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प्रधान संपादक की कलम से

इस सफलता को एक आंकड़े से समझा जा सकता है: अब भाजपा और उसके सहयोगी भारत के 28 राज्यों में से 20 पर शासन कर रहे हैं. विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा है और फिलहाल भाजपा को रोक पाना मुश्किल नजर आ रहा

15 अप्रैल, 2026 का आवरण
अपडेटेड 18 मई , 2026

- अरुण पुरी

मई की चार तारीख को भारत ने दो बड़े चुनावी उलटफेर देखे. इनमें अभिनेता विजय की तमिलनाडु में एक नए और अप्रत्याशित खिलाड़ी के तौर पर जीत ज्यादा चौंकाने वाली थी. लेकिन पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त जीत कहीं ज्यादा ऐतिहासिक साबित हुई.

यह सही है कि पार्टी 2016 की तीन सीटों से 2021 में 77 सीटों तक पहुंच चुकी थी, मुख्य विपक्षी दल बन गई थी और वामपंथ को लगभग हाशिए पर धकेल चुकी थी. फिर भी बंगाल को लंबे समय तक हिंदुत्व राजनीति की वैचारिक सीमा माना जाता था.

एक ऐसा प्रदेश जो अपने सांस्कृतिक आत्मविश्वास और अलग राजनैतिक पहचान के कारण भाजपा की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं समझा जाता था. इस चुनाव नतीजे ने उस धारणा को पूरी तरह तोड़ दिया. चौंकाने वाले 92.5 फीसद मतदान के बीच बंगाल ने 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 207 सीटें दे दीं. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई. इसके साथ ही बंगाल की एक पूरी राजनैतिक व्यवस्था का अंत हुआ और एक नए दौर की शुरुआत. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा का प्रभाव पूरे पूर्वी भारत, साथ ही उत्तर, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से तक फैल चुका है.

यह भूचाल जैसा सियासी बदलाव आखिर हुआ कैसे? प्रधानमंत्री मोदी और उनके सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए बंगाल सबसे जटिल राजनैतिक पहेली था. यह ऐसा इलाका नहीं था जहां सिर्फ राम मंदिर का प्रतीकवाद चुनाव जिता देता. यहां मुस्लिम आबादी के बड़े इलाके थे, जो ममता बनर्जी को उनकी चर्चित ''30 फीसद शुरुआती बढ़त'' देते थे. भाजपा के पारंपरिक गढ़ों की तरह यहां पार्टी को प्रभावशाली दो-तीन ऊंची जातियों का स्वाभाविक समर्थन भी हासिल न था.

बंगाल की राय बनाने वाला तबका ज्यादा उदारवादी और वाम झुकाव वाला माना जाता रहा है. ग्रामीण इलाकों में तृणमूल ने संरक्षण आधारित नेटवर्क, मजबूत काडर समूहों और स्थानीय दबंगों के सहारे अपना प्रभाव कायम किया था. इसके मुकाबले भाजपा की राज्य इकाई एक बिखरी हुई सेना जैसी दिखती थी, जिसमें सिर्फ शुभेंदु अधिकारी ही ऐसे नेता थे जिन्हें गंभीर चुनौती देने वाला माना जा सकता था.

हमारी आवरण कथा शायद अब तक का सबसे विस्तृत और सबसे दिलचस्प विवरण देती है कि ''बंगाल को कैसे जीता गया''. सीनियर डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने इस पूरी कहानी को दो स्तरों पर समझाया है. पहला, अभियान के पैमाने और उसकी सटीकता को लेकर, जो संगठनात्मक रणनीति की एक मिसाल जैसा लगता है. 45.9 फीसद वोट शेयर रातोरात नहीं मिलता. इसकी शुरुआत 2022 में हुई, जब पार्टी ने एक फील्ड कमांडर भाजपा महासचिव सुनील बंसल को तैनात किया.

आरएसएस से भाजपा को मिले बंसल में संघ की लगभग सारी विशेषताएं थीं: तड़क-भड़क से दूर शांत व्यक्तित्व, रणनीतिक सोच और जमीनी संगठन बनाने की असाधारण क्षमता. 2024 के लोकसभा चुनाव के झटके के बाद बंसल ने समझ लिया कि भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी कार्यकर्ताओं की कमी है और इसे आरएसएस के स्वयंसेवी नेटवर्क के जरिए ही दूर किया जा सकता है. इसके बाद संघ के तमाम सहयोगी संगठन पूरे बंगाल में फैल गए. चार मई को दिखे नतीजों की नींव दो साल तक लगातार रखी गई—बूथ दर बूथ, बैठक दर बैठक, ब्लॉक दर ब्लॉक और मतदाता दर मतदाता. खुद बंसल ने सभी 294 विधानसभा सीटों का 10 से ज्यादा बार दौरा किया.

दूसरी परत भाजपा के उस संदेश तंत्र में थी, जिसे उसने बंगाल के विशाल और विविध सामाजिक परिदृश्य के मुताबिक तैयार किया. इसमें व्यापक और बेहद स्थानीय, भावनात्मक और ध्रुवीकरण करने वाले हिंदुत्ववादी संदेश को हर क्षेत्र और जाति के हिसाब से तैयार सूक्ष्म रणनीति के साथ जोड़ा गया. पहले हिस्से के लिए ममता बनर्जी पर मुस्लिम समुदाय की ओर झुकाव के आरोप पहले से ही जमीन तैयार कर चुके थे.

2024 के आखिर में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की खबरों ने सीमा से लगे जिलों में मुस्लिम प्रभाव को लेकर भाजपा की ओर से पैदा की जा रही चिंताओं को और हवा दी. कार्तिक महाराज जैसे पार्टी समर्थित प्रचारकों, जिन्हें 2025 में पद्मश्री मिला था, ने सार्वजनिक सभाओं में भाषण देकर धार्मिक लामबंदी को और तेज किया.

लेकिन हिंदुत्व पर होने वाली चर्चा के बीच अक्सर भाजपा की 'मंडल शैली' की सामाजिक इंजीनियरिंग पर कम ध्यान जाता है. महिष्य समुदाय, जिससे शुभेंदु अधिकारी आते हैं, तेली समुदाय और साहा जैसे व्यापारी वर्ग—जिनकी कुल संख्या करीब डेढ़ करोड़ मानी जाती है और जिनका कई इलाकों में प्रभाव है—से ओबीसी आरक्षण का वादा किया गया. इसके ऊपर सांप्रदायिक राजनीति की परत भी चढ़ाई गई. कोलकाता का भवानीपुर, जहां अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया, बंगाल की सबसे विविध सामाजिक संरचना वाली सीटों में से एक है.

यहां यह सूक्ष्म सामाजिक रणनीति अपने चरम पर दिखी. करीब 16 लाख मारवाड़ियों और उनसे कम संख्या वाले सिंधी और गुजराती समुदायों—जो सभी महानगरीय कोलकाता का हिस्सा हैं—को साधने की कोशिश की गई. पश्चिमी आदिवासी इलाकों में आदिवासियों को वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए जोड़ना, उत्तर बंगाल में राजबंशियों को और दक्षिण बंगाल में नामशूद्र तथा मतुआ समुदाय को अपने साथ लाना कई वर्षों की मेहनत का नतीजा था. मतदान के दिन तक किसी सामाजिक वर्ग को नजरअंदाज नहीं किया गया. मतदाता सूची के विवादित विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद पहले से घटे मुस्लिम वोटों में बंटवारे ने भाजपा को उसकी अपनी उम्मीदों से भी ज्यादा फायदा पहुंचाया.

हम तमिलनाडु में विजय की उस लहर का भी विस्तृत विश्लेषण पेश कर रहे हैं, जिसने एम.के. स्टालिन की डीएमके सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया. इसके साथ असम में हिमंत बिस्व शर्मा की भगवा जीत और केरल में वामपंथी दिग्गज पिनाराई विजयन पर कांग्रेस की सांत्वना भरी जीत का भी विश्लेषण शामिल है. लेकिन मुख्य कहानी बंगाल की है, जिसमें कोलकाता से असिस्टेंट एडिटर अर्कमय दत्त मजूमदार ने भी योगदान किया है.

करीब 40 दौरों के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव को खुद पर केंद्रित नहीं होने दिया. इसके बजाए उनकी धुती-पंजाबी और झालमुड़ी जैसी प्रतीकात्मक छवियां भाजपा की उस कोशिश का हिस्सा बनीं. इस सफलता को एक आंकड़े से समझा जा सकता है: अब भाजपा और उसके सहयोगी भारत के 28 राज्यों में से 20 पर शासन कर रहे हैं. विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा है और फिलहाल भाजपा को रोक पाना मुश्किल नजर आ रहा.

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