
एक-दूसरे पर मिसाइल, बम, ड्रोन और हवाई हमलों से लड़ी जा रही ईरान जंग में इस्तेमाल सभी सैन्य हथियारों में स्पष्ट तौर पर एक ही विजेता नजर आता है, और वह है साधारण-सा दिखने वाला किफायती यूएवी (मानवरहित हवाई वाहन) या ड्रोन. ईरान के 'शाहेद-136’ जैसे सिस्टम ने दिखा दिया कि कैसे बड़े पैमाने पर निर्मित सस्ते ड्रोन सबसे आधुनिक हवाई सुरक्षा नेटवर्क में सेंध लगा सकते हैं.
कम ऊंचाई पर इधर-उधर मंडराते इन ड्रोन का झुंड दुश्मन को ऐसी इंटरसेप्टर मिसाइलें इस्तेमाल करने पर बाध्य कर देता है, जिनकी कीमत लाखों डॉलर होती है. और, उनसे जिन यूएवी को मार गिराया जाता है, उनकी कीमत मिसाइलों के मुकाबले बहुत कम होती है. बतौर उदाहरण, एक 'शाहेद-136’ कामिकाजे ड्रोन की कीमत 20,000 डॉलर (18.8 लाख रुपए) से 50,000 डॉलर (47 लाख रुपए) के बीच होती है लेकिन हर अमेरिकी 'पैट्रियट’ मिसाइल इंटरसेप्टर की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर (37.6 करोड़ रुपए) है.
इनमें कई ड्रोन तो बेअसर कर दिए जाते हैं लेकिन जो बड़ी संख्या में मिसाइल सुरक्षा कवच भेदकर दुश्मन के इलाके में पहुंच जाते हैं, वे भारी तबाही मचा रहे हैं. अहम यह है कि ड्रोन पहले से प्रोग्राम नेविगेशन का इस्तेमाल करते हैं और रियल-टाइम संचार पर इनकी निर्भरता बहुत कम होती है; इसी वजह से ये आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (ईडब्ल्यू) उपकरणों के मुकाबले ज्यादा दमदार साबित होते हैं.
ईरान युद्ध और यूक्रेन संघर्ष से सीख लेकर भारत भी अब बड़े पैमाने पर स्वदेशी और लंबी दूरी तक मारक क्षमता वाले युद्धक ड्रोन बना रहा है. फिलहाल, शाहेद जैसे कुछ ड्रोन पर काम चल रहा है और रक्षा मंत्रालय 2026 के अंत तक ऐसे ड्रोन उत्पादन के लिए किसी कंपनी को ठेका भी दे सकता है. भारत की इस नीति का प्रमुख उद्देश्य 2030 तक औद्योगिक स्तर पर उत्पादन शुरू करना और सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएं सुनिश्चित करना है. इसका लक्ष्य एक ऐसा 'किफायती लेकिन दमदार’ ड्रोन इकोसिस्टम तैयार करना है, जो युद्ध क्षेत्रों में स्वार्म अटैक यानी ड्रोन के झुंड के हमलों के लिहाज से असरदार साबित हों.
19 मार्च को राष्ट्रीय रक्षा उद्योग कॉन्क्लेव में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ''आज भारत में एक ऐसे ड्रोन निर्माण इकोसिस्टम की जरूरत है जो पूरी तरह आत्मनिर्भर हो—न सिर्फ उत्पादन बल्कि कलपुर्जों के स्तर पर भी. ताकि ड्रोन का ढांचा, सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरियां सभी भारत में ही निर्मित हों.’’ सैन्य प्रशिक्षण कमान के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''हवाई युद्ध अब पायलट वाले सिस्टम से हटकर बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहे हैं. हमें अपने प्रयासों में तेजी लानी होगी.
हम बदलाव की गति से नहीं चल पाए हैं, जबकि हमारे पास ड्रोन निर्माण क्षेत्र में पर्याप्त कौशल और क्षमता मौजूद है.’’ ऑपरेशन सिंदूर यानी मई 2025 में पाकिस्तान के साथ 87 घंटे तक चला हवाई संघर्ष भारत की ड्रोन सेना की आंख खोलने वाला था. पाकिस्तानी डायरेक्शनल जैमिंग एरे (सिग्नल बाधा प्रणाली)—जिनमें हाइ-पावर रेडियो फ्रीक्वेंसी तरंगें जीपीएस पर निर्भर संचार और नेविगेशन बाधित कर देती हैं—और सिग्नल स्पूफिंग जैसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक युद्ध रणनीतियों ने भारत के यूएवी बेड़े पर खासा प्रतिकूल असर डाला. कमजोर रेडियो फ्रीक्वेंसी और जीपीएस लिंक पर निर्भर रहने वाले भारत के कई प्लेटफॉर्म प्रभावी साबित नहीं हुए.
दरअसल, ऑपरेशन सिंदूर से पहले भारत में ड्रोन खरीद के दौरान ईडब्ल्यू पर कम ही ध्यान दिया जाता था. आयातित सब-सिस्टम—जैसे सेंसर, संचार किट, प्रोपल्शन और प्रीसिजन इलेक्ट्रॉनिक्स—पर निर्भरता के कारण यह प्लेटफॉर्म सिग्नल में बाधा और जैमिंग के प्रति संवेदनशील हो गए थे, और युद्ध के समय बोझ बन गए.
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का खतरा
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में जैमिंग का मुख्य लक्ष्य आमतौर पर कंट्रोल और वीडियो सिग्नल होते हैं. इन्हें बाधित करना ऑपरेटर के नियंत्रण को काटने और रियल-टाइम स्थिति की जानकारी खत्म करने के लिए काफी है. जीपीएस-जैमिंग इससे भी अधिक आक्रामक कदम है. यह नेविगेशन को खराब कर सकता है, फेल-सेफ मोड (जैसे रिटर्न-टू-होम) को सक्रिय कर सकता है या सटीक लक्ष्य तक पहुंचने में नाकाम कर सकता है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, भारतीय ड्रोन कंट्रोल और वीडियो लिंक में थोड़ी भी बाधा का मुकाबला नहीं कर सके. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के मुकाबले के लिए आधुनिक ड्रोन में कमांड, टेलीमेट्री और वीडियो को अलग-अलग चैनलों के बजाए एक ही डिजिटल लिंक में जोड़ा जाता है. उन्नत मॉडल फ्रीक्वेंसी होपिंग स्प्रेड-स्पेक्ट्रम (एफएचएसएस) तकनीक—जिसमें फ्रीक्वेंसी तेजी से बदलती है—और एन्क्रिप्शन का भी इस्तेमाल करते हैं ताकि जैमिंग की समस्या से आसानी से निबटा जा सके. कुछ ड्रोन लिंक टूटने पर भी अपनी स्वायत्त उड़ान जारी रख सकते हैं या दूसरे बैकअप तरीकों पर स्विच कर सकते हैं.
ड्रोन के एक विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत को ऐसा डिस्ट्रीब्यूटेड इंटेलिजेंस और एल्गोरिद्म विकसित करना होगा जो संचार में बाधा आने पर भी काम कर सके. इसमें ड्रोन किसी एक सेंट्रल कंट्रोल सिस्टम पर निर्भर रहने के बजाए अपने सेंसर डेटा का उपयोग करते हैं और नजदीकी ड्रोन के जरिए रियल-टाइम संपर्क बनाए रखते हैं. इससे वे अपनी गति या दिशा बदलकर खतरों से बच सकते हैं और समूह के साथ रहते हुए अपना मिशन पूरा कर सकते हैं.
वे कहते हैं, ''भारत को ईडब्ल्यू-प्रूफ नेविगेशन सिस्टम में निवेश करना चाहिए, जिसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (आइएनएस) व टेरेन मैपिंग की क्षमताएं शामिल हैं.’’ भारत शाहेद-136 और छोटे शाहेद-131 को इसकी प्रेरणा के तौर पर देख सकता है, जिन्हें ऐसे मुश्किल माहौल में काम करने के लिए ही डिजाइन किया गया है. इनमें से कई सिस्टम इनर्शियल नेविगेशन—अपने-आप में एक पूरा नेविगेशन मॉड्यूल—का इस्तेमाल करते हैं, जिससे बिना सैटेलाइट की मदद के अपने रास्ते से भटकते नहीं हैं.
भारत के एक प्रमुख सैन्य अधिकारी का कहना है कि जून 2025 में 12 दिन के युद्ध के दौरान ईरानी ड्रोन को भी वैसी ही कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, जैसी भारतीय ड्रोन को हुई थीं. आठ माह के अंदर ही ईरान ने अमेरिकी जीपीएस सैटेलाइट नेटवर्क पर अपनी निर्भरता खत्म कर दी और चीन के बाईडो सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को अपना लिया, जिससे इन ड्रोन को ट्रैक करना और रोकना मुश्किल हो गया.
बहरहाल, यूक्रेन युद्ध में शाहेद ड्रोन को कांटे की टक्कर मिल रही है. ईरान ने रूस को हजारों ड्रोन मुहैया कराए थे (जिन्हें शाहेद-136 की जगह गेरान-2 और शाहेद-131 की जगह गेरान-1 नाम दिया गया), और सितंबर 2022 से ये ड्रोन इस जंग में अपना दम दिखा रहे हैं. लेकिन 2025 आते-आते यूक्रेन ने इनका तोड़ निकाल लिया, जो इसी तरह कम कीमत वाले इंटरसेप्टर ड्रोन हैं. इन्हें सैनिक मॉनिटर पर देखकर या फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) गॉगल्स पहनकर चलाते हैं, और वे रूस के सैकड़ों ड्रोन मार गिरा रहे हैं. अब स्टिंग, बुलेट और ऑक्टोपस 100 जैसे 'शाहेद किलर’ ड्रोन की अमेरिका और खाड़ी देशों में खासी मांग है.

भारत का ड्रोन अभियान
भारत ऐसी कई ड्रोन परियोजनाओं पर काम कर रहा है. इनमें सबसे अहम हैं बेंगलूरू स्थित स्टार्टअप न्यूस्पेस रिसर्च ऐंड टेक्नोलॉजीज (एनआरटी) की तरफ से विकसित शेषनाग-150 और नोएडा स्थित आइजी डिफेंस का प्रोजेक्ट काल (केएएल).
आइजी डिफेंस के संस्थापक और सीईओ बोधिसत्व संघप्रिय का कहना है कि केएएल या काल शाहेद ड्रोन की नकल नहीं है, बल्कि उसके बाद आने वाली चुनौतियों से निबटने की भारत की कोशिश का हिस्सा है.
वे कहते हैं, ''हम ऐसा स्ट्राइक प्लेटफॉर्म बना रहे हैं जिसे बड़े पैमाने पर तैनात किया जा सकता है और इसे समूह में संचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है. बेहद कम समय में 100 से 300 ड्रोन लॉन्च करके दुश्मन की हवाई सुरक्षा को करारी चोट पहुंचाई जा सकती है. इसका डिजाइन मॉड्युलर है, जिसे तेजी से निर्माण और हमले, दुश्मन को झांसा देने या इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे अलग-अलग मिशन के लिए आसानी से ढाला जा सकता है.’’
भारत के ड्रोन बेड़े
एक हजार किलोमीटर रेंज वाला शेषनाग-150 ड्रोन बना रही एनआरटी के सीईओ समीर जोशी कहते हैं कि भारतीय सेना 'सैचुरेशन’ और 'डीप-स्ट्राइक’ ऑपरेशन्स के लिए हजारों कम लागत वाले, इस्तेमाल के बाद हटाए जा सकने वाले यूएवी को प्राथमिकता दे रही है. वे बताते हैं कि रक्षा मंत्रालय थल सेना और बख्तरबंद इकाइयों में खास ड्रोन प्लाटून और काउंटर-यूएएस इकाइयों को शामिल कर रहा है.
एक तरफ जहां उच्च तकनीक वाले उपकरण अब भी निगरानी/टोही गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होते हैं, वहीं अब बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले ड्रोन बेड़े नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर बढ़त हासिल करने के लिए सेना की रणनीति का मुख्य आधार बन गए हैं. वे कहते हैं, ''भारत का यूएवी इकोसिस्टम वर्षों से टुकड़ों में होने वाली खरीद, सबसे कम बोली वाले को चुनने की रणनीति और घरेलू कलपुर्जों का आधार कमजोर होने की वजह से पंगु बना हुआ है. ऑपरेशन सिंदूर ने इन्हीं खामियों को उजागर कर दिया.’’
उनका मानना है कि सही मायने में सफलता के लिए साल 2030 तक हजारों कम लागत वाले ड्रोन की तैनाती, इन्हें सेना के तीनों अंगों में पूरी तरह शामिल किया जाना और सरकारी-निजी शोध (आरऐंडडी) की मजबूती जरूरी है. वर्तमान में 50-60 फीसद हिस्से आयात किए जाते हैं, लक्ष्य इसे 40 फीसद से नीचे लाना है.’’
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि 600 से ज्यादा भारतीय कंपनियां ड्रोन और यूएवी उपकरण बनाती हैं लेकिन बड़े पैमाने पर सस्ते ड्रोन बनाने की औद्योगिक क्षमता का अभाव ड्रोन इकोसिस्टम के विस्तार में एक चुनौती बना हुआ है. वे कहते हैं, ''आने वाले समय में युद्ध का भविष्य इससे तय होगा कि ड्रोन, जैमिंग वाले चुनौतीपूर्ण वातावरण में कितनी देर टिक सकते हैं. साथ ही वे सस्ते हों, संख्या में बहुत अधिक हों, और बेहद स्मार्ट भी हों.’’
इस तरह, चुनौती दोहरी है: पूरी तरह स्वदेशी और अत्याधुनिक तकनीक हासिल करना और उसका तेजी से निर्माण सुनिश्चित करना. आखिरकार, भारत अब इस चुनौती से निबटने की तैयारी कर रहा है.ड्रोन और ऐंटी-ड्रोन तकनीक भविष्य के युद्ध में बड़ी भूमिका निभाएंगी. आज भारत में एक पूरी तरह आत्मनिर्भर ड्रोन निर्माण प्रणाली विकसित करने की जरूरत है.

