-अरुण पुरी
अप्रैल 2026 में होने वाले चार विधानसभा चुनाव केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा के लिए बेहद अहम हैं. भले ही इन राज्यों का भूगोल सीमित हो लेकिन राजनैतिक मायने काफी बड़े हैं. भाजपा के लिए ये सिर्फ राज्य चुनाव नहीं, बल्कि उन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की परीक्षा हैं जहां उसके पैर जम नहीं पाए हैं.
असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल—इन चार राज्यों में से भाजपा को सत्ता अब तक सिर्फ असम में मिली है, वह भी पिछले एक दशक से. बंगाल में 2021 के चुनाव में पार्टी ने अच्छी बढ़त जरूर दिखाई थी. 2016 में जहां उसके पास सिर्फ तीन सीटें थीं, वहीं 2021 में वह 294 सीटों वाली विधानसभा में 77 सीटें जीतने में कामयाब रही.
इसके बावजूद ये राज्य अब भी भाजपा के लिए आसान जमीन नहीं बने हैं. दरअसल, इन राज्यों की अपनी अलग राजनैतिक संस्कृति है, जो लंबे समय से भाजपा की विचारधारा से अलग रही है.
यही वजह है कि इन इलाकों को विपक्ष का मजबूत गढ़ माना जाता है. ऐसे में इन किलों को तोड़ना लंबे समय से भाजपा के एजेंडे में रहा है. अगर हालात जस के तस रहते हैं, तो भाजपा के लिए चुनौती बनी रहेगी. लेकिन अगर पार्टी यहां अपनी पकड़ मजबूत करती है, तो इससे उसकी राष्ट्रीय छवि पर बड़ा असर पड़ेगा. ये चुनाव इस बात को भी तय करेंगे कि भाजपा खुद को 'सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी' वाली छवि से कितना बाहर निकाल पाती है. 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह शायद आखिरी बड़ा मौका है. इसके बाद जिन राज्यों में चुनाव होंगे, वे ज्यादातर ऐसे इलाकों में होंगे जहां भाजपा मजबूत है.
इन चुनावों का असर सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं, विपक्ष के लिए भी इनके संकेत राष्ट्रीय राजनीति तक जाएंगे. सबसे ज्यादा नजर पश्चिम बंगाल पर है, जहां भाजपा और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी और कड़ी टक्कर है. अगर भाजपा उन्हें हरा देती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में बंगाल की 42 सीटों का रास्ता काफी हद तक खुल सकता है. लेकिन अगर ममता अपनी जमीन बचा लेती हैं, तो यह जीत उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के सबसे मजबूत नेताओं में खड़ा कर देगी.
71 साल की ममता अगर लगातार चौथी बार जीत हासिल करती हैं, वह भी भाजपा जैसी ताकतवर पार्टी को हराकर, तो यह उनकी राजनैतिक पकड़ और मजबूती का बड़ा सबूत होगा. दक्षिण भारत में भी यह चुनाव कम अहम नहीं. कांग्रेस के लिए केरल बेहद महत्वपूर्ण है. अगर यहां जीत मिलती है, तो पार्टी के पास दक्षिण के तीन राज्यों में सत्ता होगी. साथ ही तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की डीएमके अगर सत्ता में बनी रहती है, तो कांग्रेस का प्रभाव एक और राज्य में बना रहेगा. भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है. दक्षिण भारत में जहां वह अभी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है, वहां विपक्ष का मजबूत होना उसके लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है.
जमीन पर देखें तो ये चुनाव सिर्फ पार्टियों की लड़ाई नहीं, बल्कि नेताओं की निजी साख की भी परीक्षा बन गए हैं. चारों राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय चेहरे हैं, और हरेक के सामने ऐसा मोड़ है जो उनके राजनैतिक भविष्य को तय कर सकता है. इनके लिए यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि अपने पूरे दौर को बचाने की लड़ाई है. इसे हम 'क्षत्रपों की अग्निपरीक्षा' कह सकते हैं.
असम में हेमंत बिस्व सरमा इस मुकाबले में भाजपा का इकलौता बड़ा चेहरा हैं. पिछले 20 साल से राज्य की राजनीति पर उनकी मजबूत पकड़ रही है, लेकिन अब वे पहली बार मुख्यमंत्री रहते चुनाव मैदान में उतर रहे हैं. 57 साल के सरमा के लिए यह चुनाव सिर्फ जीत का नहीं, बल्कि अपनी स्वीकार्यता साबित करने का भी है. वहीं बंगाल में ममता बनर्जी पर सत्ता का बोझ पहले से ज्यादा भारी नजर आता है. 15 साल से वे मुख्यमंत्री हैं और दो बार भाजपा को कड़ी टक्कर देकर सत्ता बचा चुकी हैं. तीसरी बार लगातार सत्ता बचाने की कोशिश में उन्हें शायद पहले से ज्यादा किस्मत का साथ भी चाहिए होगा.
तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन बाहर से काफी मजबूत और ठोस नजर आते हैं. वे ऐसे राजनैतिक और वैचारिक इलाके की रखवाली कर रहे हैं, जहां भाजपा को अब तक खास जगह नहीं मिली है. लेकिन 73 साल के स्टालिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं. उनके कार्यकाल के दौरान कुछ हद तक एंटी-इन्कंबेंसी बनी है, जिसे डीएमके की पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पार्टी और भाजपा के समर्थन वाली अन्नाद्रमुक एक मौके के तौर पर देख रही है. इसके अलावा अभिनेता विजय की नई पार्टी तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) मुकाबले को और दिलचस्प और अनिश्चित बना रही है.
केरल में लेफ्ट के दिग्गज पिनाराई विजयन 80 साल की उम्र में शायद आखिरी बार बड़ा दांव खेल रहे हैं. कहा जा रहा है कि उन्होंने अब तक स्पष्ट रूप से कोई उत्तराधिकारी तैयार नहीं किया, जो आगे पार्टी को संभाल सके. दूसरी तरफ कांग्रेस ने हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है, जिससे उसे उम्मीद बंधी है. लेकिन पार्टी की पुरानी समस्या यानी अंदरूनी गुटबाजी, अक्सर जीत के मौके को कमजोर कर देती है.
इन चुनावों पर दो बड़े मुद्दे साफ असर डाल रहे हैं. पहला है वोटर लिस्ट का विवादित स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआइआर). सबसे ज्यादा असर पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है, जहां इसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद भी खड़ा हुआ है. पहले चरण में ही करीब 63 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए. इसके बाद करीब 60 लाख और नामों की जांच चल रही है, जिनमें से अब तक करीब 45 फीसद नाम हटाए जा चुके हैं.
करीब 11 लाख नामों पर अभी प्रक्रिया जारी है. तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि जिन नामों को हटाया गया है, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम बहुल इलाकों की है, जो ममता बनर्जी का मजबूत वोट बैंक माने जाते हैं. वहीं असम में इस तरह का रिविजन नहीं हुआ, लेकिन 2023 की परिसीमन प्रक्रिया ने वहां पहले ही चुनावी नक्शा बदल दिया था. 126 सीटों वाली विधानसभा में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 36 से घटकर 22 रह गई है.
दूसरा बड़ा मुद्दा है वेलफेयर पॉलिटिक्स का बढ़ता असर. चारों राज्यों में कोई भी नेता एंटी-इन्कंबेंसी से पूरी तरह बचा नहीं है. यही वजह है कि हर कोई अब लक्षित योजनाओं पर जोर दे रहा है, खासकर महिलाओं के लिए. आज महिला वोटर सबसे निर्णायक वर्ग बनती जा रही हैं और चुनावी नतीजों पर उनका असर साफ दिख रहा है. यह आवरण कथा इन सभी बड़े नैरेटिव को एक साथ जोड़ती है. इसमें ताकत और कमजोरियों, दोनों को समझाया गया है, साथ ही उन आंकड़ों को भी रखा गया है जिन पर पूरी राजनीति टिकी है. इससे आपको 2029 से पहले होने वाले इस अहम चुनाव को समझने और ट्रैक करने में मदद मिलेगी.

