
- अदिति पै
बाहर से देखने पर वडाला रोड के अशोका बिजनेस एन्क्लेव में मौजूद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के बीपीओ का दफ्तर किसी आम आइटी कंपनी जैसा ही दिखता है. सुबह युवा कर्मचारी आते-जाते नजर आते हैं. प्रवेश द्वार पर बैग रैक में रखे होते हैं और रात में युवतियां अपनी स्कूटी या इंतजार कर रहे ऑटो रिक्शा से घर लौटती दिखती हैं.
थोड़ी ही दूरी पर वडालागांव है, एक घनी आबादी वाला इलाका, जहां झुग्गियां और पुराने मकान हैं और मुस्लिम आबादी भी अच्छी-खासी है. यहां के कई युवा नासिक की आइटी कंपनियों में नौकरी करते हैं, जिनमें कुछ के पास बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लिकेशंस जैसी डिग्री है. टीसीएस समेत कई कंपनियां स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देती हैं ताकि वे रात की पाली में काम कर सकें और उन्हें लंबी दूरी तय न करनी पड़े.
लेकिन व्यस्त कारोबारी इलाके, भीड़भाड़ वाली सड़क, बगल में अशोका हॉस्पिटल और आसपास कई आइटी तथा बीपीओ दफ्तर होने के बावजूद किसी को तीसरी मंजिल पर चल रही कथित घपले की भनक नहीं थी. यहां करीब 150 कर्मचारी काम करते हैं. फिर मार्च की एक देर रात, टीसीएस की एक कर्मचारी ने नासिक के एक सामाजिक कार्यकर्ता को संदेश भेजा, ''दादा, मुझे आपसे मिलना है... एक समस्या है.''
वह कुछ किलोमीटर दूर उसके फ्लैट पर पहुंचा, बिना यह जाने कि मामला क्या है. रात के करीब ढाई बजे महिला ने कथित तौर पर दफ्तर में हुए मौखिक और यौन उत्पीड़न की दर्दनाक कहानी सुनाई. वह शादीशुदा थी और नहीं चाहती थी कि उसके परिवार को इस बारे में पता चले, इसलिए वह एफआइआर दर्ज कराने को तैयार नहीं थी. उसने बताया कि उसकी एक सहकर्मी वैष्णवी (बदला हुआ नाम) ने पुलिस में लिखित शिकायत दी थी, लेकिन डर और बाद के संभावित नतीजों की बात सोचकर बाद में शिकायत वापस ले ली.
मामले की भनक लगते ही नासिक के पुलिस कमिशनर संदीप कार्णिक तुरंत हरकत में आ गए. उन्होंने महिला अफसरों की एक विशेष जांच टीम बनाई, जिसने बीपीओ के भीतर जाकर चुपचाप काम शुरू किया. टीम ने आरोपियों की दिनचर्या और व्यवहार पर नजर रखी, सीसीटीवी फुटेज देखे, कथित तौर पर सदमे में दिख रही महिला कर्मचारियों की पहचान की और उन्हें भरोसा देकर आगे आने तथा औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के लिए समझाया.
जांच में जो तस्वीर सामने आई, उसमें कथित धोखाधड़ी, यौन हिंसा, ब्लैकमेल, दबाव और धर्म परिवर्तन की कोशिशों का जाल नजर आया. इससे भी गंभीर बात यह थी कि यह सब कथित तौर पर तीन साल से चल रहा था और शिकायतों को या तो नजरअंदाज किया गया या दबा दिया गया.
नौ एफआइआर दर्ज हो चुकी हैं. इनमें आठ महिलाओं ने और एक पुरुष ने दर्ज कराई है. हालांकि, एक सामाजिक कार्यकर्ता के मुताबिक, शिकायतों की संख्या 60 तक हो सकती है. छह पुरुषों—39 वर्ष के दानिश शेख, तौसीफ अत्तार, रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी, शफी शेख (सभी की उम 35 वर्ष) और 22 साल के आसिफ अंसारी के अलावा दो महिलाओं—एसिस्टेंट जनरल मैनेजर, ऑपरेशंस 51 साल की अश्विनी चैनानी और 25 साल की निदा खान (जो बकौल टीसीएस ''प्रॉसेस असिस्टेंट'' हैं)—पर भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं में केस दर्ज हुआ है.
इनमें यौन उत्पीड़न, पीछा करना, धार्मिक भावनाएं आहत करना और एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून की धाराएं शामिल हैं. सात आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जबकि निदा खान फरार बताई जा रही हैं (देखें, आरोपी).
टीसीएस की नासिक इकाई में आरोपों और शिकायतों से टाटा समूह हिल उठा है. टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने इसे ''बेहद चिंताजनक और बेचैन करने वाला'' बताया. उन्होंने कहा, ''इस घटना पर बेहद संजीदा ढंग से कार्रवाई की गई है. टाटा समूह अपने कर्मचारियों की किसी तरह की जोर-जबरदस्ती या दुर्व्यवहार को कतई बर्दाश्त नहीं करता. तथ्यों का पता लगाने और इस स्थिति के लिए जिम्मेदार सभी लोगों की पहचान के लिए विस्तृत जांच-पड़ताल चल रही है.''
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी जिक्र है कि जांच कंपनी की सीओओ आरती सुब्रह्मण्यम की अगुआई में चलेगी. उसमें आगे यह भी कहा गया है, ''जो दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ वाजिब और कड़ी कार्रवाई की जाएगी. जरूरी सुधार या जरूरी कदम फौन उठाए जाएंगे और उन पर कड़ाई से अमल किया जाएगा.''
अश्लील' हरकत
उस समय 20 साल की थीं वैष्णवी. उनके लिए यह कहानी किसी रोमांटिक उपन्यास जैसी लगी थी. देवलाली कैंटोनमेंट के भीड़भाड़ वाले लेविट मार्केट में कॉलेज का पूर्व सहपाठी दानिश से अचानक मुलाकात हुई. फिर खंडोबा टेकड़ी जैसे लोकप्रिय ठिकानों पर मुलाकातें बढ़ीं. बाद में उसी कंपनी में नौकरी मिली, जहां दानिश टीम लीडर था. और फिर आया शादी का वादा. यह कहानी देवलाली कैंप में 26 मार्च को दर्ज उसके एफआइआर की है. उसके साथियों के मुताबिक, दफ्तर में दानिश कथित तौर पर उस पर खास मेहरबान रहता था. उसे वे सुविधाएं मिलती थीं, जो दूसरे को नहीं मिलती थीं. चेतावनी के संकेत थे भी, तो उसे उन्होंने नजरअंदाज कर दिया.
या शायद वे ऐसा करने को मजबूर थीं. उनके एफआइआर के मुताबिक, एक दूसरे टीम लीडर तौसीफ पर आरोप है कि उसने दोनों के रिश्ते को उजागर करने की धमकी दी और चुप रहने के बदले यौन संबंध की मांग की. यह सब कंपनी में 2023 में उनके आने के बाद तीन साल तक चलता रहा. आखिरी झटका इस साल फरवरी में लगा, जब दानिश की बीवी होने का दावा करने वाली एक औरत ने उन्हें कॉल करके उन्हें अपनी शादी और दो बच्चों के बारे में बताया.
लेकिन वैष्णवी इकलौती नहीं लगतीं. मसलन, एक अन्य एफआइआर 2023 से कार्यस्थल पर उत्पीड़न का ऐसा ही पैटर्न जाहिर करती है. एक और वरिष्ठ कर्मचारी रजा ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता को कई बार घूरा, उसका पीछा किया, छूने का प्रयास किया, और उसकी शादी के संबंध में यौन टिप्पणियां कीं. उसने एक और साथी कर्मचारी शाहरुख पर भी 19 मार्च को गुड़ी पड़वा के मौके पर अनुचित हरकत करने का आरोप लगाया. एक तीसरी महिला ने अपने एफआइआर में उन दोनों पर उसकी सेहत पर टिप्पणी करने और उसके रिश्तों के बारे में संगीन सवाल किए, और इशारे किए कि क्या वह उनमें एक साथ ''तैयार'' है.
इन एफआइआर में धार्मिक उत्पीड़न की भी बातें हैं. वैष्णवी ने अपनी शिकायत में बताया है कि दानिश और तौसीफ ने कथित तौर पर उनकी धार्मिक आस्थाओं का मखौल उड़ाया और बार-बार इस्लाम अपना लेने के फायदे गिनाए. फिर, निदा खान ने उन्हें यकीन दिलाने की कोशिश की कि ''शिवलिंग असल में पुरुष गुप्तांग का ही प्रतीक है और कि उसकी पूजा करना अश्लील है.'' एक और एफआइआर में एक पुरुष कर्मचारी कृष्णा ने आरोप लगाया है कि दानिश, रजा और शाहरुख के साथ तौसीफ ने ''जबरन मुझे अपने धार्मिक टोपी पहनने और नमाज पढ़ने पर मजबूर किया. वे मुझे अपने साथ खाना खिलाने होटलों में ले जाते और मांसाहारी भोजन करने का दबाव डालते. मैंने मना किया तो वे मेरी खिल्ली उड़ाते और मेरे धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते.''
कार्णिक कहते हैं, ''आरोपी अहम पदों पर थे, इसलिए पद का दुरुपयोग करके सहकर्मियों का यौन और धार्मिक उत्पीड़न किया.'' मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआइटी) बनाई गई है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) और ऐंटी टेररिज्म स्क्वॉड भी जांच में शामिल हो गए हैं. वे कथित बड़े धर्म परिवर्तन नेटवर्क, एक कट्टरपंथी प्रचारक से सीमा पार संबंधों और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन के आरोपों की जांच कर रहे हैं. एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''हम यह देख रहे हैं कि यह सब किसी स्थानीय धार्मिक नेटवर्क, सोशल मीडिया या दूसरे रास्तों से हुआ या नहीं.''

भरोसा जीतने के तरीके
जांच अधिकारियों के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क का तरीका साफ और लगातार एक जैसा था. शुरुआत होती थी भरोसा जीतने, प्यार का एहसास दिलाने या सुरक्षा देने के वादे से. आरोप है कि ये लोग युवा महिला सहकर्मियों से दोस्ती करने के लिए खुद को मददगार और ध्यान रखने वाला दिखाते थे. यहां तक कि उनकी स्कूटी में जानबूझकर खराबी कर दी जाती थी—जैसे वायर निकाल देना—फिर वही लोग उसे ठीक करने का नाटक करते थे या घर छोड़ने की पेशकश करते थे.
कोई महिला कर्मचारी दफ्तर नहीं आती थी तो उसके घर फोन किया जाता था और हालचाल पूछने के नाम पर चिंता जताई जाती थी. इससे परिवार से भी नजदीकी बढ़ाई जाती थी. निदा युवा महिला कर्मचारियों से दोस्ती करती थी और आरोप है कि वही उन्हें आरोपियों तक पहुंचाने की कड़ी थी. एक पूर्व कर्मचारी कहता है, ''कई लड़कियां बहुत कम उम्र की थीं, करीब 20 साल की. वे उस व्यवहार को सचमुच देखभाल और सुरक्षा समझ बैठती थीं.''
जब भावनात्मक निर्भरता बन जाती थी, तब कथित तौर पर दबाव शुरू होता था. इसका तरीका इनाम और सजा जैसा था. जो महिलाएं बात मानती थीं, उन्हें अनौपचारिक सुविधाएं दी जाती थीं, जैसे ऑफिस आने-जाने के समय में ढील. एक एफआइआर में जिक्र है कि जो विरोध करती थीं, उन्हें छोटे-छोटे तरीकों से परेशान किया जाता था, जैसे मामूली देरी पर भी लेट मार्क करना, और अत्यधिक कस्टमरों के कॉल उनकी ओर कर दिए जाते थे.
दफ्तर के बाहर नासिक शहर अपने ठंडे मौसम, आसपास की पहाड़ियां और एकांत जगहों के साथ अनजाने में पृष्ठभूमि तैयार कर देता है. वैष्णवी के एफआइआर के मुताबिक, दानिश उसे खंडोबा टेकड़ी, त्र्यंगकेश्वर रोड के साथ लगे रिजॉर्ट और देवलाली कैंप के पेड़ों से घिरे एकांत जगहों पर ले जाता, जहां उनका 'रोमांस' खिला. साथ में फिल्में देखने जाना, वीकेंड योजनाएं और बिरयानी लंच तो स्टाफरों के बीच आम बताई जाती हैं. पुलिस उन दावों की भी जांच कर रही है कि कहीं खाने-पीने की चीजों में कुछ मिला दिया जाता था या नहीं.
दफ्तर के भीतर टीम लीडरों को अपनी टीम संभालने में काफी खुली छूट मिली हुई थी. कर्मचारियों का आरोप है कि पक्षपात का पैटर्न साफ-साफ दिखाई देता था. एक पूर्व कर्मचारी का कहना है, ''ऑफिशियल काम का समय नौ घंटे था, लेकिन कुछ लोग लॉग-इन करके सिर्फ तीन घंटे में निकल जाते थे.'' उसने या भी आरोप लगाया, ''वे दिन में कई बार ऑफिस में ही नमाज पढ़ते थे और दूसरों पर भी ऐसा करने के लिए दबाव बनाते थे.''
एक यूनिट मैनेजर ने ईमेल और परफॉर्मेंस अप्रेजल के जरिए कई शिकायतें उठाईं, लेकिन उन्हें कथित तौर पर खारिज कर दिया गया. पूर्व कर्मचारी ने कहा, ''वह खराब रेटिंग देता था, उसे ऊंचे अंक देने को कहा जाता था. इसलिए उसे उनकी ग्रेडिंग डी से ए करनी पड़ती थी.'' ऐसी ही कई बातें दर्ज कई एफआइआर में जोड़ी गई हैं, जिनकी सच्चाई विस्तृत जांच में ही सामने आ पाएगी.
आखिर क्यों रहीं खामोश
आखिर यह कथित साजिश पूरे तीन साल तक कैसे चलती रही? इन कथित उत्पीड़नों को दर्ज करने का कोई उपाय नहीं था. बैग और मोबाइल फोन तो अनिवार्य तौर पर बाहर ही जमा हो जाते हैं. कई कर्मचारियों का आरोप है कि चेतावनियों और शिकायतों को बार-बार नजरअंदाज किया गया. आरोप की जद में ऑपरेशंस एजीएम अश्विनी हैं, जो कंपनी में करीब दो दशक से थीं और पॉश (प्रीवेंशन ऑफ सेक्सुअल हरासमेंट) कमेटी के हिस्सा थीं, जो पूणे से काम करती है (नासिक इकाई में अपनी खुद की पॉश कमेटी नहीं है).
उन पर आरोप है कि यूनिट मैनेजर के जरिए पहुंची मौखिक शिकायतों को उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया. एक कर्मचारी की एफआइआर के मुताबिक, अश्विनी ने रजा के खिलाफ उसकी शिकायत यह कहकर टाल दी कि ''इसे इतना तूल देना क्यों चाहती हो? उसे जाने दो.''
कई पीड़ित आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से थे. उनके पास चुपचाप सब सहने के अलावा ज्यादा रास्ता नहीं था. सामाजिक बदनामी का डर और परिवार की नाराजगी का भय भी उन्हें खामोश रखता रहा. जैसा मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, अपने साथ हुए उत्पीड़न के बारे में बोलना शायद ही कभी आसान फैसला होता है.
वे कहते हैं, ''हम अक्सर बेबसी और डर का मिला-जुला असर देखते हैं. डर कि कोई भरोसा नहीं करेगा, डर कि नौकरी चली जाएगी और डर कि समाज क्या कहेगा. मेरे पास कई मरीज आते हैं और कहते हैं, 'अगर यह बात बाहर आ गई तो परिवार मेरे भविष्य को लेकर परेशान होगा, मेरी शादी कैसे होगी?' भारत में शर्म और सामाजिक बदनामी का असर बहुत गहरा होता है.''
दूसरी कहानी
इतनी ही या कुछ ज्यादा हैरानी की बात यह है कि बाहर किसी को टीसीएस बीपीओ में कुछ गलत होता नहीं दिखा. उसी इमारत में काम करने वाली दूसरी कंपनियों के कर्मचारी टीसीएस स्टाफ को समूहों में घूमते-फिरते देखते थे. वे छत पर बने डाइनिंग हॉल की लंबी मेजों पर साथ बैठते थे. उसी बिल्डिंग में काम करने वाली एक महिला कहती है, ''पुरुषों और युवा महिलाओं के समूह दिखते थे, लेकिन वे आपस में सामान्य और दोस्ताना लगते थे. ऐसा कुछ नहीं दिखता था जिससे लगे कि अंदर इस तरह की बातें चल रही हैं.''
इस बीच आरोपियों के परिवार और बचाव पक्ष के वकील सभी आरोपों को सिरे से नकार रहे हैं. रजा के रिश्तेदार रियाज मेमन का सवाल है कि क्यों सिर्फ मुसलमानों को ही गिरफ्तार किया गया है, नासिक ऑफिस से दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों को नहीं. उनका आरोप है, ''उन्हें बेमतलब निशाना बनाया गया है.'' रजा और तौसीफ सहित पांच आरोपियों के वकील बाबा सैयद का कहना है कि मामले को जरूरत से ज्यादा राजनैतिक रंग दिया गया है.
यह ''एक प्रेम कहानी के कड़वाहट में बदलने का मामला है.'' जब उनसे आरोपियों के मलेशिया के एक मजहबी प्रचारक से संबंध होने के दावे पर, जिस आरोप की पुलिस जांच कर रही है, पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ''एफआइआर में ऐसे कोई आरोप नहीं हैं. मीडिया सुनी-सुनाई बातों को हवा दे रहा है... इसका कोई सबूत या आधार नहीं है.''
उनका यह कहना है कि एफआइआर और रिमांड रिपोर्ट में जबरन धर्म परिवर्तन के आरोपों का भी जिक्र नहीं है. उनके मुताबिक आरोपी सिर्फ धार्मिक प्रथाओं पर 'दोस्ताना बातचीत' करते थे और किसी धर्म का अपमान नहीं करते थे. हालांकि पुलिस सूत्रों ने बाताया कि कुछेक एफआइआर में धार्मिक उत्पीड़न से जुड़े आरोप हैं.
कुछ दूसरे लोग पूरे में विवाद में राजनैतिक साजिश देखते हैं. उनके मुताबिक, मकसद हाल में नासिक में कुंभ मेले के लिए पेड़ काटने और एक स्वयंभू धर्म गुरु अशोक खरत पर एक महिला के शोषण के कथित आरोप से उठे विवादों से ध्यान हटाना है. ये सूत्र उन मीडिया रिपोर्टों को भी खारिज करते हैं कि पुलिस सबूत जुटाने के लिए हाउसकीपिंग स्टाफ के वेश में अंदर गई थी, क्योंकि टीसीएस ऐसे स्टाफ एक एजेंसी से हायर करती है और उनके प्रवेश के लिए सख्त व्यवस्था है.
दूसरी ओर टीसीएस पर आंखें मूंदे रहने के आरोप हैं. बचाव में कंपनी के सीईओ तथा एमडी के. कृतिवासन ने एक बयान में कहा, ''नासिक यूनिट से जुड़े रिकॉर्ड की शुरुआती समीक्षा से पता चलता है कि हमारी एथिक्स या पॉश चैनलों पर इस तरह की कोई शिकायत हमें नहीं मिली. टीसीएस हर कर्मचारी की सुरक्षा, सम्मान और भलाई के लिए प्रतिबद्ध है.'' उन्होंने ऐसी मीडिया रिपोर्टों का भी खंडन किया कि नासिक इकाई बंद है, ये ''पूरी तरह बेबुनियाद'' हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वे ''जांच एजेंसियों की पूरी मदद करेंगे, ताकि सच्चाई सामने आए.'' अब जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, इन सभी दावों और नैरेटिव की सच्चाई भी परखी जाएगी.

