
-ललिता सुहासिनी
पिछले साल धुरंधर देखते हुए सबसे बड़ा और अकेला रोमांच मुझे तब महसूस हुआ जब मैंने आशा भोसले को प्यासे-प्यासे इन मेरे लबों के लिए पंक्तियां गाते सुना. जब बाइक का पीछा किया जा रहा था और यालिना (सारा अर्जुन) ने हमजा (रणवीर सिंह) को अपनी बाहों में जकड़ रखा था, उनके स्वर पर्दे पर सड़क को चीरते गुजरे.
यह सही है कि आर.डी. बर्मन के संगीत से सजे कारवां (1971) के इस हिट कैबरे का प्रबल आकर्षण हेलेन थीं, फिर भी मेरे मन में पहली तस्वीर जो उभरी वह चमकती लाल पोशक में डांस फ्लोर पर चारों और थिरकती हेलन की तस्वीर नहीं थी. मुझे शक है कि जब-जब मैं पिया तू अब तो आजा सुनूंगी तो मेरे मन के पर्दे पर कभी ट्रायम्फ बोनविल टी120 ब्लैक पर सवार रणवीर और सारा शरीक होंगे.
भोसले की आवाज का स्टारडम फिल्म के दृश्यों के आगे भला कब फीका पड़ा है? मैंने जब-जब आशा भोसले का कोई हिट गाना सुना, मेरे मन में हल्के और बेजान रंगों की कॉटन सिल्क की पैठनी साड़ी में लिपटी उस गायिका की तस्वीर उभरती जिसके जूड़े के एक सिरे पर नफासत से मैग्नोलिया के पीले फूल लगे होते और गले से मोतियों की माला लिपटी होती.
आशा भोसले की 70वीं सालगिरह से पहले उनके साथ मेरी पहली मुलाकात की यह एक स्थाई याद है. वे ऐसे शख्स के तौर पर सामने आईं जिसे जिंदगी से मोहब्बत थी. उन्होंने मेरा यह यकीन तब और पुख्ता कर दिया जब उन्होंने कहा कि हो सकता है वे अपनी सालगिरह अपनी पसंदीदा फिल्मों में से एक रॉबिन विलियम्स की द बर्डकेज एक बार फिर देखकर मनाएं.
गायिका विदेश दौरे की तैयारी कर रही थीं और उस दिन के कामों में तुरत-फुरत रिहर्सल भी शामिल थी. उनके साथ जाने वाली मंडली खार में बर्मन के घर के नजदीक अपार्टमेंट को बदलकर बनाए गए स्टुडियो में जमा थी. भोसले ने तुरही पर एक सुर उठाया जो उससे दो या तीन सप्तक नीचे लगा जहां उसे लगना चाहिए था. उन्होंने संगीतकार से कहा, ''यह ठीक होता अगर उषा (उथुप) मेरे साथ टूर पर जा रही होती. तुम इतने नीचे क्यों चल रहे हो?'' और उन्होंने अपने कंठ का स्वर सहजता से बदलकर उथुप के स्वर की तरह कर लिया.
1988 के एक वीडियो इंटरव्यू में बर्मन और भोसले अनोखा रिश्ता (1986) के गीत चल सहेली झूम के की रिहर्सल करते नजर आए. इस इंटरव्यू में बर्मन भोसले के बारे में कहते हैं, ''उनमें लोगों की नकल उतारने का जबरदस्त हुनर है. अगर वे आपसे बात करें तो आपकी नकल करेंगी. वे आपकी आवाज की, आपके बात करने के तरीके की नकल करेंगी... इससे जरूर उन्हें मदद मिलती होगी.
वे हर उस शख्स को अच्छे से जानती हैं जिसने उनके गीत की संगीत रचना की और यह भी कि किस तरह (इस गाने की) उसने कल्पना की होगी. वे उसके गायिकी के तरीके, बोलचाल के तरीके को अपनाती हैं... यही वजह है कि वे इतना अच्छा गाती हैं.'' यादों का पिटारा खोलकर भोसले ने बताया कि बोसा नोवा और जैज सहित दुनिया भर की बहुत सारी विधाओं और शैलियों में संगीतकार की दिलचस्पी ने किस तरह उन्हें अपनी गायकी को नए सिरे से खोजने-रचने के लिए प्रेरित किया ताकि वह पश्चिमी संगीत की धुनों से मेल खा सके.
'अपनी तरह की अकेली'
बर्मन के हिट नाइटक्लब गानों के साथ जिस तरह भोसले ने 1970 के दशक पर राज किया, उसी तरह ओ.पी. नैयर की तांगा गाड़ी की ताल से प्रेरित सुरीली धुनों के साथ 1950 और 1960 के दशक भी अपने नाम किए. 2004 के इंटरव्यू में नैयर ने मुझसे कहा, ''जिन कलाकारों के साथ मैंने काम करने का चुनाव किया, उन्होंने मेरे गानों को अपना बनाया... लेकिन आशा जैसा कोई नहीं था. वे हर तरह का गाना गा सकती थीं.'' राजू भारतन की किताब आशा भोसले: ए म्यूजिकल बायोग्राफी में भोसले उन्हें अपने कम्फर्ट से बाहर लाने का श्रेय नैयर को देती हैं.
उनके साथ काम करने की बदौलत उनके कुछ शुरुआती हिट गाने आए, जिनमें सी.आई.डी. (1956) का ले के पहला पहला प्यार शामिल है. इस गाने में शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी सरीखे उस वक्त के दूसरे पार्श्व गायक सितारों की आवाज भी थी लेकिन भोसले ज्यादा वक्त हाशिए पर रहने वाली नहीं थीं. उसी साल संगीत निर्देशक एस.डी. बर्मन के साथ आया फंटूश का एकल गीत ऐ जानी जीने में क्या है आया जो शायद उनका सबसे शुरुआती हिट नाइटक्लब गीत था.

अपने कैबरे गानों में उन्होंने सांसों के जिस तेज उतार-चढ़ाव से ओत-प्रोत गायकी को मशहूर बना दिया, उसी की वजह से बाद में ए.आर. रहमान सरीखे संगीतकारों ने भोसले को खोजा. वे शालिनी अजित और आर. माधवन की अदाकारी से सजी तमिल रोमांटिक ड्रामा फिल्म अलैपयुथे (2000) में आधुनिक जमाने का नायिका को उनकी आवाज देना चाहते थे.
भोसले ने कुछ संजीदा और कुछ मजाकिया अंदाज में कुंवारेपन के खत्म होने का मातम मनाने वाला गाना सेप्टेम्बर मधम अपनी भारी और मादक आवाज में गाया. उनकी यह आवाज वीजे से अदाकारा बनी सोफिया हक को ऐसा कामुक जोश देती है जिसे फिल्मकार मणिरत्नम कहानी को आगे बढ़ाने वाली संगीतमय तरकीब की तरह इस्तेमाल करते हैं.
चाहे वे कैबरे करने वाली लड़कियां हों या कोठों के भीतर कैद तवायफ, भोसले ने सभी को आवाज दी. संगीत निर्देशक खय्याम, जिन्होंने फुटपाथ (1953) के 'सुहाना है ये मौसम' के जरिए भोसले को उनका पहला नाइटक्लब हिट दिया, उन्हें भोसले को गजल गायिका के तौर पर स्थापित करने का भी श्रेय जाता है. एक इंटरव्यू में उन्होंने मुझे बताया कि उमराव जान (1981) की संगीत रचना के वक्त उनके जहन में यही चल रहा था, ''या तो आशा या कोई नहीं. आज तक मैं इन आंखों की मस्ती या दिल चीज क्या है गाने में किसी और की कल्पना नहीं कर सकता.
उन्होंने मेरी शाम-ए-गम की कसम सरीखी पहले की गजलें सुनी थीं, इसलिए वे फौरन समझ गईं कि मैं किस चीज की तलाश में हूं.'' ऐसा बिरले ही होता है, जैसा उमराव जान में हुआ, कि तवायफें इतनी निर्णायक भूमिका निभाती हों लेकिन भोसले की आवाज ने दमित महिला किरदारों को एक किस्म के अनोखे स्टारडम से भर दिया जिससे वे उनकी फिल्मों से बाहर भी प्राणवान हो गए. अदाकारा हेलन पर भोसले के गाए कई गाने फिल्माए गए. उन्होंने भोसले के गुजरने के बाद कहा, ''मैं जो हूं, उनकी वजह से हूं.''
सई परांजपे निर्देशित 1998 की फिल्म साज में शबाना आजमी अभिनीत बंसी का किरदार कमोबेश आशा भोसले पर आधारित है. बंसी अपनी ज्यादा मशहूर बड़ी बहन मानसी के साथ अपना पहला फिल्मी गाना गाने के बाद बुरी तरह बिलखने लगती है. अरुणा ईरानी अभिनीत मानसी के किरदार में बेशक लता मंगेशकर को दिखाया गया था. बंसी के आंसू थमने का नाम नहीं लेते.
वह इसलिए दुखी और नाराज है क्योंकि मानसी ने उस गाने बादल चांदी बरसाए पर अपना एकाधिकार कायम कर लिया और उन्हें बस बैकअप कलाकार के तौर पर हिस्सा लेने दिया. अपमानित और तिरस्कृत बंसी बड़ी बहन से कहती है, ''अगर तुम्हारे सहारे रही तो सदा शुरुआत ही रहेगी मेरी. हमेशा रिम झिम रिम झिम ही गाती रहूंगी''. हैरानी की बात नहीं कि लता और आशा दोनों ने ही इस फिल्म से दूरी बना ली. अलबत्ता भारतन की जीवनी से यह साफ है कि अपनी खुद की जगह बनाने की भोसले की जरूरत ने उन्हें ऐसे चुनाव करने को मजबूर किया जो उन्होंने अपना गीतों का खजाना बनाने के लिए गाए.

इंडीपॉप स्टार
वह म्यूजिक वीडियो कादौर था जिसकी बदौलत भोसले की महत्वाकांक्षा परवान चढ़ सकी. 1997 में वे लेसली लुईस की संगीत रचना से सजे हिंदी पॉप ट्रैक जानम समझा करो में आईं. यह उनके इंडीपॉप स्टार के तौर पर अपने को नए सिरे से खोजने-रचने की शुरुआत थी. नब्बे के मध्य में ही ए.आर. रहमान रंगीला (1995) के साउंडट्रैक के लिए भोसले को खोजते चले आए. कभी केवल कैबरे गानों के लिए इस्तेमाल हुई खुले गले की कामुक आवाज अब फिल्म की मुख्य हीरोइन के लिए नए सांचे में ढाली गई. इसी आवाज में नायिका जिंदगी का जश्न मनाती है (रंगीला रे) और प्यार की तलाश करना चाहती है (तन्हा-तन्हा).
फिल्म के 25 साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू में भोसले ने कहा, ''टाइटल ट्रैक गाना काफी कठिन था क्योंकि मैं ऑर्केस्ट्रा के साथ गाने की आदी थी. लेकिन यहां मैं केवल लय और सुरों के आरोह-अवरोह के साथ गा रही थी. कुछ हिस्से बहुत ऊंचे सुरों में थे और मुझे लगा कि यह मुश्किल होगा लेकिन मैंने कर लिया. जब मैं तन्हा तन्हा गाने के लिए वापस गई तो रहमान ने पूछा कि क्या मैं रंगीला रे सुनना चाहूंगी. जब सुना तो मैं अवाक् रह गई. मैं तार बजते सुन सकती थी, एक हिस्से में ढोल और सब परफेक्ट लग रहा था. मुझे एहसास हुआ कि मैं बेजोड़ कलाकार के साथ काम कर रही थी.'' आशा भोसले ने आगे भी रहमान के लिए लगान (2001) और ताल (1999) समेत दूसरी फिल्मों के लिए गाने गाए.
अंतरराष्ट्रीय कलाकार भी भोसले की स्टारडम से खिंचे चले आए. पॉप गायक बॉब जॉर्ज ने 1991 में उन्हें अपने गाने बो डाउन मिस्टर को आवाज देने के लिए मना लिया. इसे तवज्जो तो बहुत दी गई पर नस्लीय रंग-ढंग में ढले इसके म्यूजिक वीडियो और गीतों को अनदेखा कर दिया गया. इसकी भरपाई करने वाली अकेली खूबी शायद आशा भोसले का आलाप ही था. सैन फ्रांसिस्को के स्ट्रिंग एन्सेंबल क्रोनोस क्वार्टेट ने एल्बम यू हैव स्टोलन माय हार्ट (2005) के लिए भोसले के साथ काम किया था.
वह बर्मन के हिट गानों के फिर से सजाए स्ट्रिंग संस्करणों का संकलन था. उसे बेस्ट कंटेम्परेरी वर्ल्ड म्यूजिक एल्बम केटेगरी में ग्रैमी अवार्ड के लिए नामित किया गया. लेकिन हाल में भोसले गोरिल्लाज के साथ जब जुड़ीं तो कुछ नया रचने को लेकर उनका जोश और उत्साह देखते बनता था. 92 की उम्र में भोसले इस बैंड के नवें स्टूडियो एल्बम द माउंटेन के द शेडोवी लाइट गाने में दिखाई दीं. इस गाने में भोसले की गाई पंक्तियां हैं, चल मेरे मांझी/ गहरा है पानी, मुझे जाना उस पार/जहां सुख हो, ना दु:ख हो/ जहां जय हो, ना हार हो. लग रहा है जैसे वे जिंदगी को विदा कह रही हों, उसी अंदाज में जिसमें वो उस्ताद थीं: सुरों के साथ.
लेखिका रोलिंग स्टोन इंडिया पत्रिका की पूर्व संपादक हैं, जिन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत पर लिखा है और फिलहाल मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विषय में डॉक्टरेट कर रही हैं.
जैसे उन्होंने 70 के दशक में आर.डी. बर्मन के नाइटक्लब गीतों के साथ धूम मचाई, वैसे ही 50 और 60 के दशक में ओ.पी. नैय्यर की धुनों के साथ वे छाई रहीं. कैबरे गीतों में तेज सांसों का उपयोग उनकी पहचान बना, जिसके लिए ए.आर. रहमान जैसे संगीतकार भी उनकी तरफ खिंचे चले आए.

लता मंगेशकर से अलग अपनी पहचान की जरूरत ने आशा भोसले को उन गीतों का चुनाव करने के लिए प्रेरित किया जो उनकी स्वतंत्र पहचान गढ़ सकें.
92 साल की उम्र में भी आशा भोसले का वर्चुअल बैंड गोरिल्लाज़ के साथ द माउंटेन एल्बम में जुड़ना दिखाता है कि नया संगीत बनाने के लिए वे हमेशा उत्साही रहती थीं.
'वह अपने आप में एक आयाम थीं'
अदनान सामी, गायक एवं संगीतकार
मेरे लिए आशा जी महान विभूति से कहीं ज्यादा थीं. मैं पहली बार उनसे तब मिला जब करीब 10 बरस का था. वे आर.डी. बर्मन के साथ लंदन के दौरे पर थीं. मुझे याद है उन्होंने कंसर्ट की शुरुआत चुरा लिया है गाने से की. उनकी आवाज के आभामंडल से मैं इतना अभिभूत था कि रोने लगा. मैंने ऊपर देखा और कहा, ''हे ईश्वर, एक दिन मुझे इतना काबिल बनाना कि मैं उनके साथ गा सकूं और परफॉर्म कर सकूं''. उन्होंने मंच पर खूबसूरत माहौल बना दिया था.
मुझे याद है जब हम कभी तो नजर मिलाओ की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, वे अपने स्वभाव के विपरीत एकदम खामोश थीं. मैंने पूछा तो उन्होंने कहा, वे सोच रही हैं कि क्या यह गा पाएंगी. उन्होंने कहा कि हर काम नई चुनौती होता है और उनके लिए सीखने को कितना कुछ है. लेकिन ज्यों ही वे माइक्रोफोन के सामने आईं, एक सुरीली शक्ति प्रकट हो गई हो. वे आपको इस हद तक और इतने वैरिएशन्स देतीं थीं कि आपको लगता जैसे आप कैंडी शॉप में खड़े नन्हे बच्चे हों. जिस तरह की तालीम उन्होंने पाई, उसके बाद आप उनसे वह सब करवा सकता थे, जो कोई और नहीं कर सकता.

उनके बारे में कुछ अद्भुत बातें थीं जैसे, जिंदगी के प्रति उत्साह, ताकत, मजबूत इरादा, एक चिरयुवा आत्मा. पेशेवर सीख के अलावा मैंने उनसे यह सीखा कि माइक्रोफोन का सामना कैसे करें, एक्सप्रेस कैसे करें. उन्होंने मुझे जिंदगी के बारे बहुत कुछ सिखाया. भारतीय संगीत की जो नींव उन्होंने रखी और जो योगदान उनका रहा, वह बहुत विराट और अप्रतिम है. वे अपने आप में संगीत की एक अनूठी विधा थीं.
(अदनान सामी से सुहानी सिंह की बातचीत पर आधारित)

