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जमीन पर काम, चुनाव में नाम

जेवर एयरपोर्ट समेत बड़े प्रोजेक्ट्स के सहारे योगी सरकार चुनाव से पहले विकास का संदेश देने में जुटी. दूसरी ओर विपक्ष रोजगार, किसान और जमीनी हकीकत के मुद्दों पर इस दावे को चुनौती दे रहा

जेवर एअरपोर्ट की शुरुआत करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 मार्च को वहां यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और अन्य के साथ
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2026

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही सियासी जमीन पर हलचल तेज हो चुकी है. सत्ता पक्ष ने इस बार चुनावी नैरेटिव को पारंपरिक जातीय समीकरणों से आगे ले जाकर 'विकास' के इर्द-गिर्द खड़ा करने की रणनीति बनाई है. इसी कड़ी में 28 मार्च को जेवर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन सिर्फ एक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का शुभारंभ नहीं, एक बड़े चुनावी अभियान की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मौके को पूरी तरह राजनैतिक संदेश में बदला. करीब 40 मिनट के भाषण में मोदी ने जहां अपनी सरकार की इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्धियों को गिनाया, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) पर हमला बोलते हुए कहा कि पहले नोएडा 'लूट का एटीएम' था, जिसे अब विकास के इंजन में बदला गया है.

यह बयान महज आलोचना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी लाइन है, जिसमें 'पिछली सरकार बनाम वर्तमान विकास मॉडल' का सीधा मुकाबला स्थापित किया जा रहा है. जेवर एयरपोर्ट को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 'विकसित यूपी' अभियान का प्रतीक बना रही है. 1.37 लाख वर्गमीटर में फैले इस एयरपोर्ट की शुरुआती क्षमता 1.2 करोड़ यात्रियों और 2.5 लाख मीट्रिक टन कार्गो हैंडलिंग की है, जिसे आगे बढ़ाकर 7 करोड़ यात्रियों और 18 लाख टन तक किया जा सकता है.

ये आंकड़े सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि चुनावी मंचों पर 'भविष्य की तस्वीर' के रूप में पेश किए जा रहे हैं. खास कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों—आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मेरठ, गाजियाबाद और बुलंदशहर—को इससे जोड़कर भाजपा एक क्षेत्रीय विकास कथा गढ़ने की कोशिश कर रही है.

दरअसल, पश्चिमी यूपी भाजपा के लिए हमेशा से रणनीतिक रूप से अहम रहा है. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने यहां 126 में से 85 सीटें जीतीं लेकिन 2017 के मुकाबले यह गिरावट थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मुजफ्फरनगर, कैराना और सहारनपुर जैसी सीटों पर नुक्सान ने पार्टी को सतर्क कर दिया है. ऐसे में जेवर एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे नेटवर्क और अन्य मेगा प्रोजेक्ट्स को मिलाकर भाजपा इस क्षेत्र में पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. इस कोशिश की धुरी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं.

एयरपोर्ट के उद्घाटन के मौके पर योगी ने इसे 'विकास का रनवे' करार दिया. योगी सरकार की रणनीति साफ है: पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे और प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स को जोड़कर एक ऐसा नैरेटिव बनाया जाए, जिसमें यूपी को इन्फ्रास्ट्रक्चर हब के रूप में दिखाया जा सके.

योगी सरकार ने एक्सप्रेसवे निर्माण को अपनी सरकार की सबसे प्रमुख योजनाओं में शामिल किया है. देश के सबसे लंबे गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन भी कुछेक महीनों में प्रस्तावित है. 2007 में मायावती की सरकार ने भी इस तरह के एक प्रोजेक्ट का आइडिया सोचा था और 2008 में बलिया में उन्होंने इसकी नींव भी रखी लेकिन वह प्रोजेक्ट कभी पूरा नहीं हो पाया. उसे पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी नहीं मिल पाई क्योंकि उसकी योजना गंगा नदी के किनारे-किनारे कई जगहों से गुजरने के हिसाब से बनाई गई थी.

वर्ष 2021 में एक अलग रास्ते के साथ इस नए प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई. चूंकि यह गंगा एक्सप्रेसवे प्रयागराज को जोड़ता है, इसलिए सरकार को इससे धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. इसकी वजह यह है कि पिछले वर्ष महाकुंभ के दौरान बड़ी संख्या में तीर्थयात्री सड़क के रास्ते ही प्रयागराज पहुंचे थे. इस प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाली 12 लोकसभा सीटों में से पांच सीटें इंडिया गठबंधन ने जीती थीं—तीन सपा ने और दो कांग्रेस ने (जिनमें राहुल गांधी की रायबरेली सीट भी शामिल है)—जबकि बाकी सीटें भाजपा के पास हैं.

यह उत्तर प्रदेश का पांचवां सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट होगा. इनमें से पहला यमुना एक्सप्रेसवे था, जिसे मायावती के कार्यकाल में बनाया गया था; दूसरा लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे, जिसे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार के दौरान बनाया गया था. पूर्वांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे योगी आदित्यनाथ के पिछले कार्यकाल में बनाए गए थे. गंगा एक्सप्रेसवे इन सभी एक्सप्रेसवे से कहीं ज्यादा लंबा और बड़ा प्रोजेक्ट है.

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा इस बार 'काम दिखाओ, वोट पाओ' मॉडल पर जोर दे रही है. लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अरविंद मोहन कहते हैं, ''भाजपा ने 2017 में मोदी लहर और 2022 में कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाया था. 2027 में पार्टी विकास को केंद्रीय मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ना चाहती है. जेवर एयरपोर्ट इसका फ्लैगशिप प्रोजेक्ट है.'' 

हालांकि विपक्ष इस नैरेटिव को चुनौती देने में जुट गया है. समाजवादी पार्टी का आरोप है कि भाजपा 'इवेंट मैनेजमेंट' के जरिए विकास का दिखावा कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत अलग है. पार्टी नेताओं का कहना है कि एयरपोर्ट और एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स का फायदा आम किसान और बेरोजगार युवा तक नहीं पहुंच रहा. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पहले भी यह आरोप लगा चुके हैं कि भाजपा सरकार सिर्फ 'कट ऐंड पेस्ट' प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन कर रही है, जिनकी नींव पिछली सरकारों में रखी गई थी. जेवर एयरपोर्ट के संदर्भ में भी विपक्ष याद दिला रहा है कि इसका विचार 2001 में आया था और विभिन्न सरकारों के दौरान यह आगे-पीछे होता रहा.

जेवर एयरपोर्ट की कहानी यूपी की राजनीति के उतार-चढ़ाव को दिखाती है. 2001 में प्रस्तावित यह प्रोजेक्ट मायावती सरकार में 'ताज इंटरनेशनल एविएशन हब' के रूप में आगे बढ़ा पर नीतिगत और सियासी वजहों से अटक गया. 2016 में केंद्र सरकार के दो हवाईअड्डों के बीच 150 किमी की दूरी के नियम में ढील और 2017 में भाजपा सरकार के आने के बाद इसमें तेजी आई.

ऐसे में यह तर्क पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता कि परियोजना बहुदलीय योगदान का परिणाम है. कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है. उसका आरोप है कि बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर जमीन अधिग्रहण में किसानों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला और रोजगार के वादे भी पूरे नहीं हुए. पार्टी का कहना है कि विकास तभी सार्थक है जब उसका लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचे.

भाजपा की रणनीति सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं, बल्कि उनके लोकार्पण को एक सतत अभियान में बदलने की है. पिछले कुछ महीनों में मोदी और योगी ने कई परियोजनाओं का उद्घाटन या शिलान्यास किया है—चाहे वह सेमीकंडक्टर यूनिट हो, दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल या वाराणसी में प्रस्तावित रोपवे. सरकार इन के जरिए संदेश देना चाहती है कि विकास सिर्फ वादा नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाली हकीकत है.

एक वरिष्ठ भाजपा नेता के मुताबिक, ''रणनीति यह है कि चुनाव से पहले हर महीने कोई-न-कोई बड़ा प्रोजेक्ट जनता के सामने लाया जाए, ताकि विकास का माहौल लगातार बना रहे.'' पर इस रणनीति के अपने जोखिम भी हैं. इन प्रोजेक्ट्स का सीधा लाभ लोगों तक न पहुंचा, तो विपक्ष इसे 'जुमला' करार देने में देर नहीं करेगा. खासतौर पर बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की आय जैसे मुद्दे अभी भी बड़े सवाल बने हुए हैं.

चुनावी जमीन तैयार करेंगे ये प्रोजेक्ट

> गंगा एक्सप्रेसवे देश के इस सबसे लंबे एक्सप्रेसवे का शिलान्यास 18 दिसंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. लगभग 36,200 करोड़ रुपए लागत वाली 594 किमी लंबी परियोजना 12 जिलों से गुजरते हुए मेरठ से प्रयागराज को जोड़ती है. निर्माण 95 प्रतिशत पूरा. 

> लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट का शिलान्यास दिसंबर 2020 में हुआ था. करीब 4,700 करोड़ रुपए की लागत से बन रही 63 किमी लंबी यह परियोजना लखनऊ को कानपुर से जोड़ेगी. इससे यात्रा समय डेढ़ घंटे से घटकर 40-45 मिनट रह जाएगा. 98 फीसद काम पूरा.

> क्रिकेट स्टेडियम वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का शिलान्यास 23 सितंबर, 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. 450 करोड़ रुपए की लागत से काशी की सांस्कृतिक थीम पर बन रहे इस स्टेडियम में 30,000 दर्शकों की क्षमता होगी. 80 फीसद निर्माण कार्य पूरा.

> खेल विश्वविद्यालय मेरठ में यूपी के पहले मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय का शिलान्यास 2 जनवरी, 2021 को हुआ था. 700 करोड़ रुपए लागत से बन रही इस परियोजना में आधुनिक स्टेडियम, प्रशिक्षण केंद्र और खेल विज्ञान सुविधाएं विकसित की जा रही हैं. मई, 2026 तक पूरा होने का लक्ष्य.

> इंडस्ट्रियल सिटी नोएडा के बाद यूपी की दूसरी बड़ी औद्योगिक सिटी झांसी में बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल सिटी का शिलान्यास 2023 में हुआ. 5,000 करोड़ रुपए की लागत से इस वर्ष के अंत तक विकसित होने वाली यह परियोजना औद्योगिक प्लॉट, लॉजिस्टिक्स हब और बेहतर कनेक्टिविटी से लैस होगी.

> रोपवे प्रोजेक्ट काशी में 800 करोड़ रुपए की लागत से निर्माणाधीन देश की पहली रोपवे अर्बन ट्रांसपोर्ट परियोजना का 'टेस्ट ड्राइव' चल रहा है. यह रोपवे कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया तक लगभग 3.8 किमी लंबा होगा. इससे यह दूरी 16 मिनट में तय होगी.

उद्घाटन हुआ, 'उड़ान' अभी बाकी

जेवर एयरपोर्ट से पश्चिमी यूपी में निवेश, कनेक्टिविटी और रोजगार को रफ्तार मिलेगी. लेकिन संचालन, प्रतिस्पर्धा और इन्फ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां तय करेंगी इसकी सफलता

उत्तर प्रदेश के नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट या जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन भले हो चुका हो लेकिन कॉमर्शियल उड़ान के लिए कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा. एयरपोर्ट पर सुरक्षा को लेकर ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन (बकास) की एक और रिपोर्ट आनी है. रिपोर्ट जमा होने के 45 दिनों में घरेलू उड़ानें शुरू हो सकेंगी.

हालांकि 36,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की लागत वाली यह परियोजना केवल एक हवाई अड्डा नहीं बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के विकास मॉडल की परीक्षा है. यह तय करेगा कि क्या यूपी बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध शहरीकरण और आर्थिक विस्तार को संतुलित तरीके से लागू कर सकता है.

पहले चरण में 11,200 करोड़ रुपए के निवेश के साथ 1,334 हेक्टेयर में विकसित यह एयरपोर्ट पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर आधारित है. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि जेवर एयरपोर्ट के साथ सबसे बड़ा बदलाव कनेक्टिविटी और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में देखने को मिलेगा. नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र पहले से ही योजनाबद्ध शहरी विकास के उदाहरण हैं लेकिन एयरपोर्ट के संचालन के बाद यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कई गुना बढ़ेगा.

सरकार और प्राधिकरण एयरपोर्ट तक निर्बाध पहुंच पक्की करने के लिए मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी पर काम कर रहे हैं. डीएनडी, चिल्ला बॉर्डर, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे और यमुना एक्सप्रेसवे को जोड़ने वाला पूरा कॉरिडोर हाइटेक ट्रैफिक मैनेजमेंट से लैस होगा. बस स्टैंड्स को स्मार्ट टर्मिनल में बदला जाएगा, जहां रियल-टाइम सूचना प्रणाली होगी. कैब और ऐप आधारित ट्रांसपोर्ट सेवाएं भी एआइ-आधारित डिमांड मैनेजमेंट के जरिए काम करेंगी, जिसमें 'जीरो वेटिंग' का लक्ष्य रखा गया है. यह सब मिलकर इस क्षेत्र को एक आधुनिक ट्रांसपोर्ट हब में बदल सकता है.

एयरपोर्ट आधारित विकास मॉडल दुनिया भर में शहरी विस्तार का बड़ा कारक रहा है और जेवर में भी यही पैटर्न देखने को मिल रहा है. एयरपोर्ट के आसपास कमर्शियल, लॉजिस्टिक्स, हॉस्पिटैलिटी और रेजिडेंशियल सेक्टर में निवेश तेजी से बढ़ रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, यह क्षेत्र एनसीआर में एक नए रियल एस्टेट कॉरिडोर के रूप में उभर सकता है. पूर्व टाउन प्लानर अजय मिश्र बताते हैं, ''अभी तक जो निवेश गुरुग्राम और नोएडा के स्थापित क्षेत्रों में केंद्रित था, वह अब यमुना एक्सप्रेसवे की ओर शिफ्ट हो सकता है.

अपेक्षाकृत सस्ती जमीन और बेहतर प्लानिंग इसे निवेशकों के लिए आकर्षक बनाते हैं. एयरपोर्ट का 80 एकड़ में फैला कार्गो हब इसे एक 'लॉजिस्टिक्स पावरहाउस' बना सकता है. इसे हर साल 25 लाख मीट्रिक टन कार्गो संभालने के लिए डिजाइन किया गया है.''

गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद पहले से ही इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के कार्गो का बड़ा हिस्सा संभालते हैं. ऐसे में जेवर एयरपोर्ट को स्वाभाविक बढ़त मिलेगी. यह न केवल निर्यात-आयात को आसान बनाएगा, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को भी आकर्षित करेगा.

दूसरे चरण में प्रस्तावित मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) हब इस परियोजना का सबसे रणनीतिक हिस्सा हो सकता है. अभी अपने 80-85 फीसद विमान रखरखाव के लिए भारत विदेश पर निर्भर है. एविएशन सेक्टर में वरिष्ठ पद पर काम कर रहे अमित कुमार बताते हैं, ''यदि जेवर में एमआरओ हब सफल होता है, तो यह न केवल एयरलाइंस की लागत कम करेगा बल्कि भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है.''

बोइंग और एयरबस जैसी कंपनियों को आकर्षित करने की योजना इस दिशा में बड़ा कदम है. इससे हजारों रोजगार भी पैदा होंगे: इंजीनियर, टेक्नीशियन, लॉजिस्टिक्स और सर्विस सेक्टर में. यह एयरपोर्ट ताज महल, कुंभ मेला, मथुरा और वृंदावन जैसे प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों के लिए नया प्रवेश द्वार भी बनेगा.

प्राइसवाटरहाउसकूपर्स यानी पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आने वाले लगभग 18 फीसद यात्री ताज महल देखने जाते हैं और उनमें से 60 फीसद आगरा के करीब जेवर एयरपोर्ट को प्राथमिकता देंगे. इससे विदेशी पर्यटन को सीधा फायदा मिल सकता है.

इतनी बड़ी परियोजना के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं. सबसे पहली चुनौती है समय पर संचालन और नियामकीय मंजूरी. अभी भी अंतिम सुरक्षा और लाइसेंसिंग प्रक्रियाएं बाकी हैं, जिनके बाद ही उड़ानें शुरू होंगी. दूसरी बड़ी चुनौती कनेक्टिविटी की है. एयरपोर्ट तक पहुंच आसान और तेज न हुई तो यात्री इंदिरा गांधी हवाई अड्डे को प्राथमिकता देना जारी रख सकते हैं. तीसरा मुद्दा प्रतिस्पर्धा का है. शुरुआती वर्षों में दोनों एयरपोर्ट्स के बीच एयरलाइंस, रूट्स और यात्रियों के लिए स्पर्धा होगी. इसके अलावा, बड़े पैमाने पर शहरीकरण के साथ ट्रैफिक, पर्यावरण और संसाधनों पर दबाव भी बढ़ेगा. हालांकि परियोजना को 'कार्बन न्यूट्रल' बनाने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन इसे व्यवहार में लागू करना एक बड़ी चुनौती होगा.

चार चरण में पूरा होगा निर्माण

नोएडा एयरपोर्ट के पहले चरण का निर्माण 1,334 हेक्टेयर में करीब 4,500 करोड़ रुपए की लागत से पूरा हुआ. 3,900 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे बनकर तैयार है. क्षमता 1.2 करोड़ यात्री प्रति वर्ष.

वर्ष 2030 में 5,900 करोड़ रुपए से जेवर एयरपोर्ट का दूसरा चरण बनकर तैयार होगा. इसमें दो रनवे होंगे और विमानों का 'मेंटेंनेंस, रिपेयर, ओवरहॉल' (एमआरओ) हब भी होगा. कुल क्षमता 3 करोड़ यात्री प्रति वर्ष होगी.

वर्ष 2034 तक 8,400 करोड़ रुपए की लागत से पूरा होने वाले तीसरे चरण में एयरपोर्ट की दूसरी टर्मिनल बिल्डिंग का निर्माण होगा. कुल क्षमता बढ़कर 5 करोड़ यात्री प्रति वर्ष हो जाएगी. 

वर्ष 2036 तक 10,000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले चौथे चरण में एयरोस्पेस हब के निर्माण के साथ कार्गो सुविधा का विस्तार होगा. कुल क्षमता बढ़कर 7 करोड़ यात्री प्रति वर्ष हो जाएगी. 

इस एयरपोर्ट पर कुल पांच रनवे बनाने की योजना है. 5,100 हेक्टेयर में विस्तृत जेवर एयरपोर्ट एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट होगा. इसका विस्तार इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से करीब ढाई गुना अधिक होगा.

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