
मशहूर रियल एस्टेट कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के खिलाफ 2018 में आइसीआइसीआइ बैंक ने लोन अदायगी में विफल रहने पर नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में दिवालियेपन की अर्जी डाली थी.
लंबे कानूनी सफर के बाद मार्च 2026 में एनसीएलटी की इलाहाबाद बेंच ने जेएएल की संपत्तियों को 14,535 हजार करोड़ रुपए में लेने की अदाणी ग्रुप की अर्जी मंजूर की लेकिन कुछ ही दिनों बाद वेदांता समूह ने फैसले को चुनौती दे दी.
यानी केस अब भी चल रहा है. जेपी के इस केस से सिर्फ बैंक ही नहीं, घर खरीदने वाले आम लोग भी बहुत परेशान हैं. ट्रिब्यूनलों में केस और पैसा फंसने की ऐसी हजारों कहानियां हैं.
इस साल फरवरी में संसद में पेश 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि एनसीएलटी के पास 30,600 मामले (मार्च 2025 तक) लंबित हैं, जिन्हें निबटाने में मौजूदा रफ्तार से 10 साल लग जाएंगे. इतने लंबे वक्त के चलते परिसंपत्तियों का मूल्य गिर जाता है, कर्मचारी कंपनी छोड़ देते हैं, ग्राहक प्रतिस्पर्धियों की ओर चले जाते हैं और सप्लायर से संबंध टूट जाते हैं.
दरअसल, ट्रिब्यूनल या न्यायाधिकरण व्यावसायिक विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये देश की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और कॉन्ट्रैक्ट लागू कराने की क्षमता पर असर डालते हैं. ये न्याय प्रणाली के सहायक अंग और इकोनॉमिक गवर्नेंस के केंद्रीय स्तंभ हैं. ट्रिब्यूनलों का गठन अदालतों का बोझ घटाने और तेज तथा प्रभावी न्याय देने के लिए किया गया. ये हाइकोर्ट का बोझ घटाने के लिए बने, जो आखिरी फैक्ट फाइंडिंग अथॉरिटी होते हैं.
ट्रिब्यूनल में कुछ सीमित कानूनों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई होती है. जैसे एनसीएलटी में कंपनी लॉ, दिवालियेपन के केस, आइटीएटी में आयकर से जुड़े केस, बिजली, टेलीकॉम, बेनामी संपत्ति-पीएमएलए के मामलों के लिए भी ट्रिब्यूनल बने हैं. इनके खिलाफ सिर्फ कानून की व्याख्या की जरूरत होने पर ही हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील होती है. ट्रिब्यूनलों में न्यायिक सदस्य जज और टेक्निकल मेंबर (विषय विशेषज्ञ) होते हैं. व्यावहारिक रूप से टेक्निकल मेंबर के तौर पर रिटायर्ड अफसरों को तैनात किया जाता है.
एनसीएलटी की ओर लौटते हैं. देश में दिवाला प्रक्रिया फ्रेमवर्क में एनसीएलटी अदालत है और उसका नियामक इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (आइबीबीआइ) है. एनसीएलटी की 62 में से केवल 30 बेंच ही इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी या दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता) और कंपनी अधिनियम के मामलों को देखती हैं. 4,527 पंजीकृत आरपी (रिजोल्यूशन प्रोफेशनल) में से केवल 2,198 (49 प्रतिशत) के पास ही सक्रिय (नवीनीकृत) ऑथराइजेशन फॉर असाइनमेंट (अधिकार पत्र इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल एजेंसी जारी करती है) है.
बाकी ने इसे रिन्यू नहीं कराया. एनसीएलटी और एनसीएलएटी में 85 फीसद (434 में से 382) से ज्यादा स्टाफ ठेके वाला है. साथ ही, इनसॉल्वेंसी के विशेषज्ञों की बहुत कमी है. 2016 में बने एनसीएलटी की बदहाली की तस्दीक उसके पहले चेयरमैन रहे जस्टिस (रिटायर्ड) एम.एम. कुमार भी करते हैं.
जस्टिस कुमार कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट 2010 और 2015 में पांच जजों की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि एनसीएलटी हाइकोर्ट के समकक्ष हैं. अगर ये हाइकोर्ट के बराबर हैं तो यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ और संसाधन भी हाइकोर्ट जैसे होने चाहिए, जो नहीं हैं. ये सब केस की संख्या के मुकाबले बहुत कम है. सदस्य का टेन्योर फिक्स है. जो लोग आते हैं वे 50 साल से ऊपर के होते हैं. जज और केस रेश्यो या अनुपात भी तय करना होगा. किसी जज से 50 केस रोज निबटाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती. यहां रेगुलर अपॉइंटमेंट होने चाहिए. मेंबर पूरी तरह विषय के जानकार नहीं होते. ये कुछ बुनियादी मुद्दे हैं जिन्हें हल करने की जरूरत है.''
ट्रिब्यूनलों में अटके मामलों से देश की शीर्ष अदालत भी वाकिफ है. अक्तूबर 2025 में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आइटीएटी) के एक कार्यक्रम में देश के तब के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा था, ''इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आइटीएटी) में अब भी 6.85 लाख करोड़ रुपए के केस लंबित हैं, जो चिंता का विषय है. यह रकम देश की जीडीपी का 2 फीसद से अधिक है.''
लेकिन सभी ट्रिब्यूनलों में मामलों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. ट्रिब्यूनलों के कामकाज के व्यापक डेटा का अभाव है जो न तो ट्रिब्यूनल तैयार करते हैं और न ही संबंधित मंत्रालय. ट्रिब्यूनलों ने कितने मामले निबटाए, हर बेंच में कितने केस लंबित, कितनी रिकवरी कराई, कितने साल से कौन सा केस लंबित है, जैसे तथ्यों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज नहीं किया जाता है, जबकि यह काम निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में हो रहा है और जुडीशियल डेटा ग्रिड में उन आंकड़ों को प्रति दिन अपडेट किया जाता है.
ट्रिब्यूनल का इतिहास-वर्तमान
भारत में 1941 में इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल बना जो देश का पहला ट्रिब्यूनल था, उसे मदर ट्रिब्यूनल भी कहा जाता है. इसके बाद 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए केंद्र और राज्य सरकारों को प्रशासनिक ट्रिब्यूनल बनाने का अधिकार सौंपा गया. 2010 में पर्यावरण से जुड़े मामलों के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बनाया गया. ट्रिब्यूनलों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाने के कारण उन्हें खत्म भी किया गया.
फाइनेंस ऐक्ट, 2017 के तहत आठ ट्रिब्यूनलों का मिलते-जुलते विषयों वाले ट्रिब्यूनल में विलय कर दिया गया जैसे, एम्पलॉई प्रोविडेंट फंड अपीलेट ट्रिब्यूनल को इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल और कॉपीराइट बोर्ड को इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अपीलेट बोर्ड के साथ मिला दिया गया. ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स ऐक्ट, 2021 के जरिए नौ ट्रिब्यूनलों को खत्म किया गया और उनके काम को संबंधित हाइकोर्ट को स्थानांतरित कर दिया गया.
उनमें मुख्य रूप से फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण, बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आइपीएबी)और हवाई अड्डा अपीलीय न्यायाधिकरण शामिल हैं. ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स ऐक्ट, 2021 के अनुसार, केंद्र सरकार के प्रमुख ट्रिब्यूनलों की संख्या 16 है.
समाधान ही बन गया समस्या
उम्मीद थी कि ये परंपरागत न्यायालयों का बोझ घटाएंगे, खास सेक्टर को अपनी विशेषज्ञता प्रदान करेंगे. लेकिन बीते वर्षों में लगातार विधायी हस्तक्षेप, लंबे वक्त से खाली पद, प्रक्रियागत खामियों और उनकी स्वतंत्रता की चिंताओं ने उनकी प्रभावशीलता धीरे-धीरे खत्म कर दी. आज ट्रिब्यूनल उन्हीं समस्याओं का सामना कर रहे हैं जिन्हें खत्म करने के लिए उनका गठन हुआ था.
बेंगलूरू स्थित लीगल थिंक टैंक दक्ष ने ट्रिब्यूनलों की हालत पर 'द स्टेट ऑफ ट्रिब्यूनल्स' शीर्षक से एक रिपोर्ट तैयार की जो 2025 के आखिर में जारी हुई. रिपोर्ट के अनुसार, देश में वर्ष 2024-25 के दौरान 24.72 लाख करोड़ रुपए 10 प्रमुख कॉमर्शियल ट्रिब्यूनलों में 3.56 लाख पेंडिंग मामलों की वजह से अटके हुए हैं. यह रकम देश की जीडीपी का 7.48 फीसद थी. इन लंबित मामलों को ट्रिब्यूनल के सिर्फ 350 सदस्य देख रहे हैं, इससे उनके संसाधनों और काम के बोझ का अंतर जाहिर होता है.
देश के 10 प्रमुख कॉमर्शियल ट्रिब्यूनलों में एनसीएलटी और राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी), आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आइटीएटी), सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (सीईएसटीएटी), प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी या सैट), दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण (टीडीएसएटी), विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल), माल औरं सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (जीएसटीएटी) शामिल हैं.
दक्ष की सीनियर रिसर्च एसोसिएट रितिमा सिंह कहती हैं, ''ट्रिब्यूनलों मं आरटीआइ के जरिए हमने यह जाना कि कितने लोग परमानेंट और कितने कॉन्ट्रैक्ट पर हैं. ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) और ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (डीआरएटी) और एनसीएलएटी के साथ यह बड़ी समस्या है कि ये हर राज्य में नहीं हैं. एनसीएलटी सिर्फ दिल्ली और चेन्नै में है. चेन्नै वाली ब्रांच में काम नहीं होता, सिर्फ दिल्ली में ही काम होता है.
रिपोर्ट बनाने के दौरान एनसीएलटी के मेंबरों की प्रोफाइलिंग यानी उनके कार्य अनुभव को खंगाला गया. पता चला कि 61 में से 85 फीसद मेंबर रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट हैं और ज्यादातर के पास कंपनी लॉ की डिग्री नहीं है. डीआरटी और एनसीएलटी में बेंचों की संख्या अपर्याप्त है.''
जस्टिस कुमार के अनुसार, ''अभी एनसीएलटी में केवल कॉन्ट्रैक्ट का स्टाफ है. यहां कम से कम 50 प्रतिशत स्टाफ परमानेंट होना चाहिए क्योंकि यहां गोपनीय दस्तावेजों को संभालना होता है, जो करोड़ों रुपए की अहमियत रखते हैं. हाइकोर्ट वेकेंसी निकालता है, उसमें परमानेंसी और पेस्केल बेहतर होता है लेकिन एनसीएलटी पहले मंत्रालय से कहता है फिर मंत्रालय कॉन्ट्रैक्टर के माध्यम से कर्मचारी उपलब्ध कराता है.'' कंपनियों के गोपनीय दस्तावेज बाहर आ गए तो उनकी प्रतिष्ठा और शेयर बाजार में उनकी स्थिति पर असर पड़ने की आशंका रहती है.
देश में कॉमर्शियल ट्रिब्यूनल विभिन्न सेक्टरों के लिए अलग-अलग हैं लेकिन दिक्कतें सबकी एक समान हैं. एनसीएलटी को इनसॉल्वेंसी का एक केस निबटाने में 752 दिन लगते हैं जबकि उसकी वैधानिक समय सीमा 330 दिन तय है. वित्त वर्ष 2025 में क्लोज किए गए मामलों के लिए यह सीमा 853 दिन निकली है, जो 150 प्रतिशत अधिक है. कॉमर्शियल टिब्यूनलों में सबसे ज्यादा पेंडिंग मामले डीआरटी में (2.45 लाख) हैं.
डीआरटी पहला ऐसा मंच है जहां वित्तीय संस्थान और बैंक अपने कर्ज की वसूली की गुहार लगा सकते हैं. अगर कोई लोन की किस्त देना बंद कर देता है तो बैंक उसके खिलाफ डीआरटी में केस करता है. दक्ष की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में फिलहाल 39 डीआरटी हैं और 18 राज्यों में डीआरटी है ही नहीं.
देश का सबसे पुराना ट्रिब्यूनल इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आइएटीए) दिल्ली के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में है. कॉर्पोरेट दफ्तर जैसे माहौल वाले इस ट्रिब्यूनल में इनकम टैक्स से जुड़े मामलों की अपील सुनी जाती है. आइटीएटी बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अजय वाधवा कहते हैं, ''हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि मेंबर (जज) की नियुक्ति चार साल के लिए होती है और उसकी उम्र नियुक्ति के वक्त 50 साल होनी चाहिए. 67 साल में वह सेवानिवृत्ति हो जाता है. रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जज और आयकर विभाग के रिटायर्ड अधिकारी यहां आते हैं. अफसरों का नजरिया न्यायिक के बजाए रेवेन्यू पैदा करने वाला होता है. इस ट्रिब्यूनल में पर्सनल असिस्टेंट और प्रशासनिक स्टाफ की बहुत कमी है जिससे साफ तौर पर कामकाज प्रभावित होता है.''
दिल्ली के खान मार्केट में है अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर फॉरफीटेड प्रॉपर्टी (एटीएफटी). तमिलनाडु की दिवंगत नेता जे. जयललिता की सहयोगी शशिकला से लेकर गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम और अन्य बदमाशों की जब्त संपत्ति के केस यहीं चले. अपराधियों और अपराध की कमाई से बनी संपत्ति की बरामदगी से जुड़े केस यहां मुख्य रूप से आते हैं. ट्रिब्यूनल में बेनामी संपत्ति निषेध कानून, नशीले पदार्थों के खिलाफ कानून (एनडीपीएस), विदेशी मुद्रा विनिमय कानून (फेमा), मनी लॉन्ड्रिंग कानून (पीएमएलए) जैसे कानूनों के तहत जब्त संपत्ति के मामलों में अपील पर सुनवाई होती है.
ये सभी फाइनेंशियल ऐक्ट हैं इसलिए यहां मामलों की संख्या काफी अधिक है. पहले फेरा बोर्ड था लेकिन 2016 में फेरा बोर्ड के केस यहां ट्रांसफर कर दिए जिससे बोझ बढ़ गया. एटीएफपी बार एसोसिशन के महासचिव प्रशांत पांडे कहते हैं, ''यहां स्टाफ की कमी है. 2019 तक काम ठीक था. उसके बाद नियुक्तियां ठप हो गईं. 2022 में नियुक्तियां हुईं और फिर मद्रास हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए जस्टिस एम.एन. भंडारी आए तब से काम पटरी पर आया. काम अब भी ज्यादा है.''
'स्टेट ऑफ ट्रिब्यूनल्स' रिपोर्ट के मुताबिक, हरेक ट्रिब्यूनल का संबंधित मंत्रालय अलग-अलग है और उनमें कई बार हितों का टकराव होता है क्योंकि कई मामलों में मंत्रालय ही पक्षकार होता है. आइटीएटी अपवाद है क्योंकि वह कानून मंत्रालय से जुड़ा है.

अटकने की वजह
> ट्रिब्यूनलों में स्टाफ की कमी. बुनियादी ढांचे और सुविधाओं की कमी
> टिब्यूनलों के जज (सदस्यों) का सीमित कार्यकाल
> मुकदमों की संख्या के मुकाबले जजों की काफी कम संख्या
> रिटायर्ड अधिकारियों की नियुक्ति जिन्हें उन कानूनों की विशेषज्ञता हासिल नहीं
> ज्यादातर कर्मचारी रिटायर्ड या आउटसोर्सिंग के जरिए रखे गए
> ट्रिब्यूनल अलग-अलग मंत्रालयों के अधीन हैं, इससे उनकी व्यवस्था सुधारने के एकमुश्त प्रयास नहीं होते
उपाय
> सरकार ट्रिब्यूनलों की संख्या घटाने और व्यवस्था सुधारने के लिए टिब्यूनल रिफॉर्म्स ऐक्ट 2021 ले आई, जिसके कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया
> सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से नेशनल ट्रिब्यूनल कमिशन बनाने को कहा
> हाइकोर्ट का दर्जा प्राप्त ट्रिब्यूनलों में हाइकोर्ट जैसी सुविधाएं और व्यवस्थाएं हों
कौन-किस मंत्रालय के तहत
> एनसीएलटी और एनसीएलएटी कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के तहत
> इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल कानून मंत्रालय
> अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी ऊर्जा मंत्रालय के तहत
> वित्त मंत्रालय के अलग-अलग विभागों के तहत कई ट्रिब्यूनल आते हैं. जैसे, सिक्योरिटी अपीलेट ट्रिब्यूनल वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर के तहत
> डीआरटी और डीआरएटी डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज के तहत
> कस्टम एक्साइज, सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल तथा गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू के तहत आते हैं.
सुधार के उपाय
केंद्र सरकार के ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स ऐक्ट, 2021 में जिन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल रद्द किया, उनमें मेंबर की 50 साल उम्र वाले प्रावधान भी शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से 2025 में ही नेशनल ट्रिब्यूनल कमिशन बनाने की बात कह चुका है.
इस पर अभी सरकार के भीतर मंथन चल रहा है क्योंकि ट्रिब्यूनल विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े हैं. ट्रिब्यूनल राज्य सरकारों के भी होते हैं, उनकी दिक्कतें भी कमोबेश एक जैसी हैं.
दिल्ली में तो नगर निगम और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के आदेशों के खिलाफ सुनवाई के लिए भी ट्रिब्यूनल है. देखना है कि ट्रिब्यूनलों को सुधारने के लिए बनने वाला आयोग कितना प्रभावी होता है.

