट या तो टॉयलेट पेपर हो जाएगा जिसे हम किसी को बेच नहीं पाएंगे और खुद ही देखेंगे या फिर फिल्म बेतहाशा कामयाबी बटोरेगी.''
उन्होंने एक जुआ खेला. दो साल बाद देशपांडे और धर विजेता बनकर उभरे. दो खंडों वाली धुरंधर ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर नए कीर्तिमान खड़े किए; इसके हिंदी संस्करणों ने कुल मिलाकर 18.7 करोड़ डॉलर (1,790 करोड़ रु. से ज्यादा) की कमाई की है और अमेरिका से 4.5 करोड़ डॉलर की अतिरिक्ति कमाई हुई. दोनों फिल्मों की दुनियाभर की कुल कमाई 32 करोड़ डॉलर (3,000 करोड़ रु.) से ज्यादा हो गई है. भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी इसे लेकर खासी उत्सुकता दिखी. पाकिस्तान में फिल्म के पहले भाग को लगभग दो करोड़ बार अवैध रूप से डाउनलोड किया गया और फिल्म हफ्तों तक नेटफ्लिक्स पर #1 पर ट्रेंड करती रही.
देशभक्ति और स्टाइल का मेल
धुरंधर को पूरी दुनिया के दर्शकों का इतना प्यार मिलने की एक वजह फिल्म एग्जिबिटर और वितरक अक्षय राठी बताते हैं. उनके शब्दों में, ''हम सभी चाहते हैं कि आतंकी हमलों के पीड़ितों को इंसाफ मिले और दोषियों को सजा हो.'' रणवीर सिंह अभिनीत भारतीय जासूस हमजा के किरदार वाली दो हिस्सों की यह कहानी बताती है कि वह किस तरह पाकिस्तान के खुफिया तंत्र में प्रवेश करता है और आतंकवादी ढांचे में घुसपैठ करता है. राठी कहते हैं ''धुरंधर में हर भारतीय का सपना पर्दे पर सच होता दिखता है.'' फिल्म में एक मजबूत भारत का उदय दर्शाया गया है: जैसा कि हमजा और भारतीय इंटेलिजेंस प्रमुख अजय सान्याल (आर. माधवन) कहते हैं ''यह नया हिंदुस्तान है. घर में घुसेगा भी, और मारेगा भी.''
हालांकि, भारत के मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर नजर रखने वाली कंपनी ऑरमैक्स मीडिया के संस्थापक और सीईओ शैलेश कपूर कहते हैं कि दो-भाग वाली इस फिल्म की सफलता का श्रेय पूरी तरह से राष्ट्रवादी भावनाएं उकसाने को नहीं दिया जा सकता. उनके मुताबिक, ''(यह फिल्म) द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी जैसी नहीं है.
उन फिल्मों को राजनैतिक और धार्मिक समूहों का समर्थन हासिल था...धुरंधर की लोकप्रियता किसी सोची-समझी रणनीति का नतीजा नहीं है, बल्कि कहीं ज्यादा स्वाभाविक है.'' जासूसी दुनिया को अत्यधिक ग्लैमराइज करके दिखाने वाली यशराज की वार, पठान और टाइगर जिंदा है जैसी फिल्मों के विपरीत धर के रॉ एजेंटों का शातिरपन और उनका त्याग कहीं संयत और संयमित तरीके से पेश किया गया है.
हां, इसका पार्ट-1 एक जासूसी थ्रिलर है पर साथ ही गैंगस्टर आधारित एक क्राइम ड्रामा भी है. इसमें रोंगटे खड़े कर देने वाला ऐक्शन है और ऐसे दमदार किरदार भी हैं, जिन्हें बेहद खूबसूरती से गढ़ा गया है—जैसे भ्रष्ट राजनेता जमील जमाली, जिसका किरदार राकेश बेदी ने शानदार ढंग से निभाया है.
फिल्म में बारीकियों पर गहराई से ध्यान देने का ही नतीजा है कि इसके लिए एक अलग ऑनलाइन हैशटैग चलता रहा—#peakdetailing. फिल्म के जबरा फैंस इसकी छोटी-छोटी विजुअल डिटेल्स पर गौर कर इसे साझा करते रहे, जैसे भारतीय खुफिया प्रमुख अजय सान्याल (आर. माधवन) दुबई के एक होटल में अपनी सिगरेट का टुकड़ा इसलिए नहीं छोड़ते, ताकि कहीं उनका डीएनए न रह जाए; या फिर यह कि जसकीरत सिंह रांगी (हमजा के रूप में अंडरकवर) नाम का एक किरदार उड़ी फिल्म में भी था—जो कथा-संसार रचने की धर की गूढ़ कला का एक सबूत है.
इंस्टाग्राम ने फिल्म के टाइटल की टाइपोग्राफी से प्रेरित एक नया फॉन्ट पेश किया है. फिल्म की कहानी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने जैसे कुछ और पहलू क्वांटिन तारंतीनो की किल बिल फिल्मों की याद दिलाते हैं—एक ऐसा पहलू जो राय को खास तौर पर पसंद है. मिशिगन यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडीज की प्रोफेसर और नेटवर्क्ड बॉलीवुड की लेखक स्वप्निल रॉय कहती हैं कि धर ने ''वैश्विक प्रभावों को अपनाया और उन्हें भारतीय रंग में ढाल दिया.''
फिल्म की लोकप्रियता में संगीत की बड़ी भूमिका थी. बेशक, देशभक्ति का जज्बा आपको पूरी तरह हमजा के साथ खड़ा करता है, जब वह पाकिस्तान के आतंकवादी नेटवर्क के खात्मे में जुटा होता है; लेकिन अक्षय खन्ना के रहमान डकैत और संजय दत्त के असलम चौधरी वाले किरदार भी नए अंदाज में पेश किए गए पुराने गानों हवा हवा, मोनिका, ओ माइ डार्लिंग, तम्मा तम्मा लोगे और ये इश्क इश्क की धुन पर आपको भी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं. सोशल मीडिया पर फ्लिपराची के ट्रैक 'फासला' ने तो ऐसी हलचल मचाई कि शायद ही कोई ऐसा बचा हो, जो इसका दीवाना न हो; यह अब इंटरनेट का पसंदीदा स्वैग एंथम बन चुका है.
परेशान करने वाली मिसालें!
पर दो हिस्सों वाली यह फिल्म आलोचनाओं से भी परे नहीं रही है. दूसरे भाग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई क्लिप्स शामिल किए जाने के अलावा पाकिस्तानी किरदार भी चायवाले के रूप में उनका हवाला देते हैं और कहते हैं कि उनकी मुसीबतों की जड़ वे ही हैं, उन्होंने ही उनकी जिंदगी को जहन्नुम बना डाला है. फिल्म में आए ऐसे संदर्भों ने इन आरोपों को स्वर दिया है कि धर एक सियासी एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं. इसी तरह से 2016 की नोटबंदी को नैरेटिव का हिस्सा बनाए जाने के लिए भी आलोचना हो रही है. हालांकि दोनों फिल्में सियासी जज्बात का ऐसा संवेदनशील मसला बन गई हैं कि इनकी किसी भी आलोचना को राष्ट्रविरोधी बता दिया जाता है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एजेके मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर की प्रोफेसर शोहिनी घोष कहती हैं, ''दर्शकों का एक बहुत बड़ा तबका फिल्मों को वैचारिक नजरिए से नहीं देखता बल्कि इसमें मिलने वाले भावनात्मक अनुभव का आनंद उठाता है.''
स्वप्निल रॉय का मानना है कि फिल्म ''देश में आज के दौर की राष्ट्रवादी भावना का एक आईना है. धुरंधर वैचारिक रूप से बहुत बारीक फिल्म नहीं है लेकिन प्रोपेगैंडा फिल्म भी नहीं है. यह न तो सरकार का भोंपू बनी है, और न ही इसका मकसद 'ज्ञान' देना है. बल्कि, इसका मकसद मनोरंजन करना है.'' उनके मुताबिक, धर की 'बेहतरीन ढंग से एडिट की गई जासूसी थ्रिलर' को समझने का सबसे अच्छा तरीका है फ्रेडरिक फोर्साइथ की थ्रिलर से इसकी तुलना.
''इसकी कहानी ऐतिहासिक तथ्यों से इतनी गहराई से जुड़ी है कि इसमें गढ़ी गई काल्पनिक बातें भी पूरी तरह से विश्वसनीय और दिलचस्प लगती हैं.'' लेकिन उन्हें हद दर्जे के खून-खराबे को मुख्यधारा में लाने की वजह से धुरंधर पर आपत्ति है. राय कहती हैं, ''यह चिंता की बात है, क्योंकि फिल्में अगर सचमुच राष्ट्रीय भावना को दर्शाती हैं तो फिर हिंसा के प्रति इस तरह का झुकाव हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में आ रहे बड़े बदलावों के बारे में क्या संकेत देता है?''
जो भी हो लेकिन फिल्म निर्माताओं की बिरादरी तो धर का लोहा मानती दिख रही है. निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा ने तो अपनी एक लंबी सोशल मीडिया पोस्ट में बाकायदा ऐलान किया, ''मैं मानता हूं कि उसने अपने अकेले के दम पर भारतीय सिनेमा का भविष्य बदलकर रख दिया. वे सिर्फ दृश्यों का निर्देशन नहीं करते...वे किरदारों और हम दर्शकों दोनों की मनोदशा में बुनियादी बदलाव लाते हैं. यह ऐसी फिल्म है जो नरम-नाजुक और शालीन होने का बिल्कुल दिखावा नहीं करती.
इसकी स्क्रिप्ट में पूरी मंशा, पूरा आशय बिल्कुल स्पष्ट है, दृश्य कहर बरपाते-से हैं, और इसमें सन्नाटे का भी उतने ही जबरदस्त अंदाज में इस्तेमाल किया गया है जितना कि गरजते-गूंजते साउंड इफेक्ट्स का.'' यहां तक कि निर्देशक अनुराग कश्यप ने भी पार्ट-1 को लेकर अपनी एक समीक्षा में धर के कसीदे पढ़े. उनका कहना था कि कुछेक डायलॉग्स को छोड़ दें तो इस पूरी फिल्म का निर्माण अव्वल दर्जे का है. वे खालिस अपने अंदाज में अपनी बात कहने के लिए डटे रहने पर धर की तारीफ करते हैं. उन्होंने लिखा, ''आप उस बंदे की सियासत से सहमत हों चाहे नहीं, लेकिन यह आदमी ईमानदार है.''
इस फिल्म के लिए काम करने वाले लगभग सभी लोगों को पहले से अंदाजा हो गया था कि यह हिट होगी. यह बात अलग है कि उन्हें भी इतनी बड़ी हिट होने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले साउंड डिजाइनर बिश्वदीप चटर्जी धर को तब से जानते हैं जब वे एकलव्य (2007) फिल्म में विधु विनोद चोपड़ा के असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहे थे. वे धर के 'दृढ़-संकल्प' से परिचित थे. उड़ी के लिए भी काम कर चुके चटर्जी बताते हैं, ''उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया और एक बेहद शानदार एआइ प्रेजेंटेशन दिखाते हुए बताया कि (धुरंधर में) किरदारों का लुक कैसा होगा. उसी में उन्होंने फिल्म की पूरी कहानी समझा दी.'' वे बताते हैं, ''रिलीज की डेट सिर पर आ पहुंचने'' वाली सारी अफरा-तफरी के बीच धर एकदम बुद्ध-से शांत रहते हैं. वे बस इतना ही कहते हैं, ''हो जाएगा.''
बॉलीवुड का नया जुनून
यहां तक कि धर के साथ पहली बार काम करने वाले लोग भी इस 43 वर्षीय फिल्मकार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए. दोनों फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स पर काम करने वाली कंपनियों में से एक फिल्मसीजीआइ के मैनेजिंग डायरेक्टर और को-फाउंडर आनंद भानुशाली कहते हैं, ''धर का विजन बहुत बड़ा था.'' वे बताते हैं, ''मुझे याद है, 2025 के मध्य में जब मैंने फिल्म के रशेज देखे थे तभी अंदर से पक्का भरोसा हो गया था कि यह फिल्म कुछ अलग है, बहुत ही खास है.''
देशपांडे की नजर में धुरंधर ने उसी को बड़ा करके दिखाया जो कि सिनेमा के लिए किए जाने की जरूरत है: मकसद वाले किस्से लाइए-बताइए. धुरंधर के निर्माता दुनिया भर में इसकी कामयाबी को भारत के लिए फख्र की बात मानते है. देशपांडे के शब्दों में, ''जब हम देखते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है और भारत कहां खड़ा है, तो ऐसे में हम सिर्फ समस्याओं पर ही फोकस करते हैं. पर क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अपने युवाओं को प्रेरित करें और उन्हें भारत पर दांव लगाने को कहें, जिससे कि हमारे उम्दा दिमाग यहां से छोड़कर न जाएं? यह हमारे लिए अपने नैरेटिव पर दावा जमाने का समय है. किसी मजहब या सियासत पर नहीं बल्कि सीधे भारत के बारे में.''
लब्बोलुबाब यह कि धुरंधर और उसके सीक्वल की ब्लॉकबस्टर सफलता की वजह सिर्फ देशभक्ति, भयानक हिंसा, बदला और देशभक्ति का कॉकटेल नहीं बल्कि कुछ और गहरी बात है: एक ऐसे देश की कहानी जिसका बार-बार इम्तहान लिया गया, वह रक्तरंजित हुआ, लेकिन टूटा नहीं—एक ऐसा भारत जिसने हर आघात सहा, उठा और फिर जीता.

