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चार्जशीट पर चार्जशीट

जांच एजेंसी ने चार्जशीट दाखिल करने और संपत्ति लौटाने की कार्रवाई तेज की जिससे फिर उसकी साख बन रही

ईडी के डायरेक्टर राहुल नवीन दिल्ली में एक कांफ्रेंस के दौरान
अपडेटेड 11 मई , 2026

मुनीश चंद्र पांडेय

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 17 मई, 2019 को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का एक मामला दर्ज किया. यह केस भ्रष्टाचार के उन आरोपों से जुड़ा था, जिनमें गुरुग्राम के सेक्टर 58 से 67 के बीच लगभग 1,417 एकड़ जमीन को कथित तौर पर बाजार दर से कम कीमत पर दबाव डालकर बेचने की बात कही गई थी. यह मामला उसी ढर्रे पर चला जो इस एजेंसी की पहचान बन चुका है—छापे मारे गए, सुर्खियां बनीं, संपत्तियां जब्त की गईं—और फिर, खामोशी. इस साल मार्च में ईडी ने आखिरकार हुड्डा के खिलाफ एक चार्जशीट—जिसे औपचारिक रूप से 'प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट' (पीसी) या अभियोग कहा जाता है—दाखिल कर दी. इसे मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत में दायर किया गया. साथ ही, छह साल तक चली एक लंबी जांच पूरी हुई.

लेकिन यह अकेला हुड्डा का मामला नहीं है. यह उन व्यापक बदलावों की सबसे ताजातरीन मिसाल है जिन्हें ईडी के निदेशक राहुल नवीन लागू कर रहे हैं, ताकि निदेशालय दर्ज मामलों को आगे बढ़ाने के अपने तरीके में सुधार कर सके. अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एजेंसी को युद्ध स्तर पर काम करने और जांच के लिए लंबित 6,000 से ज्यादा मामलों में चार्जशीट दाखिल करने के लिए कहा है, ताकि ये मामले कोर्ट तक पहुंचें और उन पर मुकदमा शुरू हो. वैसे भी ईडी को अपने तौर-तरीकों में खामियों के लिए विपक्षी दलों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ता है कि वह केस दर्ज करने और संपत्ति जब्ती में बहुत तेज है, लेकिन मामलों को अंजाम तक पहुंचाने में सुस्त. वर्ष 2005 से 2014 के बीच के नौ सालों में उसने महज 84 पीसी (अभियोग) दाखिल किए—यानी हर साल 10 से भी कम. यहां तक कि 2014 से 2024 के बीच भी सालाना औसत 132 ही रहा. विशेषज्ञों का कहना है कि संस्था के स्तर पर मामलों के अटके रहने का एक स्याह पहलू और भी था.

चार्जशीट दाखिल न होने पर जांच हमेशा चलती रहती थी, ऐसे में अलग-अलग अधिकारियों को आरोपियों के मामले में व्यापक अनौपचारिक अधिकार मिले रहते थे; और उन पर आरोप भी लगते थे कि समन से राहत देने के बदले वे पैसों की मांग करते थे. नवीन ने कामकाज के इस सुस्त तरीके को बदलने का बीड़ा उठाया तो उन्होंने सबसे पहले अपनी मौजूदा मशीनरी को सक्रिय किया—जोन के अधिकारियों के त्रैमासिक सम्मेलन में सभी जोन को एक ही सख्त निर्देश दिया गया—अभियोग दाखिल करने को ही जांच पूरी होने का असली पैमाना माना जाए.

अभियोग पर जोर
नवीन ने वित्त वर्ष 26 के लिए 500 अभियोग पत्रों का टारगेट रखा. यह पहले के तरीकों से एकदम अलग था, खासकर उन्होंने साफ कर दिया कि यह जवाबदेही का पैमाना है; इसके तहत फील्ड यूनिटों को निर्देश दिए गए कि वे लंबित प्रवर्तन केस सूचना रिपोर्टों (ईसीआइआर) की एक-एक कर समीक्षा करें और उन मामलों की पहचान करें जो मुकदमा चलाने लायक हैं. इस तरह के सम्मेलन में शामिल हुए एक सीनियर अधिकारी ने बताया, ''बढ़े हुए लक्ष्य की जरूरत इसलिए थी कि अरसे से लंबित जांचों को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके और नई जांचों को पूरा करने की समय-सीमा भी घटाकर एक से दो साल के उचित दायरे में लाई जा सके—सिवाय उन मामलों के जो बहुत ज्यादा पेचीदा हैं.'' इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे. निदेशालय ने जहां वित्त वर्ष 24 में 85 और वित्त वर्ष 25 में 198 मामले क्लोज किए, वहीं वित्त वर्ष 26 में यह आंकड़ा बढ़कर 685 हो गया—यानी दो साल में आठ गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी. स्टैटिस्टिकल क्लोजर नामक कैटेगरी शुरू की गई जिसमें खासतौर पर उन मामलों को शामिल किया गया जिनमें अंतिम पीसी (अभियोजन शिकायत) दाखिल हो चुकी है और अब सिर्फ ट्रायल का चरण बाकी है. इस क्लोजर कैटेगरी में मामलों की संख्या एक ही साल में 93 से बढ़कर 429 हो गई.

अधिकारी बताते हैं कि इन कठोर लक्ष्यों को पूरा करना आसान नहीं था, खासतौर पर इसलिए कि ईडी के पास 2011 से कर्मचारियों की संख्या अभी तक 2,000 ही बनी हुई है, जबकि केसों की संख्या और उनकी पेचीदगी, दोनों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. इसलिए डेटा एनालिसिस सॉफ्टवेयर के साथ दूसरे तकनीकी साधनों का इस्तेमाल शुरू किया.

रकम लौटाना
अगर अभियोग दाखिल करना संस्थागत स्तर पर दिख रहा सबसे स्पष्ट बदलाव है, तो रकम वापसी इसका सबसे अहम प्रमाण है जिसके तहत जब्त की गई संपत्ति वित्तीय अपराध के पीड़ितों को वापस की जाती है. वित्त वर्ष 2026 में ईडी ने पीडि़तों और कानूनी दावेदारों को 32,678 करोड़ रुपए की संपत्ति वापस की, जो वित्त वर्ष 25 के 15,263 करोड़ रुपए से दोगुनी से भी ज्यादा है. 31 मार्च, 2026 तक, कुल रकम वापसी 63,213 करोड़ रुपए रही—जिसे दशकों से धोखाधड़ी के शिकार हुए बैंकों, जमाकर्ताओं, घर खरीदारों और निवेशकों को लौटाया गया. इसमें 15,582 करोड़ रुपए की संपत्तियां शामिल थीं, जिन्हें जस्टिस लोढ़ा समिति को वापस किया गया ताकि वे उसे पीएसीएल लिमिटेड की ठगी के शिकार निवेशकों को बांट सकें.

 

नवीन ने वित्त वर्ष 26 के लिए 500 अभियोग पत्रों का टारगेट रखा. उन्होंने साफ कर दिया कि यह जवाबदेही का पैमाना है

 

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